सबदि मंनिऐ गुरु पाईऐ विचहु आपु गवाइ ॥ अनदिनु भगति करे सदा साचे की लिव लाइ ॥ नामु पदारथु मनि वसिआ नानक सहजि समाइ ॥4॥19॥52॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: अगर गुरू के शबद में श्रद्धा बन जाए तो गुरू मिल जाता है (जो मनुष्य गुरू के शबद में श्रद्धा बनाता है वह अपने) अंदर से अहम् दूर कर लेता है। वह हर वक्त सदा स्थिर प्रभु के चरणों में सुरति जोड़ के सदा उसकी भक्ति करता है। हे नानक ! उस के मन में परमात्मा का अमुल्य नाम आ बसता है। वह आत्मिक अडोलता में भी टिका रहता है।4।19।52।
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 3 ॥ जिन लोगों ने गुरू की बताई हुई सेवा नहीं की, वह चारों युगों में दुखी रहते हैं। (अर्थात, युग चाहे कोई भी हो गुरू की शरण के बिना दुख है)। वो मनुष्य हृदय घर में बसते परमात्मा को नहीं पहिचान सकते, वह अहंकार में अभिमान में (फंसे रहके आत्मिक जीवन की रास पूँजी) लुटा बैठते हैं। गुरू द्वारा बेमुख मनुष्य जगत में मांगते फिरते है। (माया खातिर भटकते फिरते हैं)। वह बंदे उस अटल गुर शबद को नहीं सिमरते जो सारे कार्य सवारने में समर्थ है।1। हे मेरे मन ! परमात्मा को सदा (अपने) अंग संग देख। परमात्मा (जीवों का) जन्म-मरन का दूख दूर कर देता है। वह गुरू के शबद में भरपूर बस रहा है (इस वास्ते, हे मन ! गुरू का शबद अपने अंदर धारण कर)।1।रहाउ। जो मनुष्य सदा स्थिर प्रभु की सिफत सलाह करते हैं वह उस सदा स्थिर का ही रूप् हो जाते हैं। परमात्मा का सदा स्थिर नाम उनकी (जिंदगी का) आसरा बन जाता है। जिन्होंने सिमरन की ये सदा स्थिर रहने वाली कार की है, उनका प्यार सदा स्थिर प्रभु से बन जाता है। परमात्मा ही सदा स्थिर रहने वाला शाह है, (जिसका हुकम जगत में) चल रहा है। कोई भी जीव उसके हुकम की उलंघना नहीं कर सकता। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य परमात्मा का दर घर नहीं ढूंढ सकता। नाशवंत जगत के व्यापारी झूठे मोह में ही (आत्मिक जीवन की रास पूँजी) ठगा बैठते हैं।2। जगत ‘मैं मैं’ करता ही (भाव, मैं बड़ा हूं, मैं बड़ा हूं- इस अहंकार में) जीव आत्मिक मौत ले लेता है। गुरू की शरण से वंचित रह कर (उसके जीवन में) घोर अंधकार (बना रहता) है। माया के मोह में फस के (इस ने) सुखदायक और सभ पदार्थ देने वाले परमात्मा को भुला दिया है। जब जीव गुरू की बताई हुई सेवा करते हैं, तब (माया के मोह के घोर अंधेरे में) बच जाते हैं तथा सदा स्थिर प्रभु को अपने दिल में बसा के रखते हैं। प्रभु अपनी मेहर से ही मिलता है। (सिमरन से ही) सदा स्थिर गुरू शबद के द्वारा (उस के गुणों की) विचार की जा सकती है।3। गुरू द्वारा बताई सेवा करके अहम् से पैदा होने वाले विकार छोड़ के (मनुष्य का) मन पवित्र हो जाता है। गुरू के शबद द्वारा (प्रभु के गुणों के) विचार (हृदय में टिका के), और स्वै-भाव दूर करके मनुष्य दुनिया के कार्य-व्यवहार करता हुआ विकारों से बचा रहता है। जिन मनुष्यों का सदा स्थिर प्रभु (के चरणों में) प्यार बन जाता है, वह मोह के झमेलों की भटकनों से बच जाते हैं। सदा स्थिर प्रभु के रंग में रंगे हुए लोग सदा स्थिर प्रभु के दरबार में सुर्खरू हो जाते हैं।4। जिन लोगों ने सतगुरू को (अपने जीवन का रहिबर) नहीं माना, जिन का गुरू शबद में प्यार नहीं बना, वे जितना भी (तीर्थ) स्नान करते हैं, जितना भी दान पुंन करते हैं, माया के प्यार के कारण वह सारा उन्हें खुआर ही करता है। जब परमात्मा खुद अपनी मेहर करे, तब ही जीव का उसके नाम से प्यार बनता है। हे नानक! गुरू के अटुट प्रेम की बरकति सेआप परमात्मा का नाम (अपने हृदय में) सम्भाल के रख।5।20।53।
सिरीरागु महला 3 ॥ किसु हउ सेवी किआ जपु करी सतगुर पूछउ जाइ ॥ सतगुर का भाणा मंनि लई विचहु आपु गवाइ ॥ एहा सेवा चाकरी नामु वसै मनि आइ ॥ नामै ही ते सुखु पाईऐ सचै सबदि सुहाइ ॥1॥ मन मेरे अनदिनु जागु हरि चेति ॥ आपणी खेती रखि लै कूंज पड़ैगी खेति ॥1॥ रहाउ ॥ मन कीआ इछा पूरीआ सबदि रहिआ भरपूरि ॥ भै भाइ भगति करहि दिनु राती हरि जीउ वेखै सदा हदूरि ॥ सचै सबदि सदा मनु राता भ्रमु गइआ सरीरहु दूरि ॥ निरमलु साहिबु पाइआ साचा गुणी गहीरु ॥2॥ जो जागे से उबरे सूते गए मुहाइ ॥ सचा सबदु न पछाणिओ सुपना गइआ विहाइ ॥ सुंञे घर का पाहुणा जिउ आइआ तिउ जाइ ॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 3 ॥ जब मैं अपने गुरू से पूछता हूँ कि (विकारों से बचनेके लिए) मैं किस की सेवा करूँ और कौन सा जप करूँ। (तो गुरू की ओर से उपदेश मिलता है कि) मैं अपने अंदर के अहंकार को दूर करके गुरू का हुकम मानूं। (गुरू का हुकम मानना ही एक) ऐसी सेवा है एैसी चाकरी है (जिसकी बरकति से परमात्मा का) नाम मन में आ बसता है। परमात्मा के नाम से ही आत्मिक आनन्द मिलता है, और परमात्मा की सिफत सलाह की बाणी से ही आत्मिक जीवन खूबसूरत बन जाता है।1। हे मेरे मन ! हर वक्त (विकारों के हमले से) सुचेत रह और परमात्मा का नाम सिमर। इस तरह अपने आत्मिक जीवन की फसल (इन विकारों से) बचा ले। अंत को आपके उम्र के खेत में कूँज आ पड़ेगी (भाव, वृद्ध अवस्था आ पहुँचेगी)।1।रहाउ। जो लोग परमात्मा के अदब व प्रेम में रह के उसकी भक्ति दिन रात करते हैं, उनके मन की इच्छाएं पूरी हो जाती हैं (अर्थात, मन कामना रहित हो जाता है)। गुरू के शबद की बरकति से उनको परमात्मा हर जगह व्यापक दिखता है (उन्हें यकीन बन जाता है कि) परमात्मा हर जगह हाजर-नाजर (हो के सभ जीवों की) संभाल करता है। उनका मन सदा स्थिर प्रभु की सिफत सलाह की बाणी में रंगा रहता है। भटकन उनके शरीर में से बिल्कुल ही खत्म हो जाती है। वह सदा स्थिर रहने वाले गुणों के खजाने पवित्र स्वरूप मालक प्रभु को मिल जाते हैं।2। जो लोग (माया के हमलों से) सुचेत रहते हैं, वह (विकारों से) बच जाते हैं। जो (माया की) नींद में सो जाते हैं, वे आत्मिक जीवन की राशि पूँजी लुटा जाते हैं। वो सदा स्थिर प्रभु की सिफत सलाह की बाणी की सार नहीं जानते। उनकी जिंदगी सुपने की तरह (व्यर्थ) बीत जाती है। वह जगत से ठीक उसी तरह खाली हाथ चले जाते हैं जैसे किसी सूने घर से कोई मेहमान आ के चला जाता है।
श्री राग का सुर शाम के उतार पर बैठा है, जब दिन की चमक थक चुकी होती है। ग्रंथ साहिब की राग-व्यवस्था का यह पहला नाम है, और इसकी गम्भीरता उसी क्रम का संकेत है। पंजाब के पुराने सिख घरों में आज भी, सूर्यास्त के क़रीब, इसी राग की रचनाएँ कीर्तन-संगति का केन्द्र होती हैं। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।
अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “अगर गुरू के शबद में श्रद्धा बन जाए तो गुरू मिल जाता है (जो मनुष्य गुरू के शबद में श्रद्धा बनाता है वह अपने) अंदर से अहम् दूर कर लेता है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।