अंग
342
गउड़ी
अंग बदलें या अंश चुनें · 1 अंश
· बावन अखरी · राग गउड़ी
बंदक होइ बंध सुधि लहै ॥29॥
बंदक होइ बंध सुधि लहै ॥29॥
भभा भेदहि भेद मिलावा ॥
अब भउ भानि भरोसउ आवा ॥
जो बाहरि सो भीतरि जानिआ ॥
भइआ भेदु भूपति पहिचानिआ ॥30॥
ममा मूल गहिआ मनु मानै ॥
मरमी होइ सु मन कउ जानै ॥
मत कोई मन मिलता बिलमावै ॥
मगन भइआ ते सो सचु पावै ॥31॥
ममा मन सिउ काजु है मन साधे सिधि होइ ॥
मन ही मन सिउ कहै कबीरा मन सा मिलिआ न कोइ ॥32॥
इहु मनु सकती इहु मनु सीउ ॥
इहु मनु पंच तत को जीउ ॥
इहु मनु ले जउ उनमनि रहै ॥
तउ तीनि लोक की बातै कहै ॥33॥
यया जउ जानहि तउ दुरमति हनि करि बसि काइआ गाउ ॥
रणि रूतउ भाजै नही सूरउ थारउ नाउ ॥34॥
रारा रसु निरस करि जानिआ ॥
होइ निरस सु रसु पहिचानिआ ॥
इह रस छाडे उह रसु आवा ॥
उह रसु पीआ इह रसु नही भावा ॥35॥
लला ऐसे लिव मनु लावै ॥
अनत न जाइ परम सचु पावै ॥
अरु जउ तहा प्रेम लिव लावै ॥
तउ अलह लहै लहि चरन समावै ॥36॥
ववा बार बार बिसन सम्हारि ॥
बिसन संम्हारि न आवै हारि ॥
बलि बलि जे बिसनतना जसु गावै ॥
विसन मिले सभ ही सचु पावै ॥37॥
वावा वाही जानीऐ वा जाने इहु होइ ॥
इहु अरु ओहु जब मिलै तब मिलत न जानै कोइ ॥38॥
ससा सो नीका करि सोधहु ॥
घट परचा की बात निरोधहु ॥
घट परचै जउ उपजै भाउ ॥
पूरि रहिआ तह त्रिभवण राउ ॥39॥
खखा खोजि परै जउ कोई ॥ जो खोजै सो बहुरि न होई ॥
खोज बूझि जउ करै बीचारा ॥
तउ भवजल तरत न लावै बारा ॥40॥
ससा सो सह सेज सवारै ॥
सोई सही संदेह निवारै ॥
अलप सुख छाडि परम सुख पावा ॥
तब इह त्रीअ ओुहु कंतु कहावा ॥41॥
हाहा होत होइ नही जाना ॥
जब ही होइ तबहि मनु माना ॥
है तउ सही लखै जउ कोई ॥
तब ओही उहु एहु न होई ॥42॥
लिंउ लिंउ करत फिरै सभु लोगु ॥
ता कारणि बिआपै बहु सोगु ॥
लखिमी बर सिउ जउ लिउ लावै ॥
सोगु मिटै सभ ही सुख पावै ॥43॥
खखा खिरत खपत गए केते ॥
खिरत खपत अजहूं नह चेते ॥
अब जगु जानि जउ मना रहै ॥
जह का बिछुरा तह थिरु लहै ॥44॥
भभा भेदहि भेद मिलावा ॥
अब भउ भानि भरोसउ आवा ॥
जो बाहरि सो भीतरि जानिआ ॥
भइआ भेदु भूपति पहिचानिआ ॥30॥
ममा मूल गहिआ मनु मानै ॥
मरमी होइ सु मन कउ जानै ॥
मत कोई मन मिलता बिलमावै ॥
मगन भइआ ते सो सचु पावै ॥31॥
ममा मन सिउ काजु है मन साधे सिधि होइ ॥
मन ही मन सिउ कहै कबीरा मन सा मिलिआ न कोइ ॥32॥
इहु मनु सकती इहु मनु सीउ ॥
इहु मनु पंच तत को जीउ ॥
इहु मनु ले जउ उनमनि रहै ॥
तउ तीनि लोक की बातै कहै ॥33॥
यया जउ जानहि तउ दुरमति हनि करि बसि काइआ गाउ ॥
रणि रूतउ भाजै नही सूरउ थारउ नाउ ॥34॥
रारा रसु निरस करि जानिआ ॥
होइ निरस सु रसु पहिचानिआ ॥
इह रस छाडे उह रसु आवा ॥
उह रसु पीआ इह रसु नही भावा ॥35॥
लला ऐसे लिव मनु लावै ॥
अनत न जाइ परम सचु पावै ॥
अरु जउ तहा प्रेम लिव लावै ॥
तउ अलह लहै लहि चरन समावै ॥36॥
ववा बार बार बिसन सम्हारि ॥
बिसन संम्हारि न आवै हारि ॥
बलि बलि जे बिसनतना जसु गावै ॥
विसन मिले सभ ही सचु पावै ॥37॥
वावा वाही जानीऐ वा जाने इहु होइ ॥
इहु अरु ओहु जब मिलै तब मिलत न जानै कोइ ॥38॥
ससा सो नीका करि सोधहु ॥
घट परचा की बात निरोधहु ॥
घट परचै जउ उपजै भाउ ॥
पूरि रहिआ तह त्रिभवण राउ ॥39॥
खखा खोजि परै जउ कोई ॥ जो खोजै सो बहुरि न होई ॥
खोज बूझि जउ करै बीचारा ॥
तउ भवजल तरत न लावै बारा ॥40॥
ससा सो सह सेज सवारै ॥
सोई सही संदेह निवारै ॥
अलप सुख छाडि परम सुख पावा ॥
तब इह त्रीअ ओुहु कंतु कहावा ॥41॥
हाहा होत होइ नही जाना ॥
जब ही होइ तबहि मनु माना ॥
है तउ सही लखै जउ कोई ॥
तब ओही उहु एहु न होई ॥42॥
लिंउ लिंउ करत फिरै सभु लोगु ॥
ता कारणि बिआपै बहु सोगु ॥
लखिमी बर सिउ जउ लिउ लावै ॥
सोगु मिटै सभ ही सुख पावै ॥43॥
खखा खिरत खपत गए केते ॥
खिरत खपत अजहूं नह चेते ॥
अब जगु जानि जउ मना रहै ॥
जह का बिछुरा तह थिरु लहै ॥44॥
हिन्दी अर्थ: वह (प्रभू के दर का) ढाढी बन के (माया के मोह की) जंजीरों का भेद पा लेता है (और इनके धोखे में नहीं आता)। 29। जो मनुष्य (प्रभू से बनी हुई) दूरी को समाप्त करके (अपने मन को प्रभू की याद में) जोड़ता है। उस याद की बरकति से (सांसारिक) डर दूर करने से उसे प्रभू में श्रद्धा बन जाती है। जो परमात्मा सारे जगत में व्यापक है। उसे वह अपने अंदर बसता जान लेता है। (और ज्यों-ज्यों) ये राज उसे खुलता है (कि अंदर-बाहर हर जगह प्रभू बस रहा है) वह सृष्टि के मालिक-प्रभू से (यादों की) सांझ डाल लेता है। 30। अगर जगत के मूल प्रभू को अपने मन में बसा लें, तो मन भटकने से हट जाता है। जो जीव ये भेद पा लेता है (कि प्रभू चरणों में टिकने से मन टिक जाता है) वह जीव मन (की दौड़ भाग) को समझ लेता है। (सो) अगर मन (प्रभू चरणों में) जुड़ने लगे तो कोई (इस नेक काम में) देर ना करे; (क्योंकि, प्रभू चरणों में जुड़ने की बरकति से) मन (प्रभू में) लीन हो जाता है। और उस सदा स्थिर रहने वाले प्रभू को प्राप्त कर लेता है। 31। (हरेक जीव का जगत में आने का असल) काम मन से है (वह काम ये है कि जीव अपने मन को काबू में रखे)। मन को वश में करने से ही (जीव को असल मनोरथ की) कामयाबी होती है। कबीर कहता है (कि जीव का असल काम) पूरी तरह से सिर्फ मन से ही है। मन जैसा (जीव को) और कोई नहीं मिला (जिसके साथ इसका असल मतलब पड़ता हो)। 32। (माया के साथ मिल के) ये मन माया (का रूप) हो जाता है। (आनंद स्वरूप हरी के साथ मिल के) ये मन आनंद स्वरूप हरी बन जाता है। (पर, शरीर के साथ जुड़ के) ये मन शरीर-रूप ही हो जाता है (भाव, अपने आप को शरीर से अलग नहीं समझता)। पर जब मनुष्य इस मन को वश में करके पूर्ण खिड़ाव में टिकता है, तब वह सारे जगत में व्यापक प्रभू की ही बातें करता है। 33। (हे भाई!) अगर आप (जीवन का सही रास्ता) जानना चाहते हैं, तो (अपनी) बुरी मति को समाप्त कर दें। इस शरीर (-रूप) पिंड को (अपने) वश में ले आएँ (भाव, आँख, कान आदि ज्ञानेंद्रियों को विकारों की तरफ ना जाने दें)। (इस शरीर को वश में ले आना। मानो, एक युद्ध है) अगर आप इस युद्ध में उलझ के मात ना खाएँ तो आपका नाम शूरवीर (हो सकता) है। 34। जिस मनुष्य ने माया के स्वाद फीका सा समझ लिया है। उसने मायावी चस्कों से बचे रह के वह आत्मिक आनंद पा लिया है। जिसने ये (दुनिया वाले) चस्के छोड़ दिए हैं। उसे वह (प्रभू के नाम का) आनंद प्राप्त हो गया है; (क्योंकि) जिस ने वह (नाम-) रस पीया है उसे यह (माया वाला) स्वाद अच्छा नहीं लगता। 35। अगर (किसी मनुष्य का) मन ऐसी एकग्रता से (प्रभू की याद में) बिरती जोड़ ले कि किसी और तरफ ना भटके तो उसे सबसे ऊँचा व सदा स्थिर रहने वाला प्रभू मिल जाता है। और अगर उस लिव की हालत में प्रेम की तार लगा ले तो (भाव, एक-तार मगन रहे) तो उस दुर्लभ प्रभू को वह पा लेता है और पा के सदा के लिए उसके चरणों में टिका रहता है। 36। (हे भाई!) सदा प्रभू को (अपने हृदय में) याद रख के (जीव मानस जनम की बाजी) हार के नहीं आता। मैं उस भगत-जन से सदके हूँ जो प्रभू के गुण गाता है। प्रभू को मिल के वह हर जगह सदा-स्थिर रहने वाले प्रभू को ही देखता है। 37। (हे भाई!) उस प्रभू से ही जान-पहिचान करनी चाहिए। उस प्रभू से सांझ डालने से यह जीव (उस प्रभू का रूप ही) हो जाता है। जब ये जीव और वह प्रभू एक-रूप हो जाते हैं, तो इन मिले हुओं को कोई और नहीं समझ सकता (भाव, फिर कोई इन मिले हुओं में दूरी नहीं डाल सकता)। 38। अच्छी तरह उस परमात्मा की संभाल करें। अपने मन को उन वचनों में ला के जोड़ें। जिनसे ये मन परमात्मा में परच जाए। प्रभू में मन परचने से जब (अंदर) प्रेम उपजता है तो उस अवस्था में तीनों भवनों का मालिक परमात्मा ही (हर जगह) व्यापक दिखाई देता है। 39। अगर कोई मनुष्य परमात्मा की तलाश में लग जाए। (इस तरह) जो भी मनुष्य प्रभू को पा लेता है वह फिर पैदा होता-मरता नहीं। अगर कोई जीव प्रभू के गुणों को समझ के उनको बारंबार याद करता है। उसे संसार-समंद्र को पार करने में देर नहीं लगती। 40। जो (जीव-स्त्री दुनिया वाले) तुच्छ सुख छोड़ के (प्रभू के प्यार का) सबसे ऊँचा सुख हासिल करती है। वह (अपना हृदय-रूप) पति प्रभू की सेज सवारती है। वही (जीव)-सखी (अपने मन के) संशय दूर करती है। (इस अवस्था के बनने पर ही असल भाव में) तभी ये (जीव प्रभू की) स्त्री। और वह (प्रभू जीव-स्त्री का) पति कहलवाता है। 41। जीव ने मानस जनम हासिल करके उस प्रभू को नहीं पहचाना। जो सचमुच हस्ती वाला है। जब जीव को प्रभू के वजूद का निश्चय हो जाता है, तब इसका मन (प्रभू में) पतीज जाता है। (परमात्मा) है तो जरूर (पर इस विश्वास का लाभ तब ही होता है) जब कोई जीव (इस बात को) समझ ले, तब ये जीव उस प्रभू का ही रूप हो जाता है। ये (अलग हस्ती वाला) नहीं रह जाता। 42। सारा जगत यही कहता फिरता है (भाव, इसी लालसा में भटकता फिरता है) कि मैं (माया) संभाल लूँ। मैं (माया) एकत्र कर लूँ। इस माया की खातिर ही (फिर जीव को) बड़ी चिंताएं आ घेरती हैं। पर जब जीव माया के पति परमात्मा के साथ प्रीत जोड़ता है तब (इसकी) चिंताएं समाप्त हो जाती हैं और ये सारे सुख हासिल कर लेता है। 43। मरते-खपते जीव के कई जनम गुजर गए हैं। चक्करों में पड़ा अभी तक ये (प्रभू को) याद नहीं करता। अब (इस जनम में ही) अगर जगत की अस्लियत को समझ के (इसका) मन (प्रभू में) टिक जाए तो जिस प्रभू से ये विछुड़ा हुआ है उसी में इसे ठिकाना मिल सकता है। 44।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: भगत कबीर जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 342 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।