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अंग 342

अंग
342
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: Bhagat Kabeer Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
बंदक होइ बंध सुधि लहै ॥29॥
भभा भेदहि भेद मिलावा ॥
अब भउ भानि भरोसउ आवा ॥
जो बाहरि सो भीतरि जानिआ ॥
भइआ भेदु भूपति पहिचानिआ ॥30॥
ममा मूल गहिआ मनु मानै ॥
मरमी होइ सु मन कउ जानै ॥
मत कोई मन मिलता बिलमावै ॥
मगन भइआ ते सो सचु पावै ॥31॥
ममा मन सिउ काजु है मन साधे सिधि होइ ॥
मन ही मन सिउ कहै कबीरा मन सा मिलिआ न कोइ ॥32॥
इहु मनु सकती इहु मनु सीउ ॥
इहु मनु पंच तत को जीउ ॥
इहु मनु ले जउ उनमनि रहै ॥
तउ तीनि लोक की बातै कहै ॥33॥
यया जउ जानहि तउ दुरमति हनि करि बसि काइआ गाउ ॥
रणि रूतउ भाजै नही सूरउ थारउ नाउ ॥34॥
रारा रसु निरस करि जानिआ ॥
होइ निरस सु रसु पहिचानिआ ॥
इह रस छाडे उह रसु आवा ॥
उह रसु पीआ इह रसु नही भावा ॥35॥
लला ऐसे लिव मनु लावै ॥
अनत न जाइ परम सचु पावै ॥
अरु जउ तहा प्रेम लिव लावै ॥
तउ अलह लहै लहि चरन समावै ॥36॥
ववा बार बार बिसन सम्हारि ॥
बिसन संम्हारि न आवै हारि ॥
बलि बलि जे बिसनतना जसु गावै ॥
विसन मिले सभ ही सचु पावै ॥37॥
वावा वाही जानीऐ वा जाने इहु होइ ॥
इहु अरु ओहु जब मिलै तब मिलत न जानै कोइ ॥38॥
ससा सो नीका करि सोधहु ॥
घट परचा की बात निरोधहु ॥
घट परचै जउ उपजै भाउ ॥
पूरि रहिआ तह त्रिभवण राउ ॥39॥
खखा खोजि परै जउ कोई ॥ जो खोजै सो बहुरि न होई ॥
खोज बूझि जउ करै बीचारा ॥
तउ भवजल तरत न लावै बारा ॥40॥
ससा सो सह सेज सवारै ॥
सोई सही संदेह निवारै ॥
अलप सुख छाडि परम सुख पावा ॥
तब इह त्रीअ ओुहु कंतु कहावा ॥41॥
हाहा होत होइ नही जाना ॥
जब ही होइ तबहि मनु माना ॥
है तउ सही लखै जउ कोई ॥
तब ओही उहु एहु न होई ॥42॥
लिंउ लिंउ करत फिरै सभु लोगु ॥
ता कारणि बिआपै बहु सोगु ॥
लखिमी बर सिउ जउ लिउ लावै ॥
सोगु मिटै सभ ही सुख पावै ॥43॥
खखा खिरत खपत गए केते ॥
खिरत खपत अजहूं नह चेते ॥
अब जगु जानि जउ मना रहै ॥
जह का बिछुरा तह थिरु लहै ॥44॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: वह (प्रभू के दर का) ढाढी बन के (माया के मोह की) जंजीरों का भेद पा लेता है (और इनके धोखे में नहीं आता)। 29। जो मनुष्य (प्रभू से बनी हुई) दूरी को समाप्त करके (अपने मन को प्रभू की याद में) जोड़ता है। उस याद की बरकति से (सांसारिक) डर दूर करने से उसे प्रभू में श्रद्धा बन जाती है। जो परमात्मा सारे जगत में व्यापक है। उसे वह अपने अंदर बसता जान लेता है। (और ज्यों-ज्यों) ये राज उसे खुलता है (कि अंदर-बाहर हर जगह प्रभू बस रहा है) वह सृष्टि के मालिक-प्रभू से (यादों की) सांझ डाल लेता है। 30। अगर जगत के मूल प्रभू को अपने मन में बसा लें। तो मन भटकने से हट जाता है। जो जीव ये भेद पा लेता है (कि प्रभू चरणों में टिकने से मन टिक जाता है) वह जीव मन (की दौड़ भाग) को समझ लेता है। (सो।) अगर मन (प्रभू चरणों में) जुड़ने लगे तो कोई (इस नेक काम में) देर ना करे; (क्योंकि। प्रभू चरणों में जुड़ने की बरकति से) मन (प्रभू में) लीन हो जाता है। और उस सदा स्थिर रहने वाले प्रभू को प्राप्त कर लेता है। 31। (हरेक जीव का जगत में आने का असल) काम मन से है (वह काम ये है कि जीव अपने मन को काबू में रखे)। मन को वश में करने से ही (जीव को असल मनोरथ की) कामयाबी होती है। कबीर कहता है (कि जीव का असल काम) पूरी तरह से सिर्फ मन से ही है। मन जैसा (जीव को) और कोई नहीं मिला (जिसके साथ इसका असल मतलब पड़ता हो)। 32। (माया के साथ मिल के) ये मन माया (का रूप) हो जाता है। (आनंद स्वरूप हरी के साथ मिल के) ये मन आनंद स्वरूप हरी बन जाता है। (पर। शरीर के साथ जुड़ के) ये मन शरीर-रूप ही हो जाता है (भाव। अपने आप को शरीर से अलग नहीं समझता)। पर जब मनुष्य इस मन को वश में करके पूर्ण खिड़ाव में टिकता है। तब वह सारे जगत में व्यापक प्रभू की ही बातें करता है। 33। (हे भाई !) अगर आप (जीवन का सही रास्ता) जानना चाहता है। तो (अपनी) बुरी मति को समाप्त कर दे। इस शरीर (-रूप) पिंड को (अपने) वश में ले आ (भाव। आँख। कान आदि ज्ञानेंद्रियों को विकारों की तरफ ना जाने दे)। (इस शरीर को वश में ले आना। मानो। एक युद्ध है) अगर आप इस युद्ध में उलझ के मात ना खाए तो आपका नाम शूरवीर (हो सकता) है। 34। जिस मनुष्य ने माया के स्वाद फीका सा समझ लिया है। उसने मायावी चस्कों से बचे रह के वह आत्मिक आनंद पा लिया है। जिसने ये (दुनिया वाले) चस्के छोड़ दिए हैं। उसे वह (प्रभू के नाम का) आनंद प्राप्त हो गया है; (क्योंकि) जिस ने वह (नाम-) रस पीया है उसे यह (माया वाला) स्वाद अच्छा नहीं लगता। 35। अगर (किसी मनुष्य का) मन ऐसी एकग्रता से (प्रभू की याद में) बिरती जोड़ ले कि किसी और तरफ ना भटके तो उसे सबसे ऊँचा व सदा स्थिर रहने वाला प्रभू मिल जाता है। और अगर उस लिव की हालत में प्रेम की तार लगा ले तो (भाव। एक-तार मगन रहे) तो उस दुर्लभ प्रभू को वह पा लेता है और पा के सदा के लिए उसके चरणों में टिका रहता है। 36। (हे भाई !) सदा प्रभू को (अपने हृदय में) याद रख के (जीव मानस जनम की बाजी) हार के नहीं आता। मैं उस भगत-जन से सदके हूँ जो प्रभू के गुण गाता है। प्रभू को मिल के वह हर जगह सदा-स्थिर रहने वाले प्रभू को ही देखता है। 37। (हे भाई !) उस प्रभू से ही जान-पहिचान करनी चाहिए। उस प्रभू से सांझ डालने से यह जीव (उस प्रभू का रूप ही) हो जाता है। जब ये जीव और वह प्रभू एक-रूप हो जाते हैं। तो इन मिले हुओं को कोई और नहीं समझ सकता (भाव। फिर कोई इन मिले हुओं में दूरी नहीं डाल सकता)। 38। अच्छी तरह उस परमात्मा की संभाल करो। अपने मन को उन वचनों में ला के जोड़ो। जिनसे ये मन परमात्मा में परच जाए। प्रभू में मन परचने से जब (अंदर) प्रेम उपजता है तो उस अवस्था में तीनों भवनों का मालिक परमात्मा ही (हर जगह) व्यापक दिखाई देता है। 39। अगर कोई मनुष्य परमात्मा की तलाश में लग जाए। (इस तरह) जो भी मनुष्य प्रभू को पा लेता है वह फिर पैदा होता-मरता नहीं। अगर कोई जीव प्रभू के गुणों को समझ के उनको बारंबार याद करता है। उसे संसार-समंद्र को पार करने में देर नहीं लगती। 40। जो (जीव-स्त्री दुनिया वाले) तुच्छ सुख छोड़ के (प्रभू के प्यार का) सबसे ऊँचा सुख हासिल करती है। वह (अपना हृदय-रूप) पति प्रभू की सेज सवारती है। वही (जीव) -सखी (अपने मन के) संशय दूर करती है। (इस अवस्था के बनने पर ही असल भाव में) तभी ये (जीव प्रभू की) स्त्री। और वह (प्रभू जीव-स्त्री का) पति कहलवाता है। 41। जीव ने मानस जनम हासिल करके उस प्रभू को नहीं पहचाना। जो सचमुच हस्ती वाला है। जब जीव को प्रभू के वजूद का निश्चय हो जाता है। तब इसका मन (प्रभू में) पतीज जाता है। (परमात्मा) है तो जरूर (पर इस विश्वास का लाभ तब ही होता है) जब कोई जीव (इस बात को) समझ ले। तब ये जीव उस प्रभू का ही रूप हो जाता है। ये (अलग हस्ती वाला) नहीं रह जाता। 42। सारा जगत यही कहता फिरता है (भाव। इसी लालसा में भटकता फिरता है) कि मैं (माया) संभाल लूँ। मैं (माया) एकत्र कर लूँ। इस माया की खातिर ही (फिर जीव को) बड़ी चिंताएं आ घेरती हैं। पर जब जीव माया के पति परमात्मा के साथ प्रीत जोड़ता है तब (इसकी) चिंताएं समाप्त हो जाती हैं और ये सारे सुख हासिल कर लेता है। 43। मरते-खपते जीव के कई जनम गुजर गए हैं। चक्करों में पड़ा अभी तक ये (प्रभू को) याद नहीं करता। अब (इस जनम में ही) अगर जगत की अस्लियत को समझ के (इसका) मन (प्रभू में) टिक जाए तो जिस प्रभू से ये विछुड़ा हुआ है उसी में इसे ठिकाना मिल सकता है। 44।

गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

कबीर की पहचान उनके उलट-बाँसी हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी। आज भी, बनारस के अस्सी-घाट के पास उनकी समाधि है।

इस अंग पर एक ही शबद है, और उसकी पहली पंक्तियाँ यह कहती हैं: “वह (प्रभू के दर का) ढाढी बन के (माया के मोह की) जंजीरों का भेद पा लेता है (और इनके धोखे में नहीं आता)।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।