सतगुरि मिलिऐ सद भै रचै आपि वसै मनि आइ ॥1॥ भाई रे गुरमुखि बूझै कोइ ॥ बिनु बूझे करम कमावणे जनमु पदारथु खोइ ॥1॥ रहाउ ॥ जिनी चाखिआ तिनी सादु पाइआ बिनु चाखे भरमि भुलाइ ॥ अंम्रितु साचा नामु है कहणा कछू न जाइ ॥ पीवत हू परवाणु भइआ पूरै सबदि समाइ ॥2॥ आपे देइ त पाईऐ होरु करणा किछू न जाइ ॥ देवण वाले कै हथि दाति है गुरू दुआरै पाइ ॥ जेहा कीतोनु तेहा होआ जेहे करम कमाइ ॥3॥ जतु सतु संजमु नामु है विणु नावै निरमलु न होइ ॥ पूरै भागि नामु मनि वसै सबदि मिलावा होइ ॥ नानक सहजे ही रंगि वरतदा हरि गुण पावै सोइ ॥4॥17॥50॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: गुरू के मिलने से मनुष्य का हृदय सदा परमत्मा के डर-अदब में भीगा रहता है। (और इस तरह) परमात्मा स्वयं मनुष्य के हृदय में आ बसता है।1। हे भाई ! जो कोई मनुष्य (सही जीवन जुगति) समझता है वह गुरू के द्वारा ही समझता है। (सही जीवन जुगति) समझने के बिना (निहित धार्मिक) कर्म करने से मनुष्य कीमती मानव जनम गवा लेता है।1।रहाउ। जिन्होंने ये अमृत चखा है उन्होंने इसके स्वाद का आनन्द लिया है। (नाम अमृत का स्वाद) चखने के बिना मनुष्य माया की भटकन में पड़ कर गलत रास्ते पर पड़ जाता है। परमात्मा का सदा स्थिर एक नाम आत्मिक जीवन देने वाला रस है। इसके स्वाद का वर्णन नहीं किया जा सकता। पूरे गुरू के शबद में लीन हो के नाम अमृत पीते ही मनुष्य (प्रभु की हजूरी में) कबूल हो जाता है।2। (नाम अमृत की दात) अगर परमात्मा खुद ही दे तो मिलती है। (अगर उसकी मेहर ना हो तो) और कोई चारा नहीं किया जा सकता। (नाम की दाति) देने वाले परमात्मा के अपने हाथ में यह दात है। (उसकी रजा के अनुसार) गुरू के दर से ही मिलती है। (परमात्मा ने जीव को) जिस तरह का बनाया, जीव वैसा ही बन गया। (फिर) वैसे ही कर्म जीव करता है। (उसकी रजा अनुसार ही जीव गुरू के दर पर आता है)।3। (मनुष्य अपने जीवन को पवित्र करने के लिए जत सत संजम साधनाएं करता है, पर नाम सिमरन के बिना ये किसी काम के नहीं।) परमात्मा का नाम-अमृत ही जत है, नाम ही सत है और नाम ही संजम है। नाम के बिना मनुष्य पवित्र जीवन वाला नहीं हो सकता। बहुत किस्मत के साथ जिस मनुष्य के मन में परमात्मा का नाम आ बसता है, गुरू के शबद द्वारा मनुष्य का प्रभु से मिलाप हो जाता है। हे नानक! (गुरू के शबद की बरकति से) जो मनुष्य आत्मिक अडोलता में टिक के परमात्मा के प्रेम रंग में जीवन व्यतीत करता है वह मनुष्य परमात्मा के गुण अपने अंदर बसा लेता है।4।17।50।
सिरीरागु महला 3 ॥ कांइआ साधै उरध तपु करै विचहु हउमै न जाइ ॥ अधिआतम करम जे करे नामु न कब ही पाइ ॥ गुर कै सबदि जीवतु मरै हरि नामु वसै मनि आइ ॥1॥ सुणि मन मेरे भजु सतगुर सरणा ॥ गुर परसादी छुटीऐ बिखु भवजलु सबदि गुर तरणा ॥1॥ रहाउ ॥ त्रै गुण सभा धातु है दूजा भाउ विकारु ॥ पंडितु पड़ै बंधन मोह बाधा नह बूझै बिखिआ पिआरि ॥ सतगुरि मिलिऐ त्रिकुटी छूटै चउथै पदि मुकति दुआरु ॥2॥ गुर ते मारगु पाईऐ चूकै मोहु गुबारु ॥ सबदि मरै ता उधरै पाए मोख दुआरु ॥ गुर परसादी मिलि रहै सचु नामु करतारु ॥3॥ इहु मनूआ अति सबल है छडे न कितै उपाइ ॥ दूजै भाइ दुखु लाइदा बहुती देइ सजाइ ॥ नानक नामि लगे से उबरे हउमै सबदि गवाइ ॥4॥18॥51॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 3 ॥ मानव शरीर को (ज्ञानेन्द्रियों को) अपने बस में रखने के कई प्रयत्न करता है। उल्टा लटक के तप करता है। (पर इस तरह) अंदर का अहम् दूर नहीं होता। अगर मनुष्य आत्मिक उन्नति संबंधी (ऐसे नियत धार्मिक) कर्म करता रहे, तो कभी भी वह परमात्मा का नाम प्राप्त नहीं कर सकता। जो मनुष्य गुरू के शबद की सहायता से दुनिया की कृत कार करता हुआ ही विकारों से बचता है, उसके मन में प्रभु का नाम आ बसता है।1। हे मेरे मन ! (मेरी बात) सुन। सत्गुरू की शरण पड़। (माया के प्रभाव से) गुरू की कृपा से बचते हैं। ये जहर (भरा) संसार समुंद्र गुरू के शबद द्वारा ही तैर सकते हैं।1 रहाउ। तीन गुणों के अधीन रह कर काम करना, यह सारा माया का ही प्रभाव है। और माया का ही प्यार (मन में) विकार पैदा करता है। माया के बंधनों के मोह में फंसा हुआ पंडित (धर्म पुस्तकें) पढ़ता है, पर माया के प्यार में (फंसा रहने के कारण वह जीवन का सही रास्ता) नहीं समझ सकता। अगर सतिगुरू मिल जाए तो (माया मोह के कारण पैदा हुई अंदर की खिज) दूर हो जाती है। माया के तीन गुणों से ऊपर के आत्मिक दर्जे में (पहुँचने से) (माया के मोह से खलासी) का दरवाजा मिल जाता है।2। गुरू से जीवन का सही राह मिल जाता है। (मन में से) मोह का अंधेरा दूर हो जाता है। अगर मनुष्य गुरू के शबद से जुड़ के माया के मोह से मर जाए तो (संसार समुंद्र में डूबने से बच जाता है) और विकारों से खलासी का राह मिल जाता है। गुरू की कृपा से ही मनुष्य (प्रभु चरणों में) जुड़ा रह सकता है और प्रभु का सदा स्थिर नाम प्राप्त कर सकता है।3। (नहीं तो) यह मन (तो) बड़ा बलवान है (गुरू की शरण के बिना और) किसी भी तरीके से ये (गलत रास्ते पड़ने से) हटता नहीं। माया के प्यार में फसा के (मनुष्य को) दुख चिपका लेता है, तथा बड़ी सजा देता है। हे नानक ! जो लोग गुरू के शबद से अहम् दूर करके परमात्मा के नाम में जुड़ते हैं वह (इसके पंजे से) बचते हैं।4।18।51।
सिरीरागु महला 3 ॥ किरपा करे गुरु पाईऐ हरि नामो देइ द्रिड़ाइ ॥ बिनु गुर किनै न पाइओ बिरथा जनमु गवाइ ॥ मनमुख करम कमावणे दरगह मिलै सजाइ ॥1॥ मन रे दूजा भाउ चुकाइ ॥ अंतरि तेरै हरि वसै गुर सेवा सुखु पाइ ॥ रहाउ ॥ सचु बाणी सचु सबदु है जा सचि धरे पिआरु ॥ हरि का नामु मनि वसै हउमै क्रोधु निवारि ॥ मनि निरमल नामु धिआईऐ ता पाए मोख दुआरु ॥2॥ हउमै विचि जगु बिनसदा मरि जंमै आवै जाइ ॥ मनमुख सबदु न जाणनी जासनि पति गवाइ ॥ गुर सेवा नाउ पाईऐ सचे रहै समाइ ॥3॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 3 ॥ (जब परमात्मा) कृपा करता है (तो) गुरू मिलता है (गुरू मनुष्य के हृदय में) परमात्मा का नाम पक्का कर देता है। (कभी भी) किसी मनुष्य ने गुरू के बिना (परमात्मा को) नहीं प्राप्त किया। (जो मनुष्य गुरू की शरण नहीं आता वह) अपना मानव जन्म व्यर्थ गवा लेता है। अपने मन के पीछे चल के (नीयत धार्मिक) कर्म (भी) करने से प्रभु की दरगाह में सजा ही मिलती है।1। हे मेरे मन ! (गुरू की शरण पड़ कर अपने अंदर से) माया का प्यार दूर कर। परमात्मा आपके अंदर बसता है (फिर भी आप सुखी नहीं है) गुरू द्वारा बताई सेवा भक्ति करने से ही आत्मिक सुख की प्राप्ति होती है।1। रहाउ। जब मनुष्य सदा स्थिर प्रभु में प्यार जोड़ता है, तब उस को गुरू की बाणी गुरू का शबद यर्थाथ प्रतीत होता है (गुरू के शबद द्वारा अंदर से) अहम् व क्रोध दूर करके परमात्मा का नाम मनुष्य के मन में आ बसता है। परमात्मा का नाम पवित्र मन के द्वारा ही सिमरा जा सकता है (जब मनुष्य सिमरता है) तब विकारों से निजात की राह ढूँढ लेता है ।2। जगत अहम् में फंस कर आत्मिक मौत सहता है और बारंबार पैदा होता मरता रहता है। अपने मन के पीछे चलने वाले लोग गुरू के शबद (की कद्र) नहीं जानते। वह अपनी इज्जत गवा के ही (जगत में से) जाऐंगे। गुरू की बताई सेवा-भक्ति करने से परमात्मा का नाम प्राप्त होता है (जो मनुष्य गुरू की बताई सेवा करता है वह) सदा स्थिर परमात्मा में लीन रहता है।3।
श्री राग की धुन में एक ठहराव है, सूर्यास्त के क़रीब के घंटे का। ग्रंथ में जब-कब यह राग खुलता है, स्वर में चमक के पीछे की उदासी सुनाई देती है। शास्त्रीय परम्परा में इसे रागों का मूल कहा गया है। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “गुरू के मिलने से मनुष्य का हृदय सदा परमत्मा के डर-अदब में भीगा रहता है।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।