मनहि मारि कवन सिधि थापी ॥1॥ कवनु सु मुनि जो मनु मारै ॥ मन कउ मारि कहहु किसु तारै ॥1॥ रहाउ ॥ मन अंतरि बोलै सभु कोई ॥ मन मारे बिनु भगति न होई ॥2॥ कहु कबीर जो जानै भेउ ॥ मनु मधुसूदनु त्रिभवण देउ ॥3॥28॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: (तो फिर) मन को मार के कौन सी कमाई कर ली है (भाव। कोई कामयाबी नहीं होती)। 1। वह कौन सा मुनि है जो मन को मारता है? बताओ। मन को मार के वह किसे पार लंघाता है?। 1। रहाउ। हरेक मनुष्य मन का प्रेरित हुआ ही बोलता है (भाव। जो अच्छे-बुरे काम मनुष्य करता है। उनके लिए प्रेरणा मन से ही होती है; इस वास्ते) मन को मारे बिना (भाव। मन को विकारों से हटाए बिना) भगती (भी) नहीं हो सकती। 2। हे कबीर ! कह, जो मनुष्य इस रम्ज़ को समझता है उसका मन तीन लोकों को प्रकाशित करने वाला परमात्मा का रूप हो जाता है। 3। 28।
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: गउड़ी कबीर जी ॥ वे तारे जो आकाश में दिखाई दे रहे हैं किस चित्रकार ने चित्रे हैं?बताओ। हे पंडित ! आकाश किस के सहारे है? कोई भाग्यशाली समझदार व्यक्ति ही इस (रम्ज़ को) समझता है। 1। रहाउ। (ये जो) सूरज और चंद्रमा (आदि जगत में) प्रकाश कर रहे हैं (इन) सभी में प्रभू की जोति का (ही) प्रकाश बिखरा हुआ है। 2। हे कबीर ! (बेशक) कह, (इस भेद को) वही मनुष्य समझेगा। जिसके हृदय में प्रभू बस रहा है। और मुंह में (भी) केवल प्रभू ही है (भाव। जो मुंह से भी प्रभू के गुण उचार रहा है)। 3। 29।
गउड़ी कबीर जी ॥ बेद की पुत्री सिंम्रिति भाई ॥ सांकल जेवरी लै है आई ॥1॥ आपन नगरु आप ते बाधिआ ॥ मोह कै फाधि काल सरु सांधिआ ॥1॥ रहाउ ॥ कटी न कटै तूटि नह जाई ॥ सा सापनि होइ जग कउ खाई ॥2॥ हम देखत जिनि सभु जगु लूटिआ ॥ कहु कबीर मै राम कहि छूटिआ ॥3॥30॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: गउड़ी कबीर जी ॥ हे भाई ! ये स्मृतियां जो वेदों के आधार पर बनीं हैं (ये तो अपने श्रद्धालुओं के वास्ते वर्ण-आश्रम की जैसे) जंजीरें (कर्म-कांड की) रस्सियां ले के आई हुई हैं। 1। (इन स्मृतियों ने) अपने सारे श्रद्धालु स्वयं ही जकड़े हुए हैं। (इन को स्वर्ग आदि के) मोह की फांसी में फसा के (इनके सिर पे) मौत (के सहम) का तीर (इसने) खींचा हुआ है। 1। रहाउ। (ये स्मृति रूपी फांसी की रस्सी श्रद्धालुओं द्वारा) काटे काटी नहीं जा सकती और ना ही (अपने आप) ये टूटती है। (अब तो) साँपिन बन के जगत को खा रही है (भाव। जैसे सांपिन अपने बच्चों को खा जाती है। वैसे ही स्मृति अपने ही श्रद्धालुओं का नाश कर रही है)। 2। हे कबीर ! कह, हमारे देखते-देखते जिस (स्मृति) ने सारे संसार को ठॅग लिया है। मैं प्रभू का सिमरन करके उससे बच गया हूँ। 3। 30।
गउड़ी कबीर जी ॥ देइ मुहार लगामु पहिरावउ ॥ सगल त जीनु गगन दउरावउ ॥1॥ अपनै बीचारि असवारी कीजै ॥ सहज कै पावड़ै पगु धरि लीजै ॥1॥ रहाउ ॥ चलु रे बैकुंठ तुझहि ले तारउ ॥ हिचहि त प्रेम कै चाबुक मारउ ॥2॥ कहत कबीर भले असवारा ॥ बेद कतेब ते रहहि निरारा ॥3॥31॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: गउड़ी कबीर जी ॥ मैं तो (अपने मन रूपी घोड़े को उस्तति-निंदा से रोकने) मुहार दे के (प्रेम की लगन की) लगाम डालता हूँ और प्रभू को हर जगह व्यापक जानना- ये काठी डाल के (मन को) निरंकार के देश की उड़ान लगवाता हूँ। (भाव। मन को प्रभू की याद में जोड़ता हूँ)। 1। (आएँ भाई !) अपने स्वरूप के ज्ञान-रूप घोड़े पर सवार हो जाएं (भाव। हमारी असलियत क्या है। इस विचार को घोड़ा बना के इस पर सवार होएं)। और अकल रूपी पैर को सहज अवस्था की रकाब में रखी रहें। 1। रहाउ। चल हे (मन-रूप घोड़े) ! आपको बैकुंठ की सैर कराऊँ। अगर जिद की तो आपको मैं प्रेम का चाबुक मारूँगा। 2। कबीर कहता है, (ऐसे) सियाने सवार (जो अपने मन पे सवार होते हैं) वेदों और कतेबों (को सच्चे-झूठे कहने के झगड़े) से अलग रहते हैं। 3। 31।
गउड़ी कबीर जी ॥ जिह मुखि पांचउ अंम्रित खाए ॥ तिह मुख देखत लूकट लाए ॥1॥ इकु दुखु राम राइ काटहु मेरा ॥ अगनि दहै अरु गरभ बसेरा ॥1॥ रहाउ ॥ काइआ बिगूती बहु बिधि भाती ॥ को जारे को गडि ले माटी ॥2॥ कहु कबीर हरि चरण दिखावहु ॥ पाछै ते जमु किउ न पठावहु ॥3॥32॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: गउड़ी कबीर जी ॥ जिस मुंह से पाँचों ही उक्तम पदार्थ खाते हैं। (मरने पर) उस मुंह को अपने ही लांबू (जला के) लगा देते हैं। 1। हे मेरे सुंदर राम ! मेरा एक ये दुख दूर कर दे – ये जो तृष्णा की आग जलाती है। और गरभ का बसेरा है (अर्थात। ये जो बार-बार पैदा होना-मरना पड़ता है और तृष्णा की आग में जलते हैं) । 1। रहाउ। (मरने के बाद) ये शरीर कई तरह से खराब हो जाता है। कोई इसे जला देता है। कोई इसे मिट्टी में दबा देता है। 2। हे कबीर ! (प्रभू के दर पर ऐसे) कह, हे प्रभू ! (मुझे) अपने चरणों के दर्शन करा दे। उसके बाद बेशक जम को ही (मेरे प्राण लेने के लिए) भेज देना। 3। 32।
गउड़ी कबीर जी ॥ आपे पावकु आपे पवना ॥ जारै खसमु त राखै कवना ॥1॥ राम जपत तनु जरि की न जाइ ॥ राम नाम चितु रहिआ समाइ ॥1॥ रहाउ ॥ का को जरै काहि होइ हानि ॥ नट वट खेलै सारिगपानि ॥2॥ कहु कबीर अखर दुइ भाखि ॥ होइगा खसमु त लेइगा राखि ॥3॥33॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: गउड़ी कबीर जी ॥ पति (प्रभू) खुद ही आग है। और खुद ही हवा है। अगर वह खुद ही (जीव को) जलाने लगे। तो कौन बचा सकता है?। 1। प्रभू का सिमरन करते करते (उसका) शरीर भी चाहे जल जाए (वह रक्ती भर भी परवाह नहीं करता)। (जिस मनुष्य का) मन प्रभू के नाम में जुड़ रहा है। 1। रहाउ। (क्योंकि बंदगी करने वाले को ये निश्चय होता है कि) ना किसी का कुछ जलता है ना किसी का कुछ नुकसान होता है। प्रभू खुद ही (सब जगह) नटों के भेस की तरह (बहरूपिया बन के) खेल रहा है। (भाव। कहीं खुद ही नुकसान कर रहा है। और कहीं खुद ही वह नुकसान सह रहा है)। 2। (इस वास्ते) हे कबीर ! (आप तो) ये छोटी सी बात याद रख कि यदि पति को मंजूर होंगे तो (जहां कहीं भी जरूरत होगी। खुद ही) बचा लेगा। 3। 33।
गउड़ी कबीर जी दुपदे ॥ ना मै जोग धिआन चितु लाइआ ॥ बिनु बैराग न छूटसि माइआ ॥1॥ कैसे जीवनु होइ हमारा ॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: गउड़ी कबीर जी दुपदे ॥ मैंने तो जोग (के बताए हुए) ध्यान (भाव। समाधियों) का विचार नहीं किया (क्योंकि इससे वैराग पैदा नहीं होता।और) वैराग के बिना माया (के मोह) से खलासी (मुक्ति) नहीं हो सकती। 1। (माया इतनी प्रबल है कि) हम (सही जीवन) जी नही सकते –
गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
कबीर पन्द्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, मगर रामानन्द-शिष्य परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, ज़बान सीधी है, कई बार चुभने वाली। उनकी कुछ रचनाएँ बीजक में हैं, कुछ आदि ग्रंथ में, कुछ अनेक संप्रदायों में बिखरी हैं।
इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(तो फिर) मन को मार के कौन सी कमाई कर ली है (भाव।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।