Lulla Family

अंग 330

अंग
330
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: Bhagat Kabeer Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जब न होइ राम नाम अधारा ॥1॥ रहाउ ॥
कहु कबीर खोजउ असमान ॥
राम समान न देखउ आन ॥2॥34॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: अगर हमें प्रभू के नाम का आसरा ना हो तो । 1। रहाउ। हे कबीर ! कह, मैं आकाश तक (भाव। सारी दुनिया) तलाश कर चुका हूँ (पर प्रभू के बिना) मुझे कोई और नहीं मिला (जो माया के मोह से बचा के असल जीवन दे सके)। 2। 34।
गउड़ी कबीर जी ॥
जिह सिरि रचि रचि बाधत पाग ॥
सो सिरु चुंच सवारहि काग ॥1॥
इसु तन धन को किआ गरबईआ ॥
राम नामु काहे न द्रिड़॑ीआ ॥1॥ रहाउ ॥
कहत कबीर सुनहु मन मेरे ॥
इही हवाल होहिगे तेरे ॥2॥35॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी कबीर जी ॥ जिस सिर पर (मनुष्य) संवार-संवार के पगड़ी बाँधता है। (मौत आने पे) उस सिर को कौए अपनी चोंच से संवारते हैं। 1। (हे भाई !) इस शरीर का और इस धन का क्या मान करता है? प्रभू का नाम क्यूँ नहीं सिमरता?। 1। रहाउ। कबीर कहता है, हे मेरे मन ! सुन। (मौत आने पे) आपके साथ भी ऐसा ही होंगे। 2। 35।
गउड़ी गुआरेरी के पदे पैतीस ॥
रागु गउड़ी गुआरेरी असटपदी कबीर जी की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सुखु मांगत दुखु आगै आवै ॥
सो सुखु हमहु न मांगिआ भावै ॥1॥
बिखिआ अजहु सुरति सुख आसा ॥
कैसे होई है राजा राम निवासा ॥1॥ रहाउ ॥
इसु सुख ते सिव ब्रहम डराना ॥
सो सुखु हमहु साचु करि जाना ॥2॥
सनकादिक नारद मुनि सेखा ॥
तिन भी तन महि मनु नही पेखा ॥3॥
इसु मन कउ कोई खोजहु भाई ॥
तन छूटे मनु कहा समाई ॥4॥
गुर परसादी जैदेउ नामां ॥
भगति कै प्रेमि इन ही है जानां ॥5॥
इसु मन कउ नही आवन जाना ॥
जिस का भरमु गइआ तिनि साचु पछाना ॥6॥
इसु मन कउ रूपु न रेखिआ काई ॥
हुकमे होइआ हुकमु बूझि समाई ॥7॥
इस मन का कोई जानै भेउ ॥
इह मनि लीण भए सुखदेउ ॥8॥
जीउ एकु अरु सगल सरीरा ॥
इसु मन कउ रवि रहे कबीरा ॥9॥1॥36॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी के पदे पैतीस ॥ रागु गउड़ी गुआरेरी असटपदी कबीर जी की ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। जिस सुख के मांगने से दुख मिलता है – मुझे उस सुख को मांगने की जरूरत नहीं। 1। अभी भी हमारी सुरति माया में लगी हुई है और (इस माया से ही) सुखों की आस लगाए बैठा हूं; तो फिर जोति रूप निरंकार का निवास (इस सुरति में) कैसे हो?। 1। रहाउ। इस (माया-) सुख से तो शिव जी और ब्रहमा (जैसे देवतों) ने भी कानों को हाथ लगाए; (पर संसारी जीवों ने) इस सुख को सच्चा समझा है। 2। ब्रहमा के चारों पुत्र सनक आदि। नारद मुनि और शेषनाग – इन्होंने भी (इस माया-सुख की ओर सुरति लगी रहने के कारण) अपने मन को अपने शरीर में नहीं देखा (भाव। इनका मन भी अंतरात्मे टिका ना रह सका)। 3। हे भाई ! कोई पक्ष इस मन की भी खोज करो कि शरीर से विछोड़ा होने से ये मन कहाँ जा टिकता है। 4। सतिगुरू की कृपा से इन जयदेव और नामदेव जी (जैसे भक्तों) ने ही भगती के चाव से ये बात समझी है (कि “तन छूटे मनु कहा समाई”)। 5। उस मनुष्य की इस आत्मा को जनम-मरण के चक्कर में नहीं पड़ना पड़ता जिस मनुष्य की (सुखों के वास्ते) भटकना दूर हो गई है,उसने प्रभू को पहिचान लिया है (प्रभू के साथ सांझ पा ली है) । 6। (असल में) इस जीव का (प्रभू से अलग) कोई रूप अथवा चिन्ह नहीं। प्रभू के हुकम में ही यह (अलग स्वरूप वाला) बना है और प्रभू की रजा को समझ के उस में लीन हो जाता है। 7। जो मनुष्य इस मन का भेद जान लेता है। वह इस मन के द्वारा ही (अंतरात्मे) लीन हो के सुखदेव प्रभू का रूप हो जाता है। 8। जो खुद एक है और सारे शरीरों में मौजूद है कबीर उस (सर्व-व्यापक) मन (भाव। परमात्मा) का सिमरन कर रहा है । 9। 1। 36।
गउड़ी गुआरेरी ॥
अहिनिसि एक नाम जो जागे ॥
केतक सिध भए लिव लागे ॥1॥ रहाउ ॥
साधक सिध सगल मुनि हारे ॥
एक नाम कलिप तर तारे ॥1॥
जो हरि हरे सु होहि न आना ॥
कहि कबीर राम नाम पछाना ॥2॥37॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी ॥ बहुत सारे वह मनुष्य (जीवन सफर की दौड़ में) जीते हुए हैं जो दिन रात केवल प्रभू के नाम में सुचेत रहे हैं। जिन्होंने (नाम में ही) सुरति जोड़ के रखी है। 1। रहाउ। (योग-) साधना करने वाले, (योग साधनों में) सिद्ध हुए जोगी और सारे मुनि लोक (संसार समुंद्र से तैरने के और ही तरीके ढूँढ-ढूँढ के) थक गए हैं; केवल प्रभू का नाम ही कल्प-वृक्ष है जो (जीवों का) बेड़ा पार करता है। 1। जो मनुष्य प्रभू का सिमरन करते हैं, वह प्रभू से अलग नहीं रह जाते, कबीर जी कहते है, उन्होंने प्रभू के नाम को पहचान लिया है (नाम से गहरी सांझ डाल ली है) । 2। 37।
गउड़ी भी सोरठि भी ॥
रे जीअ निलज लाज तोुहि नाही ॥
हरि तजि कत काहू के जांही ॥1॥ रहाउ ॥
जा को ठाकुरु ऊचा होई ॥
सो जनु पर घर जात न सोही ॥1॥
सो साहिबु रहिआ भरपूरि ॥
सदा संगि नाही हरि दूरि ॥2॥
कवला चरन सरन है जा के ॥
कहु जन का नाही घर ता के ॥3॥
सभु कोऊ कहै जासु की बाता ॥
सो संम्रथु निज पति है दाता ॥4॥
कहै कबीरु पूरन जग सोई ॥
जा के हिरदै अवरु न होई ॥5॥38॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी भी सोरठि भी ॥ हे बेशर्म मन ! आपको शर्म नहीं आती? प्रभू को छोड़ के कहाँ और किसके पास आप जाता है? (भाव। क्यूँ और आसरे आप देखता है?)। 1। रहाउ। जिस मनुष्य का मालिक बड़ा हो। वह पराए घर जाता अच्छा नहीं लगता। 1। (हे मन !) वह मालिक प्रभू सब जगह मौजूद है। सदा (आपके) साथ है। (आपसे) दूर नहीं। 2। लक्ष्मी (भी) जिसके चरणों का आसरा लिए बैठी है। हे भाई ! बताओ। उस प्रभू के घर किस चीज की कमी है?। 3। जिस प्रभू की (महानता की) बातें हरेक जीव कर रहा है। वह प्रभू सब ताकतों का मालिक है। वह हमारा (सबका) पति है और सब पदार्थ देने वाला है। 4। कबीर कहता है, संसार में केवल वही मनुष्य गुणवान है जिसके हृदय में (प्रभू के बिना) कोई और (दाता जचता) नहीं। 5। 38।

गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

कबीर की पहचान उनके उलट-बाँसी हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी। आज भी, बनारस के अस्सी-घाट के पास उनकी समाधि है।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “अगर हमें प्रभू के नाम का आसरा ना हो तो।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।