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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 330 · गउड़ी

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अंग
330
गउड़ी
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  1. जब न होइ राम नाम अधारा ॥1॥ रहाउ ॥
  2. गउड़ी कबीर जी ॥
  3. गउड़ी गुआरेरी के पदे पैतीस ॥
  4. गउड़ी गुआरेरी ॥
  5. गउड़ी भी सोरठि भी ॥

जब न होइ राम नाम अधारा ॥1॥ रहाउ ॥

अंग 329 से चला आ रहा अंश

जब न होइ राम नाम अधारा ॥1॥ रहाउ ॥
कहु कबीर खोजउ असमान ॥
राम समान न देखउ आन ॥2॥34॥

हिन्दी अर्थ: अगर हमें प्रभू के नाम का आसरा ना हो तो । 1। रहाउ। हे कबीर ! कह, मैं आकाश तक (भाव। सारी दुनिया) तलाश कर चुका हूँ (पर प्रभू के बिना) मुझे कोई और नहीं मिला (जो माया के मोह से बचा के असल जीवन दे सके)। 2। 34।

गउड़ी कबीर जी ॥

गउड़ी कबीर जी ॥
जिह सिरि रचि रचि बाधत पाग ॥
सो सिरु चुंच सवारहि काग ॥1॥
इसु तन धन को किआ गरबईआ ॥
राम नामु काहे न द्रिड़॑ीआ ॥1॥ रहाउ ॥
कहत कबीर सुनहु मन मेरे ॥
इही हवाल होहिगे तेरे ॥2॥35॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी कबीर जी ॥ जिस सिर पर (मनुष्य) संवार-संवार के पगड़ी बाँधता है। (मौत आने पे) उस सिर को कौए अपनी चोंच से संवारते हैं। 1। (हे भाई !) इस शरीर का और इस धन का क्या मान करता है? प्रभू का नाम क्यूँ नहीं सिमरता?। 1। रहाउ। कबीर कहता है, हे मेरे मन ! सुन। (मौत आने पे) आपके साथ भी ऐसा ही होंगे। 2। 35।

गउड़ी गुआरेरी के पदे पैतीस ॥

गउड़ी गुआरेरी के पदे पैतीस ॥
रागु गउड़ी गुआरेरी असटपदी कबीर जी की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सुखु मांगत दुखु आगै आवै ॥
सो सुखु हमहु न मांगिआ भावै ॥1॥
बिखिआ अजहु सुरति सुख आसा ॥
कैसे होई है राजा राम निवासा ॥1॥ रहाउ ॥
इसु सुख ते सिव ब्रहम डराना ॥
सो सुखु हमहु साचु करि जाना ॥2॥
सनकादिक नारद मुनि सेखा ॥
तिन भी तन महि मनु नही पेखा ॥3॥
इसु मन कउ कोई खोजहु भाई ॥
तन छूटे मनु कहा समाई ॥4॥
गुर परसादी जैदेउ नामां ॥
भगति कै प्रेमि इन ही है जानां ॥5॥
इसु मन कउ नही आवन जाना ॥
जिस का भरमु गइआ तिनि साचु पछाना ॥6॥
इसु मन कउ रूपु न रेखिआ काई ॥
हुकमे होइआ हुकमु बूझि समाई ॥7॥
इस मन का कोई जानै भेउ ॥
इह मनि लीण भए सुखदेउ ॥8॥
जीउ एकु अरु सगल सरीरा ॥
इसु मन कउ रवि रहे कबीरा ॥9॥1॥36॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी के पदे पैतीस ॥ रागु गउड़ी गुआरेरी असटपदी कबीर जी की ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। जिस सुख के मांगने से दुख मिलता है - मुझे उस सुख को मांगने की जरूरत नहीं। 1। अभी भी हमारी सुरति माया में लगी हुई है और (इस माया से ही) सुखों की आस लगाए बैठा हूं; तो फिर जोति रूप निरंकार का निवास (इस सुरति में) कैसे हो?। 1। रहाउ। इस (माया-) सुख से तो शिव जी और ब्रहमा (जैसे देवतों) ने भी कानों को हाथ लगाए; (पर संसारी जीवों ने) इस सुख को सच्चा समझा है। 2। ब्रहमा के चारों पुत्र सनक आदि। नारद मुनि और शेषनाग - इन्होंने भी (इस माया-सुख की ओर सुरति लगी रहने के कारण) अपने मन को अपने शरीर में नहीं देखा (भाव। इनका मन भी अंतरात्मे टिका ना रह सका)। 3। हे भाई ! कोई पक्ष इस मन की भी खोज करो कि शरीर से विछोड़ा होने से ये मन कहाँ जा टिकता है। 4। सतिगुरू की कृपा से इन जयदेव और नामदेव जी (जैसे भक्तों) ने ही भगती के चाव से ये बात समझी है (कि “तन छूटे मनु कहा समाई”)। 5। उस मनुष्य की इस आत्मा को जनम-मरण के चक्कर में नहीं पड़ना पड़ता जिस मनुष्य की (सुखों के वास्ते) भटकना दूर हो गई है,उसने प्रभू को पहिचान लिया है (प्रभू के साथ सांझ पा ली है) । 6। (असल में) इस जीव का (प्रभू से अलग) कोई रूप अथवा चिन्ह नहीं। प्रभू के हुकम में ही यह (अलग स्वरूप वाला) बना है और प्रभू की रजा को समझ के उस में लीन हो जाता है। 7। जो मनुष्य इस मन का भेद जान लेता है। वह इस मन के द्वारा ही (अंतरात्मे) लीन हो के सुखदेव प्रभू का रूप हो जाता है। 8। जो खुद एक है और सारे शरीरों में मौजूद है कबीर उस (सर्व-व्यापक) मन (भाव। परमात्मा) का सिमरन कर रहा है । 9। 1। 36।

गउड़ी गुआरेरी ॥

गउड़ी गुआरेरी ॥
अहिनिसि एक नाम जो जागे ॥
केतक सिध भए लिव लागे ॥1॥ रहाउ ॥
साधक सिध सगल मुनि हारे ॥
एक नाम कलिप तर तारे ॥1॥
जो हरि हरे सु होहि न आना ॥
कहि कबीर राम नाम पछाना ॥2॥37॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी ॥ बहुत सारे वह मनुष्य (जीवन सफर की दौड़ में) जीते हुए हैं जो दिन रात केवल प्रभू के नाम में सुचेत रहे हैं। जिन्होंने (नाम में ही) सुरति जोड़ के रखी है। 1। रहाउ। (योग-) साधना करने वाले, (योग साधनों में) सिद्ध हुए जोगी और सारे मुनि लोक (संसार समुंद्र से तैरने के और ही तरीके ढूँढ-ढूँढ के) थक गए हैं; केवल प्रभू का नाम ही कल्प-वृक्ष है जो (जीवों का) बेड़ा पार करता है। 1। जो मनुष्य प्रभू का सिमरन करते हैं, वह प्रभू से अलग नहीं रह जाते, कबीर जी कहते है, उन्होंने प्रभू के नाम को पहचान लिया है (नाम से गहरी सांझ डाल ली है) । 2। 37।

गउड़ी भी सोरठि भी ॥

गउड़ी भी सोरठि भी ॥
रे जीअ निलज लाज तोुहि नाही ॥
हरि तजि कत काहू के जांही ॥1॥ रहाउ ॥
जा को ठाकुरु ऊचा होई ॥
सो जनु पर घर जात न सोही ॥1॥
सो साहिबु रहिआ भरपूरि ॥
सदा संगि नाही हरि दूरि ॥2॥
कवला चरन सरन है जा के ॥
कहु जन का नाही घर ता के ॥3॥
सभु कोऊ कहै जासु की बाता ॥
सो संम्रथु निज पति है दाता ॥4॥
कहै कबीरु पूरन जग सोई ॥
जा के हिरदै अवरु न होई ॥5॥38॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी भी सोरठि भी ॥ हे बेशर्म मन ! आपको शर्म नहीं आती? प्रभू को छोड़ के कहाँ और किसके पास आप जाते हैं? (भाव। क्यूँ और आसरे आप देखते हैं?)। 1। रहाउ। जिस मनुष्य का मालिक बड़ा हो। वह पराए घर जाता अच्छा नहीं लगता। 1। (हे मन !) वह मालिक प्रभू सब जगह मौजूद है। सदा (आपके) साथ है। (आपसे) दूर नहीं। 2। लक्ष्मी (भी) जिसके चरणों का आसरा लिए बैठी है। हे भाई ! बताओ। उस प्रभू के घर किस चीज की कमी है?। 3। जिस प्रभू की (महानता की) बातें हरेक जीव कर रहा है। वह प्रभू सब ताकतों का मालिक है। वह हमारा (सबका) पति है और सब पदार्थ देने वाला है। 4। कबीर कहता है, संसार में केवल वही मनुष्य गुणवान है जिसके हृदय में (प्रभू के बिना) कोई और (दाता जचता) नहीं। 5। 38।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: भगत कबीर जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 330 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।