कहु कबीर खोजउ असमान ॥
राम समान न देखउ आन ॥2॥34॥
जिह सिरि रचि रचि बाधत पाग ॥
सो सिरु चुंच सवारहि काग ॥1॥
इसु तन धन को किआ गरबईआ ॥
राम नामु काहे न द्रिड़॑ीआ ॥1॥ रहाउ ॥
कहत कबीर सुनहु मन मेरे ॥
इही हवाल होहिगे तेरे ॥2॥35॥
रागु गउड़ी गुआरेरी असटपदी कबीर जी की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सुखु मांगत दुखु आगै आवै ॥
सो सुखु हमहु न मांगिआ भावै ॥1॥
बिखिआ अजहु सुरति सुख आसा ॥
कैसे होई है राजा राम निवासा ॥1॥ रहाउ ॥
इसु सुख ते सिव ब्रहम डराना ॥
सो सुखु हमहु साचु करि जाना ॥2॥
सनकादिक नारद मुनि सेखा ॥
तिन भी तन महि मनु नही पेखा ॥3॥
इसु मन कउ कोई खोजहु भाई ॥
तन छूटे मनु कहा समाई ॥4॥
गुर परसादी जैदेउ नामां ॥
भगति कै प्रेमि इन ही है जानां ॥5॥
इसु मन कउ नही आवन जाना ॥
जिस का भरमु गइआ तिनि साचु पछाना ॥6॥
इसु मन कउ रूपु न रेखिआ काई ॥
हुकमे होइआ हुकमु बूझि समाई ॥7॥
इस मन का कोई जानै भेउ ॥
इह मनि लीण भए सुखदेउ ॥8॥
जीउ एकु अरु सगल सरीरा ॥
इसु मन कउ रवि रहे कबीरा ॥9॥1॥36॥
अहिनिसि एक नाम जो जागे ॥
केतक सिध भए लिव लागे ॥1॥ रहाउ ॥
साधक सिध सगल मुनि हारे ॥
एक नाम कलिप तर तारे ॥1॥
जो हरि हरे सु होहि न आना ॥
कहि कबीर राम नाम पछाना ॥2॥37॥
रे जीअ निलज लाज तोुहि नाही ॥
हरि तजि कत काहू के जांही ॥1॥ रहाउ ॥
जा को ठाकुरु ऊचा होई ॥
सो जनु पर घर जात न सोही ॥1॥
सो साहिबु रहिआ भरपूरि ॥
सदा संगि नाही हरि दूरि ॥2॥
कवला चरन सरन है जा के ॥
कहु जन का नाही घर ता के ॥3॥
सभु कोऊ कहै जासु की बाता ॥
सो संम्रथु निज पति है दाता ॥4॥
कहै कबीरु पूरन जग सोई ॥
जा के हिरदै अवरु न होई ॥5॥38॥
गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
कबीर की पहचान उनके उलट-बाँसी हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी। आज भी, बनारस के अस्सी-घाट के पास उनकी समाधि है।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “अगर हमें प्रभू के नाम का आसरा ना हो तो।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।