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अंग 325

अंग
325
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: Bhagat Kabeer Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
गउड़ी कबीर जी ॥
अंधकार सुखि कबहि न सोई है ॥
राजा रंकु दोऊ मिलि रोई है ॥1॥
जउ पै रसना रामु न कहिबो ॥
उपजत बिनसत रोवत रहिबो ॥1॥ रहाउ ॥
जस देखीऐ तरवर की छाइआ ॥
प्रान गए कहु का की माइआ ॥2॥
जस जंती महि जीउ समाना ॥
मूए मरमु को का कर जाना ॥3॥
हंसा सरवरु कालु सरीर ॥
राम रसाइन पीउ रे कबीर ॥4॥8॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी कबीर जी ॥ (परमात्मा को भुला के अज्ञानता के) अंधकार में कभी सुखी नहीं सो सकते। राजा हो कंगाल। दोनों ही दुखी होते हैं। 1। (हे भाई !) जब तक जीभ से परमात्मा को नहीं जपते। तब तक पैदा होते मरते व (इस दुख में) रोते रहोगे। 1। रहाउ। जैसे वृक्ष की छाया देखते हैं (भाव। जैसे पेड़ की छाया सदा टिकी नहीं रहती। वैसे ही इस माया का हाल है); जब मनुष्य के प्राण निकल जाते हैं तो बताओ। ये माया किस की होती है? (भाव। किसी और की बन जाती है। इसलिए इसका क्या मान?)। 2। जैसे (जब गवईया अपना हाथ साज से हटा लेता है तो) राग की आवाज साज़ में (ही) लीन हो जाती है (कोई बता नहीं सकता कि वह कहाँ गई)। वैसे ही मरे मनुष्य का भेद (कि उसकी जीवात्मा कहाँ गई) कोई मनुष्य कैसे जान सकता है?। 3। जैसे हंसों के लिए सरोवर है (भाव। जैसे हंस सरोवर के नजदीक ही उड़ते रहते हैं) वैसे ही मौत शरीरों (के लिए) है। इसलिए हे कबीर ! सब रसों से श्रेष्ठ रस राम-रस पी। 4। 8।
गउड़ी कबीर जी ॥
जोति की जाति जाति की जोती ॥
तितु लागे कंचूआ फल मोती ॥1॥
कवनु सु घरु जो निरभउ कहीऐ ॥
भउ भजि जाइ अभै होइ रहीऐ ॥1॥ रहाउ ॥
तटि तीरथि नही मनु पतीआइ ॥
चार अचार रहे उरझाइ ॥2॥
पाप पुंन दुइ एक समान ॥
निज घरि पारसु तजहु गुन आन ॥3॥
कबीर निरगुण नाम न रोसु ॥
इसु परचाइ परचि रहु एसु ॥4॥9॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी कबीर जी ॥ परमात्मा की बनाई हुई (सारी) सृष्टि है। इस सृष्टि के जीवों की (जो) बुद्धि है (उसे) काँच व मोती फल लगे हुए हैं (अर्थात। कोई भली तरफ लगे हुए हैं कोई बुरी तरफ)। 1। वह कौन सी जगह है जो डर से खाली है? (जहाँ रहने से हृदय का) डर दूर हो सकता है। जहाँ निडर हो के रह सकते हैं?। 1। रहाउ। किसी (पवित्र नदी के) किनारे अथवा तीर्थ पर (जा के भी) मन को धैर्य नहीं मिलता। वहाँ भी लोग पाप-पुंन्न में लगे हुए हैं। 2। (पर) पाप और पुन्न दोनों ही एक जैसे हैं (भाव। दोनों ही वासना की और दोड़ाए फिरते हैं)। (हे मन ! नीचों से ऊँचा करने वाला) पारस (प्रभू) आपके अपने अंदर ही है। (इसलिए। पाप-पुन्न वाले) और गुण (अंदर धारण करने) छोड़ दे (और प्रभू को अपने अंदर संभाल)। 3। हे कबीर ! माया के मोह से ऊँचे प्रभू के नाम को ना बिसार; अपने मन को नाम जपने में लगा के नाम में ही व्यस्त रह। 4। 9।
गउड़ी कबीर जी ॥
जो जन परमिति परमनु जाना ॥
बातन ही बैकुंठ समाना ॥1॥
ना जाना बैकुंठ कहा ही ॥
जानु जानु सभि कहहि तहा ही ॥1॥ रहाउ ॥
कहन कहावन नह पतीअई है ॥
तउ मनु मानै जा ते हउमै जई है ॥2॥
जब लगु मनि बैकुंठ की आस ॥
तब लगु होइ नही चरन निवासु ॥3॥
कहु कबीर इह कहीऐ काहि ॥
साधसंगति बैकुंठै आहि ॥4॥10॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी कबीर जी ॥ जो मनुष्य (निरा कहते ही हैं कि) हमने उस प्रभू को जान लिया है। जिसकी सीमा नहीं ढूँढी जा सकती जो मन की पहुँच से परे है। वह मनुष्य निरी बातों से ही बैकुंठ में पहुँचे हैं (भाव। वे गप्पें ही मार रहे हैं। उन्होंने बैकुंठ असल में देखा ही नहीं है)। 1। मुझे तो पता ही नहीं। वह बैकुंठ कहाँ है। जहाँ ये सारे लोग कहते हैं। चलना है चलना है। 1। रहाउ। निरा ये कहने से और सुनने से (कि हमने बैकुंठ जाना है) मन को तसल्ली नहीं हो सकती। मन को तभी धैर्य आ सकता है कि जब अहंकार दूर हो जाय। 2। (एक बार और याद रखने वाली है कि) जब तक मन में बैकुंठ जाने की चाहत बनी हुई है। तब तक प्रभू के चरणों में मन नहीं जुड़ सकता। 3। हे कबीर ! कह,ये बात कैसे समझा के बताएं (भाव। ये स्पष्ट बात है कि) साध-संगति ही (असली) बैकुंठ है। 4। 10।
गउड़ी कबीर जी ॥
उपजै निपजै निपजि समाई ॥
नैनह देखत इहु जगु जाई ॥1॥
लाज न मरहु कहहु घरु मेरा ॥
अंत की बार नही कछु तेरा ॥1॥ रहाउ ॥
अनिक जतन करि काइआ पाली ॥
मरती बार अगनि संगि जाली ॥2॥
चोआ चंदनु मरदन अंगा ॥
सो तनु जलै काठ कै संगा ॥3॥
कहु कबीर सुनहु रे गुनीआ ॥
बिनसैगो रूपु देखै सभ दुनीआ ॥4॥11॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी कबीर जी ॥ (पहले इस जीव की पिता के बिंद से) शुरूआत होती है। (फिर माँ के पेट में यह) वजूद में आता है। वजूद में आ के (पुनः) नाश हो जाता है। (सो) हमारी आँखों के सामने ही ये संसार इसी तरह चलता जा रहा है। 1। (इसलिए। हे जीव !) शर्म से क्यूँ नहीं डूब मरता (भाव। आपको शर्म क्यूँ नहीं आती) जब आप ये कहता है कि ये घर मेरा है। (याद रख) जिस वक्त मौत आएगी। तब कोई भी चीज आपकी नहीं रहेगी। 1। रहाउ। अनेकों यतन करके ये शरीर पालते हैं। पर जब मौत आती है। इसे आग से जला देते हैं। 2। (जिस शरीर के) अंगों को इत्र व चंदन मलते हैं। वह शरीर (आखिर को) लकड़ियों से जल जाता है। 3। हे कबीर ! कह, हे विचारवान मनुष्य ! याद रख। सारी दुनिया देखेगी (भाव। सबके देखते-देखते) ये रूप नाश हो जाएगा। 4। 11।
गउड़ी कबीर जी ॥
अवर मूए किआ सोगु करीजै ॥
तउ कीजै जउ आपन जीजै ॥1॥
मै न मरउ मरिबो संसारा ॥
अब मोहि मिलिओ है जीआवनहारा ॥1॥ रहाउ ॥
इआ देही परमल महकंदा ॥
ता सुख बिसरे परमानंदा ॥2॥
कूअटा एकु पंच पनिहारी ॥
टूटी लाजु भरै मति हारी ॥3॥
कहु कबीर इक बुधि बीचारी ॥
ना ओहु कूअटा ना पनिहारी ॥4॥12॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी कबीर जी ॥ औरों के मरने पर शोक करने से क्या लाभ? (उनके विछोड़े का) तो तभी करें अगर खुद (यहाँ सदा) जीवित रहना हो। 1। मेरी आत्मा की कभी मौत नहीं होगी। मुर्दा हैं वो जीव जो जगत के धंधों में फंसे हुए हैं। मुझे (तो) अब (असल) जिंदगी देने वाला परमात्मा मिल गया है। 1। रहाउ। (जीव) इस शरीर को कई प्रकार की सुगंधियों से महकाता है। इन ही सुखों में इसे परम आनन्द-स्वरूप परमात्मा भूल जाता है। 2। (शरीर, जैसे) एक छोटा सा कूआँ है, (पाँचों ज्ञानेंदियां जैसे) पाँच चरखिआं हैं, भ्रष्ट हुई बुद्धि रस्सी के बिना (पानी) भरने की कोशिश कर रही है (भाव, विकारों में फंसी हुई बुद्धि ज्ञानेंद्रियों द्वारा विकारों में से सुख लेने के व्यर्थ यत्न कर रही है)।3। हे कबीर ! कह, (जब) विचार वाली बुद्धि अंदर (जाग गई), तब ना वह शरीरिक मोह रहा और ना ही (विकारों की तरफ खींचने वाली) वे इंद्रियां रहीं।4।12।
गउड़ी कबीर जी ॥
असथावर जंगम कीट पतंगा ॥
अनिक जनम कीए बहु रंगा ॥1॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी कबीर जी ॥ हम (अब तक) अस्थावर। जंगम। कीट-पतंगे। ऐसे कई किस्मों और जन्मों में आ चुके हैं। 1।

गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

कबीर पन्द्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, मगर रामानन्द-शिष्य परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, ज़बान सीधी है, कई बार चुभने वाली। उनकी कुछ रचनाएँ बीजक में हैं, कुछ आदि ग्रंथ में, कुछ अनेक संप्रदायों में बिखरी हैं।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “गउड़ी कबीर जी ॥ (परमात्मा को भुला के अज्ञानता के) अंधकार में कभी सुखी नहीं सो सकते।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।