अंग
321
गउड़ी
अंग बदलें या अंश चुनें · १३ अंश
- नानक राम नामु धनु कीता पूरे गुर परसादि ॥2॥
- धोहु न चली खसम नालि लबि मोहि विगुते ॥
- उठंदिआ बहंदिआ सवंदिआ सुखु सोइ ॥
- लालचि अटिआ नित फिरै सुआरथु करे न कोइ ॥
- सभे वसतू कउड़ीआ सचे नाउ मिठा ॥
- जाचड़ी सा सारु जो जाचंदी हेकड़ो ॥
- नीहि जि विधा मंनु पछाणू विरलो थिओ ॥
- सोई सेविहु जीअड़े दाता बखसिंदु ॥
- वत लगी सचे नाम की जो बीजे सो खाइ ॥
- मंगणा त सचु इकु जिसु तुसि देवै आपि ॥
- लाहा जग महि से खटहि जिन हरि धनु रासि ॥
- पारब्रहमि फुरमाइआ मीहु वुठा सहजि सुभाइ ॥
- मः 5 ॥
नानक राम नामु धनु कीता पूरे गुर परसादि ॥2॥
नानक राम नामु धनु कीता पूरे गुर परसादि ॥2॥
हिन्दी अर्थ: उसे अपहुँच और आश्चर्य रूप प्रभू हर जगह मौजूद दिखाई दे गया है। 2।
धोहु न चली खसम नालि लबि मोहि विगुते ॥
पउड़ी ॥
धोहु न चली खसम नालि लबि मोहि विगुते ॥
करतब करनि भलेरिआ मदि माइआ सुते ॥
फिरि फिरि जूनि भवाईअनि जम मारगि मुते ॥
कीता पाइनि आपणा दुख सेती जुते ॥
नानक नाइ विसारिऐ सभ मंदी रुते ॥12॥
धोहु न चली खसम नालि लबि मोहि विगुते ॥
करतब करनि भलेरिआ मदि माइआ सुते ॥
फिरि फिरि जूनि भवाईअनि जम मारगि मुते ॥
कीता पाइनि आपणा दुख सेती जुते ॥
नानक नाइ विसारिऐ सभ मंदी रुते ॥12॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ पति (प्रभू) के साथ धोखा कामयाब नहीं हो सकता। जो मनुष्य लोभ में और मोह में फंसे हुए हैं वह ख्वार होते हैं। माया के नशे में सोए हुए लोग बुरी करतूतें करते हैं। बार-बार जूनों में धक्के खाते हैं और यमराज के राह में (पति-विहीन) छोड़े जाते हैं। अपने किए हुए (बुरे) कामों का फल पाते हैं। दुखों के साथ जोते जाते हैं। हे नानक ! अगर प्रभू का नाम बिसार दिया जाय तो (जीव के लिए) सारी ऋतुएं बुरी ही समझें। 12।
उठंदिआ बहंदिआ सवंदिआ सुखु सोइ ॥
सलोक मः 5 ॥
उठंदिआ बहंदिआ सवंदिआ सुखु सोइ ॥
नानक नामि सलाहिऐ मनु तनु सीतलु होइ ॥1॥
उठंदिआ बहंदिआ सवंदिआ सुखु सोइ ॥
नानक नामि सलाहिऐ मनु तनु सीतलु होइ ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ सुख एक-सार उठते-बैठते-सोते हर समय बना रहता है - हे नानक ! अगर प्रभू के नाम की वडिआई करते रहें तो मन और शरीर ठंडे-ठार रहते हैं । 1।
लालचि अटिआ नित फिरै सुआरथु करे न कोइ ॥
मः 5 ॥
लालचि अटिआ नित फिरै सुआरथु करे न कोइ ॥
जिसु गुरु भेटै नानका तिसु मनि वसिआ सोइ ॥2॥
लालचि अटिआ नित फिरै सुआरथु करे न कोइ ॥
जिसु गुरु भेटै नानका तिसु मनि वसिआ सोइ ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ (जगत माया के) लालच से लिबड़ा हुआ सदा (भटकता) फिरता है। कोई भी आदमी अपने असल भले का काम नहीं करता। (पर) हे नानक ! जिस मनुष्य को सतिगुरू मिलता है उसके मन में वह प्रभू बस जाता है। 2।
सभे वसतू कउड़ीआ सचे नाउ मिठा ॥
पउड़ी ॥
सभे वसतू कउड़ीआ सचे नाउ मिठा ॥
सादु आइआ तिन हरि जनां चखि साधी डिठा ॥
पारब्रहमि जिसु लिखिआ मनि तिसै वुठा ॥
इकु निरंजनु रवि रहिआ भाउ दुया कुठा ॥
हरि नानकु मंगै जोड़ि कर प्रभु देवै तुठा ॥13॥
सभे वसतू कउड़ीआ सचे नाउ मिठा ॥
सादु आइआ तिन हरि जनां चखि साधी डिठा ॥
पारब्रहमि जिसु लिखिआ मनि तिसै वुठा ॥
इकु निरंजनु रवि रहिआ भाउ दुया कुठा ॥
हरि नानकु मंगै जोड़ि कर प्रभु देवै तुठा ॥13॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (दुनिया की बाकी) सारी चीजें (आखिर) कड़वी (हो जाती) हैं (एक) सच्चे प्रभू का नाम (ही सदा) मीठा (रहता) है। (पर) ये स्वाद उन साधुओं को हरी-जनों को ही आता है जिन्होंने (ये नाम रस) चख के देखा है। और उस मनुष्य के मन में (ये स्वाद) आ के बसता है जिसके भाग्य में प्रभू ने लिख दिया है। (ऐसे भाग्यशाली को) माया-रहित प्रभू ही हर जगह दिखाई देता है (उस मनुष्य का) दूसरा भाव नाश हो जाता है। नानक भी दोनों हाथ जोड़ के हरी से यह नाम-रसमांगता है। (पर) प्रभू (उसे) देता है (जिस पर) प्रसन्न होता है। 13।
जाचड़ी सा सारु जो जाचंदी हेकड़ो ॥
सलोक मः 5 ॥
जाचड़ी सा सारु जो जाचंदी हेकड़ो ॥
गाल॑ी बिआ विकार नानक धणी विहूणीआ ॥1॥
जाचड़ी सा सारु जो जाचंदी हेकड़ो ॥
गाल॑ी बिआ विकार नानक धणी विहूणीआ ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ वह याचना सब से बढ़िया है जो (भाव। जिससे मनुष्य) एक प्रभू (के नाम) को मांगता है। हे नानक ! मालिक प्रभू से अन्य बाहरी बातें सब बेकार हैं। 1।
नीहि जि विधा मंनु पछाणू विरलो थिओ ॥
मः 5 ॥
नीहि जि विधा मंनु पछाणू विरलो थिओ ॥
जोड़णहारा संतु नानक पाधरु पधरो ॥2॥
नीहि जि विधा मंनु पछाणू विरलो थिओ ॥
जोड़णहारा संतु नानक पाधरु पधरो ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ ऐसा (ईश्वर की) पहचान वाला कोई दुर्लभ व्यक्ति ही होता है। जिसका मन प्रभु के प्रेम में भेद गया हैं। हे नानक ! ऐसा संत (औरों को भी रॅब से) जोड़ने के स्मर्थ होता है और (रॅब को मिलने के लिए) सीधा राह दिखा देता है। 2।
सोई सेविहु जीअड़े दाता बखसिंदु ॥
पउड़ी ॥
सोई सेविहु जीअड़े दाता बखसिंदु ॥
किलविख सभि बिनासु होनि सिमरत गोविंदु ॥
हरि मारगु साधू दसिआ जपीऐ गुरमंतु ॥
माइआ सुआद सभि फिकिआ हरि मनि भावंदु ॥
धिआइ नानक परमेसरै जिनि दिती जिंदु ॥14॥
सोई सेविहु जीअड़े दाता बखसिंदु ॥
किलविख सभि बिनासु होनि सिमरत गोविंदु ॥
हरि मारगु साधू दसिआ जपीऐ गुरमंतु ॥
माइआ सुआद सभि फिकिआ हरि मनि भावंदु ॥
धिआइ नानक परमेसरै जिनि दिती जिंदु ॥14॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ हे मेरी जिंदे ! उस परमेश्वर को सिमर जो सब दातें देने वाला हैऔर बख्शिशें करने वाला है। परमेश्वर के सिमरन से सारे पाप नाश हो जाते हैं। गुरू ने प्रभू (को मिलने) का राह बताया है। गुरू का उपदेश सदा याद रखना चाहिए। (गुरू का उपदेश हमेशा याद रखने से) माया के सारे स्वाद फीके प्रतीत होते हैं और मन में परमेश्वर प्यारा लगने लगता है। हे नानक ! जिस परमेश्वर ने (ये) जिंद दी है। उसे (सदा) सिमर। 14।
वत लगी सचे नाम की जो बीजे सो खाइ ॥
सलोक मः 5 ॥
वत लगी सचे नाम की जो बीजे सो खाइ ॥
तिसहि परापति नानका जिस नो लिखिआ आइ ॥1॥
वत लगी सचे नाम की जो बीजे सो खाइ ॥
तिसहि परापति नानका जिस नो लिखिआ आइ ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ (ये मानस जनम) सच्चा प्रभू नाम (रूपी बीज बीजने) के लिए फबवां समय मिला है। जो मनुष्य (‘नाम’-बीज) बीजता है वह (इसका फल) खाता है। हे नानक ! ये चीज उस मनुष्य को ही मिलती है जिसके भाग्यों में लिखी हो। 1।
मंगणा त सचु इकु जिसु तुसि देवै आपि ॥
मः 5 ॥
मंगणा त सचु इकु जिसु तुसि देवै आपि ॥
जितु खाधै मनु त्रिपतीऐ नानक साहिब दाति ॥2॥
मंगणा त सचु इकु जिसु तुसि देवै आपि ॥
जितु खाधै मनु त्रिपतीऐ नानक साहिब दाति ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ अगर मांगना है तो सिर्फ प्रभू का नाम मांगो (ये ‘नाम’ उसे ही मिलता है) जिस पर प्रभू स्वयं प्रसन्न हो के देता है। अगर ये (नाम वस्तु) खाई जाए तो मन (माया की ओर से) संतुष्ट हो जाता है। पर हे नानक ! है ये (निरोल। पूरी तरह से) मालिक की बख्शिश ही। 2।
लाहा जग महि से खटहि जिन हरि धनु रासि ॥
पउड़ी ॥
लाहा जग महि से खटहि जिन हरि धनु रासि ॥
दुतीआ भाउ न जाणनी सचे दी आस ॥
निहचलु एकु सरेविआ होरु सभ विणासु ॥
पारब्रहमु जिसु विसरै तिसु बिरथा सासु ॥
कंठि लाइ जन रखिआ नानक बलि जासु ॥15॥
लाहा जग महि से खटहि जिन हरि धनु रासि ॥
दुतीआ भाउ न जाणनी सचे दी आस ॥
निहचलु एकु सरेविआ होरु सभ विणासु ॥
पारब्रहमु जिसु विसरै तिसु बिरथा सासु ॥
कंठि लाइ जन रखिआ नानक बलि जासु ॥15॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ जगत में वही (मनुष्य-बन्जारे) लाभ कमाते हैं जिनके पास परमात्मा का नाम-रूप धन है। पूँजी है। वह (परमात्मा के बिना) किसी और से मोह करना नहीं जानते। उन्हें एक परमात्मा की ही आस होती है। उन्होंने सदा कायम रहने वाले प्रभू को ही सिमरा है (क्योंकि) और सारा जगत (उन्हें) नाशवान (दिखता) है। जिस मनुष्य को परमात्मा भूल जाता है उस की (हरेक) सांस व्यर्थ जाती है। परमात्मा ने अपने सेवकों को (‘दुतिया भाव’ से) स्वयं अपने गले से लगा के बचाया है। हे नानक ! मैं उस प्रभू से सदके जाता हूँ। 15।
पारब्रहमि फुरमाइआ मीहु वुठा सहजि सुभाइ ॥
सलोक मः 5 ॥
पारब्रहमि फुरमाइआ मीहु वुठा सहजि सुभाइ ॥
अंनु धंनु बहुतु उपजिआ प्रिथमी रजी तिपति अघाइ ॥
सदा सदा गुण उचरै दुखु दालदु गइआ बिलाइ ॥
पूरबि लिखिआ पाइआ मिलिआ तिसै रजाइ ॥
परमेसरि जीवालिआ नानक तिसै धिआइ ॥1॥
पारब्रहमि फुरमाइआ मीहु वुठा सहजि सुभाइ ॥
अंनु धंनु बहुतु उपजिआ प्रिथमी रजी तिपति अघाइ ॥
सदा सदा गुण उचरै दुखु दालदु गइआ बिलाइ ॥
पूरबि लिखिआ पाइआ मिलिआ तिसै रजाइ ॥
परमेसरि जीवालिआ नानक तिसै धिआइ ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ जब परमात्मा ने हुकम दिया तो (जिस किसी भाग्यशाली के हृदय रूपी धरती पर) अपने आप नाम की बरखा होने लग पड़ी। उस (हृदय-धरती) में (प्रभू की सिफत सालाह का) अन्न बहुत पैदा हो जाता है। (उसका हृदय अच्छी तरह संतोख वाला हो जाता है)। वह मनुष्य सदा ही परमात्मा के गुण गाता है। उसकी दुख-दरिद्रता दूर हो जाती है। पर ये ‘नाम’ रूपी अन्न पूर्बले लिखे भाग्यों के अनुसार मिलता है और मिलता है परमात्मा की रजा मुताबिक। (माया में मरे हुए जिस किसी में) जान डाली है परमेश्वर ने ही (डाली है)। हे नानक ! उस प्रभू को सिमर। 1।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ३२१ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।