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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 320 · गउड़ी

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अंग
320
गउड़ी
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  1. तिसै सरेवहु प्राणीहो जिस दै नाउ पलै ॥
  2. जाचकु मंगै दानु देहि पिआरिआ ॥
  3. सिखहु सबदु पिआरिहो जनम मरन की टेक ॥
  4. ओथै अंम्रितु वंडीऐ सुखीआ हरि करणे ॥
  5. सतिगुरि पूरै सेविऐ दूखा का होइ नासु ॥
  6. जिसु सिमरत संकट छुटहि अनद मंगल बिस्राम ॥
  7. तिन की सोभा किआ गणी जिनी हरि हरि लधा ॥
  8. कामु न करही आपणा फिरहि अवता लोइ ॥
  9. बिखै कउड़तणि सगल माहि जगति रही लपटाइ ॥
  10. इह नीसाणी साध की जिसु भेटत तरीऐ ॥
  11. नानक आए से परवाणु है जिन हरि वुठा चिति ॥
  12. पारब्रहमु प्रभु द्रिसटी आइआ पूरन अगम बिसमाद ॥

गुरु अर्जन देव जी · गउड़ी की वार, पउड़ी · राग गउड़ी

तिसै सरेवहु प्राणीहो जिस दै नाउ पलै ॥

पउड़ी ॥
तिसै सरेवहु प्राणीहो जिस दै नाउ पलै ॥
ऐथै रहहु सुहेलिआ अगै नालि चलै ॥
घरु बंधहु सच धरम का गडि थंमु अहलै ॥
ओट लैहु नाराइणै दीन दुनीआ झलै ॥
नानक पकड़े चरण हरि तिसु दरगह मलै ॥8॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ उस (गुरू) की। हे लोगो! सेवा करें जिसके पल्ले प्रभू का नाम है (भाव, जिससे नाम मिल सकता है)। (इस तरह) यहाँ सुखी रहेंगे और परलोक में (ये नाम) आपके साथ जाएगा। (ये नाम रूपी) पक्का स्तम्भ (खम्भा) गाड़ के सदा कायम रहने वाले धर्म का मंदिर (सत्संग) बनाएँ। अकाल-पुरख की टेक रखें जो दीन और दुनिया का आसरा देने वाला है। हे नानक! जिस मनुष्य ने प्रभू के पैर पकड़े हैं वह प्रभू की दरगाह में बना रहता है। 8।

गुरु अर्जन देव जी · गउड़ी की वार, सलोक · राग गउड़ी

जाचकु मंगै दानु देहि पिआरिआ ॥

सलोक मः 5 ॥
जाचकु मंगै दानु देहि पिआरिआ ॥
देवणहारु दातारु मै नित चितारिआ ॥
निखुटि न जाई मूलि अतुल भंडारिआ ॥
नानक सबदु अपारु तिनि सभु किछु सारिआ ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ (हे प्रभू!) मैं मंगता (आपके ‘अपार शबद’ की) ख़ैर मांगता हूँ। मुझे ख़ैर दें। आप दातें देने वाले हैं। आप दातें देने के समर्थ हैं। मैं आपको सदा याद करता हूँ। आपका खजाना बेअंत है (अगर उसमें से मुझे भी ख़ैर डाल दे तो) खत्म नहीं होता। हे नानक! (प्रभू की सिफत सालाह की) बाणी अपार है। इस बाणी ने मेरा हरेक कार्य सँवार दिया है। 1।

गुरु अर्जन देव जी · गउड़ी की वार, सलोक · राग गउड़ी

सिखहु सबदु पिआरिहो जनम मरन की टेक ॥

मः 5 ॥
सिखहु सबदु पिआरिहो जनम मरन की टेक ॥
मुख ऊजल सदा सुखी नानक सिमरत एक ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे प्यारे सज्जनों! (प्रभू की सिफत सालाह वाली) गुरबाणी याद रखने की आदत डालें। ये सारी उम्र का आसरा (बनती) है। हे नानक! (इस बाणी के द्वारा) एक प्रभू को सिमरने से सदा सुखी रहते हैं और माथा खिला रहता है। 2।

गुरु अर्जन देव जी · गउड़ी की वार, पउड़ी · राग गउड़ी

ओथै अंम्रितु वंडीऐ सुखीआ हरि करणे ॥

पउड़ी ॥
ओथै अंम्रितु वंडीऐ सुखीआ हरि करणे ॥
जम कै पंथि न पाईअहि फिरि नाही मरणे ॥
जिस नो आइआ प्रेम रसु तिसै ही जरणे ॥
बाणी उचरहि साध जन अमिउ चलहि झरणे ॥
पेखि दरसनु नानकु जीविआ मन अंदरि धरणे ॥9॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ सब जीवों को सुखी करने वाला हरी-नाम अमृत उस सत्संग में बाँटते हैं। (जो मनुष्य वह अमृत प्राप्त करते हैं वह) जम के राह पर नहीं पाए जाते। उन्हें मुड़ मौत (का डर सताता) नहीं। जिस मनुष्य को हरी नाम के प्यार का स्वाद आता है। वह इस स्वाद को अपने अंदर टिकाता है। (सत्संग में) गुरमुख सिफत सालाह की बाणी उच्चारते हैं वहाँ अमृत के। जैसे, फुव्वारे चल पड़ते हैं। नानक (भी उस सत्संग का) दर्शन करके जी रहा है और मन में हरि-नाम को धारण कर रहा है। 9।

गुरु अर्जन देव जी · गउड़ी की वार, सलोक · राग गउड़ी

सतिगुरि पूरै सेविऐ दूखा का होइ नासु ॥

सलोक मः 5 ॥
सतिगुरि पूरै सेविऐ दूखा का होइ नासु ॥
नानक नामि अराधिऐ कारजु आवै रासि ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5 ॥ हे नानक! अगर पूरे गुरू के बताए हुए मार्ग पर चलें तो दुखों का नाश हो जाता है और अगर आपका नाम सिमरें तो जीवन का मनोरथ सफल हो जाता है। 1।

गुरु अर्जन देव जी · गउड़ी की वार, सलोक · राग गउड़ी

जिसु सिमरत संकट छुटहि अनद मंगल बिस्राम ॥

मः 5 ॥
जिसु सिमरत संकट छुटहि अनद मंगल बिस्राम ॥
नानक जपीऐ सदा हरि निमख न बिसरउ नामु ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे नानक! जिस परमात्मा को सिमरने से सारे दुख दूर हो जाते हैं और (हृदय में) आनंद व खुशियों का निवास होता है उसको सदा सिमरें। कभी निमख मात्र भी वह हरी-नाम हमें ना भूले। 2।

गुरु अर्जन देव जी · गउड़ी की वार, पउड़ी · राग गउड़ी

तिन की सोभा किआ गणी जिनी हरि हरि लधा ॥

पउड़ी ॥
तिन की सोभा किआ गणी जिनी हरि हरि लधा ॥
साधा सरणी जो पवै सो छुटै बधा ॥
गुण गावै अबिनासीऐ जोनि गरभि न दधा ॥
गुरु भेटिआ पारब्रहमु हरि पड़ि बुझि समधा ॥
नानक पाइआ सो धणी हरि अगम अगधा ॥10॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ जिन (गुरमुखों) ने ईश्वर को पा लिया है उनका बड़प्पन बयान नहीं किया जा सकता। जो मनुष्य उन गुरमुखों की शरण आता है वह माया के बंधनों में बंधा हुआ मुक्त हो जाता है (भाव, उसके माया के बंधन टूट जाते हैं)। वह अविनाशी प्रभू के गुण गाता है और जूनियों में पड़-पड़ के नहीं सड़ता। उसे गुरू मिल जाता है। वह प्रभू की सिफत सालाह उचार के और समझ के शांति प्राप्त करता है। हे नानक! उस मनुष्य ने अथाह और अपहुँच मालिक हरी को पा लिया है। 10।

गुरु अर्जन देव जी · गउड़ी की वार, सलोक · राग गउड़ी

कामु न करही आपणा फिरहि अवता लोइ ॥

सलोक मः 5 ॥
कामु न करही आपणा फिरहि अवता लोइ ॥
नानक नाइ विसारिऐ सुखु किनेहा होइ ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ (हे जीव!) आप अपना (असल) काम नहीं करते और जगत में आवारा फिर रहे हैं। हे नानक! अगर प्रभू का नाम बिसार दिया जाए तो कोई भी सुख नहीं हो सकता। 1।

गुरु अर्जन देव जी · गउड़ी की वार, सलोक · राग गउड़ी

बिखै कउड़तणि सगल माहि जगति रही लपटाइ ॥

मः 5 ॥
बिखै कउड़तणि सगल माहि जगति रही लपटाइ ॥
नानक जनि वीचारिआ मीठा हरि का नाउ ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ (माया) जहर की कड़वाहट सारे जीवों में है। जगत में सबको चिपकी हुई है। हे नानक! (सिर्फ प्रभू के) सेवक ने ये विचार की है कि परमात्मा का नाम ही मीठा है। 2।

गुरु अर्जन देव जी · गउड़ी की वार, पउड़ी · राग गउड़ी

इह नीसाणी साध की जिसु भेटत तरीऐ ॥

पउड़ी ॥
इह नीसाणी साध की जिसु भेटत तरीऐ ॥
जमकंकरु नेड़ि न आवई फिरि बहुड़ि न मरीऐ ॥
भव सागरु संसारु बिखु सो पारि उतरीऐ ॥
हरि गुण गुंफहु मनि माल हरि सभ मलु परहरीऐ ॥
नानक प्रीतम मिलि रहे पारब्रहम नरहरीऐ ॥11॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ साधू की ये निशानी है कि उसको मिल के (संसार) समुंद्र से तैर जाते हैं। जम का सेवक (भाव, जमदूत) नजदीक नहीं फटकता और बार-बार नहीं मरना पड़ता। जो जहर-रूपी संसार समुंद्र है इससे पार लांघ जाते हैं। हे भाई! (साधू गुरमुख को मिल के) मन में परमात्मा के गुणों की माला गूँदो। मन की सारी मैल दूर हो जाती है। हे नानक! (जिन्होंने ये माला गूँदी है) वे पारब्रहम परमात्मा को मिले रहते हैं। 11।

गुरु अर्जन देव जी · गउड़ी की वार, सलोक · राग गउड़ी

नानक आए से परवाणु है जिन हरि वुठा चिति ॥

सलोक मः 5 ॥
नानक आए से परवाणु है जिन हरि वुठा चिति ॥
गाल॑ी अल पलालीआ कंमि न आवहि मित ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ हे नानक! जिन मनुष्यों के चित्त में परमात्मा आ बसा है उनका आना सफल है। हे मित्र! फोकी बातें किसी काम नहीं आतीं (नाम से टूट के फोकी बातों का कोई लाभ नहीं होता)। 1।

गुरु अर्जन देव जी · गउड़ी की वार, सलोक · राग गउड़ी

पारब्रहमु प्रभु द्रिसटी आइआ पूरन अगम बिसमाद ॥

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मः 5 ॥
पारब्रहमु प्रभु द्रिसटी आइआ पूरन अगम बिसमाद ॥

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे नानक! (जिस मनुष्य ने) पूरे गुरू की कृपा से परमात्मा के नाम को अपना धन बनाया है।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 320 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।