दामनी चमतकार तिउ वरतारा जग खे ॥
वथु सुहावी साइ नानक नाउ जपंदो तिसु धणी ॥2॥
सिम्रिति सासत्र सोधि सभि किनै कीम न जाणी ॥
जो जनु भेटै साधसंगि सो हरि रंगु माणी ॥
सचु नामु करता पुरखु एह रतना खाणी ॥
मसतकि होवै लिखिआ हरि सिमरि पराणी ॥
तोसा दिचै सचु नामु नानक मिहमाणी ॥4॥
अंतरि चिंता नैणी सुखी मूलि न उतरै भुख ॥
नानक सचे नाम बिनु किसै न लथो दुखु ॥1॥
मुठड़े सेई साथ जिनी सचु न लदिआ ॥
नानक से साबासि जिनी गुर मिलि इकु पछाणिआ ॥2॥
जिथै बैसनि साध जन सो थानु सुहंदा ॥
ओइ सेवनि संम्रिथु आपणा बिनसै सभु मंदा ॥
पतित उधारण पारब्रहम संत बेदु कहंदा ॥
भगति वछलु तेरा बिरदु है जुगि जुगि वरतंदा ॥
नानकु जाचै एकु नामु मनि तनि भावंदा ॥5॥
चिड़ी चुहकी पहु फुटी वगनि बहुतु तरंग ॥
अचरज रूप संतन रचे नानक नामहि रंग ॥1॥
घर मंदर खुसीआ तही जह तू आवहि चिति ॥
दुनीआ कीआ वडिआईआ नानक सभि कुमित ॥2॥
हरि धनु सची रासि है किनै विरलै जाता ॥
तिसै परापति भाइरहु जिसु देइ बिधाता ॥
मन तन भीतरि मउलिआ हरि रंगि जनु राता ॥
साधसंगि गुण गाइआ सभि दोखह खाता ॥
नानक सोई जीविआ जिनि इकु पछाता ॥6॥
खखड़ीआ सुहावीआ लगड़ीआ अक कंठि ॥
बिरह विछोड़ा धणी सिउ नानक सहसै गंठि ॥1॥
विसारेदे मरि गए मरि भि न सकहि मूलि ॥
वेमुख होए राम ते जिउ तसकर उपरि सूलि ॥2॥
सुख निधानु प्रभु एकु है अबिनासी सुणिआ ॥
जलि थलि महीअलि पूरिआ घटि घटि हरि भणिआ ॥
ऊच नीच सभ इक समानि कीट हसती बणिआ ॥
मीत सखा सुत बंधिपो सभि तिस दे जणिआ ॥
तुसि नानकु देवै जिसु नामु तिनि हरि रंगु मणिआ ॥7॥
जिना सासि गिरासि न विसरै हरि नामां मनि मंतु ॥
धंनु सि सेई नानका पूरनु सोई संतु ॥1॥
अठे पहर भउदा फिरै खावण संदड़ै सूलि ॥
दोजकि पउदा किउ रहै जा चिति न होइ रसूलि ॥2॥
गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 13 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “महला 5॥ जगत का वरतारा उसी तरह है (जैसे) बिजली की चमक (थोडे ही समय के लिए) होती है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।