Lulla Family

अंग ३१४ · गउड़ी

अंग
314
गउड़ी
अंग बदलें या अंश चुनें · ७ अंश

१ से १४३० तक कोई अंक लिखिए।

  1. तू करता सभु किछु जाणदा जो जीआ अंदरि वरतै ॥
  2. इहु मनूआ द्रिड़ु करि रखीऐ गुरमुखि लाईऐ चितु ॥
  3. मनमुखु अहंकारी महलु न जाणै खिनु आगै खिनु पीछै ॥
  4. सा सेवा कीती सफल है जितु सतिगुर का मनु मंने ॥
  5. जिनि गुरु गोपिआ आपणा तिसु ठउर न ठाउ ॥
  6. मनमुखु अगिआनु दुरमति अहंकारी ॥
  7. जिन के चित कठोर हहि से बहहि न सतिगुर पासि ॥

तू करता सभु किछु जाणदा जो जीआ अंदरि वरतै ॥

पउड़ी ॥
तू करता सभु किछु जाणदा जो जीआ अंदरि वरतै ॥
तू करता आपि अगणतु है सभु जगु विचि गणतै ॥
सभु कीता तेरा वरतदा सभ तेरी बणतै ॥
तू घटि घटि इकु वरतदा सचु साहिब चलतै ॥
सतिगुर नो मिले सु हरि मिले नाही किसै परतै ॥24॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे सृजनहार ! जो कुछ जीवों के मनों में बरतता है (भाव। जो विचार चलते हैं)। आप वह सब जानते हैं। सारा संसार ही इस गिनती (फायदे-नुकसान के विचार। चिंता व चिंतन) में है। हे सृजनहार ! एक आप इससे परे हैं। (क्योंकि) जो कुछ हो रहा है सब आपका ही किया हुआ हो रहा है। सारी (सृष्टि की) बनावट ही आपकी बनाई हुई है। हे हरी ! आप हरेक घट में व्यापक हैं। आपके करिश्में (आश्चर्यजनक) हैं। (सब जगह व्यापक होते हुए भी हरी को अपने आप कोई नहीं ढूँढ सका) जो मनुष्य सतिगुरू को मिला है। उस ने ही हरी को पाया है। (माया) के किसी (आडम्बर) ने उन्हें हरी से परताया नहीं। 24।

इहु मनूआ द्रिड़ु करि रखीऐ गुरमुखि लाईऐ चितु ॥

सलोकु मः 4 ॥
इहु मनूआ द्रिड़ु करि रखीऐ गुरमुखि लाईऐ चितु ॥
किउ सासि गिरासि विसारीऐ बहदिआ उठदिआ नित ॥
मरण जीवण की चिंता गई इहु जीअड़ा हरि प्रभ वसि ॥
जिउ भावै तिउ रखु तू जन नानक नामु बखसि ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 4॥ (अगर) सतिगुरू के सन्मुख हो के मन (प्रभू की याद में) जोड़ें (और) इस मन को पक्का कर के रखें (ताकि ये माया की तरफ ना दौड़े)। (और यदि) बैठते-उठते (काम-काज करते हुए) कभी एक दम के लिए भी (नाम) ना बिसारें। (तो) यह जीव हरी के वश में (आ जाता है। भाव अपना आप उसके हवाले कर देता है। और) इसकी सारी चिंता मिट जाती है। (हे हरी !) जैसे आपको ठीक लगे वैसे (मुझे) दास नानक को नाम की दाति बख्श (क्योंकि। नाम ही है जो मन की चिंता-फिक्र को मिटा सकता हैं)। 1।

मनमुखु अहंकारी महलु न जाणै खिनु आगै खिनु पीछै ॥

मः 3 ॥
मनमुखु अहंकारी महलु न जाणै खिनु आगै खिनु पीछै ॥
सदा बुलाईऐ महलि न आवै किउ करि दरगह सीझै ॥
सतिगुर का महलु विरला जाणै सदा रहै कर जोड़ि ॥
आपणी क्रिपा करे हरि मेरा नानक लए बहोड़ि ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 3 ॥ अहंकार में मतवाला हुआ मनमुख (सतिगुरू के) निवास स्थान (भाव। सत्संग) को नहीं पहिचानता हर वक्त अस्थिर अवस्था में रहता है (एक पल प्रसन्न तो अगले पल दुखी)। हमेशा बुलाते रहें तो भी वह सत्संग में नहीं आता (इस वास्ते) वह हरी की दरगाह में भी कैसे सुर्खरू हो? (सत्संग की) किसी उस विरले (दुर्लभ) को सार आती है जो सदा हाथ जोड़े रखे (भाव। मन विनम्रता में रह के याद में जुड़ा रहे)। हे नानक ! जिस पर प्यारा प्रभू खुद अपनी मेहर करे। उसे (मनमुखता की ओर से) मोड़ लेता है। 2।

सा सेवा कीती सफल है जितु सतिगुर का मनु मंने ॥

पउड़ी ॥
सा सेवा कीती सफल है जितु सतिगुर का मनु मंने ॥
जा सतिगुर का मनु मंनिआ ता पाप कसंमल भंने ॥
उपदेसु जि दिता सतिगुरू सो सुणिआ सिखी कंने ॥
जिन सतिगुर का भाणा मंनिआ तिन चड़ी चवगणि वंने ॥
इह चाल निराली गुरमुखी गुर दीखिआ सुणि मनु भिंने ॥25॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। जिस सेवा से सतिगुरू का मन (सिख पर) पतीज जाए। वही की हुई सेवा फायदेमंद है (क्योंकि जब) सतिगुरू का मन पतीजे, तब ही विकार व पाप दूर होते हैं। (पतीज के) सतिगुरू जो उपदेश सिखों को देता है वह ध्यान से उसे सुनते हैं। (फिर) जो सिख सतिगुरू की रजा और सिदक रहते हैं। उनको (पहले से) चौगुनी रंगत चढ़ जाती है। सतिगुरू की ही शिक्षा सुन के मन (हरी के प्यार में) भीगता है - सतिगुरू के सन्मुख रहने वाला ये रास्ता (संसार के अन्य मतों से) निराला है। 25।

जिनि गुरु गोपिआ आपणा तिसु ठउर न ठाउ ॥

सलोकु मः 3 ॥
जिनि गुरु गोपिआ आपणा तिसु ठउर न ठाउ ॥
हलतु पलतु दोवै गए दरगह नाही थाउ ॥
ओह वेला हथि न आवई फिरि सतिगुर लगहि पाइ ॥
सतिगुर की गणतै घुसीऐ दुखे दुखि विहाइ ॥
सतिगुरु पुरखु निरवैरु है आपे लए जिसु लाइ ॥
नानक दरसनु जिना वेखालिओनु तिना दरगह लए छडाइ ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ जिस मनुष्य ने अपने सतिगुरू की निंदा की है। उसे ना जगह ना ठिकाना। उसके ये लोक और परलोक दानों गवाए जाते हैं। हरी की दरगाह में (भी) जगह नहीं है मिलती। (ऐसे लोगों को) फिर वह मौका नहीं मिलता कि सतिगुरू के चरणों में लग सकें। (क्योंकि) सतिगुरू की निंदा करने में (एक बार जो) गलतान हो जाएं तो निरोल दुखों में ही उम्र बीतती है। (पर) मर्द (भाव। शूरवीर) सतिगुरू (ऐसा) निर्वैर है कि उस (निंदक) को भी खुद ही (भाव। अपने आप मेहर करके चरणों से) लगा लेता है। और हे नानक ! जिन्हें हरी। गुरू के दर्शन करवाता है। उन्हें दरगाह में छुड़ा लेता है। 1।

मनमुखु अगिआनु दुरमति अहंकारी ॥

मः 3 ॥
मनमुखु अगिआनु दुरमति अहंकारी ॥
अंतरि क्रोधु जूऐ मति हारी ॥
कूड़ु कुसतु ओहु पाप कमावै ॥
किआ ओहु सुणै किआ आखि सुणावै ॥
अंना बोला खुइ उझड़ि पाइ ॥
मनमुखु अंधा आवै जाइ ॥
बिनु सतिगुर भेटे थाइ न पाइ ॥
नानक पूरबि लिखिआ कमाइ ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ मनमुख विचार-हीन खोटी बुद्धि वाला और अहंकारी होता है। उसके मन में क्रोध है और वह (विषियों के) जूए में अक्ल गवा लेता हैं। वह (सदा) झूठ-फरेब और पाप के काम करता है (इस वास्ते) वह सुने क्या और (किसी को) कह के सुनाए क्या? (भाव। झूठ फरेब वाले काम करने से उसका मन तो पापी हुआ ही पड़ा है। ना वह प्रभू की बंदगी की बात सुनता है और ना ही किसी को सुनाता है)। (सतिगुरू के दर्शनों से) अंधा (और उपदेश सुनने से) बहरा हो के अंधा मनमुख गलत रास्ते पर पड़ा हुआ है और नित्य पैदा होता मरता है। सतिगुरू को मिले बिना (कोई दरगाह में) कबूल नहीं होता। (क्योंकि) हे नानक ! शुरू से (किए कर्मों के अनुसार जो संस्कार उसके मन में) लिखे गए हैं (उनके अनुसार अब भी बुरे काम ही) किए जाता है। 2।

जिन के चित कठोर हहि से बहहि न सतिगुर पासि ॥

पउड़ी ॥
जिन के चित कठोर हहि से बहहि न सतिगुर पासि ॥
ओथै सचु वरतदा कूड़िआरा चित उदासि ॥
ओइ वलु छलु करि झति कढदे फिरि जाइ बहहि कूड़िआरा पासि ॥
विचि सचे कूड़ु न गडई मनि वेखहु को निरजासि ॥
कूड़िआर कूड़िआरी जाइ रले सचिआर सिख बैठे सतिगुर पासि ॥26॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। जिन मनुष्यों के मन कठोर (भाव। निर्दयी) होते हैं। वे सतिगुरू के पास नहीं बैठ सकते। वहाँ (सतिगुरू की संगत में तो) सत्य की बातें होती हैं। झूठ के व्यापारी के मन को उदासी छाई रहती है। (सतिगुरू की संगति में) वे छल-फरेब करके समय गुजारते हैं। (वहाँ से उठ के) फिर झूठों के पास ही जा बैठते हैं। कोई पक्ष मन में निर्णय कर के देख लो। सच्चे (मनुष्य के हृदय में) झूठ नहीं मिल सकता (अर्थात अपना गहरा प्रभाव नहीं डाल सकता)। झूठे झूठों में ही जा मिलते हैं और सच्चे सिख सतिगुरू के पास ही जा बैठते हैं। 26।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ३: गुरु अमर दास जी; महला ४: गुरु राम दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ३१४ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

English