तू करता सभु किछु जाणदा जो जीआ अंदरि वरतै ॥
तू करता आपि अगणतु है सभु जगु विचि गणतै ॥
सभु कीता तेरा वरतदा सभ तेरी बणतै ॥
तू घटि घटि इकु वरतदा सचु साहिब चलतै ॥
सतिगुर नो मिले सु हरि मिले नाही किसै परतै ॥24॥
इहु मनूआ द्रिड़ु करि रखीऐ गुरमुखि लाईऐ चितु ॥
किउ सासि गिरासि विसारीऐ बहदिआ उठदिआ नित ॥
मरण जीवण की चिंता गई इहु जीअड़ा हरि प्रभ वसि ॥
जिउ भावै तिउ रखु तू जन नानक नामु बखसि ॥1॥
मनमुखु अहंकारी महलु न जाणै खिनु आगै खिनु पीछै ॥
सदा बुलाईऐ महलि न आवै किउ करि दरगह सीझै ॥
सतिगुर का महलु विरला जाणै सदा रहै कर जोड़ि ॥
आपणी क्रिपा करे हरि मेरा नानक लए बहोड़ि ॥2॥
सा सेवा कीती सफल है जितु सतिगुर का मनु मंने ॥
जा सतिगुर का मनु मंनिआ ता पाप कसंमल भंने ॥
उपदेसु जि दिता सतिगुरू सो सुणिआ सिखी कंने ॥
जिन सतिगुर का भाणा मंनिआ तिन चड़ी चवगणि वंने ॥
इह चाल निराली गुरमुखी गुर दीखिआ सुणि मनु भिंने ॥25॥
जिनि गुरु गोपिआ आपणा तिसु ठउर न ठाउ ॥
हलतु पलतु दोवै गए दरगह नाही थाउ ॥
ओह वेला हथि न आवई फिरि सतिगुर लगहि पाइ ॥
सतिगुर की गणतै घुसीऐ दुखे दुखि विहाइ ॥
सतिगुरु पुरखु निरवैरु है आपे लए जिसु लाइ ॥
नानक दरसनु जिना वेखालिओनु तिना दरगह लए छडाइ ॥1॥
मनमुखु अगिआनु दुरमति अहंकारी ॥
अंतरि क्रोधु जूऐ मति हारी ॥
कूड़ु कुसतु ओहु पाप कमावै ॥
किआ ओहु सुणै किआ आखि सुणावै ॥
अंना बोला खुइ उझड़ि पाइ ॥
मनमुखु अंधा आवै जाइ ॥
बिनु सतिगुर भेटे थाइ न पाइ ॥
नानक पूरबि लिखिआ कमाइ ॥2॥
जिन के चित कठोर हहि से बहहि न सतिगुर पासि ॥
ओथै सचु वरतदा कूड़िआरा चित उदासि ॥
ओइ वलु छलु करि झति कढदे फिरि जाइ बहहि कूड़िआरा पासि ॥
विचि सचे कूड़ु न गडई मनि वेखहु को निरजासि ॥
कूड़िआर कूड़िआरी जाइ रले सचिआर सिख बैठे सतिगुर पासि ॥26॥
गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।
इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “पउड़ी॥ हे सृजनहार ! जो कुछ जीवों के मनों में बरतता है (भाव।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।