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अंग 314

अंग
314
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
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पउड़ी ॥
तू करता सभु किछु जाणदा जो जीआ अंदरि वरतै ॥
तू करता आपि अगणतु है सभु जगु विचि गणतै ॥
सभु कीता तेरा वरतदा सभ तेरी बणतै ॥
तू घटि घटि इकु वरतदा सचु साहिब चलतै ॥
सतिगुर नो मिले सु हरि मिले नाही किसै परतै ॥24॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे सृजनहार ! जो कुछ जीवों के मनों में बरतता है (भाव। जो विचार चलते हैं)। आप वह सब जानता है। सारा संसार ही इस गिनती (फायदे-नुकसान के विचार। चिंता व चिंतन) में है। हे सृजनहार ! एक आप इससे परे है। (क्योंकि) जो कुछ हैं रहा है सब आपका ही किया हुआ हैं रहा है। सारी (सृष्टि की) बनावट ही आपकी बनाई हुई है। हे हरी ! आप हरेक घट में व्यापक है। आपके करिश्में (आश्चर्यजनक) हैं। (सब जगह व्यापक होते हुए भी हरी को अपने आप कोई नहीं ढूँढ सका) जो मनुष्य सतिगुरू को मिला है। उस ने ही हरी को पाया है। (माया) के किसी (आडम्बर) ने उन्हें हरी से परताया नहीं। 24।
सलोकु मः 4 ॥
इहु मनूआ द्रिड़ु करि रखीऐ गुरमुखि लाईऐ चितु ॥
किउ सासि गिरासि विसारीऐ बहदिआ उठदिआ नित ॥
मरण जीवण की चिंता गई इहु जीअड़ा हरि प्रभ वसि ॥
जिउ भावै तिउ रखु तू जन नानक नामु बखसि ॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 4॥ (अगर) सतिगुरू के सन्मुख हो के मन (प्रभू की याद में) जोड़ें (और) इस मन को पक्का कर के रखें (ताकि ये माया की तरफ ना दौड़े)। (और यदि) बैठते-उठते (काम-काज करते हुए) कभी एक दम के लिए भी (नाम) ना बिसारें। (तो) यह जीव हरी के वश में (आ जाता है। भाव अपना आप उसके हवाले कर देता है। और) इसकी सारी चिंता मिट जाती है। (हे हरी !) जैसे आपको ठीक लगे वैसे (मुझे) दास नानक को नाम की दाति बख्श (क्योंकि। नाम ही है जो मन की चिंता-फिक्र को मिटा सकता हैं)। 1।
मः 3 ॥
मनमुखु अहंकारी महलु न जाणै खिनु आगै खिनु पीछै ॥
सदा बुलाईऐ महलि न आवै किउ करि दरगह सीझै ॥
सतिगुर का महलु विरला जाणै सदा रहै कर जोड़ि ॥
आपणी क्रिपा करे हरि मेरा नानक लए बहोड़ि ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: महला 3 ॥ अहंकार में मतवाला हुआ मनमुख (सतिगुरू के) निवास स्थान (भाव। सत्संग) को नहीं पहिचानता हर वक्त अस्थिर अवस्था में रहता है (एक पल प्रसन्न तो अगले पल दुखी)। हमेशा बुलाते रहें तो भी वह सत्संग में नहीं आता (इस वास्ते) वह हरी की दरगाह में भी कैसे सुर्खरू हो? (सत्संग की) किसी उस विरले (दुर्लभ) को सार आती है जो सदा हाथ जोड़े रखे (भाव। मन विनम्रता में रह के याद में जुड़ा रहे)। हे नानक ! जिस पर प्यारा प्रभू खुद अपनी मेहर करे। उसे (मनमुखता की ओर से) मोड़ लेता है। 2।
पउड़ी ॥
सा सेवा कीती सफल है जितु सतिगुर का मनु मंने ॥
जा सतिगुर का मनु मंनिआ ता पाप कसंमल भंने ॥
उपदेसु जि दिता सतिगुरू सो सुणिआ सिखी कंने ॥
जिन सतिगुर का भाणा मंनिआ तिन चड़ी चवगणि वंने ॥
इह चाल निराली गुरमुखी गुर दीखिआ सुणि मनु भिंने ॥25॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। जिस सेवा से सतिगुरू का मन (सिख पर) पतीज जाए। वही की हुई सेवा फायदेमंद है (क्योंकि जब) सतिगुरू का मन पतीजे, तब ही विकार व पाप दूर होते हैं। (पतीज के) सतिगुरू जो उपदेश सिखों को देता है वह ध्यान से उसे सुनते हैं। (फिर) जो सिख सतिगुरू की रजा और सिदक रहते हैं। उनको (पहले से) चौगुनी रंगत चढ़ जाती है। सतिगुरू की ही शिक्षा सुन के मन (हरी के प्यार में) भीगता है – सतिगुरू के सन्मुख रहने वाला ये रास्ता (संसार के अन्य मतों से) निराला है। 25।
सलोकु मः 3 ॥
जिनि गुरु गोपिआ आपणा तिसु ठउर न ठाउ ॥
हलतु पलतु दोवै गए दरगह नाही थाउ ॥
ओह वेला हथि न आवई फिरि सतिगुर लगहि पाइ ॥
सतिगुर की गणतै घुसीऐ दुखे दुखि विहाइ ॥
सतिगुरु पुरखु निरवैरु है आपे लए जिसु लाइ ॥
नानक दरसनु जिना वेखालिओनु तिना दरगह लए छडाइ ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ जिस मनुष्य ने अपने सतिगुरू की निंदा की है। उसे ना जगह ना ठिकाना। उसके ये लोक और परलोक दानों गवाए जाते हैं। हरी की दरगाह में (भी) जगह नहीं है मिलती। (ऐसे लोगों को) फिर वह मौका नहीं मिलता कि सतिगुरू के चरणों में लग सकें। (क्योंकि) सतिगुरू की निंदा करने में (एक बार जो) गलतान हो जाएं तो निरोल दुखों में ही उम्र बीतती है। (पर) मर्द (भाव। शूरवीर) सतिगुरू (ऐसा) निर्वैर है कि उस (निंदक) को भी खुद ही (भाव। अपने आप मेहर करके चरणों से) लगा लेता है। और हे नानक ! जिन्हें हरी। गुरू के दर्शन करवाता है। उन्हें दरगाह में छुड़ा लेता है। 1।
मः 3 ॥
मनमुखु अगिआनु दुरमति अहंकारी ॥
अंतरि क्रोधु जूऐ मति हारी ॥
कूड़ु कुसतु ओहु पाप कमावै ॥
किआ ओहु सुणै किआ आखि सुणावै ॥
अंना बोला खुइ उझड़ि पाइ ॥
मनमुखु अंधा आवै जाइ ॥
बिनु सतिगुर भेटे थाइ न पाइ ॥
नानक पूरबि लिखिआ कमाइ ॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ मनमुख विचार-हीन खोटी बुद्धि वाला और अहंकारी होता है। उसके मन में क्रोध है और वह (विषियों के) जूए में अक्ल गवा लेता हैं। वह (सदा) झूठ-फरेब और पाप के काम करता है (इस वास्ते) वह सुने क्या और (किसी को) कह के सुनाए क्या? (भाव। झूठ फरेब वाले काम करने से उसका मन तो पापी हुआ ही पड़ा है। ना वह प्रभू की बंदगी की बात सुनता है और ना ही किसी को सुनाता है)। (सतिगुरू के दर्शनों से) अंधा (और उपदेश सुनने से) बहरा हो के अंधा मनमुख गलत रास्ते पर पड़ा हुआ है और नित्य पैदा होता मरता है। सतिगुरू को मिले बिना (कोई दरगाह में) कबूल नहीं होता। (क्योंकि) हे नानक ! शुरू से (किए कर्मों के अनुसार जो संस्कार उसके मन में) लिखे गए हैं (उनके अनुसार अब भी बुरे काम ही) किए जाता है। 2।
पउड़ी ॥
जिन के चित कठोर हहि से बहहि न सतिगुर पासि ॥
ओथै सचु वरतदा कूड़िआरा चित उदासि ॥
ओइ वलु छलु करि झति कढदे फिरि जाइ बहहि कूड़िआरा पासि ॥
विचि सचे कूड़ु न गडई मनि वेखहु को निरजासि ॥
कूड़िआर कूड़िआरी जाइ रले सचिआर सिख बैठे सतिगुर पासि ॥26॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। जिन मनुष्यों के मन कठोर (भाव। निर्दयी) होते हैं। वे सतिगुरू के पास नहीं बैठ सकते। वहाँ (सतिगुरू की संगत में तो) सत्य की बातें होती हैं। झूठ के व्यापारी के मन को उदासी छाई रहती है। (सतिगुरू की संगति में) वे छल-फरेब करके समय गुजारते हैं। (वहाँ से उठ के) फिर झूठों के पास ही जा बैठते हैं। कोई पक्ष मन में निर्णय कर के देख लो। सच्चे (मनुष्य के हृदय में) झूठ नहीं मिल सकता (अर्थात अपना गहरा प्रभाव नहीं डाल सकता)। झूठे झूठों में ही जा मिलते हैं और सच्चे सिख सतिगुरू के पास ही जा बैठते हैं। 26।

गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।

इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “पउड़ी॥ हे सृजनहार ! जो कुछ जीवों के मनों में बरतता है (भाव।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।