लुल्ला परिवारLULLA FAMILY, शुरुआतEnglish
सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 315 · गउड़ी

इस पृष्ठ पर
अंग
315
गउड़ी
अंग बदलें या अंश चुनें · 10 अंश

1 से 1430 तक कोई अंक लिखिए।

  1. रहदे खुहदे निंदक मारिअनु करि आपे आहरु ॥
  2. मुंढहु भुले मुंढ ते किथै पाइनि हथु ॥
  3. लै फाहे राती तुरहि प्रभु जाणै प्राणी ॥
  4. सेवक सचे साह के सेई परवाणु ॥
  5. जो धुरि लिखिआ लेखु प्रभ मेटणा न जाइ ॥
  6. नाराइणि लइआ नाठूंगड़ा पैर किथै रखै ॥
  7. नरक घोर बहु दुख घणे अकिरतघणा का थानु ॥
  8. अवखध सभे कीतिअनु निंदक का दारू नाहि ॥
  9. तुसि दिता पूरै सतिगुरू हरि धनु सचु अखुटु ॥
  10. तपा न होवै अंद्रहु लोभी नित माइआ नो फिरै जजमालिआ ॥

गुरु अर्जन देव जी · गउड़ी की वार, सलोक · राग गउड़ी

रहदे खुहदे निंदक मारिअनु करि आपे आहरु ॥

सलोक मः 5 ॥
रहदे खुहदे निंदक मारिअनु करि आपे आहरु ॥
संत सहाई नानका वरतै सभ जाहरु ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ (जन्म जन्मांतरों से पाप करके निंदक मनुष्य बहुत कुछ तो आगे ही नाम की ओर से मर चुके होते हैं) बाकी थोड़े बहुत (जो भले संस्कार रह जाते हैं) उनको प्रभू खुद उद्यम करके (भाव, निंदकों को निंदा में लगा के खत्म करा देता है) और, हे नानक! संत जनों का राखा हरी सब जगह प्रगट खेल कर रहा है। 1।

गुरु अर्जन देव जी · गउड़ी की वार, सलोक · राग गउड़ी

मुंढहु भुले मुंढ ते किथै पाइनि हथु ॥

मः 5 ॥
मुंढहु भुले मुंढ ते किथै पाइनि हथु ॥
तिंनै मारे नानका जि करण कारण समरथु ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ जो मनुष्य पहले से ही प्रभू से टूटे हुए हैं। वे और कौन सा आसरा लें? (क्योंकि) हे नानक! ये उस प्रभू ने खुद मारे हुए हैं। जो सारी सृष्टि को रचने में स्मर्थ है। 2।

गुरु अर्जन देव जी · गउड़ी की वार, पउड़ी · राग गउड़ी

लै फाहे राती तुरहि प्रभु जाणै प्राणी ॥

पउड़ी 5 ॥
लै फाहे राती तुरहि प्रभु जाणै प्राणी ॥
तकहि नारि पराईआ लुकि अंदरि ठाणी ॥
संन॑ी देनि॑ विखंम थाइ मिठा मदु माणी ॥
करमी आपो आपणी आपे पछुताणी ॥
अजराईलु फरेसता तिल पीड़े घाणी ॥27॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी 5 ॥ मनुष्य रात के रस्से ले के (पराए घरों को लूटने के लिए) चलते हैं (पर) प्रभू उनको जानता है। अंदर छुप के पराई सि्त्रयों को ताकते हैं। मुश्किल जगह पर सेंध लगाते हैं और शराब को मीठा समझ के पीते हैं। (आखिर में) अपने अपने किए कर्मों के अनुसार खुद ही पछताते हैं। (क्योंकि) मौत का फरिश्ता बुरे काम करने वालों को ऐसे पीढ़ता है जैसे घाणी में तिल। 27।

गुरु अर्जन देव जी · गउड़ी की वार, सलोक · राग गउड़ी

सेवक सचे साह के सेई परवाणु ॥

सलोक मः 5 ॥
सेवक सचे साह के सेई परवाणु ॥
दूजा सेवनि नानका से पचि पचि मुए अजाण ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5 ॥ जो मनुष्य सच्चे शाह (प्रभू) के सेवक हैं वही (प्रभू की हजूरी में) कबूल होते हैं। हे नानक! जो (उस सच्चे शाह को छोड़ के) दूसरे की सेवा करते हैं। वे मूर्ख खप-खप के मरते हैं। 1।

गुरु अर्जन देव जी · गउड़ी की वार, सलोक · राग गउड़ी

जो धुरि लिखिआ लेखु प्रभ मेटणा न जाइ ॥

मः 5 ॥
जो धुरि लिखिआ लेखु प्रभ मेटणा न जाइ ॥
राम नामु धनु वखरो नानक सदा धिआइ ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 5 ॥ हे प्रभू! आरम्भ से (किए कर्मों के मुताबिक) जो (संस्कार-रूपी) लेख (हृदय में) उकरा गया है। वह मिटाया नहीं जा सकता। (पर हाँ) हे नानक! प्रभू का नाम-धन और सौदा (एकत्र करें)। नाम सदा सिमरें (इस तरह पिछला लेख मिट सकता है)। 2।

गुरु अर्जन देव जी · गउड़ी की वार, पउड़ी · राग गउड़ी

नाराइणि लइआ नाठूंगड़ा पैर किथै रखै ॥

पउड़ी 5 ॥
नाराइणि लइआ नाठूंगड़ा पैर किथै रखै ॥
करदा पाप अमितिआ नित विसो चखै ॥
निंदा करदा पचि मुआ विचि देही भखै ॥
सचै साहिब मारिआ कउणु तिस नो रखै ॥
नानक तिसु सरणागती जो पुरखु अलखै ॥28॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी 5 ॥ जिस मनुष्य को ईश्वर से ही ठेडा बजे। वह (जिंदगी की सही राह पर) टिक नहीं सकता। वह बेअंत पाप करता रहता है। सदा (विकारों का) विष ही चखता रहता है (भाव, उसे विकारों का चस्का पड़ा रहता है)। दूसरों के ऐब ढूँढ-ढूँढ के ख्वार होता है और अपने आप में जलता है। वह (समझें) सच्चे परमात्मा द्वारा मारा हुआ है। कोई उसकी सहायता नहीं कर सकता। हे नानक! (इस विष से बचने के लिए) उस अकाल पुरख की शरण पड़ें जो अलख। (अदृश्य) है। 28।

गुरु अर्जन देव जी · गउड़ी की वार, सलोक · राग गउड़ी

नरक घोर बहु दुख घणे अकिरतघणा का थानु ॥

सलोक मः 5 ॥
नरक घोर बहु दुख घणे अकिरतघणा का थानु ॥
तिनि प्रभि मारे नानका होइ होइ मुए हरामु ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ बहुत भारे दुख-रूप घोर नर्क अकृतज्ञ मनुष्य का ठिकाना है। हे नानक! अकृतज्ञ मनुष्य उस प्रभू द्वारा मारे हुए होते हैं। (इन दुखों में) वे ख्वार हो हो के मरते हैं। 1।

गुरु अर्जन देव जी · गउड़ी की वार, सलोक · राग गउड़ी

अवखध सभे कीतिअनु निंदक का दारू नाहि ॥

मः 5 ॥
अवखध सभे कीतिअनु निंदक का दारू नाहि ॥
आपि भुलाए नानका पचि पचि जोनी पाहि ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ सारे रोगों की दवा उस प्रभू ने बनाई है (भाव, हो सकती हैं)। पर निंदकों (के निंदा-रोग का) कोई इलाज नहीं। हे नानक! प्रभू ने खुद वह भुलेखे डाले हुए हैं (इस अपने किए के अनुसार) निंदक खप-खप के जूनियों में पड़ते हैं। 2।

गुरु अर्जन देव जी · गउड़ी की वार, पउड़ी · राग गउड़ी

तुसि दिता पूरै सतिगुरू हरि धनु सचु अखुटु ॥

पउड़ी 5 ॥
तुसि दिता पूरै सतिगुरू हरि धनु सचु अखुटु ॥
सभि अंदेसे मिटि गए जम का भउ छुटु ॥
काम क्रोध बुरिआईआं संगि साधू तुटु ॥
विणु सचे दूजा सेवदे हुइ मरसनि बुटु ॥
नानक कउ गुरि बखसिआ नामै संगि जुटु ॥29॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी 5॥ (जिन मनुष्यों को) पूरे सतिगुरू ने प्रभू का सच्चा और ना-खत्म होने वाला धन प्रसन्न हो के दिया है। उनके सारे फिक्र मिट जाते हैं और मौत का डर दूर हो जाता है (और उनके) काम-क्रोध आदि पाप संतों की संगति में समाप्त हो जाते हैं; काम, क्रोध एवं बुराइयां संतों की संगति करने से मिट जाते हैं। पर जो मनुष्य सच्चे हरी के अलावा किसी और की सेवा करते हैं। वह बोट हो के (भाव, निआसरे हो के) मरते हैं। हे नानक! जिस मनुष्य पर सतिगुरू के द्वारा प्रभू ने बख्शिश की है वह निरोल नाम में जुटा हुआ है। 29।

गुरु राम दास जी · गउड़ी की वार, सलोक · राग गउड़ी

तपा न होवै अंद्रहु लोभी नित माइआ नो फिरै जजमालिआ ॥

अगले अंग पर आगे पढ़िए →

सलोक मः 4 ॥
तपा न होवै अंद्रहु लोभी नित माइआ नो फिरै जजमालिआ ॥
अगो दे सदिआ सतै दी भिखिआ लए नाही पिछो दे पछुताइ कै आणि तपै पुतु विचि बहालिआ ॥
पंच लोग सभि हसण लगे तपा लोभि लहरि है गालिआ ॥
जिथै थोड़ा धनु वेखै तिथै तपा भिटै नाही धनि बहुतै डिठै तपै धरमु हारिआ ॥
भाई एहु तपा न होवी बगुला है बहि साध जना वीचारिआ ॥
सत पुरख की तपा निंदा करै संसारै की उसतती विचि होवै एतु दोखै तपा दयि मारिआ ॥
महा पुरखां की निंदा का वेखु जि तपे नो फलु लगा सभु गइआ तपे का घालिआ ॥
बाहरि बहै पंचा विचि तपा सदाए ॥
अंदरि बहै तपा पाप कमाए ॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 4॥ जो मनुष्य अंदर से लोभी हो और जो कोढ़ी सदा माया के लिए भटकता फिरे। वह (सच्चा) तपस्वी नहीं हो सकता। ये तपस्वी पहले (अपने आप) बुलाने पर आदर की भिक्षा नहीं लेता था। और बाद में पछता कर इसने पुत्र को ला के (पंगति) में बैठा दिया। (नगर के) मुखी लोग सारे हसने लग पड़े (और कहने लगे कि) ये तपस्वी लोभ की लहर में गला पड़ा है। जहाँ थोड़ा धन देखता है। वहाँ नजदीक छूता भी नहीं। और ज्यादा धन देख के तपस्वी ने अपना धर्म हार दिया है। भले मनुष्यों ने इकट्ठे हो के विचार की है (और फैसला किया है) कि हे भाई! यह (सच्चा) तपस्वी नहीं है बगुला है (भाव, पाखण्डी है)। भले मनुष्यों की यह तपा निंदा करता है और संसार की उस्तति में है (भाव, संसारी जीवों की उस्तति से खुश होता है) इस दूषण के कारण इस तपे को पति प्रभू ने (आत्मिक जीवन की तरफ से) मुर्दा कर दिया है। देखें! महापुरुषों की निंदा करने का इस तपे को ये फल मिला है कि इस की (अब तक की की हुई) सारी मेहनत निश्फल गई है। बाहर नगर के मुखी लोगों में बैठ के अपने आप को तपस्वी कहलवाता है। और अंदर बैठ के तपस्वी बुरे कर्म करता है।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 4: गुरु राम दास जी; महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 315 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।