Lulla Family

अंग 315

अंग
315
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सलोक मः 5 ॥
रहदे खुहदे निंदक मारिअनु करि आपे आहरु ॥
संत सहाई नानका वरतै सभ जाहरु ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ (जन्म जन्मांतरों से पाप करके निंदक मनुष्य बहुत कुछ तो आगे ही नाम की ओर से मर चुके होते हैं) बाकी थोड़े बहुत (जो भले संस्कार रह जाते हैं) उनको प्रभू खुद उद्यम करके (भाव। निंदकों को निंदा में लगा के खत्म करा देता है) और। हे नानक ! संत जनों का राखा हरी सब जगह प्रगट खेल कर रहा है। 1।
मः 5 ॥
मुंढहु भुले मुंढ ते किथै पाइनि हथु ॥
तिंनै मारे नानका जि करण कारण समरथु ॥2॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ जो मनुष्य पहले से ही प्रभू से टूटे हुए हैं। वे और कौन सा आसरा लें? (क्योंकि) हे नानक ! ये उस प्रभू ने खुद मारे हुए हैं। जो सारी सृष्टि को रचने में स्मर्थ है। 2।
पउड़ी 5 ॥
लै फाहे राती तुरहि प्रभु जाणै प्राणी ॥
तकहि नारि पराईआ लुकि अंदरि ठाणी ॥
संन॑ी देनि॑ विखंम थाइ मिठा मदु माणी ॥
करमी आपो आपणी आपे पछुताणी ॥
अजराईलु फरेसता तिल पीड़े घाणी ॥27॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी 5 ॥ मनुष्य रात के रस्से ले के (पराए घरों को लूटने के लिए) चलते हैं (पर) प्रभू उनको जानता है। अंदर छुप के पराई सि्त्रयों को ताकते हैं। मुश्किल जगह पर सेंध लगाते हैं और शराब को मीठा समझ के पीते हैं। (आखिर में) अपने अपने किए कर्मों के अनुसार खुद ही पछताते हैं। (क्योंकि) मौत का फरिश्ता बुरे काम करने वालों को ऐसे पीढ़ता है जैसे घाणी में तिल। 27।
सलोक मः 5 ॥
सेवक सचे साह के सेई परवाणु ॥
दूजा सेवनि नानका से पचि पचि मुए अजाण ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5 ॥ जो मनुष्य सच्चे शाह (प्रभू) के सेवक हैं वही (प्रभू की हजूरी में) कबूल होते हैं। हे नानक ! जो (उस सच्चे शाह को छोड़ के) दूसरे की सेवा करते हैं। वे मूर्ख खप-खप के मरते हैं। 1।
मः 5 ॥
जो धुरि लिखिआ लेखु प्रभ मेटणा न जाइ ॥
राम नामु धनु वखरो नानक सदा धिआइ ॥2॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: महला 5 ॥ हे प्रभू ! आरम्भ से (किए कर्मों के मुताबिक) जो (संस्कार-रूपी) लेख (हृदय में) उकरा गया है। वह मिटाया नहीं जा सकता। (पर हाँ) हे नानक ! प्रभू का नाम-धन और सौदा (एकत्र करो)। नाम सदा सिमरो (इस तरह पिछला लेख मिट सकता है)। 2।
पउड़ी 5 ॥
नाराइणि लइआ नाठूंगड़ा पैर किथै रखै ॥
करदा पाप अमितिआ नित विसो चखै ॥
निंदा करदा पचि मुआ विचि देही भखै ॥
सचै साहिब मारिआ कउणु तिस नो रखै ॥
नानक तिसु सरणागती जो पुरखु अलखै ॥28॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी 5 ॥ जिस मनुष्य को ईश्वर से ही ठेडा बजे। वह (जिंदगी की सही राह पर) टिक नहीं सकता। वह बेअंत पाप करता रहता है। सदा (विकारों का) विष ही चखता रहता है (भाव। उसे विकारों का चस्का पड़ा रहता है)। दूसरों के ऐब ढूँढ-ढूँढ के ख्वार होता है और अपने आप में जलता है। वह (समझो) सच्चे परमात्मा द्वारा मारा हुआ है। कोई उसकी सहायता नहीं कर सकता। हे नानक ! (इस विष से बचने के लिए) उस अकाल पुरख की शरण पड़ो जो अलख। (अदृश्य) है। 28।
सलोक मः 5 ॥
नरक घोर बहु दुख घणे अकिरतघणा का थानु ॥
तिनि प्रभि मारे नानका होइ होइ मुए हरामु ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ बहुत भारे दुख-रूप घोर नर्क अकृतज्ञ मनुष्य का ठिकाना है। हे नानक ! अकृतज्ञ मनुष्य उस प्रभू द्वारा मारे हुए होते हैं। (इन दुखों में) वे ख्वार हो हो के मरते हैं। 1।
मः 5 ॥
अवखध सभे कीतिअनु निंदक का दारू नाहि ॥
आपि भुलाए नानका पचि पचि जोनी पाहि ॥2॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ सारे रोगों की दवा उस प्रभू ने बनाई है (भाव। हो सकती हैं)। पर निंदकों (के निंदा-रोग का) कोई इलाज नहीं। हे नानक ! प्रभू ने खुद वह भुलेखे डाले हुए हैं (इस अपने किए के अनुसार) निंदक खप-खप के जूनियों में पड़ते हैं। 2।
पउड़ी 5 ॥
तुसि दिता पूरै सतिगुरू हरि धनु सचु अखुटु ॥
सभि अंदेसे मिटि गए जम का भउ छुटु ॥
काम क्रोध बुरिआईआं संगि साधू तुटु ॥
विणु सचे दूजा सेवदे हुइ मरसनि बुटु ॥
नानक कउ गुरि बखसिआ नामै संगि जुटु ॥29॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी 5॥ (जिन मनुष्यों को) पूरे सतिगुरू ने प्रभू का सच्चा और ना-खत्म होने वाला धन प्रसन्न हो के दिया है। उनके सारे फिक्र मिट जाते हैं और मौत का डर दूर हो जाता है (और उनके) काम-क्रोध आदि पाप संतों की संगति में समाप्त हो जाते हैं; काम, क्रोध एवं बुराइयां संतों की संगति करने से मिट जाते हैं। पर जो मनुष्य सच्चे हरी के अलावा किसी और की सेवा करते हैं। वह बोट हो के (भाव। निआसरे हो के) मरते हैं। हे नानक ! जिस मनुष्य पर सतिगुरू के द्वारा प्रभू ने बख्शिश की है वह निरोल नाम में जुटा हुआ है। 29।
सलोक मः 4 ॥
तपा न होवै अंद्रहु लोभी नित माइआ नो फिरै जजमालिआ ॥
अगो दे सदिआ सतै दी भिखिआ लए नाही पिछो दे पछुताइ कै आणि तपै पुतु विचि बहालिआ ॥
पंच लोग सभि हसण लगे तपा लोभि लहरि है गालिआ ॥
जिथै थोड़ा धनु वेखै तिथै तपा भिटै नाही धनि बहुतै डिठै तपै धरमु हारिआ ॥
भाई एहु तपा न होवी बगुला है बहि साध जना वीचारिआ ॥
सत पुरख की तपा निंदा करै संसारै की उसतती विचि होवै एतु दोखै तपा दयि मारिआ ॥
महा पुरखां की निंदा का वेखु जि तपे नो फलु लगा सभु गइआ तपे का घालिआ ॥
बाहरि बहै पंचा विचि तपा सदाए ॥
अंदरि बहै तपा पाप कमाए ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 4॥ जो मनुष्य अंदर से लोभी हो और जो कोढ़ी सदा माया के लिए भटकता फिरे। वह (सच्चा) तपस्वी नहीं हो सकता। ये तपस्वी पहले (अपने आप) बुलाने पर आदर की भिक्षा नहीं लेता था। और बाद में पछता कर इसने पुत्र को ला के (पंगति) में बैठा दिया। (नगर के) मुखी लोग सारे हसने लग पड़े (और कहने लगे कि) ये तपस्वी लोभ की लहर में गला पड़ा है। जहाँ थोड़ा धन देखता है। वहाँ नजदीक छूता भी नहीं। और ज्यादा धन देख के तपस्वी ने अपना धर्म हार दिया है। भले मनुष्यों ने इकट्ठे हो के विचार की है (और फैसला किया है) कि हे भाई ! यह (सच्चा) तपस्वी नहीं है बगुला है (भाव। पाखण्डी है)। भले मनुष्यों की यह तपा निंदा करता है और संसार की उस्तति में है (भाव। संसारी जीवों की उस्तति से खुश होता है) इस दूषण के कारण इस तपे को पति प्रभू ने (आत्मिक जीवन की तरफ से) मुर्दा कर दिया है। देखो ! महापुरुषों की निंदा करने का इस तपे को ये फल मिला है कि इस की (अब तक की की हुई) सारी मेहनत निश्फल गई है। बाहर नगर के मुखी लोगों में बैठ के अपने आप को तपस्वी कहलवाता है। और अंदर बैठ के तपस्वी बुरे कर्म करता है।

गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 10 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “श्लोक महला 5॥ (जन्म जन्मांतरों से पाप करके निंदक मनुष्य बहुत कुछ तो आगे ही नाम की ओर से मर चुके होते हैं) बाकी थोड़े बहुत (जो भले संस्कार रह जाते हैं) उनको प्रभू खुद उद्यम करके (भा।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।