जिना सासि गिरासि न विसरै से पूरे पुरख परधान ॥ करमी सतिगुरु पाईऐ अनदिनु लगै धिआनु ॥ तिन की संगति मिलि रहा दरगह पाई मानु ॥ सउदे वाहु वाहु उचरहि उठदे भी वाहु करेनि ॥ नानक ते मुख उजले जि नित उठि संमालेनि ॥1॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।
हिन्दी अर्थ: उन्हें प्रभू एक दम के लिए भी नहीं बिसरता और वह मनुष्य (सर्व-गुण) संपूर्ण व उक्तम होते हैं (भाव। सोए हुए भी नाम में जुड़े रहते हैं और जागते हुए भी। लोगों को वे सोए हुए या जागते दिखते हैं। वे सदा नाम में लीन रहते हैं)। (प्रभू की) मेहर से सतिगुरू मिलता है और हर वक्त (सोये हुए अथवा जागते हुए मेहर से ही) जीव का ध्यान (नाम में जुड़ा रहता है)। (चित्त चाहता है कि) मैं भी उनकी संगति करूँ और प्रभू की हजूरी में आदर पाऊँ। (सतिगुरू के सन्मुख होए हुए वे भाग्यशाली जीव) सोने के समय भी सिफतसालाह करते हैं और उठने के वक्त भी। हे नानक ! वह मुख उज्जवल होते हैं। जो सदा सुचेत रहके नाम चेते रखते हैं। 1।
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
हिन्दी अर्थ: महला 4॥ अपने सतिगुरू की बताई हुई कार करें। तो ना खत्म होने वाला नाम (भाव नाम का खजाना) मिल जाता है। दातें देने वाला हरी (नाम की यह) दात बख्शता है और (नाम) संसार सागर में डूबते को निकाल लेता है। जो शाह नाम (की राशि) से व्यापार करते हैं वह भाग्यशाली हैं। (क्योंकि इस प्रकार का) व्यापार करने वाले जो सिख (सतिगुरू के पास) आते हैं। (सतिगुरू उनको अपने) शबद द्वारा (भवजल से) पार उतार देता है। (पर) हे दास नानक ! सृजनहार प्रभू की बंदगी वही मनुष्य करते हैं। जिन पर प्रभू स्वयं मेहर करता है। 2।
पउड़ी ॥ सचु सचे के जन भगत हहि सचु सचा जिनी अराधिआ ॥ जिन गुरमुखि खोजि ढंढोलिआ तिन अंदरहु ही सचु लाधिआ ॥ सचु साहिबु सचु जिनी सेविआ कालु कंटकु मारि तिनी साधिआ ॥ सचु सचा सभ दू वडा है सचु सेवनि से सचि रलाधिआ ॥ सचु सचे नो साबासि है सचु सचा सेवि फलाधिआ ॥22॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी। जो मनुष्य सच्चे हरी का सचमुच भजन करते हैं। वह ही सच्चे भक्त (कहलाते) हैं। जो मनुष्य गुरू के सन्मुख हो कर खोज के ढूँढते हैं (भाव। यत्न से तलाशते हैं) वे अपने हृदय में ही प्रभू को पा लेते हैं। जिन मनुष्यों ने सच्चा सांई सचमुच सिमरा है उन्होंने दुखदाई काल को मार के काबू कर लिया है। (भाव। उन्हे काल काँटे के समान दुखद प्रतीत नहीं होता)। जो सच्चा हरी सबसे बड़ा है। उसकी बंदगी जो मनुष्य करते हैं। वह उस में लीन हो जाते हैं। धन्य है सच्चा प्रभू। धन्य है सच्चा प्रभू (इस तरह) जो मनुष्य सचमुच सच्चे की आराधना करते हैं। उन्हें उक्तम फल प्राप्त होता है (भाव। वे मानस जनम को सफल कर लेते हैं)। 22।
सलोक मः 4 ॥ मनमुखु प्राणी मुगधु है नामहीण भरमाइ ॥ बिनु गुर मनूआ ना टिकै फिरि फिरि जूनी पाइ ॥ हरि प्रभु आपि दइआल होहि तां सतिगुरु मिलिआ आइ ॥ जन नानक नामु सलाहि तू जनम मरण दुखु जाइ ॥1॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 4॥ मनमुख मनुष्य मूर्ख है। नाम से टूटा हुआ भटकता फिरता है। सतिगुरू के बिना उसका होछा मन (किसी आसरे पर) टिक नहीं सकता (इस वास्ते) बार-बार जूनियों में पड़ता है। यदि हरी प्रभू खुद मेहर करे तो सतिगुरू आ के मिलता है (और नाम के आसरे टिका के भटकने से बचा लेता है)। (इस वास्ते) हे दास नानक ! आप भी नाम की सिफत सालाह कर (ता कि) आपका सारी उम्र का दुख खत्म हैं जाए। 1।
मः 4 ॥ गुरु सालाही आपणा बहु बिधि रंगि सुभाइ ॥ सतिगुर सेती मनु रता रखिआ बणत बणाइ ॥ जिहवा सालाहि न रजई हरि प्रीतम चितु लाइ ॥ नानक नावै की मनि भुख है मनु त्रिपतै हरि रसु खाइ ॥2॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।
हिन्दी अर्थ: महला 4॥ (मन चाहता है कि) कई तरह (भाव कई तरह की उमंगों के साथ भाव-विभोर हो के) प्यारे सतिगुरू के प्यार में और स्वभाव में (लीन हो के) उसकी सिफत सालाह करूँ। मेरा मन प्यारे सतिगुरू के साथ रंगा गया है। (गुरू ने मेरे मन को) सवार बना दिया है। मेरी जीभ सिफत-सलाह करके तृप्त नहीं होती और मन प्रीतम प्रभू के साथ (नेह) लगा के नहीं भरता। (भरे भी कैसे?) हे नानक ! मन में तो नाम की भूख है। मन तभी तृप्त हो अगर प्रभू के नाम का स्वाद चख ले। 2।
पउड़ी ॥ सचु सचा कुदरति जाणीऐ दिनु राती जिनि बणाईआ ॥ सो सचु सलाही सदा सदा सचु सचे कीआ वडिआईआ ॥ सालाही सचु सलाह सचु सचु कीमति किनै न पाईआ ॥ जा मिलिआ पूरा सतिगुरू ता हाजरु नदरी आईआ ॥ सचु गुरमुखि जिनी सलाहिआ तिना भुखा सभि गवाईआ ॥23॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ जिस प्रभू ने दिन और रात (जैसे चमत्कार) बनाए हैं। वह सच्चा प्रभू (इस) कुदरति से ही सचमुच (बहुत बड़ी महिमा वाला) प्रतीत होता है; (मेरा मन चाहता है कि) मैं सदा उस सच्चे प्रभू की सिफत सालाह करूँ और महिमा कहूँ। सराहनीय प्रभू सच्चा है। उसकी महिमा भी स्थिर रहने वाली है। पर किसी ने उसकी कीमत नहीं पाई। जब पूरन सतिगुरू मिलता है तो वह महानताएं प्रत्यक्ष दिख पड़ती हैं। जो मनुष्य सतिगुरू के सन्मुख हो के (भाव। स्वै भाव गवा के) सच्चे प्रभू की वडिआई करते हैं। उनकी सारी भूख दूर हो जाती हैं। 23।
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 4॥ मन और शरीर को खोजते-खोजते मैंने (अंत में) प्रभू को ढूँढ ही लिया (पर मैं अपने बल पर नहीं ढूँढ सकता था)। मुझे सतिगुरू वकील मिल गया। जिसने हरी प्रभू मिला दिया। 1।
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
हिन्दी अर्थ: महला 3॥ जिस मनुष्य ने (हृदय में) माया (का प्यार) धारण किया हुआ है वह (सतिगुरू की ओर से) अंधा और बहरा है (भाव। ना सतिगुरू के दर्शन करके पतीज सकता है और ना ही उपदेश सुन के)। वह मनुष्य सतिगुरू के शब्दों की ओर ध्यान ही नहीं देता। (पर) (माया का) बेमतलब खपाने वाला (भाव। सिर दर्द कराने वाला) शोर बहुत (पसंद करता है)। जो मनुष्य सतिगुरू के सन्मुख होता है। (वह ऐसे) दिखाई देता है (कि) वह गुरू के शबद में बिरती जोड़ता है। हरी के नाम को सुन के उस पर सिदक लाता है और हरी के नाम में (ही) लीन हो जाता है। (पर मायाधारी अथवा गुरमुखि के क्या हाथ?) जो कुछ उस प्रभू को ठीक लगता है (उसी के अनुसार) ये जीव करवाया काम करता है। हे नानक ! जीव (बाजे की तरह) बजाए बजता है (भाव। बुलाने से बोलता है)। 2।
गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।
इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “उन्हें प्रभू एक दम के लिए भी नहीं बिसरता और वह मनुष्य (सर्व-गुण) संपूर्ण व उक्तम होते हैं (भाव।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।