अंग
313
गउड़ी
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- जिना सासि गिरासि न विसरै से पूरे पुरख परधान ॥
- सतिगुरु सेवीऐ आपणा पाईऐ नामु अपारु ॥
- सचु सचे के जन भगत हहि सचु सचा जिनी अराधिआ ॥
- मनमुखु प्राणी मुगधु है नामहीण भरमाइ ॥
- गुरु सालाही आपणा बहु बिधि रंगि सुभाइ ॥
- सचु सचा कुदरति जाणीऐ दिनु राती जिनि बणाईआ ॥
- मै मनु तनु खोजि खोजेदिआ सो प्रभु लधा लोड़ि ॥
- माइआधारी अति अंना बोला ॥
जिना सासि गिरासि न विसरै से पूरे पुरख परधान ॥
जिना सासि गिरासि न विसरै से पूरे पुरख परधान ॥
करमी सतिगुरु पाईऐ अनदिनु लगै धिआनु ॥
तिन की संगति मिलि रहा दरगह पाई मानु ॥
सउदे वाहु वाहु उचरहि उठदे भी वाहु करेनि ॥
नानक ते मुख उजले जि नित उठि संमालेनि ॥1॥
करमी सतिगुरु पाईऐ अनदिनु लगै धिआनु ॥
तिन की संगति मिलि रहा दरगह पाई मानु ॥
सउदे वाहु वाहु उचरहि उठदे भी वाहु करेनि ॥
नानक ते मुख उजले जि नित उठि संमालेनि ॥1॥
हिन्दी अर्थ: उन्हें प्रभू एक दम के लिए भी नहीं बिसरता और वह मनुष्य (सर्व-गुण) संपूर्ण व उक्तम होते हैं (भाव। सोए हुए भी नाम में जुड़े रहते हैं और जागते हुए भी। लोगों को वे सोए हुए या जागते दिखते हैं। वे सदा नाम में लीन रहते हैं)। (प्रभू की) मेहर से सतिगुरू मिलता है और हर वक्त (सोये हुए अथवा जागते हुए मेहर से ही) जीव का ध्यान (नाम में जुड़ा रहता है)। (चित्त चाहता है कि) मैं भी उनकी संगति करूँ और प्रभू की हजूरी में आदर पाऊँ। (सतिगुरू के सन्मुख होए हुए वे भाग्यशाली जीव) सोने के समय भी सिफतसालाह करते हैं और उठने के वक्त भी। हे नानक ! वह मुख उज्जवल होते हैं। जो सदा सुचेत रहके नाम चेते रखते हैं। 1।
सतिगुरु सेवीऐ आपणा पाईऐ नामु अपारु ॥
मः 4 ॥
सतिगुरु सेवीऐ आपणा पाईऐ नामु अपारु ॥
भउजलि डुबदिआ कढि लए हरि दाति करे दातारु ॥
धंनु धंनु से साह है जि नामि करहि वापारु ॥
वणजारे सिख आवदे सबदि लघावणहारु ॥
जन नानक जिन कउ क्रिपा भई तिन सेविआ सिरजणहारु ॥2॥
सतिगुरु सेवीऐ आपणा पाईऐ नामु अपारु ॥
भउजलि डुबदिआ कढि लए हरि दाति करे दातारु ॥
धंनु धंनु से साह है जि नामि करहि वापारु ॥
वणजारे सिख आवदे सबदि लघावणहारु ॥
जन नानक जिन कउ क्रिपा भई तिन सेविआ सिरजणहारु ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 4॥ अपने सतिगुरू की बताई हुई कार करें। तो ना खत्म होने वाला नाम (भाव नाम का खजाना) मिल जाता है। दातें देने वाला हरी (नाम की यह) दात बख्शता है और (नाम) संसार सागर में डूबते को निकाल लेता है। जो शाह नाम (की राशि) से व्यापार करते हैं वह भाग्यशाली हैं। (क्योंकि इस प्रकार का) व्यापार करने वाले जो सिख (सतिगुरू के पास) आते हैं। (सतिगुरू उनको अपने) शबद द्वारा (भवजल से) पार उतार देता है। (पर) हे दास नानक ! सृजनहार प्रभू की बंदगी वही मनुष्य करते हैं। जिन पर प्रभू स्वयं मेहर करता है। 2।
सचु सचे के जन भगत हहि सचु सचा जिनी अराधिआ ॥
पउड़ी ॥
सचु सचे के जन भगत हहि सचु सचा जिनी अराधिआ ॥
जिन गुरमुखि खोजि ढंढोलिआ तिन अंदरहु ही सचु लाधिआ ॥
सचु साहिबु सचु जिनी सेविआ कालु कंटकु मारि तिनी साधिआ ॥
सचु सचा सभ दू वडा है सचु सेवनि से सचि रलाधिआ ॥
सचु सचे नो साबासि है सचु सचा सेवि फलाधिआ ॥22॥
सचु सचे के जन भगत हहि सचु सचा जिनी अराधिआ ॥
जिन गुरमुखि खोजि ढंढोलिआ तिन अंदरहु ही सचु लाधिआ ॥
सचु साहिबु सचु जिनी सेविआ कालु कंटकु मारि तिनी साधिआ ॥
सचु सचा सभ दू वडा है सचु सेवनि से सचि रलाधिआ ॥
सचु सचे नो साबासि है सचु सचा सेवि फलाधिआ ॥22॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी। जो मनुष्य सच्चे हरी का सचमुच भजन करते हैं। वह ही सच्चे भक्त (कहलाते) हैं। जो मनुष्य गुरू के सन्मुख हो कर खोज के ढूँढते हैं (भाव। यत्न से तलाशते हैं) वे अपने हृदय में ही प्रभू को पा लेते हैं। जिन मनुष्यों ने सच्चा सांई सचमुच सिमरा है उन्होंने दुखदाई काल को मार के काबू कर लिया है। (भाव। उन्हे काल काँटे के समान दुखद प्रतीत नहीं होता)। जो सच्चा हरी सबसे बड़ा है। उसकी बंदगी जो मनुष्य करते हैं। वह उस में लीन हो जाते हैं। धन्य है सच्चा प्रभू। धन्य है सच्चा प्रभू (इस तरह) जो मनुष्य सचमुच सच्चे की आराधना करते हैं। उन्हें उक्तम फल प्राप्त होता है (भाव। वे मानस जनम को सफल कर लेते हैं)। 22।
मनमुखु प्राणी मुगधु है नामहीण भरमाइ ॥
सलोक मः 4 ॥
मनमुखु प्राणी मुगधु है नामहीण भरमाइ ॥
बिनु गुर मनूआ ना टिकै फिरि फिरि जूनी पाइ ॥
हरि प्रभु आपि दइआल होहि तां सतिगुरु मिलिआ आइ ॥
जन नानक नामु सलाहि तू जनम मरण दुखु जाइ ॥1॥
मनमुखु प्राणी मुगधु है नामहीण भरमाइ ॥
बिनु गुर मनूआ ना टिकै फिरि फिरि जूनी पाइ ॥
हरि प्रभु आपि दइआल होहि तां सतिगुरु मिलिआ आइ ॥
जन नानक नामु सलाहि तू जनम मरण दुखु जाइ ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 4॥ मनमुख मनुष्य मूर्ख है। नाम से टूटा हुआ भटकता फिरता है। सतिगुरू के बिना उसका होछा मन (किसी आसरे पर) टिक नहीं सकता (इस वास्ते) बार-बार जूनियों में पड़ता है। यदि हरी प्रभू खुद मेहर करे तो सतिगुरू आ के मिलता है (और नाम के आसरे टिका के भटकने से बचा लेता है)। (इस वास्ते) हे दास नानक ! आप भी नाम की सिफत सालाह कर (ता कि) आपका सारी उम्र का दुख खत्म हो जाए। 1।
गुरु सालाही आपणा बहु बिधि रंगि सुभाइ ॥
मः 4 ॥
गुरु सालाही आपणा बहु बिधि रंगि सुभाइ ॥
सतिगुर सेती मनु रता रखिआ बणत बणाइ ॥
जिहवा सालाहि न रजई हरि प्रीतम चितु लाइ ॥
नानक नावै की मनि भुख है मनु त्रिपतै हरि रसु खाइ ॥2॥
गुरु सालाही आपणा बहु बिधि रंगि सुभाइ ॥
सतिगुर सेती मनु रता रखिआ बणत बणाइ ॥
जिहवा सालाहि न रजई हरि प्रीतम चितु लाइ ॥
नानक नावै की मनि भुख है मनु त्रिपतै हरि रसु खाइ ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 4॥ (मन चाहता है कि) कई तरह (भाव कई तरह की उमंगों के साथ भाव-विभोर हो के) प्यारे सतिगुरू के प्यार में और स्वभाव में (लीन हो के) उसकी सिफत सालाह करूँ। मेरा मन प्यारे सतिगुरू के साथ रंगा गया है। (गुरू ने मेरे मन को) सवार बना दिया है। मेरी जीभ सिफत-सलाह करके तृप्त नहीं होती और मन प्रीतम प्रभू के साथ (नेह) लगा के नहीं भरता। (भरे भी कैसे?) हे नानक ! मन में तो नाम की भूख है। मन तभी तृप्त हो अगर प्रभू के नाम का स्वाद चख ले। 2।
सचु सचा कुदरति जाणीऐ दिनु राती जिनि बणाईआ ॥
पउड़ी ॥
सचु सचा कुदरति जाणीऐ दिनु राती जिनि बणाईआ ॥
सो सचु सलाही सदा सदा सचु सचे कीआ वडिआईआ ॥
सालाही सचु सलाह सचु सचु कीमति किनै न पाईआ ॥
जा मिलिआ पूरा सतिगुरू ता हाजरु नदरी आईआ ॥
सचु गुरमुखि जिनी सलाहिआ तिना भुखा सभि गवाईआ ॥23॥
सचु सचा कुदरति जाणीऐ दिनु राती जिनि बणाईआ ॥
सो सचु सलाही सदा सदा सचु सचे कीआ वडिआईआ ॥
सालाही सचु सलाह सचु सचु कीमति किनै न पाईआ ॥
जा मिलिआ पूरा सतिगुरू ता हाजरु नदरी आईआ ॥
सचु गुरमुखि जिनी सलाहिआ तिना भुखा सभि गवाईआ ॥23॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ जिस प्रभू ने दिन और रात (जैसे चमत्कार) बनाए हैं। वह सच्चा प्रभू (इस) कुदरति से ही सचमुच (बहुत बड़ी महिमा वाला) प्रतीत होता है; (मेरा मन चाहता है कि) मैं सदा उस सच्चे प्रभू की सिफत सालाह करूँ और महिमा कहूँ। सराहनीय प्रभू सच्चा है। उसकी महिमा भी स्थिर रहने वाली है। पर किसी ने उसकी कीमत नहीं पाई। जब पूरन सतिगुरू मिलता है तो वह महानताएं प्रत्यक्ष दिख पड़ती हैं। जो मनुष्य सतिगुरू के सन्मुख हो के (भाव। स्वै भाव गवा के) सच्चे प्रभू की वडिआई करते हैं। उनकी सारी भूख दूर हो जाती हैं। 23।
मै मनु तनु खोजि खोजेदिआ सो प्रभु लधा लोड़ि ॥
सलोक मः 4 ॥
मै मनु तनु खोजि खोजेदिआ सो प्रभु लधा लोड़ि ॥
विसटु गुरू मै पाइआ जिनि हरि प्रभु दिता जोड़ि ॥1॥
मै मनु तनु खोजि खोजेदिआ सो प्रभु लधा लोड़ि ॥
विसटु गुरू मै पाइआ जिनि हरि प्रभु दिता जोड़ि ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 4॥ मन और शरीर को खोजते-खोजते मैंने (अंत में) प्रभू को ढूँढ ही लिया (पर मैं अपने बल पर नहीं ढूँढ सकता था)। मुझे सतिगुरू वकील मिल गया। जिसने हरी प्रभू मिला दिया। 1।
माइआधारी अति अंना बोला ॥
मः 3 ॥
माइआधारी अति अंना बोला ॥
सबदु न सुणई बहु रोल घचोला ॥
गुरमुखि जापै सबदि लिव लाइ ॥
हरि नामु सुणि मंने हरि नामि समाइ ॥
जो तिसु भावै सु करे कराइआ ॥
नानक वजदा जंतु वजाइआ ॥2॥
माइआधारी अति अंना बोला ॥
सबदु न सुणई बहु रोल घचोला ॥
गुरमुखि जापै सबदि लिव लाइ ॥
हरि नामु सुणि मंने हरि नामि समाइ ॥
जो तिसु भावै सु करे कराइआ ॥
नानक वजदा जंतु वजाइआ ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 3॥ जिस मनुष्य ने (हृदय में) माया (का प्यार) धारण किया हुआ है वह (सतिगुरू की ओर से) अंधा और बहरा है (भाव। ना सतिगुरू के दर्शन करके पतीज सकता है और ना ही उपदेश सुन के)। वह मनुष्य सतिगुरू के शब्दों की ओर ध्यान ही नहीं देता। (पर) (माया का) बेमतलब खपाने वाला (भाव। सिर दर्द कराने वाला) शोर बहुत (पसंद करता है)। जो मनुष्य सतिगुरू के सन्मुख होता है। (वह ऐसे) दिखाई देता है (कि) वह गुरू के शबद में बिरती जोड़ता है। हरी के नाम को सुन के उस पर सिदक लाता है और हरी के नाम में (ही) लीन हो जाता है। (पर मायाधारी अथवा गुरमुखि के क्या हाथ?) जो कुछ उस प्रभू को ठीक लगता है (उसी के अनुसार) ये जीव करवाया काम करता है। हे नानक ! जीव (बाजे की तरह) बजाए बजता है (भाव। बुलाने से बोलता है)। 2।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ३: गुरु अमर दास जी; महला ४: गुरु राम दास जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ३१३ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।