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अंग ३११ · गउड़ी

अंग
311
गउड़ी
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  1. सचु सचा रसु जिनी चखिआ से त्रिपति रहे आघाई ॥
  2. जिना अंदरि उमरथल सेई जाणनि सूलीआ ॥
  3. अउगणी भरिआ सरीरु है किउ संतहु निरमलु होइ ॥
  4. सालाही सचु सालाहणा सचु सचा पुरखु निराले ॥
  5. गउड़ी रागि सुलखणी जे खसमै चिति करेइ ॥
  6. सतसंगति महि हरि उसतति है संगि साधू मिले पिआरिआ ॥

सचु सचा रसु जिनी चखिआ से त्रिपति रहे आघाई ॥

अंग ३१० से चला आ रहा अंश

सचु सचा रसु जिनी चखिआ से त्रिपति रहे आघाई ॥
इहु हरि रसु सेई जाणदे जिउ गूंगै मिठिआई खाई ॥
गुरि पूरै हरि प्रभु सेविआ मनि वजी वाधाई ॥18॥

हिन्दी अर्थ: जिन्होंने सच्चे प्रभू के नाम का स्वाद चखा है। वह (माया की ओर से) तृप्त हो के संतुष्ट रहते हैं। इस स्वाद को जानते भी वही हैं। (पर बयान नहीं कर सकते) जैसे गूँगा मिठाई खाता है (पर। स्वाद नहीं बता सकता)। पूरे सतिगुरू के द्वारा जिन्होंने नाम जपा है उनके मन में उत्साह बना रहता है (भाव। उनके मन पुल्कित रहते हैं)। 18।

जिना अंदरि उमरथल सेई जाणनि सूलीआ ॥

सलोक मः 4 ॥
जिना अंदरि उमरथल सेई जाणनि सूलीआ ॥
हरि जाणहि सेई बिरहु हउ तिन विटहु सद घुमि घोलीआ ॥
हरि मेलहु सजणु पुरखु मेरा सिरु तिन विटहु तल रोलीआ ॥
जो सिख गुर कार कमावहि हउ गुलमु तिना का गोलीआ ॥
हरि रंगि चलूलै जो रते तिन भिनी हरि रंगि चोलीआ ॥
करि किरपा नानक मेलि गुर पहि सिरु वेचिआ मोलीआ ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 4 II (जैसे) जिनके शरीर के अंदर फोड़ा है। वह ही उस पीड़ा को समझते हैं (वैसे ही जिनके हृदय में विरह के काँटे की चुभन है वही उस पीड़ा को जानते हैं। और) विछोड़े से पैदा हुए प्यार को भी वही समझते हैं, मैं उनसे सदके हूँ। हे हरी ! मुझे कोई ऐसा सज्जन मर्द मिला। ऐसे लोगों (के दीदार) के लिए मेरा सिर उनके पैरों तले रहे। जो सिख सतिगुरू की बताई हुई कार करते हैं। मैं उनके गुलामों का गुलाम हूँ। जिनके मन प्रभू-नाम के गाढ़े रंग में रंगे हुए हैं। उनके चोले (भी। भाव। शरीर) प्रभू के प्यार में भीगे हुए रहते हैं। हे नानक ! उन्हें प्रभू ने कृपा करके गुरू के साथ मिलाया है। और उन्होंने अपना सिर गुरू के आगे बेच दिया है। 1।

अउगणी भरिआ सरीरु है किउ संतहु निरमलु होइ ॥

मः 4 ॥
अउगणी भरिआ सरीरु है किउ संतहु निरमलु होइ ॥
गुरमुखि गुण वेहाझीअहि मलु हउमै कढै धोइ ॥
सचु वणंजहि रंग सिउ सचु सउदा होइ ॥
तोटा मूलि न आवई लाहा हरि भावै सोइ ॥
नानक तिन सचु वणंजिआ जिना धुरि लिखिआ परापति होइ ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 4॥ (प्रश्न) हे संत जनों ! (यह) शरीर अवगुणों से भरा हुआ है।साफ कैसे हो सकता (उक्तर) सतिगुरू के सन्मुख हो के गुण खरीदे जायं। तो (इस तरह मनुष्य के शरीर में से) अहंकार-रूपी मैल कोई धो के निकाल सकता है। जो मनुष्य प्यार से सच को (भाव। सच्चे के नाम को) खरीरदते हैं। उनका ये सौदा सदा साथ निभता है। (इस सौदे में) लाभ (ये मिलता) है कि परमात्मा उन्हें प्यारा लगने लग पड़ता है। हे नानक ! सच्चे नाम की खरीद वह मनुष्य करते हैं। जिन्हें (ये सच्चा नाम) आरम्भ से ही (किए हुये भले कर्मों के अनुसार) (हृदय में) उकरा हुआ मिलता है। 2।

सालाही सचु सालाहणा सचु सचा पुरखु निराले ॥

पउड़ी ॥
सालाही सचु सालाहणा सचु सचा पुरखु निराले ॥
सचु सेवी सचु मनि वसै सचु सचा हरि रखवाले ॥
सचु सचा जिनी अराधिआ से जाइ रले सच नाले ॥
सचु सचा जिनी न सेविआ से मनमुख मूड़ बेताले ॥
ओह आलु पतालु मुहहु बोलदे जिउ पीतै मदि मतवाले ॥19॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ (मेरा चित्त चाहता है कि) जो निराला पुरख सच्चा हरी है। उस सच्चे हरी की सिफत करूँ। उसकी की हुई सिफत सदा साथ निभती है। (चित्त चाहता है कि) जो सच्चा हरी सब का रक्षक है उसकी सेवा करूँ। और सच्चा हरी मेरे मन में निवास करे। जिन्होंने सच-मुच सच्चे हरी की सेवा की है। वह उस सच्चे के साथ जा मिले हैं। जिन्होंने सच्चे हरी की सेवा नहीं की। वह मनमुख मूर्ख और भूतने हैं। वह मुँह से ऐसी बकवास करते हैं जैसे शराब पी के शराबी (बकवास करते हैं)। 19।

गउड़ी रागि सुलखणी जे खसमै चिति करेइ ॥

सलोक महला 3 ॥
गउड़ी रागि सुलखणी जे खसमै चिति करेइ ॥
भाणै चलै सतिगुरू कै ऐसा सीगारु करेइ ॥
सचा सबदु भतारु है सदा सदा रावेइ ॥
जिउ उबली मजीठै रंगु गहगहा तिउ सचे नो जीउ देइ ॥
रंगि चलूलै अति रती सचे सिउ लगा नेहु ॥
कूड़ु ठगी गुझी ना रहै कूड़ु मुलंमा पलेटि धरेहु ॥
कूड़ी करनि वडाईआ कूड़े सिउ लगा नेहु ॥
नानक सचा आपि है आपे नदरि करेइ ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ (जीव रूपी स्त्री) गउड़ी रागिनी से तभी अच्छे लक्षणों वाली हो सकती है अगर प्रभू पति को हृदय में बसाए। सतिगुरू की रजा में चले - ऐसा श्रृंगार करे; सच्चा शबद (रूप जो) पति (है) उसका आनंद ले (भाव। सदा उसे जपे)। सच्चा शब्द प्राणी का कंत (पति) है, हमेशा उसे उसी का आनंद लेना चाहिए। जैसे मजीठ उबाल सहती है और उसका रंग गाढ़ा हो जाता है। वैसे ही (जीव रूपी स्त्री) अपना आप पति के सदके करे। (इसे भी नाम का गाढ़ा रंग चढ़ जाए) तो उसका सच्चे प्रभू के साथ प्यार बन जाता है। वह (नाम के) गूढ़े रंग में रंगी जाती है। झूठ (रूप) मुलम्मा (बेशक सच से) लपेट के रखो। (फिर भी) जो झूठ और ठगी है वह छुपे नहीं रह सकते। (हृदय में ठगी रखने वाले ऐसे ही) झूठी उपमा करते हैं। उनका प्यार झूठ से ही होता है (और ये बात छुपी नहीं रहती)। (पर) हे नानक ! (ये किसी के वश नहीं) जो हरी सच्चा स्वयं है वही मेहर करता है (और दिल में से ठॅगी दूर हो सकती है)। 1।

सतसंगति महि हरि उसतति है संगि साधू मिले पिआरिआ ॥

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मः 4 ॥
सतसंगति महि हरि उसतति है संगि साधू मिले पिआरिआ ॥
ओइ पुरख प्राणी धंनि जन हहि उपदेसु करहि परउपकारिआ ॥
हरि नामु द्रिड़ावहि हरि नामु सुणावहि हरि नामे जगु निसतारिआ ॥
गुर वेखण कउ सभु कोई लोचै नव खंड जगति नमसकारिआ ॥
तुधु आपे आपु रखिआ सतिगुर विचि गुरु आपे तुधु सवारिआ ॥
तू आपे पूजहि पूज करावहि सतिगुर कउ सिरजणहारिआ ॥
कोई विछुड़ि जाइ सतिगुरू पासहु तिसु काला मुहु जमि मारिआ ॥

हिन्दी अर्थ: महला 4॥ सत्संग में परमात्मा की सिफत सालाह होती है (क्योंकि वहाँ) प्यारे (गुरसिख। संत जन) सतिगुरू के साथ मिलते हैं। वे लोग मुबारक हैं (क्योंकि) परोपकार के लिए वे (औरों को भी) उपदेश करते हैं। प्रभू के नाम में सिदक बनाते हैं। प्रभू का नाम ही सुनाते हैं और प्रभू के नाम द्वारा ही संसार को पार लंघाते हैं (ये सारी बरकति इसलिए है कि वह भाग्यशाली सत्संगति में जा के सतिगुरू में जुड़ते हैं)। (ये बरकतें सुन के) हरेक जीव सतिगुरू के दर्शन करने की चाहत रखता है और संसार में नवों खण्डों (के जीव) सतिगुरू के आगे सिर निवाते हैं। सतिगुरू को पैदा करने वाले हे प्रभू ! आपने अपना आप सतिगुरू में छुपा के रखा है और आपने खुद ही सतिगुरू को सुंदर बनाया है। आप खुद ही सतिगुरू को बडिआई (आदर) देते हैं और खुद ही (औरों से गुरू की) वडिआई करवाते हैं। जो मनुष्य सतिगुरू से विछुड़ जाए। उसका मुंह काला होता है और यमराज से उसको मार पड़ती है। (भाव। वह जगत में एक तो मुकालख कमाता है। दूसरा मौत आदि का उसे सदा सहिम बना रहता है)।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ३: गुरु अमर दास जी; महला ४: गुरु राम दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ३११ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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