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अंग 311

अंग
311
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सचु सचा रसु जिनी चखिआ से त्रिपति रहे आघाई ॥
इहु हरि रसु सेई जाणदे जिउ गूंगै मिठिआई खाई ॥
गुरि पूरै हरि प्रभु सेविआ मनि वजी वाधाई ॥18॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: जिन्होंने सच्चे प्रभू के नाम का स्वाद चखा है। वह (माया की ओर से) तृप्त हो के संतुष्ट रहते हैं। इस स्वाद को जानते भी वही हैं। (पर बयान नहीं कर सकते) जैसे गूँगा मिठाई खाता है (पर। स्वाद नहीं बता सकता)। पूरे सतिगुरू के द्वारा जिन्होंने नाम जपा है उनके मन में उत्साह बना रहता है (भाव। उनके मन पुल्कित रहते हैं)। 18।
सलोक मः 4 ॥
जिना अंदरि उमरथल सेई जाणनि सूलीआ ॥
हरि जाणहि सेई बिरहु हउ तिन विटहु सद घुमि घोलीआ ॥
हरि मेलहु सजणु पुरखु मेरा सिरु तिन विटहु तल रोलीआ ॥
जो सिख गुर कार कमावहि हउ गुलमु तिना का गोलीआ ॥
हरि रंगि चलूलै जो रते तिन भिनी हरि रंगि चोलीआ ॥
करि किरपा नानक मेलि गुर पहि सिरु वेचिआ मोलीआ ॥1॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 4 II (जैसे) जिनके शरीर के अंदर फोड़ा है। वह ही उस पीड़ा को समझते हैं (वैसे ही जिनके हृदय में विरह के काँटे की चुभन है वही उस पीड़ा को जानते हैं। और) विछोड़े से पैदा हुए प्यार को भी वही समझते हैं, मैं उनसे सदके हूँ। हे हरी ! मुझे कोई ऐसा सज्जन मर्द मिला। ऐसे लोगों (के दीदार) के लिए मेरा सिर उनके पैरों तले रहे। जो सिख सतिगुरू की बताई हुई कार करते हैं। मैं उनके गुलामों का गुलाम हूँ। जिनके मन प्रभू-नाम के गाढ़े रंग में रंगे हुए हैं। उनके चोले (भी। भाव। शरीर) प्रभू के प्यार में भीगे हुए रहते हैं। हे नानक ! उन्हें प्रभू ने कृपा करके गुरू के साथ मिलाया है। और उन्होंने अपना सिर गुरू के आगे बेच दिया है। 1।
मः 4 ॥
अउगणी भरिआ सरीरु है किउ संतहु निरमलु होइ ॥
गुरमुखि गुण वेहाझीअहि मलु हउमै कढै धोइ ॥
सचु वणंजहि रंग सिउ सचु सउदा होइ ॥
तोटा मूलि न आवई लाहा हरि भावै सोइ ॥
नानक तिन सचु वणंजिआ जिना धुरि लिखिआ परापति होइ ॥2॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: महला 4॥ (प्रश्न) हे संत जनों ! (यह) शरीर अवगुणों से भरा हुआ है।साफ कैसे हो सकता (उक्तर) सतिगुरू के सन्मुख हो के गुण खरीदे जायं। तो (इस तरह मनुष्य के शरीर में से) अहंकार-रूपी मैल कोई धो के निकाल सकता है। जो मनुष्य प्यार से सच को (भाव। सच्चे के नाम को) खरीरदते हैं। उनका ये सौदा सदा साथ निभता है। (इस सौदे में) लाभ (ये मिलता) है कि परमात्मा उन्हें प्यारा लगने लग पड़ता है। हे नानक ! सच्चे नाम की खरीद वह मनुष्य करते हैं। जिन्हें (ये सच्चा नाम) आरम्भ से ही (किए हुये भले कर्मों के अनुसार) (हृदय में) उकरा हुआ मिलता है। 2।
पउड़ी ॥
सालाही सचु सालाहणा सचु सचा पुरखु निराले ॥
सचु सेवी सचु मनि वसै सचु सचा हरि रखवाले ॥
सचु सचा जिनी अराधिआ से जाइ रले सच नाले ॥
सचु सचा जिनी न सेविआ से मनमुख मूड़ बेताले ॥
ओह आलु पतालु मुहहु बोलदे जिउ पीतै मदि मतवाले ॥19॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ (मेरा चित्त चाहता है कि) जो निराला पुरख सच्चा हरी है। उस सच्चे हरी की सिफत करूँ। उसकी की हुई सिफत सदा साथ निभती है। (चित्त चाहता है कि) जो सच्चा हरी सब का रक्षक है उसकी सेवा करूँ। और सच्चा हरी मेरे मन में निवास करे। जिन्होंने सच-मुच सच्चे हरी की सेवा की है। वह उस सच्चे के साथ जा मिले हैं। जिन्होंने सच्चे हरी की सेवा नहीं की। वह मनमुख मूर्ख और भूतने हैं। वह मुँह से ऐसी बकवास करते हैं जैसे शराब पी के शराबी (बकवास करते हैं)। 19।
सलोक महला 3 ॥
गउड़ी रागि सुलखणी जे खसमै चिति करेइ ॥
भाणै चलै सतिगुरू कै ऐसा सीगारु करेइ ॥
सचा सबदु भतारु है सदा सदा रावेइ ॥
जिउ उबली मजीठै रंगु गहगहा तिउ सचे नो जीउ देइ ॥
रंगि चलूलै अति रती सचे सिउ लगा नेहु ॥
कूड़ु ठगी गुझी ना रहै कूड़ु मुलंमा पलेटि धरेहु ॥
कूड़ी करनि वडाईआ कूड़े सिउ लगा नेहु ॥
नानक सचा आपि है आपे नदरि करेइ ॥1॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ (जीव रूपी स्त्री) गउड़ी रागिनी से तभी अच्छे लक्षणों वाली हो सकती है अगर प्रभू पति को हृदय में बसाए। सतिगुरू की रजा में चले – ऐसा श्रृंगार करे; सच्चा शबद (रूप जो) पति (है) उसका आनंद ले (भाव। सदा उसे जपे)। सच्चा शब्द प्राणी का कंत (पति) है, हमेशा उसे उसी का आनंद लेना चाहिए। जैसे मजीठ उबाल सहती है और उसका रंग गाढ़ा हो जाता है। वैसे ही (जीव रूपी स्त्री) अपना आप पति के सदके करे। (इसे भी नाम का गाढ़ा रंग चढ़ जाए) तो उसका सच्चे प्रभू के साथ प्यार बन जाता है। वह (नाम के) गूढ़े रंग में रंगी जाती है। झूठ (रूप) मुलम्मा (बेशक सच से) लपेट के रखो। (फिर भी) जो झूठ और ठगी है वह छुपे नहीं रह सकते। (हृदय में ठगी रखने वाले ऐसे ही) झूठी उपमा करते हैं। उनका प्यार झूठ से ही होता है (और ये बात छुपी नहीं रहती)। (पर) हे नानक ! (ये किसी के वश नहीं) जो हरी सच्चा स्वयं है वही मेहर करता है (और दिल में से ठॅगी दूर हो सकती है)। 1।
मः 4 ॥
सतसंगति महि हरि उसतति है संगि साधू मिले पिआरिआ ॥
ओइ पुरख प्राणी धंनि जन हहि उपदेसु करहि परउपकारिआ ॥
हरि नामु द्रिड़ावहि हरि नामु सुणावहि हरि नामे जगु निसतारिआ ॥
गुर वेखण कउ सभु कोई लोचै नव खंड जगति नमसकारिआ ॥
तुधु आपे आपु रखिआ सतिगुर विचि गुरु आपे तुधु सवारिआ ॥
तू आपे पूजहि पूज करावहि सतिगुर कउ सिरजणहारिआ ॥
कोई विछुड़ि जाइ सतिगुरू पासहु तिसु काला मुहु जमि मारिआ ॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: महला 4॥ सत्संग में परमात्मा की सिफत सालाह होती है (क्योंकि वहाँ) प्यारे (गुरसिख। संत जन) सतिगुरू के साथ मिलते हैं। वे लोग मुबारक हैं (क्योंकि) परोपकार के लिए वे (औरों को भी) उपदेश करते हैं। प्रभू के नाम में सिदक बनाते हैं। प्रभू का नाम ही सुनाते हैं और प्रभू के नाम द्वारा ही संसार को पार लंघाते हैं (ये सारी बरकति इसलिए है कि वह भाग्यशाली सत्संगति में जा के सतिगुरू में जुड़ते हैं)। (ये बरकतें सुन के) हरेक जीव सतिगुरू के दर्शन करने की चाहत रखता है और संसार में नवों खण्डों (के जीव) सतिगुरू के आगे सिर निवाते हैं। सतिगुरू को पैदा करने वाले हे प्रभू ! तूने अपना आप सतिगुरू में छुपा के रखा है और तूने खुद ही सतिगुरू को सुंदर बनाया है। आप खुद ही सतिगुरू को बडिआई (आदर) देता है और खुद ही (औरों से गुरू की) वडिआई करवाता है। जो मनुष्य सतिगुरू से विछुड़ जाए। उसका मुंह काला होता है और यमराज से उसको मार पड़ती है। (भाव। वह जगत में एक तो मुकालख कमाता है। दूसरा मौत आदि का उसे सदा सहिम बना रहता है)।

गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जिन्होंने सच्चे प्रभू के नाम का स्वाद चखा है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।