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अंग 312

अंग
312
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
तिसु अगै पिछै ढोई नाही गुरसिखी मनि वीचारिआ ॥
सतिगुरू नो मिले सेई जन उबरे जिन हिरदै नामु समारिआ ॥
जन नानक के गुरसिख पुतहहु हरि जपिअहु हरि निसतारिआ ॥2॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: उसे ना इस लोक में ना ही परलोक में कहीं आसरा मिलता है – सब गुरसिखों ने मन में ये विचार की है। जो मनुष्य सतिगुरू को जा के मिलते हैं। वह (संसार सागर से) बच जाते हैं। क्योंकि वह हृदय में नाम को संभालते हैं। (इसलिए प्रभू के) दास नानक के सिख पुत्रो ! प्रभू का नाम जपो। (क्योंकि) प्रभू (संसार से) पार उतारता है। 2।
महला 3 ॥
हउमै जगतु भुलाइआ दुरमति बिखिआ बिकार ॥
सतिगुरु मिलै त नदरि होइ मनमुख अंध अंधिआर ॥
नानक आपे मेलि लए जिस नो सबदि लाए पिआरु ॥3॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ अहंकार ने जगत को कुमार्ग पर डाला हुआ है। खोटी मति और माया में (फस के) विकार किए जाता है। जिस मनुष्य को गुरू मिलता है उस पर (प्रभू की मेहर की) नजर होती है। मन के मुरीद मनुष्य नदार अंधे रहते हैं। हे नानक ! हरी जिस मनुष्य में शबद के प्रति प्यार पैदा करता है। उसे हरी खुद ही अपने साथ मिला लेता है। 3।
पउड़ी ॥
सचु सचे की सिफति सलाह है सो करे जिसु अंदरु भिजै ॥
जिनी इक मनि इकु अराधिआ तिन का कंधु न कबहू छिजै ॥
धनु धनु पुरख साबासि है जिन सचु रसना अंम्रितु पिजै ॥
सचु सचा जिन मनि भावदा से मनि सची दरगह लिजै ॥
धनु धंनु जनमु सचिआरीआ मुख उजल सचु करिजै ॥20॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ सच्चे प्रभू की (की हुई) सिफत सालाह सदा स्थिर रहने वाली है; (ये सिफत सालाह) वह मनुष्य कर सकता है जिसका हृदय (भी) (सिफत में) भीगा हो। जो मनुष्य एकाग्रचित्त हो के एक हरी का सिमरन करते हैं। उनका शरीर कभी जर-जर नहीं होता (विकारों में खचित नहीं होता)। वे मनुष्य धन्य हैं। शाबाश है उनको जो जीभ से सच्चा नाम अमृत पीते हैं। जिनके मन को सच्चा हरी सचमुच प्यारा लगता है वह सच्ची दरगाह में सतिकारे जाते हैं। सच के व्यापारियों का मानस जनम सफला है (क्योंकि दरगाह में) वह सुर्खरू किए जाते हैं। 2।
सलोक मः 4 ॥
साकत जाइ निवहि गुर आगै मनि खोटे कूड़ि कूड़िआरे ॥
जा गुरु कहै उठहु मेरे भाई बहि जाहि घुसरि बगुलारे ॥
गुरसिखा अंदरि सतिगुरु वरतै चुणि कढे लधोवारे ॥
ओइ अगै पिछै बहि मुहु छपाइनि न रलनी खोटेआरे ॥
ओना दा भखु सु ओथै नाही जाइ कूड़ु लहनि भेडारे ॥
जे साकतु नरु खावाईऐ लोचीऐ बिखु कढै मुखि उगलारे ॥
हरि साकत सेती संगु न करीअहु ओइ मारे सिरजणहारे ॥
जिस का इहु खेलु सोई करि वेखै जन नानक नामु समारे ॥1॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 4॥ अगर साकत मनुष्य सतिगुरू के आगे जा के झुक भी जाएं। (तो भी) उनके मन में खोट (रहता है) और खोट होने के कारण झूठ के व्यापारी बने रहते हैं। जब सतिगुरू (सब सिखों को) कहता है – ‘हे मेरे भाईयो ! सचेत हो जाएँ !’ (तो ये साकत भी) बगुलों की तरह (सिखों में) मिल के बैठ जाते हैं। (पर साकतों के हृदय में झूठ बसता है) और गुरसिखों के दिल में सतिगुरू बसता है। (इस करके सिखों में मिल के बैठे हुए भी साकत) परख के समय चुन के निकाल दिए जाते हैं। वे आगे-पीछे हो के मुँह तो बहुत छुपाते हैं। पर झूठ के व्यापारी (सिखों में) मिल नहीं सकते। साकतों का खाना वहाँ (गुरसिखों के संग में) नहीं होता। (इस वास्ते) भेड़ों की तरह (किसी और जगह) जा के झूठ को तलाशते हैं। अगर साकत मनुष्य को (नाम-रूपी) बढ़िया पदार्थ खिलाना भी चाहें तो भी वह मुँह से (निंदा-रूपी) विष ही उगलता है। (हे संत जनों !) ईश्वर से टूटे हुए का संग ना करना। (क्योंकि) सृजनहार ने स्वयं उनको (नाम से) मुर्दा किया हुआ है। (उन्हें सीधे राह पर लाना किसी जीव के वश नहीं)। जिस प्रभू का ये खेल है वह खुद इस खेल को रच के देख रहा है। हे दास नानक ! आप प्रभू का नाम संभाल। 1।
मः 4 ॥
सतिगुरु पुरखु अगंमु है जिसु अंदरि हरि उरि धारिआ ॥
सतिगुरू नो अपड़ि कोइ न सकई जिसु वलि सिरजणहारिआ ॥
सतिगुरू का खड़गु संजोउ हरि भगति है जितु कालु कंटकु मारि विडारिआ ॥
सतिगुरू का रखणहारा हरि आपि है सतिगुरू कै पिछै हरि सभि उबारिआ ॥
जो मंदा चितवै पूरे सतिगुरू का सो आपि उपावणहारै मारिआ ॥
एह गल होवै हरि दरगह सचे की जन नानक अगमु वीचारिआ ॥2॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: महला 4॥ सतिगुरू अगम पुरख है जिसने हृदय में प्रभू को परोया हुआ है। सतिगुरू की बराबरी कोई नहीं कर सकता। क्योंकि सृजनहार उसीकी ओर है। सतिगुरू की खड़ग और संजोअ प्रभू की भक्ति है जिससे उसने काल (-रूपी) काँटे को (भाव मौत के डर को) मार के किनारे फेंका है। सतिगुरू का रक्षक प्रभू स्वयं है और सतिगुरू के पद्चिन्हों पर चलने वाले सभी को भी प्रभू बचा लेता है। जो मनुष्य पूरे सतिगुरू का बुरा लोचता है उसे खुद करतार मारता है। सच्चे हरी की दरगाह में ये न्याय होता है। और हे नानक ! अगम हरी का सिमरन करने से (ये समझ पड़ती है)। 2।
पउड़ी ॥
सचु सुतिआ जिनी अराधिआ जा उठे ता सचु चवे ॥
से विरले जुग महि जाणीअहि जो गुरमुखि सचु रवे ॥
हउ बलिहारी तिन कउ जि अनदिनु सचु लवे ॥
जिन मनि तनि सचा भावदा से सची दरगह गवे ॥
जनु नानकु बोलै सचु नामु सचु सचा सदा नवे ॥21॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ जो मनुष्य सोए हुए भी सच्चे हरी को सिमरते हैं और उठ के भी उसी का नाम उचारते हैं। मानस जनम में ऐसे मनुष्य दुर्लभ ही मिलते हैं जो गुरू के सन्मुख रहके इस तरह सच्चे नाम का आनंद लेते हैं। मैं उनके सदके हूँ जो रोज (अर्थात हर समय) सच्चे प्रभू का नाम उच्चारते हैं। जिन मनुष्यों को मन से और तन से सच्चा प्रभू प्यारा लगता है (भाव। जिनको हरी की याद भी और हरी की कार भी प्यारी लगती है) वह सच्ची दरगाह में पहुँचते हैं। दास नानक भी उस हरी का नाम उचारता है। जो सदा स्थिर रहने वाला है (भाव। हर समय प्यारा लगने वाला है)। 21।
सलोकु मः 4 ॥
किआ सवणा किआ जागणा गुरमुखि ते परवाणु ॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 4 ॥ सोना क्या और जागना क्या, जो मनुष्य सतिगुरू के सन्मुख हैं उनके लिए ये दोनों हालात एक जैसे हैं – कि

गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।

इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “उसे ना इस लोक में ना ही परलोक में कहीं आसरा मिलता है – सब गुरसिखों ने मन में ये विचार की है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।