हरि तिन का दरसनु ना करहु जो दूजै भाइ चितु लाही ॥
धुरि करतै आपि लिखि पाइआ तिसु नालि किहु चारा नाही ॥
जन नानक नामु अराधि तू तिसु अपड़ि को न सकाही ॥
नावै की वडिआई वडी है नित सवाई चड़ै चड़ाही ॥2॥
जि होंदै गुरू बहि टिकिआ तिसु जन की वडिआई वडी होई ॥
तिसु कउ जगतु निविआ सभु पैरी पइआ जसु वरतिआ लोई ॥
तिस कउ खंड ब्रहमंड नमसकारु करहि जिस कै मसतकि हथु धरिआ गुरि पूरै सो पूरा होई ॥
गुर की वडिआई नित चड़ै सवाई अपड़ि को न सकोई ॥
जनु नानकु हरि करतै आपि बहि टिकिआ आपे पैज रखै प्रभु सोई ॥3॥
काइआ कोटु अपारु है अंदरि हटनाले ॥
गुरमुखि सउदा जो करे हरि वसतु समाले ॥
नामु निधानु हरि वणजीऐ हीरे परवाले ॥
विणु काइआ जि होर थै धनु खोजदे से मूड़ बेताले ॥
से उझड़ि भरमि भवाईअहि जिउ झाड़ मिरगु भाले ॥15॥
जो निंदा करे सतिगुर पूरे की सु अउखा जग महि होइआ ॥
नरक घोरु दुख खूहु है ओथै पकड़ि ओहु ढोइआ ॥
कूक पुकार को न सुणे ओहु अउखा होइ होइ रोइआ ॥
ओनि हलतु पलतु सभु गवाइआ लाहा मूलु सभु खोइआ ॥
ओहु तेली संदा बलदु करि नित भलके उठि प्रभि जोइआ ॥
हरि वेखै सुणै नित सभु किछु तिदू किछु गुझा न होइआ ॥
जैसा बीजे सो लुणै जेहा पुरबि किनै बोइआ ॥
जिसु क्रिपा करे प्रभु आपणी तिसु सतिगुर के चरण धोइआ ॥
गुर सतिगुर पिछै तरि गइआ जिउ लोहा काठ संगोइआ ॥
जन नानक नामु धिआइ तू जपि हरि हरि नामि सुखु होइआ ॥1॥
वडभागीआ सोहागणी जिना गुरमुखि मिलिआ हरि राइ ॥
अंतर जोति प्रगासीआ नानक नामि समाइ ॥2॥
इहु सरीरु सभु धरमु है जिसु अंदरि सचे की विचि जोति ॥
गुहज रतन विचि लुकि रहे कोई गुरमुखि सेवकु कढै खोति ॥
सभु आतम रामु पछाणिआ तां इकु रविआ इको ओति पोति ॥
इकु देखिआ इकु मंनिआ इको सुणिआ स्रवण सरोति ॥
गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “गुरू से टूटे हुए वे पहले ही कोढ़ी हैं।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।