सभि रस तिन कै रिदै हहि जिन हरि वसिआ मन माहि ॥
हरि दरगहि ते मुख उजले तिन कउ सभि देखण जाहि ॥
जिन निरभउ नामु धिआइआ तिन कउ भउ कोई नाहि ॥
हरि उतमु तिनी सरेविआ जिन कउ धुरि लिखिआ आहि ॥
ते हरि दरगहि पैनाईअहि जिन हरि वुठा मन माहि ॥
ओइ आपि तरे सभ कुटंब सिउ तिन पिछै सभु जगतु छडाहि ॥
जन नानक कउ हरि मेलि जन तिन वेखि वेखि हम जीवाहि ॥1॥
सा धरती भई हरीआवली जिथै मेरा सतिगुरु बैठा आइ ॥
से जंत भए हरीआवले जिनी मेरा सतिगुरु देखिआ जाइ ॥
धनु धंनु पिता धनु धंनु कुलु धनु धनु सु जननी जिनि गुरू जणिआ माइ ॥
धनु धंनु गुरू जिनि नामु अराधिआ आपि तरिआ जिनी डिठा तिना लए छडाइ ॥
हरि सतिगुरु मेलहु दइआ करि जनु नानकु धोवै पाइ ॥2॥
सचु सचा सतिगुरु अमरु है जिसु अंदरि हरि उरि धारिआ ॥
सचु सचा सतिगुरु पुरखु है जिनि कामु क्रोधु बिखु मारिआ ॥
जा डिठा पूरा सतिगुरू तां अंदरहु मनु साधारिआ ॥
बलिहारी गुर आपणे सदा सदा घुमि वारिआ ॥
गुरमुखि जिता मनमुखि हारिआ ॥17॥
करि किरपा सतिगुरु मेलिओनु मुखि गुरमुखि नामु धिआइसी ॥
सो करे जि सतिगुर भावसी गुरु पूरा घरी वसाइसी ॥
जिन अंदरि नामु निधानु है तिन का भउ सभु गवाइसी ॥
जिन रखण कउ हरि आपि होइ होर केती झखि झखि जाइसी ॥
जन नानक नामु धिआइ तू हरि हलति पलति छोडाइसी ॥1॥
गुरसिखा कै मनि भावदी गुर सतिगुर की वडिआई ॥
हरि राखहु पैज सतिगुरू की नित चड़ै सवाई ॥
गुर सतिगुर कै मनि पारब्रहमु है पारब्रहमु छडाई ॥
गुर सतिगुर ताणु दीबाणु हरि तिनि सभ आणि निवाई ॥
जिनी डिठा मेरा सतिगुरु भाउ करि तिन के सभि पाप गवाई ॥
हरि दरगह ते मुख उजले बहु सोभा पाई ॥
जनु नानकु मंगै धूड़ि तिन जो गुर के सिख मेरे भाई ॥2॥
हउ आखि सलाही सिफति सचु सचु सचे की वडिआई ॥
सालाही सचु सलाह सचु सचु कीमति किनै न पाई ॥
गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।
इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे दास नानक ! आप (भी इसी तरह) नाम की उस्तति कर।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।