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अंग 308

अंग
308
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
मः 4 ॥
जिन कउ आपि देइ वडिआई जगतु भी आपे आणि तिन कउ पैरी पाए ॥
डरीऐ तां जे किछु आप दू कीचै सभु करता आपणी कला वधाए ॥
देखहु भाई एहु अखाड़ा हरि प्रीतम सचे का जिनि आपणै जोरि सभि आणि निवाए ॥
आपणिआ भगता की रख करे हरि सुआमी निंदका दुसटा के मुह काले कराए ॥
सतिगुर की वडिआई नित चड़ै सवाई हरि कीरति भगति नित आपि कराए ॥
अनदिनु नामु जपहु गुरसिखहु हरि करता सतिगुरु घरी वसाए ॥
सतिगुर की बाणी सति सति करि जाणहु गुरसिखहु हरि करता आपि मुहहु कढाए ॥
गुरसिखा के मुह उजले करे हरि पिआरा गुर का जैकारु संसारि सभतु कराए ॥
जनु नानकु हरि का दासु है हरि दासन की हरि पैज रखाए ॥2॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: महला 4॥ जिनको प्रभू स्वयं आदर बख्शता है। उनके चरणों में सारे संसार को भी ला के डालता है; (इस वडिआई। आदर को देख के) तब डरें। अगर हम कुछ अपनी तरफ से करते हों। ये तो करतार अपनी कला आप बढ़ा रहा है। हे भाई ! याद रखो। जिस प्रभू ने अपने बल से सब जीवों को ला के (सतिगुरू के आगे) निवाया है। उस सच्चे प्रीतम का यह संसार (एक) अखाड़ा है। (जिस में) वह स्वामी प्रभू अपने भगतों की रक्षा करता है और निंदकों व दुष्टों के मुँह काले करवाता है। सतिगुरू की महिमा हमेशा बढ़ती है क्योंकि हरी अपनी कीर्ति और भगती सदैव स्वयं सतिगुरू से करवाता है। हे गुर-सिखो ! हर रोज़ (भाव। हर समय) नाम जपो (ता कि) सृजनहार हरी (ऐसा) सतिगुरू (आपके) हृदय में बसा दे। हे गुर-सिखो ! सतिगुरू की बाणी सत्य समझो (क्योंकि) सृजनहार प्रभू स्वयं यह बाणी सतिगुरू के मुँह से कहलवाता है। प्यारा हरी गुर-सिखों के मुँह उज्जवल करता है और संसार में हर तरफ सतिगुरू की जीत करवाता है। दास नानक भी प्रभू का सेवक है; प्रभू अपने दासों की लाज खुद रखता है। 2।
पउड़ी ॥
तू सचा साहिबु आपि है सचु साह हमारे ॥
सचु पूजी नामु द्रिड़ाइ प्रभ वणजारे थारे ॥
सचु सेवहि सचु वणंजि लैहि गुण कथह निरारे ॥
सेवक भाइ से जन मिले गुर सबदि सवारे ॥
तू सचा साहिबु अलखु है गुर सबदि लखारे ॥14॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे हमारे सदा स्थिर रहने वाले शाह ! आप खुद ही सच्चा मालिक है। हे प्रभू ! हम आपके वणजारे हैं। हमें यह निश्चय करा कि नाम की पूँजी सदा कायम रहने वाली है। सच्चे नाम का सौदा खरीदते हैं और निराले प्रभू के गुण उचारते हैं। वह मनुष्य सतिगुरू के शबद द्वारा सुधर के सेवक स्वभाव वाले हो के प्रभू को मिलते हैं जो सदा स्थिर नाम सिमरते हैं। हे हरी ! आप सच्चा मालिक है। आपको कोई समझ नहीं सकता (पर) सतिगुरू के शबद द्वारा आपकी सूझ पड़ती है। 14।
सलोक मः 4 ॥
जिसु अंदरि ताति पराई होवै तिस दा कदे न होवी भला ॥
ओस दै आखिऐ कोई न लगै नित ओजाड़ी पूकारे खला ॥
जिसु अंदरि चुगली चुगलो वजै कीता करतिआ ओस दा सभु गइआ ॥
नित चुगली करे अणहोदी पराई मुहु कढि न सकै ओस दा काला भइआ ॥
करम धरती सरीरु कलिजुग विचि जेहा को बीजे तेहा को खाए ॥
गला उपरि तपावसु न होई विसु खाधी ततकाल मरि जाए ॥
भाई वेखहु निआउ सचु करते का जेहा कोई करे तेहा कोई पाए ॥
जन नानक कउ सभ सोझी पाई हरि दर कीआ बाता आखि सुणाए ॥1॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 4॥ जिसके हृदय में पराई ईरखा हो। उसका अपना भी कभी भला नहीं होता। उसके बचन पर कोई एतबार नहीं करता। वह सदा (जैसे) उजाड़ में खड़ा चिल्लाता है। जिस मनुष्य के हृदय में चुगली होती है वह चुग़ल (के नाम से) ही मशहूर हो जाता है। उसकी (पिछली) सारी की हुई कमाई व्यर्थ जाती है। वह सदा पराई झूठी चुग़ली करता है। इस मुकालख़ करके वह किसी के माथे भी नहीं लग सकता (उसका मुँह काला हो जाता है और दिखा नहीं सकता)। इस मानस जनम में शरीर कर्म- (रूपी बीज बीजने के लिए) जमीन है। इस में जिस तरह का बीज मनुष्य बीजता है। उसी तरह का फल खाता है (किए कर्मों का निबेड़ा बातों से नहीं होता) अगर विष खाया जाय तो (अमृत की बातें करने से मनुष्य बच नहीं सकता) तुरंत मर जाता है। हे भाई ! सच्चे प्रभू का न्याय देखो। जिस तरह के कोई काम करता है। वैसा उसका फल पा लेता है। हे नानक ! जिस दास को प्रभू ये समझने की सारी बुद्धि बख्शता है। वह प्रभू के दर की ये बातें कर के सुनाता है। 1।
मः 4 ॥
होदै परतखि गुरू जो विछुड़े तिन कउ दरि ढोई नाही ॥
कोई जाइ मिलै तिन निंदका मुह फिके थुक थुक मुहि पाही ॥
जो सतिगुरि फिटके से सभ जगति फिटके नित भंभल भूसे खाही ॥
जिन गुरु गोपिआ आपणा से लैदे ढहा फिराही ॥
तिन की भुख कदे न उतरै नित भुखा भुख कूकाही ॥
ओना दा आखिआ को ना सुणै नित हउले हउलि मराही ॥
सतिगुर की वडिआई वेखि न सकनी ओना अगै पिछै थाउ नाही ॥
जो सतिगुरि मारे तिन जाइ मिलहि रहदी खुहदी सभ पति गवाही ॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: महला 4॥ सतिगुरू के प्रत्यक्ष होते हुए भी जो निंदक (गुरू से) विछुड़े रहते हैं। उन्हें दरगाह में आसरा नहीं मिलता। यदि कोई उनका संग भी करता है उसका भी मुँह फीका और मुँह पर निरी थूक पड़ती है (भाव। लोग मुँह पर धिक्कारते हैं) (क्योंकि) जो मनुष्य गुरू से विछुड़े हुए हैं। वह संसार में भी तिरस्कारे हुए हैं और सदा भंभलभूसे में डाँवा-डोल रहते हैं। जो मनुष्य प्यारे सतिगुरू की निंदा करते हैं। वह सदा (जैसे) ढाहें मारते फिरते हैं। उनकी तृष्णा कभी नहीं उतरती। और सदा भूख-भूख करते कूकते हैं। कोई उनकी बात का एतबार नहीं करता (इस कारण) वह सदा चिंता फिक्र में ही खपते हैं। जो मनुष्य सतिगुरू की महिमा बर्दाश्त नहीं कर सकते। उनको लोक-परलोक में ठिकाना नहीं मिलता। गुरू से जो विछुड़े हैं। उनसे मनुष्य जा मिलते हैं। वे भी अपनी छोटी-मोटी इज्जत गवा लेते हैं (क्योंकि)

गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “महला 4॥ जिनको प्रभू स्वयं आदर बख्शता है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।