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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 308 · गउड़ी

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अंग
308
गउड़ी
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  1. जिन कउ आपि देइ वडिआई जगतु भी आपे आणि तिन कउ पैरी पाए ॥
  2. तू सचा साहिबु आपि है सचु साह हमारे ॥
  3. जिसु अंदरि ताति पराई होवै तिस दा कदे न होवी भला ॥
  4. होदै परतखि गुरू जो विछुड़े तिन कउ दरि ढोई नाही ॥

गुरु राम दास जी · गउड़ी की वार, सलोक · राग गउड़ी

जिन कउ आपि देइ वडिआई जगतु भी आपे आणि तिन कउ पैरी पाए ॥

मः 4 ॥
जिन कउ आपि देइ वडिआई जगतु भी आपे आणि तिन कउ पैरी पाए ॥
डरीऐ तां जे किछु आप दू कीचै सभु करता आपणी कला वधाए ॥
देखहु भाई एहु अखाड़ा हरि प्रीतम सचे का जिनि आपणै जोरि सभि आणि निवाए ॥
आपणिआ भगता की रख करे हरि सुआमी निंदका दुसटा के मुह काले कराए ॥
सतिगुर की वडिआई नित चड़ै सवाई हरि कीरति भगति नित आपि कराए ॥
अनदिनु नामु जपहु गुरसिखहु हरि करता सतिगुरु घरी वसाए ॥
सतिगुर की बाणी सति सति करि जाणहु गुरसिखहु हरि करता आपि मुहहु कढाए ॥
गुरसिखा के मुह उजले करे हरि पिआरा गुर का जैकारु संसारि सभतु कराए ॥
जनु नानकु हरि का दासु है हरि दासन की हरि पैज रखाए ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 4॥ जिनको प्रभू स्वयं आदर बख्शता है। उनके चरणों में सारे संसार को भी ला के डालता है; (इस वडिआई। आदर को देख के) तब डरें। अगर हम कुछ अपनी तरफ से करते हों। ये तो करतार अपनी कला आप बढ़ा रहा है। हे भाई! याद रखें। जिस प्रभू ने अपने बल से सब जीवों को ला के (सतिगुरू के आगे) निवाया है। उस सच्चे प्रीतम का यह संसार (एक) अखाड़ा है। (जिस में) वह स्वामी प्रभू अपने भगतों की रक्षा करता है और निंदकों व दुष्टों के मुँह काले करवाता है। सतिगुरू की महिमा हमेशा बढ़ती है क्योंकि हरी अपनी कीर्ति और भगती सदैव स्वयं सतिगुरू से करवाता है। हे गुर-सिखो! हर रोज़ (भाव, हर समय) नाम जपें (ता कि) सृजनहार हरी (ऐसा) सतिगुरू (आपके) हृदय में बसा दे। हे गुर-सिखो! सतिगुरू की बाणी सत्य समझें (क्योंकि) सृजनहार प्रभू स्वयं यह बाणी सतिगुरू के मुँह से कहलवाता है। प्यारा हरी गुर-सिखों के मुँह उज्जवल करता है और संसार में हर तरफ सतिगुरू की जीत करवाता है। दास नानक भी प्रभू का सेवक है; प्रभू अपने दासों की लाज खुद रखता है। 2।

गुरु राम दास जी · गउड़ी की वार, पउड़ी · राग गउड़ी

तू सचा साहिबु आपि है सचु साह हमारे ॥

पउड़ी ॥
तू सचा साहिबु आपि है सचु साह हमारे ॥
सचु पूजी नामु द्रिड़ाइ प्रभ वणजारे थारे ॥
सचु सेवहि सचु वणंजि लैहि गुण कथह निरारे ॥
सेवक भाइ से जन मिले गुर सबदि सवारे ॥
तू सचा साहिबु अलखु है गुर सबदि लखारे ॥14॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे हमारे सदा स्थिर रहने वाले शाह! आप खुद ही सच्चे मालिक हैं। हे प्रभू! हम आपके वणजारे हैं। हमें यह निश्चय करा कि नाम की पूँजी सदा कायम रहने वाली है। सच्चे नाम का सौदा खरीदते हैं और निराले प्रभू के गुण उचारते हैं। वह मनुष्य सतिगुरू के शबद द्वारा सुधर के सेवक स्वभाव वाले हो के प्रभू को मिलते हैं जो सदा स्थिर नाम सिमरते हैं। हे हरी! आप सच्चे मालिक हैं। आपको कोई समझ नहीं सकता (पर) सतिगुरू के शबद द्वारा आपकी सूझ पड़ती है। 14।

गुरु राम दास जी · गउड़ी की वार, सलोक · राग गउड़ी

जिसु अंदरि ताति पराई होवै तिस दा कदे न होवी भला ॥

सलोक मः 4 ॥
जिसु अंदरि ताति पराई होवै तिस दा कदे न होवी भला ॥
ओस दै आखिऐ कोई न लगै नित ओजाड़ी पूकारे खला ॥
जिसु अंदरि चुगली चुगलो वजै कीता करतिआ ओस दा सभु गइआ ॥
नित चुगली करे अणहोदी पराई मुहु कढि न सकै ओस दा काला भइआ ॥
करम धरती सरीरु कलिजुग विचि जेहा को बीजे तेहा को खाए ॥
गला उपरि तपावसु न होई विसु खाधी ततकाल मरि जाए ॥
भाई वेखहु निआउ सचु करते का जेहा कोई करे तेहा कोई पाए ॥
जन नानक कउ सभ सोझी पाई हरि दर कीआ बाता आखि सुणाए ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 4॥ जिसके हृदय में पराई ईरखा हो। उसका अपना भी कभी भला नहीं होता। उसके बचन पर कोई एतबार नहीं करता। वह सदा (जैसे) उजाड़ में खड़ा चिल्लाता है। जिस मनुष्य के हृदय में चुगली होती है वह चुग़ल (के नाम से) ही मशहूर हो जाता है। उसकी (पिछली) सारी की हुई कमाई व्यर्थ जाती है। वह सदा पराई झूठी चुग़ली करता है। इस मुकालख़ करके वह किसी के माथे भी नहीं लग सकता (उसका मुँह काला हो जाता है और दिखा नहीं सकता)। इस मानस जनम में शरीर कर्म, (रूपी बीज बीजने के लिए) जमीन है। इस में जिस तरह का बीज मनुष्य बीजता है। उसी तरह का फल खाता है (किए कर्मों का निबेड़ा बातों से नहीं होता) अगर विष खाया जाय तो (अमृत की बातें करने से मनुष्य बच नहीं सकता) तुरंत मर जाता है। हे भाई! सच्चे प्रभू का न्याय देखें। जिस तरह के कोई काम करता है। वैसा उसका फल पा लेता है। हे नानक! जिस दास को प्रभू ये समझने की सारी बुद्धि बख्शता है। वह प्रभू के दर की ये बातें कर के सुनाता है। 1।

गुरु राम दास जी · गउड़ी की वार, सलोक · राग गउड़ी

होदै परतखि गुरू जो विछुड़े तिन कउ दरि ढोई नाही ॥

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मः 4 ॥
होदै परतखि गुरू जो विछुड़े तिन कउ दरि ढोई नाही ॥
कोई जाइ मिलै तिन निंदका मुह फिके थुक थुक मुहि पाही ॥
जो सतिगुरि फिटके से सभ जगति फिटके नित भंभल भूसे खाही ॥
जिन गुरु गोपिआ आपणा से लैदे ढहा फिराही ॥
तिन की भुख कदे न उतरै नित भुखा भुख कूकाही ॥
ओना दा आखिआ को ना सुणै नित हउले हउलि मराही ॥
सतिगुर की वडिआई वेखि न सकनी ओना अगै पिछै थाउ नाही ॥
जो सतिगुरि मारे तिन जाइ मिलहि रहदी खुहदी सभ पति गवाही ॥

हिन्दी अर्थ: महला 4॥ सतिगुरू के प्रत्यक्ष होते हुए भी जो निंदक (गुरू से) विछुड़े रहते हैं। उन्हें दरगाह में आसरा नहीं मिलता। यदि कोई उनका संग भी करता है उसका भी मुँह फीका और मुँह पर निरी थूक पड़ती है (भाव, लोग मुँह पर धिक्कारते हैं) (क्योंकि) जो मनुष्य गुरू से विछुड़े हुए हैं। वह संसार में भी तिरस्कारे हुए हैं और सदा भंभलभूसे में डाँवा-डोल रहते हैं। जो मनुष्य प्यारे सतिगुरू की निंदा करते हैं। वह सदा (जैसे) ढाहें मारते फिरते हैं। उनकी तृष्णा कभी नहीं उतरती। और सदा भूख-भूख करते कूकते हैं। कोई उनकी बात का एतबार नहीं करता (इस कारण) वह सदा चिंता फिक्र में ही खपते हैं। जो मनुष्य सतिगुरू की महिमा बर्दाश्त नहीं कर सकते। उनको लोक-परलोक में ठिकाना नहीं मिलता। गुरू से जो विछुड़े हैं। उनसे मनुष्य जा मिलते हैं। वे भी अपनी छोटी-मोटी इज्जत गवा लेते हैं (क्योंकि)

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 4: गुरु राम दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 308 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।