जिन कउ आपि देइ वडिआई जगतु भी आपे आणि तिन कउ पैरी पाए ॥
डरीऐ तां जे किछु आप दू कीचै सभु करता आपणी कला वधाए ॥
देखहु भाई एहु अखाड़ा हरि प्रीतम सचे का जिनि आपणै जोरि सभि आणि निवाए ॥
आपणिआ भगता की रख करे हरि सुआमी निंदका दुसटा के मुह काले कराए ॥
सतिगुर की वडिआई नित चड़ै सवाई हरि कीरति भगति नित आपि कराए ॥
अनदिनु नामु जपहु गुरसिखहु हरि करता सतिगुरु घरी वसाए ॥
सतिगुर की बाणी सति सति करि जाणहु गुरसिखहु हरि करता आपि मुहहु कढाए ॥
गुरसिखा के मुह उजले करे हरि पिआरा गुर का जैकारु संसारि सभतु कराए ॥
जनु नानकु हरि का दासु है हरि दासन की हरि पैज रखाए ॥2॥
तू सचा साहिबु आपि है सचु साह हमारे ॥
सचु पूजी नामु द्रिड़ाइ प्रभ वणजारे थारे ॥
सचु सेवहि सचु वणंजि लैहि गुण कथह निरारे ॥
सेवक भाइ से जन मिले गुर सबदि सवारे ॥
तू सचा साहिबु अलखु है गुर सबदि लखारे ॥14॥
जिसु अंदरि ताति पराई होवै तिस दा कदे न होवी भला ॥
ओस दै आखिऐ कोई न लगै नित ओजाड़ी पूकारे खला ॥
जिसु अंदरि चुगली चुगलो वजै कीता करतिआ ओस दा सभु गइआ ॥
नित चुगली करे अणहोदी पराई मुहु कढि न सकै ओस दा काला भइआ ॥
करम धरती सरीरु कलिजुग विचि जेहा को बीजे तेहा को खाए ॥
गला उपरि तपावसु न होई विसु खाधी ततकाल मरि जाए ॥
भाई वेखहु निआउ सचु करते का जेहा कोई करे तेहा कोई पाए ॥
जन नानक कउ सभ सोझी पाई हरि दर कीआ बाता आखि सुणाए ॥1॥
होदै परतखि गुरू जो विछुड़े तिन कउ दरि ढोई नाही ॥
कोई जाइ मिलै तिन निंदका मुह फिके थुक थुक मुहि पाही ॥
जो सतिगुरि फिटके से सभ जगति फिटके नित भंभल भूसे खाही ॥
जिन गुरु गोपिआ आपणा से लैदे ढहा फिराही ॥
तिन की भुख कदे न उतरै नित भुखा भुख कूकाही ॥
ओना दा आखिआ को ना सुणै नित हउले हउलि मराही ॥
सतिगुर की वडिआई वेखि न सकनी ओना अगै पिछै थाउ नाही ॥
जो सतिगुरि मारे तिन जाइ मिलहि रहदी खुहदी सभ पति गवाही ॥
गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “महला 4॥ जिनको प्रभू स्वयं आदर बख्शता है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।