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अंग 307

अंग
307
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
अंतरि हरि गुरू धिआइदा वडी वडिआई ॥
तुसि दिती पूरै सतिगुरू घटै नाही इकु तिलु किसै दी घटाई ॥
सचु साहिबु सतिगुरू कै वलि है तां झखि झखि मरै सभ लोुकाई ॥
निंदका के मुह काले करे हरि करतै आपि वधाई ॥
जिउ जिउ निंदक निंद करहि तिउ तिउ नित नित चड़ै सवाई ॥
जन नानक हरि आराधिआ तिनि पैरी आणि सभ पाई ॥1॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: सतिगुरू की वडिआई बड़ी है (महिमा अपार है) (क्योंकि वह) हरी को हृदय में सिमरता है; पूरे प्रभू ने सतिगुरू को प्रसन्न हो के (इही वडिआई) बख्शी है (इस करके) किसी के घटाने से रक्ती भर भी नहीं घटती। जब सच्चा पति प्रभू सतिगुरू का अंग पालता है। तो सारी दुनिया (भले ही) पड़ी झक्खें मारे (सतिगुरू का कुछ बिगाड़ नहीं सकती); सतिगुरू की महिमा सृजनहार ने खुद बढ़ाई है और दोखियों के मुँह काले किए हैं। ज्यों-ज्यों निंदक मनुष्य। सतिगुरू की निंदा करते हैं। त्यों-त्यों सतिगुरू की महिमा बढ़ती है। हे दास नानक ! (सतिगुरू ने जिस) प्रभू का सिमरन किया है। उस (प्रभू) ने सारी सृष्टि ला के सतिगुरू के पैरों पर डाल दी है। 1।
मः 4 ॥
सतिगुर सेती गणत जि रखै हलतु पलतु सभु तिस का गइआ ॥
नित झहीआ पाए झगू सुटे झखदा झखदा झड़ि पइआ ॥
नित उपाव करै माइआ धन कारणि अगला धनु भी उडि गइआ ॥
किआ ओहु खटे किआ ओहु खावै जिसु अंदरि सहसा दुखु पइआ ॥
निरवैरै नालि जि वैरु रचाए सभु पापु जगतै का तिनि सिरि लइआ ॥
ओसु अगै पिछै ढोई नाही जिसु अंदरि निंदा मुहि अंबु पइआ ॥
जे सुइने नो ओहु हथु पाए ता खेहू सेती रलि गइआ ॥
जे गुर की सरणी फिरि ओहु आवै ता पिछले अउगण बखसि लइआ ॥
जन नानक अनदिनु नामु धिआइआ हरि सिमरत किलविख पाप गइआ ॥2॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: महला 4 ॥ जो मनुष्य सतिगुरू के साथ द्वैष रखता है। उसके लोक व परलोक समूचे ही व्यर्थ जाते हैं। (उसकी पेश तो चलती नहीं। इस करके वह) सदा दाँत पीसता है। झाग फेंकता है (और अंत को) खप-खप के नष्ट हो जाता है (आत्मिक मौत सहेड़ लेता है)। (सतिगुरू का वह दोखी) सदा माया के लिए उपाय करता है। पर उसका पहले का (कमाया हुआ) भी हाथों से जाता रहता है। जिस मनुष्य के हृदय में ये चिंता और जलन हो। उसने कमाना क्या और खाना क्या? (भाव। ना वह कुछ कमा सकता है ना ही कमाए हुए का आनंद ले सकता है)। जो मनुष्य निर्वैर के साथ वैर करता है वह सारे संसार के पापों (का भार) अपने सिर पर लेता है। उसे लोक-परलोक में कोई आसरा नहीं देता। जिसके हृदय में तो निंदा हो। पर मुँह में आम पड़ा हो (अर्थात। जो मुँह से मीठा बोले)। ऐसा खोटा मनुष्य अगर सोने को हाथ डाले तो वह भी राख में मिल जाता है। फिर भी (अर्थात ऐसा पापी होते हुए भी) अगर वह सतिगुरू के चरणों में गिर पड़े तो सतिगुरू उसके पिछले अवगुणों को बख्श देता है। हे नानक ! जो मनुष्य (सतिगुरू की शरण पड़ कर) हर रोज नाम जपता है। प्रभू को सिमरते हुए उसके सारे पाप दूर हो जाते हैं। 2।
पउड़ी ॥
तूहै सचा सचु तू सभ दू उपरि तू दीबाणु ॥
जो तुधु सचु धिआइदे सचु सेवनि सचे तेरा माणु ॥
ओना अंदरि सचु मुख उजले सचु बोलनि सचे तेरा ताणु ॥
से भगत जिनी गुरमुखि सालाहिआ सचु सबदु नीसाणु ॥
सचु जि सचे सेवदे तिन वारी सद कुरबाणु ॥13॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे सच्चे प्रभू ! आप ही सबसे बड़ा (जीवों का) आसरा है। जो आपका सिमरन करते हैं। आपकी सेवा करते हैं। उनको आपका ही मान है। उनके हृदय में सच है (इस करके उनके) माथे खिले रहते हैं। और। हे सच्चे हरी ! वह आपका सदा स्थिर रहने वाला नाम उचारते हैं। और आपका उन्हें भरोसा है (ताण है)। जो मनुष्य सतिगुरू के सन्मुख रहके हरी की सिफत-सालाह करते हैं। वही सच्चे भक्त हैं और उनके पास सच्चा शबद-रूप निशान है। मैं सदके हूँ कुर्बान हूँ उन पर से जो सच्चे प्रभू को तन से-मन से सिमरते हैं। 13।
सलोक मः 4 ॥
धुरि मारे पूरै सतिगुरू सेई हुणि सतिगुरि मारे ॥
जे मेलण नो बहुतेरा लोचीऐ न देई मिलण करतारे ॥
सतसंगति ढोई ना लहनि विचि संगति गुरि वीचारे ॥
कोई जाइ मिलै हुणि ओना नो तिसु मारे जमु जंदारे ॥
गुरि बाबै फिटके से फिटे गुरि अंगदि कीते कूड़िआरे ॥
गुरि तीजी पीड़ी वीचारिआ किआ हथि एना वेचारे ॥
गुरु चउथी पीड़ी टिकिआ तिनि निंदक दुसट सभि तारे ॥
कोई पुतु सिखु सेवा करे सतिगुरू की तिसु कारज सभि सवारे ॥
जो इछै सो फलु पाइसी पुतु धनु लखमी खड़ि मेले हरि निसतारे ॥
सभि निधान सतिगुरू विचि जिसु अंदरि हरि उर धारे ॥
सो पाए पूरा सतिगुरू जिसु लिखिआ लिखतु लिलारे ॥
जनु नानकु मागै धूड़ि तिन जो गुरसिख मित पिआरे ॥1॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 4॥ जो पहले से पूरे सतिगुरू ने धिक्कारे हैं। वह अब (फिर) सतिगुरू की ओर से मारे गए हैं (भाव। सतिगुरू की ओर से मनमुख हुए पड़े हैं)। अगर उन्हें (सतिगुरू से) मिलाने के लिए बहुत सारी चाहत (कोशिश) भी करें (तो भी) सृजनहार उन्हें मिलने नहीं देता। उन्हें सत्संग में भी राहत (जगह) नहीं मिलती – गुरू ने भी संगति में यही विचार की है। ऐसे वक्त पर अगर कोई उनका जा के साथी बने। उसे भी जमदूत दण्ड देता है (वह मनुष्य भी मन-मुखता वाले काम ही करेगा। जिस करके जम-मार्ग का भागी बनेगा)। जिन मनुष्यों को बाबे (गुरू नानक देव जी) ने मनमुख करार दिया। उन अहंकारियों को गुरू अंगद (देव जी) ने भी झूठा बताया। तीसरे स्थान पर बैठे गुरू ने विचार की कि इन कंगालों के क्या वश? जिसने चौथे स्थान पर बैठे को गुरू स्थापित किया, सो उस ने सारे निंदक और दुष्ट तार दिए (भाव। अहंकार और तिरस्कार से बचा लिए)। पुत्र हो या सिख। जो कोई (भी) सतिगुरू की सेवा करता है सतिगुरू उासके सारे काम सवारता है – पुत्र। धन। लक्ष्मी। जिस भी चीज की वह इच्छा करे। वही फल उसे मिलता है। (सतिगुरू) उसको ले जा के (प्रभू से) मिलाता है और प्रभू (उसको) पार उतारता है। (सिरे की बात)। जिस सतिगुरू के हृदय में प्रभू टिका हुआ है। उस में सारे खजाने हैं। जिस (मनुष्य) के माथे पर (पिछले किए अच्छे कर्मों के संस्कार रूपी) लेख लिखे हुए हैं। वह पूरे सतिगुरू को मिल जाता है। (इस तरह के) जो मित्र-प्यारे गुरू के सिख हैं। उनके चरणों की धूड़ दास नानक (भी) मांगता है। 1।

गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सतिगुरू की वडिआई बड़ी है (महिमा अपार है) (क्योंकि वह) हरी को हृदय में सिमरता है; पूरे प्रभू ने सतिगुरू को प्रसन्न हो के (इही वडिआई) बख्शी है (इस करके) किसी के घटाने से रक्ती भर भी ।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।