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अंग 306

अंग
306
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जिस नो दइआलु होवै मेरा सुआमी तिसु गुरसिख गुरू उपदेसु सुणावै ॥
जनु नानकु धूड़ि मंगै तिसु गुरसिख की जो आपि जपै अवरह नामु जपावै ॥2॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: जिस पर प्यारा प्रभू दयाल होता है। उस गुरसिख को सतिगुरू शिक्षा देता है। दास नानक (भी) उस गुरसिख की चरणधूड़ मांगता है जो आप नाम जपता है व औरों को जपाता है। 2।
पउड़ी ॥
जो तुधु सचु धिआइदे से विरले थोड़े ॥
जो मनि चिति इकु अराधदे तिन की बरकति खाहि असंख करोड़े ॥
तुधुनो सभ धिआइदी से थाइ पए जो साहिब लोड़े ॥
जो बिनु सतिगुर सेवे खादे पैनदे से मुए मरि जंमे कोड़्हे ॥
ओइ हाजरु मिठा बोलदे बाहरि विसु कढहि मुखि घोले ॥
मनि खोटे दयि विछोड़े ॥11॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ हे सच्चे प्रभू ! वह बहुत थोड़े जीव हैं। जो (एकाग्रचित्त हो के) आपका नाम सिमरते हैं। पूर्ण एकाग्रता में जो मनुष्य ‘एक’ की आराधना करते हैं। उनकी कमाई बेअंत जीव खाते हैं। हे हरी ! (वैसे तो) सारी सृष्टि आपका ध्यान धरती है। पर परवान वे होते हैं जिनको आप मालिक पसंद करता है। सतिगुरू की सेवा से वंचित रहके जो मनुष्य खाने-पीने और पहनने के रसों में लगे हुए हैं। वे कोहड़ी बार-बार पैदा होते हैं। ऐसे मनुष्य सामने (तो) मीठी बातें करते हैं (पर) पीछे से मुँह में से विष घोल के निकालते हैं (अर्थात। जी भर के निंदा करते हैं)। ऐसे मन के खोटों को प्रभू पति ने (अपने आप से) विछोड़ दिया है।
सलोक मः 4 ॥
मलु जूई भरिआ नीला काला खिधोलड़ा तिनि वेमुखि वेमुखै नो पाइआ ॥
पासि न देई कोई बहणि जगत महि गूह पड़ि सगवी मलु लाइ मनमुखु आइआ ॥
पराई जो निंदा चुगली नो वेमुखु करि कै भेजिआ ओथै भी मुहु काला दुहा वेमुखा दा कराइआ ॥
तड़ सुणिआ सभतु जगत विचि भाई वेमुखु सणै नफरै पउली पउदी फावा होइ कै उठि घरि आइआ ॥
अगै संगती कुड़मी वेमुखु रलणा न मिलै ता वहुटी भतीजंी फिरि आणि घरि पाइआ ॥
हलतु पलतु दोवै गए नित भुखा कूके तिहाइआ ॥
धनु धनु सुआमी करता पुरखु है जिनि निआउ सचु बहि आपि कराइआ ॥
जो निंदा करे सतिगुर पूरे की सो साचै मारि पचाइआ ॥
एहु अखरु तिनि आखिआ जिनि जगतु सभु उपाइआ ॥1॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 4॥ मैल और जूओं से भरा हुआ नीला और काला जुल्ला उस बे-मुख ने बेमुख को डाल दिया। संसार में उसे कोई पास बैठने नहीं देता। गंद पड़ के बल्कि ज्यादा मैल लगा के मनमुख (वापस) आया। जो मनमुख पराई निंदा व चुगली करने के लिए (सलाह) करके भेजा गया था। वहाँ भी दोनों का मुँह काला किया गया। संसार में हर तरफ तुरंत सुना गया है कि हे भाई ! बेमुख को नौकर समेत जूतियां पड़ीं और खासा हल्का हो के घर को आ गया है। आगे संगतों व कुड़मों (भाव। साक-संबधियों) में बेमुख को बैठना ना मिले। तो फिर पत्नी और भतीजों ने ला के घर में ठिकाना दिया। उसके लोक-परलोक दोनों व्यर्थ गए और (अब) भूखा और प्यासा पुकारता है। धन्य सृजनहार मालिक है जिसने खुद ध्यान से सच्चा न्याय कराया है। (कि) जो मनुष्य पूरे सतिगुरू की निंदा करता है। सच्चा प्रभू उस को खुद (आत्मिक मौत) मार के दुखी करता है, (ये) न्याय के वचन उस प्रभू ने खुद कहे हैं जिस ने सारा संसार पैदा किया है। 1।
मः 4 ॥
साहिबु जिस का नंगा भुखा होवै तिस दा नफरु किथहु रजि खाए ॥
जि साहिब कै घरि वथु होवै सु नफरै हथि आवै अणहोदी किथहु पाए ॥
जिस दी सेवा कीती फिरि लेखा मंगीऐ सा सेवा अउखी होई ॥
नानक सेवा करहु हरि गुर सफल दरसन की फिरि लेखा मंगै न कोई ॥2॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: महला 4 ॥ जिस नौकर का मालिक कंगाल हो। उसके नौकर ने कहाँ से पेट भर के खाना हुआ? नौकर को वही वस्तु मिल सकती है जो मलिक के घर में हो। अगर घर में ही ना हो तो उसे कहाँ से मिले जिसकी सेवा करने से फिर भी लेखा मांगा जाना हो। वह सेवा मुश्किल है (भाव-उसके करने का क्या लाभ है?) हे नानक ! जिस हरी और सतिगुरू के दर्शन (मनुष्य के जनम को) सफल करते हैं। उनकी सेवा करो (ता कि) फिर कोई लेखा ना मांगे। 2।
पउड़ी ॥
नानक वीचारहि संत जन चारि वेद कहंदे ॥
भगत मुखै ते बोलदे से वचन होवंदे ॥
प्रगट पहारा जापदा सभि लोक सुणंदे ॥
सुखु न पाइनि मुगध नर संत नालि खहंदे ॥
ओइ लोचनि ओना गुणै नो ओइ अहंकारि सड़ंदे ॥
ओइ विचारे किआ करहि जा भाग धुरि मंदे ॥
जो मारे तिनि पारब्रहमि से किसै न संदे ॥
वैरु करहि निरवैर नालि धरम निआइ पचंदे ॥
जो जो संति सरापिआ से फिरहि भवंदे ॥
पेडु मुंढाहूं कटिआ तिसु डाल सुकंदे ॥12॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ हे नानक ! संत (अपने) विचार बताते हैं और चारों वेद (भाव-पुरातन धर्म-पुस्तकें भी यही बात) कहते हैं (कि) भक्तजन जो वचन मुँह से बोलते हैं वह सही होते हैं। (भगत) सारे जगत में मशहूर हो जाते हैं। उनकी शोभा सारे लोग सुनते हैं। जो मूर्ख मनुष्य (ऐसे) संतों से वैर करते हैं वह सुख नहीं पाते। (वह दोखी) जलते तो अहंकार में हैं। पर संतजनों के गुणों को तरसते हैं। इन दोखी मनुष्यों के वश में भी क्या है? शुरू से (बुरे कर्म करने के कारण) बुरे संस्कार ही उनका भाग्य है (और इन संस्कारों से प्रेरित हो के गलत रास्ते पर पड़े रहते हैं)। जो मनुष्य ईश्वर की तरफ से मरे हुए हैं। वह किसी के (सगे) नहीं। निर्वैरों के साथ भी वैर करते हैं और परमात्मा व धर्म-न्याय के अनुसार दुखी होते हैं। जो जो मनुष्य संत (गुरू) की ओर से धिक्कारे हुए हैं (भाव। गुरू के दर से वंचित हैं) वह भटकते फिरते हैं। जो वृक्ष जड़ से उखड़ जाए। उसकी टहनियां भी सूख जाती हैं। 12।
सलोक मः 4 ॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: सलोक मः 4 ॥

गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जिस पर प्यारा प्रभू दयाल होता है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।