जनु नानकु धूड़ि मंगै तिसु गुरसिख की जो आपि जपै अवरह नामु जपावै ॥2॥
जो तुधु सचु धिआइदे से विरले थोड़े ॥
जो मनि चिति इकु अराधदे तिन की बरकति खाहि असंख करोड़े ॥
तुधुनो सभ धिआइदी से थाइ पए जो साहिब लोड़े ॥
जो बिनु सतिगुर सेवे खादे पैनदे से मुए मरि जंमे कोड़्हे ॥
ओइ हाजरु मिठा बोलदे बाहरि विसु कढहि मुखि घोले ॥
मनि खोटे दयि विछोड़े ॥11॥
मलु जूई भरिआ नीला काला खिधोलड़ा तिनि वेमुखि वेमुखै नो पाइआ ॥
पासि न देई कोई बहणि जगत महि गूह पड़ि सगवी मलु लाइ मनमुखु आइआ ॥
पराई जो निंदा चुगली नो वेमुखु करि कै भेजिआ ओथै भी मुहु काला दुहा वेमुखा दा कराइआ ॥
तड़ सुणिआ सभतु जगत विचि भाई वेमुखु सणै नफरै पउली पउदी फावा होइ कै उठि घरि आइआ ॥
अगै संगती कुड़मी वेमुखु रलणा न मिलै ता वहुटी भतीजंी फिरि आणि घरि पाइआ ॥
हलतु पलतु दोवै गए नित भुखा कूके तिहाइआ ॥
धनु धनु सुआमी करता पुरखु है जिनि निआउ सचु बहि आपि कराइआ ॥
जो निंदा करे सतिगुर पूरे की सो साचै मारि पचाइआ ॥
एहु अखरु तिनि आखिआ जिनि जगतु सभु उपाइआ ॥1॥
साहिबु जिस का नंगा भुखा होवै तिस दा नफरु किथहु रजि खाए ॥
जि साहिब कै घरि वथु होवै सु नफरै हथि आवै अणहोदी किथहु पाए ॥
जिस दी सेवा कीती फिरि लेखा मंगीऐ सा सेवा अउखी होई ॥
नानक सेवा करहु हरि गुर सफल दरसन की फिरि लेखा मंगै न कोई ॥2॥
नानक वीचारहि संत जन चारि वेद कहंदे ॥
भगत मुखै ते बोलदे से वचन होवंदे ॥
प्रगट पहारा जापदा सभि लोक सुणंदे ॥
सुखु न पाइनि मुगध नर संत नालि खहंदे ॥
ओइ लोचनि ओना गुणै नो ओइ अहंकारि सड़ंदे ॥
ओइ विचारे किआ करहि जा भाग धुरि मंदे ॥
जो मारे तिनि पारब्रहमि से किसै न संदे ॥
वैरु करहि निरवैर नालि धरम निआइ पचंदे ॥
जो जो संति सरापिआ से फिरहि भवंदे ॥
पेडु मुंढाहूं कटिआ तिसु डाल सुकंदे ॥12॥
गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जिस पर प्यारा प्रभू दयाल होता है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।