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अंग 305

अंग
305
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सचिआर सिख बहि सतिगुर पासि घालनि कूड़िआर न लभनी कितै थाइ भाले ॥
जिना सतिगुर का आखिआ सुखावै नाही तिना मुह भलेरे फिरहि दयि गाले ॥
जिन अंदरि प्रीति नही हरि केरी से किचरकु वेराईअनि मनमुख बेताले ॥
सतिगुर नो मिलै सु आपणा मनु थाइ रखै ओहु आपि वरतै आपणी वथु नाले ॥
जन नानक इकना गुरु मेलि सुखु देवै इकि आपे वखि कढै ठगवाले ॥1॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: सत्य के व्यापारी सिख तो सतिगुरू के पास बैठ के (सेवा की) मेहनत करते हैं। पर वहाँ झूठ के व्यापारी ढूँढने से भी नहीं मिलते। जिन मनुष्यों को सतिगुरू के बचन अच्छे नहीं लगते उनके मुँह भ्रष्ट हुए हुये हैं। वे प्रभू पति द्वारा धिक्कारे फिरते हैं। जिनके हृदय में प्रभू का प्यार नहीं। उन्हें कब तक धीरज दिया जा सकता है?वह मन के मुरीद लोग भूतों की तरह ही भटकते हैं। जो मनुष्य सतिगुरू को मिलता है वह (एक तो) अपने मन को (विकारों से बचा के) ठिकाने रखता है। साथ ही अपनी वस्तु को वह स्वयं ही इस्तेमाल करता है (भाव। कामादिक वैरी उसके आनंद को खराब नहीं कर सकते)। (पर) हे दास नानक ! (जीव के हाथ में कुछ नहीं) एक को खुद हरी मिलाता है और सुख बख्शता है और एक ठॅगी करने वालों को अलग कर देता है (भाव। सतिगुरू मिलने नहीं देता)। 1।
मः 4 ॥
जिना अंदरि नामु निधानु हरि तिन के काज दयि आदे रासि ॥
तिन चूकी मुहताजी लोकन की हरि प्रभु अंगु करि बैठा पासि ॥
जां करता वलि ता सभु को वलि सभि दरसनु देखि करहि साबासि ॥
साहु पातिसाहु सभु हरि का कीआ सभि जन कउ आइ करहि रहरासि ॥
गुर पूरे की वडी वडिआई हरि वडा सेवि अतुलु सुखु पाइआ ॥
गुरि पूरै दानु दीआ हरि निहचलु नित बखसे चड़ै सवाइआ ॥
कोई निंदकु वडिआई देखि न सकै सो करतै आपि पचाइआ ॥
जनु नानकु गुण बोलै करते के भगता नो सदा रखदा आइआ ॥2॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: महला 4॥ जिनके हृदय में प्रभू नाम का खजाना है। पति प्रभू ने उनके काम खुद सफल कर दिए हैं; उन्हें लोगों की मुहताजी करने की जरूरत नहीं रहती (क्योंकि) प्रभू उनका पक्ष करके (सदा) उनके अंग-संग है। (मुहताजी तो कहीं रही। बल्कि) सब लोग उनका दर्शन करके उनकी उपमा करते हैं (क्योंकि) जब खुद सृजनहार उनका पक्ष करता है तो हर किसी ने पक्ष करना हुआ। (यहाँ तक कि) शाह-पातशाह भी सारे हरी के दास के आगे सिर निवाते हैं (क्योंकि वे भी तो) सारे प्रभू के ही बनाए हुए हैं (प्रभू के दास से आक़ी कैसे हो(यही) महान महिमा पूरे सतिगुरू की ही है (कि हरी के दास का शाहों-पातशाहों समेत लोग आदर करते हैं। और वह) बड़े हरी की सेवा करके अतुल्य सुख पाता है। पूरे सतिगुरू के द्वारा प्रभू ने (जो अपने नाम का) दान (अपने सेवक को) बख्शा है वह समाप्त नहीं होता। क्योंकि। प्रभू सदा बख्शिश किए जाता है और वह दान (दिनो-दिन) बढ़ता रहता है। जो कोई निंदक (ऐसे हरी के दास की) महिमा देख के बर्दाश्त नहीं कर सकता। उसे सृजनहार ने खुद (ईष्या की आग में) दुखी किया है। मैं दास नानक सृजनहार के गुण गाता हूँ। वह अपने भक्तों की सदा रक्षा करता आया है। 2।
पउड़ी ॥
तू साहिबु अगम दइआलु है वड दाता दाणा ॥
तुधु जेवडु मै होरु को दिसि ना आवई तूहैं सुघड़ु मेरै मनि भाणा ॥
मोहु कुटंबु दिसि आवदा सभु चलणहारा आवण जाणा ॥
जो बिनु सचे होरतु चितु लाइदे से कूड़िआर कूड़ा तिन माणा ॥
नानक सचु धिआइ तू बिनु सचे पचि पचि मुए अजाणा ॥10॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे प्रभू ! आप अपहुँच और दयालु मालिक है। बड़ा दाता और समझदार है; मुझे आपके जितना बड़ा और कोई दिखाई नहीं देता। आप ही सुजान मेरे मन में प्यारा लगा है। (जो) मोह (रूप) कुटंब दिखाई देता है सब विनाशवान है और (संसार में) पैदा होने मरने (का कारण बनता है)। (इस करके) सच्चे हरी के बिना जो मनुष्य किसी और के साथ मन जोड़ते हैं वे झूठ के व्यापारी हैं। और उनका (इस पर) मान झूठा है। हे नानक ! सच्चे प्रभू का सिमरन कर। (क्योंकि) सच्चे से टूटे हुए मूर्ख जीव दुखी हो के आत्मिक मौत लिए रहते हैं। 10।
सलोक मः 4 ॥
अगो दे सत भाउ न दिचै पिछो दे आखिआ कंमि न आवै ॥
अध विचि फिरै मनमुखु वेचारा गली किउ सुखु पावै ॥
जिसु अंदरि प्रीति नही सतिगुर की सु कूड़ी आवै कूड़ी जावै ॥
जे क्रिपा करे मेरा हरि प्रभु करता तां सतिगुरु पारब्रहमु नदरी आवै ॥
ता अपिउ पीवै सबदु गुर केरा सभु काड़ा अंदेसा भरमु चुकावै ॥
सदा अनंदि रहै दिनु राती जन नानक अनदिनु हरि गुण गावै ॥1॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 4॥ मन का मुरीद मनुष्य पहले तो (गुरू के बचनों को) आदर नहीं देता। बाद में उसके कहने का कोई लाभ नहीं होता। वह अभागा दुचित्तेपन में ही भटकता है (अगर श्रद्धा और प्यार ना हो तो) निरी बातें करके कैसे सुख मिल जाए? जिसके हृदय में सतिगुरू का प्यार नहीं वह लोकाचारी (गुरू के दर पर) आता जाता है (उसका आना-जाना लोक दिखावा ही है)। अगर मेरा सृजनहार प्रभू मेहर करे तो (उस मनुष्य को भी) दिखाई दे जाता है कि सतिगुरू पारब्रहम (का रूप है)। वह सतिगुरू का शबद-रूपी अमृत पीता है और चिंता-फिक्र व भटकना सब खत्म का लेता है। हे नानक ! जो मनुष्य हर रोज प्रभू के गुण गाता है वह दिन रात सदा सुख में रहता है। 1।
मः 4 ॥
गुर सतिगुर का जो सिखु अखाए सु भलके उठि हरि नामु धिआवै ॥
उदमु करे भलके परभाती इसनानु करे अंम्रित सरि नावै ॥
उपदेसि गुरू हरि हरि जपु जापै सभि किलविख पाप दोख लहि जावै ॥
फिरि चड़ै दिवसु गुरबाणी गावै बहदिआ उठदिआ हरि नामु धिआवै ॥
जो सासि गिरासि धिआए मेरा हरि हरि सो गुरसिखु गुरू मनि भावै ॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: महला 4॥ जो मनुष्य सतिगुरू का (सच्चा) सिख कहलवाता है (भाव। जिसको लोग सच्चा सिख कहते हैं) वह हर रोज सवेरे उठ के हरी-नाम का सिमरन करता है। हर रोज सवेरे उद्यम करता है। स्नान करता है (और फिर नाम रूपी) अमृत के सरोवर में डुबकी लगाता है। सतिगुरू के उपदेश द्वारा प्रभू के नाम का जाप जपता है और (इस तरह) उसके सारे पाप विकार उतर जाते हैं। फिर दिन चढ़ने पर सतिगुरू की बाणी का कीर्तन करता है और (दिन में) बैठते-उठते (भाव। काम-काज करते हुए) प्रभू का नाम सिमरता है। सतिगुरू के मन को वह सिख भाता है जो प्यारे प्रभू को हर दम याद करता है।

गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सत्य के व्यापारी सिख तो सतिगुरू के पास बैठ के (सेवा की) मेहनत करते हैं।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।