जिना सतिगुर का आखिआ सुखावै नाही तिना मुह भलेरे फिरहि दयि गाले ॥
जिन अंदरि प्रीति नही हरि केरी से किचरकु वेराईअनि मनमुख बेताले ॥
सतिगुर नो मिलै सु आपणा मनु थाइ रखै ओहु आपि वरतै आपणी वथु नाले ॥
जन नानक इकना गुरु मेलि सुखु देवै इकि आपे वखि कढै ठगवाले ॥1॥
जिना अंदरि नामु निधानु हरि तिन के काज दयि आदे रासि ॥
तिन चूकी मुहताजी लोकन की हरि प्रभु अंगु करि बैठा पासि ॥
जां करता वलि ता सभु को वलि सभि दरसनु देखि करहि साबासि ॥
साहु पातिसाहु सभु हरि का कीआ सभि जन कउ आइ करहि रहरासि ॥
गुर पूरे की वडी वडिआई हरि वडा सेवि अतुलु सुखु पाइआ ॥
गुरि पूरै दानु दीआ हरि निहचलु नित बखसे चड़ै सवाइआ ॥
कोई निंदकु वडिआई देखि न सकै सो करतै आपि पचाइआ ॥
जनु नानकु गुण बोलै करते के भगता नो सदा रखदा आइआ ॥2॥
तू साहिबु अगम दइआलु है वड दाता दाणा ॥
तुधु जेवडु मै होरु को दिसि ना आवई तूहैं सुघड़ु मेरै मनि भाणा ॥
मोहु कुटंबु दिसि आवदा सभु चलणहारा आवण जाणा ॥
जो बिनु सचे होरतु चितु लाइदे से कूड़िआर कूड़ा तिन माणा ॥
नानक सचु धिआइ तू बिनु सचे पचि पचि मुए अजाणा ॥10॥
अगो दे सत भाउ न दिचै पिछो दे आखिआ कंमि न आवै ॥
अध विचि फिरै मनमुखु वेचारा गली किउ सुखु पावै ॥
जिसु अंदरि प्रीति नही सतिगुर की सु कूड़ी आवै कूड़ी जावै ॥
जे क्रिपा करे मेरा हरि प्रभु करता तां सतिगुरु पारब्रहमु नदरी आवै ॥
ता अपिउ पीवै सबदु गुर केरा सभु काड़ा अंदेसा भरमु चुकावै ॥
सदा अनंदि रहै दिनु राती जन नानक अनदिनु हरि गुण गावै ॥1॥
गुर सतिगुर का जो सिखु अखाए सु भलके उठि हरि नामु धिआवै ॥
उदमु करे भलके परभाती इसनानु करे अंम्रित सरि नावै ॥
उपदेसि गुरू हरि हरि जपु जापै सभि किलविख पाप दोख लहि जावै ॥
फिरि चड़ै दिवसु गुरबाणी गावै बहदिआ उठदिआ हरि नामु धिआवै ॥
जो सासि गिरासि धिआए मेरा हरि हरि सो गुरसिखु गुरू मनि भावै ॥
गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सत्य के व्यापारी सिख तो सतिगुरू के पास बैठ के (सेवा की) मेहनत करते हैं।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।