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अंग ३०४ · गउड़ी

अंग
304
गउड़ी
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  1. जो गुरु गोपे आपणा सु भला नाही पंचहु ओनि लाहा मूलु सभु गवाइआ ॥
  2. सचु सचा सभ दू वडा है सो लए जिसु सतिगुरु टिके ॥
  3. हरि प्रभ का सभु खेतु है हरि आपि किरसाणी लाइआ ॥
  4. सारा दिनु लालचि अटिआ मनमुखि होरे गला ॥
  5. तू वेपरवाहु अथाहु है अतुलु किउ तुलीऐ ॥
  6. सतिगुर की सेवा निरमली निरमल जनु होइ सु सेवा घाले ॥

जो गुरु गोपे आपणा सु भला नाही पंचहु ओनि लाहा मूलु सभु गवाइआ ॥

अंग ३०३ से चला आ रहा अंश

जो गुरु गोपे आपणा सु भला नाही पंचहु ओनि लाहा मूलु सभु गवाइआ ॥
पहिला आगमु निगमु नानकु आखि सुणाए पूरे गुर का बचनु उपरि आइआ ॥
गुरसिखा वडिआई भावै गुर पूरे की मनमुखा ओह वेला हथि न आइआ ॥2॥

हिन्दी अर्थ: हे संत जनों ! (सिरे की बात ये है कि) जो मनुष्य अपने सतिगुरू की निंदा करता है। वह ठीक नहीं। (मानस जनम में) जो कमाना था वह भी गवा लेता है और (मनुष्य-जन्म-रूप) भी गवा लेता है। नानक कह के सुनाता है (भाव। इस बात पर जोर दे के कहता है कि) (गुरसिख के लिए यह) पहला आगम-निगम है (यही है वेद-शास्त्रों का उक्तम सिद्धांत कि) पूरे सतिगुरू का वचन (सबसे ज्यादा) प्रामाणिक है। (इस वास्ते) गुरसिखों को पूरे सतिगुरू की वडिआई अच्छी लगती है (पर) मनमुखों को गुरू की वडिआई समझने का वह समय हाथ नहीं आता। 2।

सचु सचा सभ दू वडा है सो लए जिसु सतिगुरु टिके ॥

पउड़ी ॥
सचु सचा सभ दू वडा है सो लए जिसु सतिगुरु टिके ॥
सो सतिगुरु जि सचु धिआइदा सचु सचा सतिगुरु इके ॥
सोई सतिगुरु पुरखु है जिनि पंजे दूत कीते वसि छिके ॥
जि बिनु सतिगुर सेवे आपु गणाइदे तिन अंदरि कूड़ु फिटु फिटु मुह फिके ॥
ओइ बोले किसै न भावनी मुह काले सतिगुर ते चुके ॥8॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ सदा स्थिर रहने वाला जो सच्चा प्रभू सबसे बड़ा है। उस मनुष्य को मिलता है जिसको सतिगुरू तिलक दे (भाव। आशीश दे)। सतिगुरू भी वही हैजो सदा सच्चे प्रभू को याद रखता है (और इस तरह) सच्चा प्रभू और सतिगुरू एक-रूप (हो गए हैं।) जिस ने (कामादिक) पाँचों वैरी खींच के वश कर लिए हैं। जो मनुष्य सतिगुरू की सेवा से वंचित रहते हैं और अपने आप को बड़ा कहलवाते हैं। उनके हृदय में झूठ होता है (इस करके उनका) मुंह फीका (रहता है। भाव। उनके मुँह पर नाम की लाली नहीं होती और) उन्हें सदा धिक्कार मिलती है। किसी को उनके वचन अच्छे नहीं लगते (अंदर झूठ होने के कारण) उनके मुँह भी भ्रष्टे हुए होते हैं (क्योंकि) वह सतिगुरू को भूले हुए हैं। 8।

हरि प्रभ का सभु खेतु है हरि आपि किरसाणी लाइआ ॥

सलोक मः 4 ॥
हरि प्रभ का सभु खेतु है हरि आपि किरसाणी लाइआ ॥
गुरमुखि बखसि जमाईअनु मनमुखी मूलु गवाइआ ॥
सभु को बीजे आपणे भले नो हरि भावै सो खेतु जमाइआ ॥
गुरसिखी हरि अंम्रितु बीजिआ हरि अंम्रित नामु फलु अंम्रितु पाइआ ॥
जमु चूहा किरस नित कुरकदा हरि करतै मारि कढाइआ ॥
किरसाणी जंमी भाउ करि हरि बोहल बखस जमाइआ ॥
तिन का काड़ा अंदेसा सभु लाहिओनु जिनी सतिगुरु पुरखु धिआइआ ॥
जन नानक नामु अराधिआ आपि तरिआ सभु जगतु तराइआ ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 4॥ सारा संसार प्रभू का (जैसे) खेत है (जिस में) प्रभू ने (जीवों को) खेती के काम में लगाया हुआ है (भाव। नाम जपने के लिए भेजा हुआ है)। जो मनुष्य सतिगुरू के सन्मुख रहते हैं। उनकी (खेती) प्रभू ने मेहर करके उगा दी है। (पर) पर जो मनुष्य मन के पीछे भूले रहे। वे मूल भी गवा बैठे (भाव। मनुष्य जनम हाथों से छीन लिया)। (अपनी ओर से) हर कोई अपने भले के लिए बीजता है (पर) वही खेत अच्छा उगता है (भाव। वही कमाई सफल होती है) जो प्रभू को अच्छा लगता है। (इस करके हरी की प्रसन्नता के लिए) सतिगुरू के सिख अमर करने वाले प्रभू का आत्मिक जीवन देने वाला नाम बीजते हैं और उन्हें हरि-नाम-रूपी अमृत फल की प्राप्ति हो जाती है। (मनमुखों की) फसल को जो जम (रूपी) चूहा सदा कुतरता जाता है गुरसिखों का वह कुछ बिगाड़ नहीं सकता। (क्योंकि) सृजनहार प्रभू ने मार के उसे निकाल बाहर कर दिया है (भाव। गुरसिखों के हृदय में माया वाला प्रभाव ही नहीं रहने दिया।) (इस वास्ते उनकी) फसल प्रेम से (भाव बढ़िया फॅब के लहरा के) उगती है और प्रभू की मेहर-रूपी बोहल का ढेर लग जाता है। जो मनुष्य सतिगुरू पुरखु का ध्यान धरते हैं। प्रभू ने उनकी सारी चिंताएं उतार दी हैं। हे दास नानक ! जो मनुष्य प्रभू के नाम का सिमरन करता है। वह खुद (इस काड़े-अंदेसे भरे समुंद्र में से) तैर जाता है और सारे संसार को पार कर लेता है। 1।

सारा दिनु लालचि अटिआ मनमुखि होरे गला ॥

मः 4 ॥
सारा दिनु लालचि अटिआ मनमुखि होरे गला ॥
राती ऊघै दबिआ नवे सोत सभि ढिला ॥
मनमुखा दै सिरि जोरा अमरु है नित देवहि भला ॥
जोरा दा आखिआ पुरख कमावदे से अपवित अमेध खला ॥
कामि विआपे कुसुध नर से जोरा पुछि चला ॥
सतिगुर कै आखिऐ जो चलै सो सति पुरखु भल भला ॥
जोरा पुरख सभि आपि उपाइअनु हरि खेल सभि खिला ॥
सभ तेरी बणत बणावणी नानक भल भला ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 4॥ मन के अधीन हुआ मनुष्य सारा दिन लालच में लिबड़ा हुआ (नाम के अलावा) और-और बातें करता फिरता है। (दिन का कार्य-व्यवहार करके थका हुआ) रात को नींद में घुटा जाता है। उसकी सारी नौ इंद्रियां ही ढीली पड़ जाती हैं। (ऐसे) मनमुखों के सिर पर सि्त्रयों का हुकम चलता है। और वह उनको (ही) सदा बढ़िया-बढ़िया पदार्थ ला के देते हैं। जो मनुष्य सि्त्रयों के कहे में चलते हैं (भाव। अपना वजीर जान के सलाह नहीं लेते। बल्कि पूरी तरह जो सि्त्रयां कहें वही करते हैं)। वह (आम तौर पर) मलीन-मति बुद्धिहीन और मूर्ख होते हैं। (क्योंकि) जो विषौ के मारे हुए गंदे आचरण वाले होते हैं। वही सि्त्रयों के कहे में चलते हैं। सच्चा और अच्छे से अच्छा मनुष्य वह है। जो सतिगुरू के हुकम में चलता है। (पर। स्त्री या मनमुख मनुष्य के क्या इख्तियार?) सभ सि्त्रयां और मनुष्य प्रभू ने खुद पैदा किए हैं। हे नानक ! (कह कि) हे प्रभू ! (संसार की) यह सारी बनतर आपकी बनाई हुई है। जो कुछ आपने किया है सब भला है। 2।

तू वेपरवाहु अथाहु है अतुलु किउ तुलीऐ ॥

पउड़ी ॥
तू वेपरवाहु अथाहु है अतुलु किउ तुलीऐ ॥
से वडभागी जि तुधु धिआइदे जिन सतिगुरु मिलीऐ ॥
सतिगुर की बाणी सति सरूपु है गुरबाणी बणीऐ ॥
सतिगुर की रीसै होरि कचु पिचु बोलदे से कूड़िआर कूड़े झड़ि पड़ीऐ ॥
ओन॑ा अंदरि होरु मुखि होरु है बिखु माइआ नो झखि मरदे कड़ीऐ ॥9॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ हे प्रभू ! आपको कैसे तोलें? आप बेपरवाह। अथाह व अतोल है। जिन्हें सतिगुरू मिलता है और जो आपका सिमरन करते हैं। वह बहुत भाग्यशाली हैं। सतिगुरू की बाणी द्वारा (सत्य-स्वरूप) बन जाते हैं (भाव। जो नाम जपता है वह नाम में समा जाता है)। कई और झूठ के व्यापारी सतिगुरू की रीस करके कच्ची बाणी उचारते हैं। पर वह (हृदय में) झूठ होने के कारण झड़ जाते हैं (भाव। सतिगुरू की बराबरी नहीं कर सकते। और उनका पर्दा फाश हो जाता है)। उनके दिल में कुछ और होता है और मुँह में और। वे विषौली-माया को एकत्र करने के लिए झुरते हैं और खप-खप के मरते हैं। 9।

सतिगुर की सेवा निरमली निरमल जनु होइ सु सेवा घाले ॥

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सलोक मः 4 ॥
सतिगुर की सेवा निरमली निरमल जनु होइ सु सेवा घाले ॥
जिन अंदरि कपटु विकारु झूठु ओइ आपे सचै वखि कढे जजमाले ॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 4॥ सतिगुरू की (बताई) सेवा (एक) पवित्र (कर्म) है। जो मनुष्य निर्मल हो (भाव। जिस मनुष्य का हृदय मलीन ना हो) वही ये मुश्किल कार कर सकता है। जिनके हृदय में धोखा-विकार और झूठ है। सच्चे प्रभू ने खुद ही उन कड़वों को (गुरू से) अलग कर दिया है।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ४: गुरु राम दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ३०४ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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