जो गुरु गोपे आपणा सु भला नाही पंचहु ओनि लाहा मूलु सभु गवाइआ ॥ पहिला आगमु निगमु नानकु आखि सुणाए पूरे गुर का बचनु उपरि आइआ ॥ गुरसिखा वडिआई भावै गुर पूरे की मनमुखा ओह वेला हथि न आइआ ॥2॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
हिन्दी अर्थ: हे संत जनों ! (सिरे की बात ये है कि) जो मनुष्य अपने सतिगुरू की निंदा करता है। वह ठीक नहीं। (मानस जनम में) जो कमाना था वह भी गवा लेता है और (मनुष्य-जन्म-रूप) भी गवा लेता है। नानक कह के सुनाता है (भाव। इस बात पर जोर दे के कहता है कि) (गुरसिख के लिए यह) पहला आगम-निगम है (यही है वेद-शास्त्रों का उक्तम सिद्धांत कि) पूरे सतिगुरू का वचन (सबसे ज्यादा) प्रामाणिक है। (इस वास्ते) गुरसिखों को पूरे सतिगुरू की वडिआई अच्छी लगती है (पर) मनमुखों को गुरू की वडिआई समझने का वह समय हाथ नहीं आता। 2।
पउड़ी ॥ सचु सचा सभ दू वडा है सो लए जिसु सतिगुरु टिके ॥ सो सतिगुरु जि सचु धिआइदा सचु सचा सतिगुरु इके ॥ सोई सतिगुरु पुरखु है जिनि पंजे दूत कीते वसि छिके ॥ जि बिनु सतिगुर सेवे आपु गणाइदे तिन अंदरि कूड़ु फिटु फिटु मुह फिके ॥ ओइ बोले किसै न भावनी मुह काले सतिगुर ते चुके ॥8॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ सदा स्थिर रहने वाला जो सच्चा प्रभू सबसे बड़ा है। उस मनुष्य को मिलता है जिसको सतिगुरू तिलक दे (भाव। आशीश दे)। सतिगुरू भी वही हैजो सदा सच्चे प्रभू को याद रखता है (और इस तरह) सच्चा प्रभू और सतिगुरू एक-रूप (हो गए हैं।) जिस ने (कामादिक) पाँचों वैरी खींच के वश कर लिए हैं। जो मनुष्य सतिगुरू की सेवा से वंचित रहते हैं और अपने आप को बड़ा कहलवाते हैं। उनके हृदय में झूठ होता है (इस करके उनका) मुंह फीका (रहता है। भाव। उनके मुँह पर नाम की लाली नहीं होती और) उन्हें सदा धिक्कार मिलती है। किसी को उनके वचन अच्छे नहीं लगते (अंदर झूठ होने के कारण) उनके मुँह भी भ्रष्टे हुए होते हैं (क्योंकि) वह सतिगुरू को भूले हुए हैं। 8।
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 4॥ सारा संसार प्रभू का (जैसे) खेत है (जिस में) प्रभू ने (जीवों को) खेती के काम में लगाया हुआ है (भाव। नाम जपने के लिए भेजा हुआ है)। जो मनुष्य सतिगुरू के सन्मुख रहते हैं। उनकी (खेती) प्रभू ने मेहर करके उगा दी है। (पर) पर जो मनुष्य मन के पीछे भूले रहे। वे मूल भी गवा बैठे (भाव। मनुष्य जनम हाथों से छीन लिया)। (अपनी ओर से) हर कोई अपने भले के लिए बीजता है (पर) वही खेत अच्छा उगता है (भाव। वही कमाई सफल होती है) जो प्रभू को अच्छा लगता है। (इस करके हरी की प्रसन्नता के लिए) सतिगुरू के सिख अमर करने वाले प्रभू का आत्मिक जीवन देने वाला नाम बीजते हैं और उन्हें हरि-नाम-रूपी अमृत फल की प्राप्ति हो जाती है। (मनमुखों की) फसल को जो जम (रूपी) चूहा सदा कुतरता जाता है गुरसिखों का वह कुछ बिगाड़ नहीं सकता। (क्योंकि) सृजनहार प्रभू ने मार के उसे निकाल बाहर कर दिया है (भाव। गुरसिखों के हृदय में माया वाला प्रभाव ही नहीं रहने दिया।) (इस वास्ते उनकी) फसल प्रेम से (भाव बढ़िया फॅब के लहरा के) उगती है और प्रभू की मेहर-रूपी बोहल का ढेर लग जाता है। जो मनुष्य सतिगुरू पुरखु का ध्यान धरते हैं। प्रभू ने उनकी सारी चिंताएं उतार दी हैं। हे दास नानक ! जो मनुष्य प्रभू के नाम का सिमरन करता है। वह खुद (इस काड़े-अंदेसे भरे समुंद्र में से) तैर जाता है और सारे संसार को पार कर लेता है। 1।
मः 4 ॥ सारा दिनु लालचि अटिआ मनमुखि होरे गला ॥ राती ऊघै दबिआ नवे सोत सभि ढिला ॥ मनमुखा दै सिरि जोरा अमरु है नित देवहि भला ॥ जोरा दा आखिआ पुरख कमावदे से अपवित अमेध खला ॥ कामि विआपे कुसुध नर से जोरा पुछि चला ॥ सतिगुर कै आखिऐ जो चलै सो सति पुरखु भल भला ॥ जोरा पुरख सभि आपि उपाइअनु हरि खेल सभि खिला ॥ सभ तेरी बणत बणावणी नानक भल भला ॥2॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।
हिन्दी अर्थ: महला 4॥ मन के अधीन हुआ मनुष्य सारा दिन लालच में लिबड़ा हुआ (नाम के अलावा) और-और बातें करता फिरता है। (दिन का कार्य-व्यवहार करके थका हुआ) रात को नींद में घुटा जाता है। उसकी सारी नौ इंद्रियां ही ढीली पड़ जाती हैं। (ऐसे) मनमुखों के सिर पर सि्त्रयों का हुकम चलता है। और वह उनको (ही) सदा बढ़िया-बढ़िया पदार्थ ला के देते हैं। जो मनुष्य सि्त्रयों के कहे में चलते हैं (भाव। अपना वजीर जान के सलाह नहीं लेते। बल्कि पूरी तरह जो सि्त्रयां कहें वही करते हैं)। वह (आम तौर पर) मलीन-मति बुद्धिहीन और मूर्ख होते हैं। (क्योंकि) जो विषौ के मारे हुए गंदे आचरण वाले होते हैं। वही सि्त्रयों के कहे में चलते हैं। सच्चा और अच्छे से अच्छा मनुष्य वह है। जो सतिगुरू के हुकम में चलता है। (पर। स्त्री या मनमुख मनुष्य के क्या इख्तियार?) सभ सि्त्रयां और मनुष्य प्रभू ने खुद पैदा किए हैं। हे नानक ! (कह कि) हे प्रभू ! (संसार की) यह सारी बनतर आपकी बनाई हुई है। जो कुछ तूने किया है सब भला है। 2।
पउड़ी ॥ तू वेपरवाहु अथाहु है अतुलु किउ तुलीऐ ॥ से वडभागी जि तुधु धिआइदे जिन सतिगुरु मिलीऐ ॥ सतिगुर की बाणी सति सरूपु है गुरबाणी बणीऐ ॥ सतिगुर की रीसै होरि कचु पिचु बोलदे से कूड़िआर कूड़े झड़ि पड़ीऐ ॥ ओन॑ा अंदरि होरु मुखि होरु है बिखु माइआ नो झखि मरदे कड़ीऐ ॥9॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ हे प्रभू ! आपको कैसे तोलें? आप बेपरवाह। अथाह व अतोल है। जिन्हें सतिगुरू मिलता है और जो आपका सिमरन करते हैं। वह बहुत भाग्यशाली हैं। सतिगुरू की बाणी द्वारा (सत्य-स्वरूप) बन जाते हैं (भाव। जो नाम जपता है वह नाम में समा जाता है)। कई और झूठ के व्यापारी सतिगुरू की रीस करके कच्ची बाणी उचारते हैं। पर वह (हृदय में) झूठ होने के कारण झड़ जाते हैं (भाव। सतिगुरू की बराबरी नहीं कर सकते। और उनका पर्दा फाश हो जाता है)। उनके दिल में कुछ और होता है और मुँह में और। वे विषौली-माया को एकत्र करने के लिए झुरते हैं और खप-खप के मरते हैं। 9।
सलोक मः 4 ॥ सतिगुर की सेवा निरमली निरमल जनु होइ सु सेवा घाले ॥ जिन अंदरि कपटु विकारु झूठु ओइ आपे सचै वखि कढे जजमाले ॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 4॥ सतिगुरू की (बताई) सेवा (एक) पवित्र (कर्म) है। जो मनुष्य निर्मल हो (भाव। जिस मनुष्य का हृदय मलीन ना हो) वही ये मुश्किल कार कर सकता है। जिनके हृदय में धोखा-विकार और झूठ है। सच्चे प्रभू ने खुद ही उन कड़वों को (गुरू से) अलग कर दिया है।
गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे संत जनों ! (सिरे की बात ये है कि) जो मनुष्य अपने सतिगुरू की निंदा करता है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।