इस पृष्ठ पर
अंग
301
गउड़ी
अंग बदलें या अंश चुनें · 11 अंश
- सभि कारज तिन के सिधि हहि जिन गुरमुखि किरपा धारि ॥
- तू सचा साहिबु सचु है सचु सचा गोसाई ॥
- विणु नावै होरु सलाहणा सभु बोलणु फिका सादु ॥
- सतिगुर हरि प्रभु दसि नामु धिआई मनि हरी ॥
- तू आपे आपि निरंकारु है निरंजन हरि राइआ ॥
- मन अंतरि हउमै रोगु है भ्रमि भूले मनमुख दुरजना ॥
- मनु तनु रता रंग सिउ गुरमुखि हरि गुणतासु ॥
- तू करता पुरखु अगंमु है किसु नालि तू वड़ीऐ ॥
- मै मनि तनि प्रेमु पिरंम का अठे पहर लगंनि ॥
- जिन अंदरि प्रीति पिरंम की जिउ बोलनि तिवै सोहंनि ॥
- तू करता आपि अभुलु है भुलण विचि नाही ॥
· गउड़ी की वार, सलोक · राग गउड़ी
सभि कारज तिन के सिधि हहि जिन गुरमुखि किरपा धारि ॥
सभि कारज तिन के सिधि हहि जिन गुरमुखि किरपा धारि ॥
नानक जो धुरि मिले से मिलि रहे हरि मेले सिरजणहारि ॥2॥
नानक जो धुरि मिले से मिलि रहे हरि मेले सिरजणहारि ॥2॥
हिन्दी अर्थ: जिन गुरमुखों पर वह कृपा करता है। उनके सारे काम सफल हो जाते हैं। (उन्हें मानस जनम के असल व्यापार में घाटा नहीं पड़ता)। (पर) हे नानक! प्रभू को वही मिले हैं। जो दरगाह से मिले हैं। और जिन्हें सृजनहार हरी ने स्वयं मिलाया है। 2।
· गउड़ी की वार, पउड़ी · राग गउड़ी
तू सचा साहिबु सचु है सचु सचा गोसाई ॥
पउड़ी ॥
तू सचा साहिबु सचु है सचु सचा गोसाई ॥
तुधुनो सभ धिआइदी सभ लगै तेरी पाई ॥
तेरी सिफति सुआलिउ सरूप है जिनि कीती तिसु पारि लघाई ॥
गुरमुखा नो फलु पाइदा सचि नामि समाई ॥
वडे मेरे साहिबा वडी तेरी वडिआई ॥1॥
तू सचा साहिबु सचु है सचु सचा गोसाई ॥
तुधुनो सभ धिआइदी सभ लगै तेरी पाई ॥
तेरी सिफति सुआलिउ सरूप है जिनि कीती तिसु पारि लघाई ॥
गुरमुखा नो फलु पाइदा सचि नामि समाई ॥
वडे मेरे साहिबा वडी तेरी वडिआई ॥1॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ हे प्रभू! आप सदा स्थिर रहने वाले मालिक हैं और पृथ्वी के सच्चे साईं हैं। सारी सृष्टि आपका ध्यान है और सब जीव-जंतु आपके आगे सिर निवाते हैं। आपकी सिफत-सालाह करना एक सोहाना सुंदर कार्य है। जिसने किया है। उसको (संसार-सागर से) पार उतारता है। हे प्रभू! जो जीव सतिगुरू के सन्मुख रहते हैं; आप उनकी मेहनत (सिफत-सलाह करने की मेहनत) सफल करते हैं। आपके सच्चे नाम में वह लीन हो जाते हैं। हे मेरे मालिक! (प्रभू! जैसा) आप खुद हैं (वैसी ही) आपकी वडिआई (भी) बड़ी (भाव, बड़े गुण पैदा करने वाली) है। 1।
· गउड़ी की वार, सलोक · राग गउड़ी
विणु नावै होरु सलाहणा सभु बोलणु फिका सादु ॥
सलोक मः 4 ॥
विणु नावै होरु सलाहणा सभु बोलणु फिका सादु ॥
मनमुख अहंकारु सलाहदे हउमै ममता वादु ॥
जिन सालाहनि से मरहि खपि जावै सभु अपवादु ॥
जन नानक गुरमुखि उबरे जपि हरि हरि परमानादु ॥1॥
विणु नावै होरु सलाहणा सभु बोलणु फिका सादु ॥
मनमुख अहंकारु सलाहदे हउमै ममता वादु ॥
जिन सालाहनि से मरहि खपि जावै सभु अपवादु ॥
जन नानक गुरमुखि उबरे जपि हरि हरि परमानादु ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 4॥ हरी के नाम के बिना किसी और की महिमा करनी, ये बोलने का सारा (उद्यम) बे-स्वादा काम है (भाव, इसमें असली आनंद नहीं है)। मनमुख जीव अहंकार। अहंम और अपनत्व की बातों को पसंद करते हैं। इनके आधार पर किसी मनुष्य की निंदा करते हैं और इनका सारा झगड़ा (भाव, उस्तति-निंदा की बातों का सिलसिला) व्यर्थ जाता है। हे नानक! सतिगुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य पूर्ण आनंद स्वरूप प्रभू का सिमरन करके (दूसरे मनुष्यों की उस्तति निंदा के चस्के से) बच निकलते हैं। 1।
· गउड़ी की वार, सलोक · राग गउड़ी
सतिगुर हरि प्रभु दसि नामु धिआई मनि हरी ॥
मः 4 ॥
सतिगुर हरि प्रभु दसि नामु धिआई मनि हरी ॥
नानक नामु पवितु हरि मुखि बोली सभि दुख परहरी ॥2॥
सतिगुर हरि प्रभु दसि नामु धिआई मनि हरी ॥
नानक नामु पवितु हरि मुखि बोली सभि दुख परहरी ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 4॥ हे सतिगुरू! मुझे प्रभू की बातें सुना (जिससे) मैं हृदय में प्रभू का नाम सिमर सकूँ। हे नानक! प्रभू का नाम पवित्र है (इसलिए मन चाहता है कि मैं भी) मुँह से उच्चारण करके (अपने) सारे दुख दूर कर लूँ। 2।
· गउड़ी की वार, पउड़ी · राग गउड़ी
तू आपे आपि निरंकारु है निरंजन हरि राइआ ॥
पउड़ी ॥
तू आपे आपि निरंकारु है निरंजन हरि राइआ ॥
जिनी तू इक मनि सचु धिआइआ तिन का सभु दुखु गवाइआ ॥
तेरा सरीकु को नाही जिस नो लवै लाइ सुणाइआ ॥
तुधु जेवडु दाता तूहै निरंजना तूहै सचु मेरै मनि भाइआ ॥
सचे मेरे साहिबा सचे सचु नाइआ ॥2॥
तू आपे आपि निरंकारु है निरंजन हरि राइआ ॥
जिनी तू इक मनि सचु धिआइआ तिन का सभु दुखु गवाइआ ॥
तेरा सरीकु को नाही जिस नो लवै लाइ सुणाइआ ॥
तुधु जेवडु दाता तूहै निरंजना तूहै सचु मेरै मनि भाइआ ॥
सचे मेरे साहिबा सचे सचु नाइआ ॥2॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे रौशनी देने वाले माया से रहित प्रभू! आप स्वयं ही स्वयं निरंकार हैं। हे सच्चे साई! जिन्होंने एकाग्र हो के आपका सिमरन किया है। उनका आपने सब दुख दूर कर दिया है। (संसार में) आपका शरीक कोई नहीं जिसे बराबरी दे के (आपके जैसा) कहें। हे माया से रहित सच्चे हरी! आपके जितना आप स्वयं ही दाता हैं। आप ही मेरे मन को प्यारे लगते हैं। हे मेरे सच्चे साहिब! आपकी बडिआई (महिमा) सदा कायम रहने वाली है। 2।
· गउड़ी की वार, सलोक · राग गउड़ी
मन अंतरि हउमै रोगु है भ्रमि भूले मनमुख दुरजना ॥
सलोक मः 4 ॥
मन अंतरि हउमै रोगु है भ्रमि भूले मनमुख दुरजना ॥
नानक रोगु गवाइ मिलि सतिगुर साधू सजना ॥1॥
मन अंतरि हउमै रोगु है भ्रमि भूले मनमुख दुरजना ॥
नानक रोगु गवाइ मिलि सतिगुर साधू सजना ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 4॥ जिनके मन में अहंकार का रोग है। वे मन के मुरीद विकारी लोग भ्रम में भूले हुए हैं। हे नानक! ये अहंम् का रोग सतिगुरू को मिल के और सत्संग में रह कर दूर करें। 1।
· गउड़ी की वार, सलोक · राग गउड़ी
मनु तनु रता रंग सिउ गुरमुखि हरि गुणतासु ॥
मः 4 ॥
मनु तनु रता रंग सिउ गुरमुखि हरि गुणतासु ॥
जन नानक हरि सरणागती हरि मेले गुर साबासि ॥2॥
मनु तनु रता रंग सिउ गुरमुखि हरि गुणतासु ॥
जन नानक हरि सरणागती हरि मेले गुर साबासि ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 4॥ सतिगुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य का मन और शरीर गुण-निधान हरी के प्रेम से रंगा रहता है। हे नानक! जिस जन को सतिगुरू की शाबशी मिलती है। प्रभू की शरण पड़े उस मनुष्य को प्रभू (अपने साथ) मेल लेता है। 2।
· गउड़ी की वार, पउड़ी · राग गउड़ी
तू करता पुरखु अगंमु है किसु नालि तू वड़ीऐ ॥
पउड़ी ॥
तू करता पुरखु अगंमु है किसु नालि तू वड़ीऐ ॥
तुधु जेवडु होइ सु आखीऐ तुधु जेहा तूहै पड़ीऐ ॥
तू घटि घटि इकु वरतदा गुरमुखि परगड़ीऐ ॥
तू सचा सभस दा खसमु है सभ दू तू चड़ीऐ ॥
तू करहि सु सचे होइसी ता काइतु कड़ीऐ ॥3॥
तू करता पुरखु अगंमु है किसु नालि तू वड़ीऐ ॥
तुधु जेवडु होइ सु आखीऐ तुधु जेहा तूहै पड़ीऐ ॥
तू घटि घटि इकु वरतदा गुरमुखि परगड़ीऐ ॥
तू सचा सभस दा खसमु है सभ दू तू चड़ीऐ ॥
तू करहि सु सचे होइसी ता काइतु कड़ीऐ ॥3॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ हे प्रभू! आप (सारी सृष्टि को) रचने वाले हैं। (सृष्टि में) व्यापक है (और फिर भी) पहुँच से परे है। किसी के साथ आपकी तुलना नहीं की जा सकती। किस का नाम लें? आपके जितना और कोई नहीं। आपको ही आपके जितना कह सकते हैं। (हे हरी!) आप हरेक शरीर में व्यापक हैं। (पर ये बात) उनपे प्रगट (होती है) जो सतिगुरू के सन्मुख (होते हैं)। (हे प्रभू!) आप सदा स्थिर रहने वाले सब के मालिक हैं और सबसे सुंदर (श्रेष्ठ) हैं। हे सच्चे (हरी!) (अगर हमें ये निश्चय हो जाए कि) जो आप करते हैं वही होता है, तो हम चिंता क्यों करें? 3।
· गउड़ी की वार, सलोक · राग गउड़ी
मै मनि तनि प्रेमु पिरंम का अठे पहर लगंनि ॥
सलोक मः 4 ॥
मै मनि तनि प्रेमु पिरंम का अठे पहर लगंनि ॥
जन नानक किरपा धारि प्रभ सतिगुर सुखि वसंनि ॥1॥
मै मनि तनि प्रेमु पिरंम का अठे पहर लगंनि ॥
जन नानक किरपा धारि प्रभ सतिगुर सुखि वसंनि ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 4 ॥ (मन चाहता है कि) आठों पहर लग जाएं (भाव, गुजर जाएं) (पर) मेरे हृदय और शरीर में प्यारे का प्यार (लगा रहे। भाव, ना खत्म हो) (क्योंकि) हे नानक! (जिन) मनुष्यों पर हरी (ऐसी) कृपा करता है वह सतिगुरू के (बख्शे हुए) सुख में (सदा) बसते हैं। 1।
· गउड़ी की वार, सलोक · राग गउड़ी
जिन अंदरि प्रीति पिरंम की जिउ बोलनि तिवै सोहंनि ॥
मः 4 ॥
जिन अंदरि प्रीति पिरंम की जिउ बोलनि तिवै सोहंनि ॥
नानक हरि आपे जाणदा जिनि लाई प्रीति पिरंनि ॥2॥
जिन अंदरि प्रीति पिरंम की जिउ बोलनि तिवै सोहंनि ॥
नानक हरि आपे जाणदा जिनि लाई प्रीति पिरंनि ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 4॥ जिन के हृदय में प्रभू का प्यार है। वह जैसे बोलते हैं, वैसे ही शोभा देते हैं (भाव, उनका बोला हुआ मीठा लगता है) (ये एक आश्चर्यजनक चमत्कार है)। हे नानक! (इस भेद की जीव को समझ नहीं आ सकती) जिस पर (प्रभू) ने ये प्यार लगाया है वह खुद ही जानता है। 2।
· गउड़ी की वार, पउड़ी · राग गउड़ी
तू करता आपि अभुलु है भुलण विचि नाही ॥
पउड़ी ॥
तू करता आपि अभुलु है भुलण विचि नाही ॥
तू करहि सु सचे भला है गुर सबदि बुझाही ॥
तू करण कारण समरथु है दूजा को नाही ॥
तू साहिबु अगमु दइआलु है सभि तुधु धिआही ॥
तू करता आपि अभुलु है भुलण विचि नाही ॥
तू करहि सु सचे भला है गुर सबदि बुझाही ॥
तू करण कारण समरथु है दूजा को नाही ॥
तू साहिबु अगमु दइआलु है सभि तुधु धिआही ॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ हे (सृष्टि के) रचनहार! आप खुद अभूल हैं। भूलते नहीं (गलती नहीं करते)। हे सच्चे! सतिगुरू के शबद के द्वारा आप ये समझाते हैं कि जो आप करते हैं सो ठीक करते हैं। हे हरी! आपका कोई शरीक नहीं और सृष्टि के इस सारे परपंच का मूल आप खुद ही हैं और सामर्थ्य वाले हैं। आप दया करने वाले मालिक हैं (पर) आपके तक पहुँच नहीं हो सकती; सब जीव-जंतु आपको सिमरते हैं।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 4: गुरु राम दास जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 301 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।