सभि कारज तिन के सिधि हहि जिन गुरमुखि किरपा धारि ॥ नानक जो धुरि मिले से मिलि रहे हरि मेले सिरजणहारि ॥2॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।
हिन्दी अर्थ: जिन गुरमुखों पर वह कृपा करता है। उनके सारे काम सफल हो जाते हैं। (उन्हें मानस जनम के असल व्यापार में घाटा नहीं पड़ता)। (पर) हे नानक ! प्रभू को वही मिले हैं। जो दरगाह से मिले हैं। और जिन्हें सृजनहार हरी ने स्वयं मिलाया है। 2।
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ हे प्रभू ! आप सदा स्थिर रहने वाला मालिक है और पृथ्वी का सच्चा साई है। सारी सृष्टि आपका ध्यान है और सब जीव-जंतु आपके आगे सिर निवाते हैं। आपकी सिफत-सालाह करना एक सोहाना सुंदर कार्य है। जिसने किया है। उसको (संसार-सागर से) पार उतारता है। हे प्रभू ! जो जीव सतिगुरू के सन्मुख रहते हैं; आप उनकी मेहनत (सिफत-सलाह करने की मेहनत) सफल करता है। आपके सच्चे नाम में वह लीन हैं जाते हैं। हे मेरे मालिक ! (प्रभू ! जैसा) आप खुद है (वैसी ही) आपकी वडिआई (भी) बड़ी (भाव। बड़े गुण पैदा करने वाली) है। 1।
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 4॥ हरी के नाम के बिना किसी और की महिमा करनी – ये बोलने का सारा (उद्यम) बे-स्वादा काम है (भाव। इसमें असली आनंद नहीं है)। मनमुख जीव अहंकार। अहंम और अपनत्व की बातों को पसंद करते हैं। इनके आधार पर किसी मनुष्य की निंदा करते हैं और इनका सारा झगड़ा (भाव। उस्तति-निंदा की बातों का सिलसिला) व्यर्थ जाता है। हे नानक ! सतिगुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य पूर्ण आनंद स्वरूप प्रभू का सिमरन करके (दूसरे मनुष्यों की उस्तति निंदा के चस्के से) बच निकलते हैं। 1।
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
हिन्दी अर्थ: महला 4॥ हे सतिगुरू ! मुझे प्रभू की बातें सुना (जिससे) मैं हृदय में प्रभू का नाम सिमर सकूँ। हे नानक ! प्रभू का नाम पवित्र है (इसलिए मन चाहता है कि मैं भी) मुँह से उच्चारण करके (अपने) सारे दुख दूर कर लूँ। 2।
पउड़ी ॥ तू आपे आपि निरंकारु है निरंजन हरि राइआ ॥ जिनी तू इक मनि सचु धिआइआ तिन का सभु दुखु गवाइआ ॥ तेरा सरीकु को नाही जिस नो लवै लाइ सुणाइआ ॥ तुधु जेवडु दाता तूहै निरंजना तूहै सचु मेरै मनि भाइआ ॥ सचे मेरे साहिबा सचे सचु नाइआ ॥2॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे रौशनी देने वाले माया से रहित प्रभू ! आप स्वयं ही स्वयं निरंकार है। हे सच्चे साई ! जिन्होंने एकाग्र हो के आपका सिमरन किया है। उनका तूने सब दुख दूर कर दिया है। (संसार में) आपका शरीक कोई नहीं जिसे बराबरी दे के (आपके जैसा) कहें। हे माया से रहित सच्चे हरी ! आपके जितना आप स्वयं ही दाता है। आप ही मेरे मन को प्यारा लगता है। हे मेरे सच्चे साहिब ! आपकी बडिआई (महिमा) सदा कायम रहने वाली है। 2।
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 4॥ जिनके मन में अहंकार का रोग है। वे मन के मुरीद विकारी लोग भ्रम में भूले हुए हैं। हे नानक ! ये अहंम् का रोग सतिगुरू को मिल के और सत्संग में रह कर दूर कर। 1।
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।
हिन्दी अर्थ: महला 4॥ सतिगुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य का मन और शरीर गुण-निधान हरी के प्रेम से रंगा रहता है। हे नानक ! जिस जन को सतिगुरू की शाबशी मिलती है। प्रभू की शरण पड़े उस मनुष्य को प्रभू (अपने साथ) मेल लेता है। 2।
पउड़ी ॥ तू करता पुरखु अगंमु है किसु नालि तू वड़ीऐ ॥ तुधु जेवडु होइ सु आखीऐ तुधु जेहा तूहै पड़ीऐ ॥ तू घटि घटि इकु वरतदा गुरमुखि परगड़ीऐ ॥ तू सचा सभस दा खसमु है सभ दू तू चड़ीऐ ॥ तू करहि सु सचे होइसी ता काइतु कड़ीऐ ॥3॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ हे प्रभू ! आप (सारी सृष्टि को) रचने वाला है। (सृष्टि में) व्यापक है (और फिर भी) पहुँच से परे है। किसी के साथ आपकी तुलना नहीं की जा सकती। किस का नाम लें? आपके जितना और कोई नहीं। आपको ही आपके जितना कह सकते हैं। (हे हरी !) आप हरेक शरीर में व्यापक है। (पर ये बात) उनपे प्रगट (होती है) जो सतिगुरू के सन्मुख (होते हैं)। (हे प्रभू !) आप सदा स्थिर रहने वाला सब का मालिक है और सबसे सुंदर (श्रेष्ठ) है। हे सच्चे (हरी !) (अगर हमें ये निश्चय हो जाए कि) जो आप करता है वही होता है। तो हम चिंता क्यों करें?। 3।
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 4 ॥ (मन चाहता है कि) आठों पहर लग जाएं (भाव। गुजर जाएं) (पर) मेरे हृदय और शरीर में प्यारे का प्यार (लगा रहे। भाव – ना खत्म हो) (क्योंकि) हे नानक ! (जिन) मनुष्यों पर हरी (ऐसी) कृपा करता है वह सतिगुरू के (बख्शे हुए) सुख में (सदा) बसते हैं। 1।
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
हिन्दी अर्थ: महला 4॥ जिन के हृदय में प्रभू का प्यार है। वह जैसे बोलते हैं। वैसे ही शोभा देते हैं (भाव। उनका बोला हुआ मीठा लगता है) (ये एक आश्चर्यजनक चमत्कार है)। हे नानक ! (इस भेद की जीव को समझ नहीं आ सकती) जिस पर (प्रभू) ने ये प्यार लगाया है वह खुद ही जानता है। 2।
पउड़ी ॥ तू करता आपि अभुलु है भुलण विचि नाही ॥ तू करहि सु सचे भला है गुर सबदि बुझाही ॥ तू करण कारण समरथु है दूजा को नाही ॥ तू साहिबु अगमु दइआलु है सभि तुधु धिआही ॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ हे (सृष्टि के) रचनहार ! आप खुद अभॅुल है। भूलता नहीं (गलती नहीं करता)। हे सच्चे ! सतिगुरू के शबद के द्वारा आप ये समझाता है कि जो आप करता है सो ठीक करता है। हे हरी ! आपका कोई शरीक नहीं और सृष्टि के इस सारे परपंच का मूल आप खुद ही है और समर्था वाला है। आप दया करने वाला मालिक है (पर) आपके तक पहुँच नहीं हैं सकती; सब जीव-जंतु आपको सिमरते हैं।
गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।
इस अंग पर 11 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जिन गुरमुखों पर वह कृपा करता है।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।