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अंग 302

अंग
302
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सभि जीअ तेरे तू सभस दा तू सभ छडाही ॥4॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: सब जीव आपके (रचे हुए) हैं। आप सब का (मालिक) है। आप सभी को (दुखों और चिंताओं से) स्वयं छुड़वाता है। 4।
सलोक मः 4 ॥
सुणि साजन प्रेम संदेसरा अखी तार लगंनि ॥
गुरि तुठै सजणु मेलिआ जन नानक सुखि सवंनि ॥1॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 4॥ सज्जन प्रभू का प्यार भरा संदेशा सुन के (जिन की) आँखें तार में (भाव- दीदार की उम्मीद में) लग जाती हैं; हे नानक ! गुरू ने प्रसन्न हो के उनको सज्जन मिलाया है। और वे सुख में टिके रहते हैं। 1।
मः 4 ॥
सतिगुरु दाता दइआलु है जिस नो दइआ सदा होइ ॥
सतिगुरु अंदरहु निरवैरु है सभु देखै ब्रहमु इकु सोइ ॥
निरवैरा नालि जि वैरु चलाइदे तिन विचहु तिसटिआ न कोइ ॥
सतिगुरु सभना दा भला मनाइदा तिस दा बुरा किउ होइ ॥
सतिगुर नो जेहा को इछदा तेहा फलु पाए कोइ ॥
नानक करता सभु किछु जाणदा जिदू किछु गुझा न होइ ॥2॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: महला 4॥ दातें बख्शने वाला सतिगुरू दया का घर है। उसके (हृदय) में सदा दया (ही दया) है। सतिगुरू के (हृदय) में किसी के साथ वैर नहीं। वह सब जगह एक प्रभू को देख रहा है (इसलिए वह वैर किस के साथ करे? पर कई मूर्ख मनुष्य निर्वैर गुरू के साथ भी वैर करने से नहीं हटते) जो मनुष्य निर्वैरों के साथ वैर कमाते हैं उनमें से किसी भी के हृदय में कभी भी शांति नहीं आई (भाव-वे सदा दुखी रहते हैं) (और) सतिगुरू का बुरा तो हो ही नहीं सकता (क्योंकि) वह सबका भला सोचता है। जिस भावना से कोई जीव सतिगुरू के पास जाता है उसको वैसा फल मिल जाता है (जाहरदारी सफल नहीं हो सकती); क्योंकि। हे नानक ! रचनहार प्रभू से कोई बात छुपाई नहीं जा सकती। वह (अंदर की और बाहर की) हर बात जानता है। 2।
पउड़ी ॥
जिस नो साहिबु वडा करे सोई वड जाणी ॥
जिसु साहिब भावै तिसु बखसि लए सो साहिब मनि भाणी ॥
जे को ओस दी रीस करे सो मूड़ अजाणी ॥
जिस नो सतिगुरु मेले सु गुण रवै गुण आखि वखाणी ॥
नानक सचा सचु है बुझि सचि समाणी ॥5॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ जिस (जीव-स्त्री) की मालिक प्रभू सराहना करे वही (दरअसल) बड़ी समझनी चाहिए। जिस को चाहे प्रभू मालिक बख्श लेता है। और वह साहिब के मन में प्यारी लगती है। वह (जीव-स्त्री) मूर्ख व अंजान है जो उसकी रीस करती है। (क्योंकि। रीस करने से कुछ भी हाथ नहीं आता। यहाँ तो) जिसे सतिगुरू मिलाता है (वही मिलती है और) (हरी की) सिफत सलाह ही उच्चारण करके (औरों को सुनाती है)। हे नानक ! प्रभू सदा स्थिर रहने वाला है। (इस बात को अच्छी तरह) समझ के (वह जीव-स्त्री) सच्चे प्रभू में लीन हो जाती है। 5।
सलोक मः 4 ॥
हरि सति निरंजन अमरु है निरभउ निरवैरु निरंकारु ॥
जिन जपिआ इक मनि इक चिति तिन लथा हउमै भारु ॥
जिन गुरमुखि हरि आराधिआ तिन संत जना जैकारु ॥
कोई निंदा करे पूरे सतिगुरू की तिस नो फिटु फिटु कहै सभु संसारु ॥
सतिगुर विचि आपि वरतदा हरि आपे रखणहारु ॥
धनु धंनु गुरू गुण गावदा तिस नो सदा सदा नमसकारु ॥
जन नानक तिन कउ वारिआ जिन जपिआ सिरजणहारु ॥1॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 4 ॥ प्रभू सचमुच है। माया से निर्लिप है। काल रहित निरभउ निर्वैर और आकार रहित है। जिन्होंने एकाग्र मन हो के उसका सिमरन किया है। उनके मन से अहंकार का बोझ उतर गया है। (पर) उन संत जनों को ही वडिआई मिलती है जिन्होंने गुरू के सन्मुख हो के सिमरन किया है। जो कोई पूरे सतिगुरू की निंदा करता है उसे सारा संसार धिक्कारता है (वह निंदक सतिगुरू का कुछ बिगाड़ नहीं सकता क्योंकि) प्रभू स्वयं सतिगुरू में बसता है और वह स्वयं रक्षा करने वाला है। धन्य है गुरू जो हरी के गुण गाता है। उसके आगे सदा सिर झुकाना चाहिए। (कह) हे नानक ! मैं सदके हूँ। उन हरी के दासों से जिन्होंने सृजनहार को आराधा है। 1।
मः 4 ॥
आपे धरती साजीअनु आपे आकासु ॥
विचि आपे जंत उपाइअनु मुखि आपे देइ गिरासु ॥
सभु आपे आपि वरतदा आपे ही गुणतासु ॥
जन नानक नामु धिआइ तू सभि किलविख कटे तासु ॥2॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: महला 4॥ प्रभू ने खुद ही धरती की रचना की और खुद ही आकाश। इस धरती में उसने जीव-जंतु पैदा किए और खुद ही (जीवों के) मुंह में ग्रास देता है। गुणों का खजाना (हरी) खुद ही सब जीवों के अंदर व्यापक है। हे दास नानक ! आप प्रभू का नाम जप। (जिसने जपा है) उसके सारे पाप प्रभू दूर करता है। 2।
पउड़ी ॥
तू सचा साहिबु सचु है सचु सचे भावै ॥
जो तुधु सचु सलाहदे तिन जम कंकरु नेड़ि न आवै ॥
तिन के मुख दरि उजले जिन हरि हिरदै सचा भावै ॥
कूड़िआर पिछाहा सटीअनि कूड़ु हिरदै कपटु महा दुखु पावै ॥
मुह काले कूड़िआरीआ कूड़िआर कूड़ो होइ जावै ॥6॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे हरी ! आप सच्चा और स्थिर रहने वाला मालिक है। आपको सच ही प्यारा लगता है। हे सच्चे प्रभू ! जो जीव आपकी सिफत सालाह करते हैं। जमदूत उनके नजदीक नहीं फटकता। जिनके हृदय को सच्चा प्रभू प्यारा लगता है। उनके मुंह दरगाह में उज्जवल होते हैं। (पर) झूठ का व्यापार करने वालों के हृदय में झूठ और कपट होने के कारण वे पीछे फेंक दिए जाते हैं और बहुत दुखी होते हैं। झूठों का मुँह (दरगाह में) काले होते हैं (क्योंकि) उनके झूठ का पर्दा-फाश हो जाता है। 6।
सलोक मः 4 ॥
सतिगुरु धरती धरम है तिसु विचि जेहा को बीजे तेहा फलु पाए ॥
गुरसिखी अंम्रितु बीजिआ तिन अंम्रित फलु हरि पाए ॥
ओना हलति पलति मुख उजले ओइ हरि दरगह सची पैनाए ॥
इकन॑ा अंदरि खोटु नित खोटु कमावहि ओहु जेहा बीजे तेहा फलु खाए ॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 4॥ (धरती के स्वभाव की तरह) सतिगुरू (भी) धर्म की भूमि है। जिस तरह (की भावना) का बीज कोई बीजता है। वैसा ही फल लेता है। जिन गुरसिखों ने नाम-अमृत बीजा है उन्हें प्रभू-प्राप्ति-रूपी अमृत फल ही मिल गया है। इस संसार में और अगले जहान में वे सुर्ख-रू होते हैं। और प्रभू की सच्ची दरगाह में उनका आदर होता है। एक जीवों के हृदय में खोट (होने के कारण) वे सदा खोटे कर्म करते हैं। ऐसा आदमी वैसा ही फल खाता है।

गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।

इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे।

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।