अंग
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गउड़ी
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मनु तनु सीतलु सांति सहज लागा प्रभ की सेव ॥
मनु तनु सीतलु सांति सहज लागा प्रभ की सेव ॥
टूटे बंधन बहु बिकार सफल पूरन ता के काम ॥ दुरमति मिटी हउमै छुटी सिमरत हरि को नाम ॥
सरनि गही पारब्रहम की मिटिआ आवा गवन ॥
आपि तरिआ कुटंब सिउ गुण गुबिंद प्रभ रवन ॥
हरि की टहल कमावणी जपीऐ प्रभ का नामु ॥
गुर पूरे ते पाइआ नानक सुख बिस्रामु ॥15॥
टूटे बंधन बहु बिकार सफल पूरन ता के काम ॥ दुरमति मिटी हउमै छुटी सिमरत हरि को नाम ॥
सरनि गही पारब्रहम की मिटिआ आवा गवन ॥
आपि तरिआ कुटंब सिउ गुण गुबिंद प्रभ रवन ॥
हरि की टहल कमावणी जपीऐ प्रभ का नामु ॥
गुर पूरे ते पाइआ नानक सुख बिस्रामु ॥15॥
हिन्दी अर्थ: (गुरू की कृपा से) वह परमात्मा की सेवा-भगती में लगा (जिस करके) उसका मन उसका हृदय ठंडा-ठार हो गया। उसके अंदर शांति और आत्मिक अडोलता पैदा हो गई। (हे भाई !) परमात्मा का नाम सिमरने से अनेकों विकारों (के संस्कारों के) बंधन टूट जाते हैं (जो मनुष्य सिमरन करता है) उसके सारे कारज रास आ जाते हैं। उसकी खोटी मति खत्म हो जाती है और उसे अहंकार से मुकती मिल जाती है। (हे भाई !) जिस मनुष्य ने पारब्रहम परमेश्वर का आसरा लिया। उसका जनम-मरण (का चक्र) समाप्त हो जाता है। गोबिंद प्रभू के गुण गाने की बरकति से वह मनुष्य अपने परिवार समेत (संसार-समुंद्र से) पार लांध जाता है। (हे भाई !) परमात्मा की सेवा भगती करनी चाहिए। परमात्मा का नाम जपना चाहिए। हे नानक ! सारे सुखों का मूल वह प्रभू पूरे गुरू की कृपा से मिल जाता है। 15।
पूरनु कबहु न डोलता पूरा कीआ प्रभ आपि ॥
सलोकु ॥
पूरनु कबहु न डोलता पूरा कीआ प्रभ आपि ॥
दिनु दिनु चड़ै सवाइआ नानक होत न घाटि ॥16॥
पूरनु कबहु न डोलता पूरा कीआ प्रभ आपि ॥
दिनु दिनु चड़ै सवाइआ नानक होत न घाटि ॥16॥
हिन्दी अर्थ: सलोकु हे नानक ! जिस मनुष्य को परमात्मा ने खुद पूर्ण जीवन वाला बना दिया वह पूरन मनुष्य कभी (माया के आसरे तले आ के) नहीं डोलता। उसका आत्मिक जीवन दिनो-दिन ज्यादा चमकता है। उसके आत्मिक जीवन में कभी कमी नहीं आती। 16।
पूरनमा पूरन प्रभ एकु करण कारण समरथु ॥
पउड़ी ॥
पूरनमा पूरन प्रभ एकु करण कारण समरथु ॥
जीअ जंत दइआल पुरखु सभ ऊपरि जा का हथु ॥
गुण निधान गोबिंद गुर कीआ जा का होइ ॥
अंतरजामी प्रभु सुजानु अलख निरंजन सोइ ॥
पारब्रहमु परमेसरो सभ बिधि जानणहार ॥
संत सहाई सरनि जोगु आठ पहर नमसकार ॥
अकथ कथा नह बूझीऐ सिमरहु हरि के चरन ॥
पतित उधारन अनाथ नाथ नानक प्रभ की सरन ॥16॥
पूरनमा पूरन प्रभ एकु करण कारण समरथु ॥
जीअ जंत दइआल पुरखु सभ ऊपरि जा का हथु ॥
गुण निधान गोबिंद गुर कीआ जा का होइ ॥
अंतरजामी प्रभु सुजानु अलख निरंजन सोइ ॥
पारब्रहमु परमेसरो सभ बिधि जानणहार ॥
संत सहाई सरनि जोगु आठ पहर नमसकार ॥
अकथ कथा नह बूझीऐ सिमरहु हरि के चरन ॥
पतित उधारन अनाथ नाथ नानक प्रभ की सरन ॥16॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी- सिर्फ परमात्मा ही सारे गुणों से भरपूर है। सारे जगत का मूल है और सारी ताकतों का मालिक है। वह सर्व-व्यापक प्रभू सब जीवों पर दयावान रहता है। सब जीवों पर उस (की सहायता) का हाथ है। वह परमात्मा सारे गुणों का खजाना है। सारी सृष्टि का पालक है। सबसे बड़ा है। सब कुछ उसी का किया घटित होता है। प्रभू सबके दिल की जानने वाला है। समझदार है। उसका संपूर्ण स्वरूप बयान नहीं किया जा सकता। वह माया के प्रभाव से परे है। (हे भाई !) वह पारब्रहम सबसे बड़ा मालिक है (जीवों के भले का) हरेक ढंग जानने वाला है। संतों का रक्षक है। शरण आए की सहायता करने के लायक है - उस परमात्मा को आठों पहर नमस्कार कर। हे नानक ! परमात्मा के सारे गुण बयान नहीं किए जा सकते। उसका सही स्वरूप समझा नहीं जा सकता। उस परमात्मा के चरणों का ध्यान धर। वह परमात्मा (विकारों में) गिरे लोगों को (विकारों से) बचाने वाला है। वह निखसमों का खसम है (अनाथों का नाथ है)। उसका आसरा ले। 16।
दुख बिनसे सहसा गइओ सरनि गही हरि राइ ॥
सलोकु ॥
दुख बिनसे सहसा गइओ सरनि गही हरि राइ ॥
मनि चिंदे फल पाइआ नानक हरि गुन गाइ ॥17॥
दुख बिनसे सहसा गइओ सरनि गही हरि राइ ॥
मनि चिंदे फल पाइआ नानक हरि गुन गाइ ॥17॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ हे नानक ! (जिस मनुष्य ने) प्रभू पातशाह का आसरा लिया। (उसके) सारे दुख नाश हो गए। (उसके अंदर से हरेक किस्म का) सहम दूर हो गया। परमातमा के गुण गा के (उसने अपने) मन में चितवे हुए सारे ही फल हासिल कर लिए। 17।
कोई गावै को सुणै कोई करै बीचारु ॥
पउड़ी ॥
कोई गावै को सुणै कोई करै बीचारु ॥
को उपदेसै को द्रिड़ै तिस का होइ उधारु ॥
किलबिख काटै होइ निरमला जनम जनम मलु जाइ ॥
हलति पलति मुखु ऊजला नह पोहै तिसु माइ ॥
सो सुरता सो बैसनो सो गिआनी धनवंतु ॥
सो सूरा कुलवंतु सोइ जिनि भजिआ भगवंतु ॥
खत्री ब्राहमणु सूदु बैसु उधरै सिमरि चंडाल ॥
जिनि जानिओ प्रभु आपना नानक तिसहि रवाल ॥17॥
कोई गावै को सुणै कोई करै बीचारु ॥
को उपदेसै को द्रिड़ै तिस का होइ उधारु ॥
किलबिख काटै होइ निरमला जनम जनम मलु जाइ ॥
हलति पलति मुखु ऊजला नह पोहै तिसु माइ ॥
सो सुरता सो बैसनो सो गिआनी धनवंतु ॥
सो सूरा कुलवंतु सोइ जिनि भजिआ भगवंतु ॥
खत्री ब्राहमणु सूदु बैसु उधरै सिमरि चंडाल ॥
जिनि जानिओ प्रभु आपना नानक तिसहि रवाल ॥17॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ जो कोई मनुष्य (परमात्मा के गुण) गाता है। जो कोई मनुष्य (परमात्मा की सिफत सलाह) सुनता है। जो कोई मनुष्य (परमात्मा के गुणों को अपने) मन में बसाता है। जो कोई मनुष्य (परमात्मा की सिफत सालाह करने का औरों को) उपदेश देता है (और खुद भी उस सिफत सालाह को अपने मन में) पक्की तरह टिकाता है। उस मनुष्य का विकारों से बचाव हो जाता है। वह मनुष्य (अपने अंदर से) विकार काट लेता है। उसका जीवन पवित्र हो जाता है। अनेको जन्मों (के किए हुए विकारों) की मैल (उसके अंदर से) दूर हो जाती है। इस लोक में (भी उसका) मुंह रौशन रहता है (क्योंकि) माया उसपे अपना प्रभाव नहीं डाल सकती। वह परमात्मा के साथ गहरी सांझ वाला है; वह ऊँचे आचरन वाला है; वह (असल) धनवान है; वह प्रभू-चरणों में सुरति जोड़े रखने वाला है। वह (विकारों का टाकरा करने वाला असल) शूरवीर है वही उच्च कुल वाला है। (हे भाई !) जिस (मनुष्य) ने भगवान का भजन किया है (हे भाई ! कोई) क्षत्रिय (हो। कोई) ब्राहमण (हो। कोई) शूद्र (हो। कोई) वैश (हो। कोई) चण्डाल (हो। किसी भी वर्ण का हो। परमात्मा का नाम) सिमर के (वह विकारों से) बच जाता है। जिस (भी मनुष्य) ने अपने परमात्मा के साथ गहरी सांझ डाली है। नानक उसके चरणों की धूड़ (मांगता है)। 17।
सतिगुरु पुरखु दइआलु है जिस नो समतु सभु कोइ ॥
गउड़ी की वार महला 4 ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सलोक मः 4 ॥
सतिगुरु पुरखु दइआलु है जिस नो समतु सभु कोइ ॥
एक द्रिसटि करि देखदा मन भावनी ते सिधि होइ ॥
सतिगुर विचि अंम्रितु है हरि उतमु हरि पदु सोइ ॥
नानक किरपा ते हरि धिआईऐ गुरमुखि पावै कोइ ॥1॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सलोक मः 4 ॥
सतिगुरु पुरखु दइआलु है जिस नो समतु सभु कोइ ॥
एक द्रिसटि करि देखदा मन भावनी ते सिधि होइ ॥
सतिगुर विचि अंम्रितु है हरि उतमु हरि पदु सोइ ॥
नानक किरपा ते हरि धिआईऐ गुरमुखि पावै कोइ ॥1॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी की वार महला 4 ॥ ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। श्लोक महला 4॥ सतिगुरू सब जीवों पर मेहर करने वाला है। उसके लिए हरेक जीव एक समान है। वह सब की ओर एक निगाह से देखता है। पर (जीव को अपने उद्यम की) सफलता अपने मन की भावना के कारण होती है (भाव। जैसी मन की भावना तैसी मुराद मिलती है)। सतिगुरू के पास हरी के श्रेष्ठ नाम का अमृत है। (पर) हे नानक ! यही हरी-नाम। जीव (प्रभू की) कृपा से सिमरता है। सतिगुरू से सन्मुख हो के कोई (भाग्यशाली) ही हासिल कर सकता है। 1।
हउमै माइआ सभ बिखु है नित जगि तोटा संसारि ॥
मः 4 ॥
हउमै माइआ सभ बिखु है नित जगि तोटा संसारि ॥
लाहा हरि धनु खटिआ गुरमुखि सबदु वीचारि ॥
हउमै मैलु बिखु उतरै हरि अंम्रितु हरि उर धारि ॥
हउमै माइआ सभ बिखु है नित जगि तोटा संसारि ॥
लाहा हरि धनु खटिआ गुरमुखि सबदु वीचारि ॥
हउमै मैलु बिखु उतरै हरि अंम्रितु हरि उर धारि ॥
हिन्दी अर्थ: महला 4॥ माया से उपजा हुआ अहंकार निरोल जहर (का काम करता) है। इसके पीछे लगने से सदा जगत में घाटा है। प्रभू के नाम धन का लाभ सतिगुरू के सन्मुख रहके शबद के विचार के द्वारा कमाया (जा सकता है)। और अहंकार की मैल (रूपी) जहर। प्रभू का अमृत नाम हृदय में धारन करने से उतर जाती है। (ये नाम की दाति प्रभू के हाथ में है)।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ४: गुरु राम दास जी; महला ५: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ३०० खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।