Lulla Family

अंग 30

अंग
30
राग Siree Raag
राग: Siree Raag · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
हरि जीउ सदा धिआइ तू गुरमुखि एकंकारु ॥1॥ रहाउ ॥
गुरमुखा के मुख उजले गुर सबदी बीचारि ॥
हलति पलति सुखु पाइदे जपि जपि रिदै मुरारि ॥
घर ही विचि महलु पाइआ गुर सबदी वीचारि ॥2॥
सतगुर ते जो मुह फेरहि मथे तिन काले ॥
अनदिनु दुख कमावदे नित जोहे जम जाले ॥
सुपनै सुखु न देखनी बहु चिंता परजाले ॥3॥
सभना का दाता एकु है आपे बखस करेइ ॥
कहणा किछू न जावई जिसु भावै तिसु देइ ॥
नानक गुरमुखि पाईऐ आपे जाणै सोइ ॥4॥9॥42॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: गुरू की शरण पड़ कर आप सर्व-व्यापक परमात्मा को सिमरता रह।1।रहाउ। जो लोग गुरू के सन्मुख रहते हैं गुरू के शबद के द्वारा (परमात्मा के गुणों को) विचार के (वह) सदा सुर्खरू रहते हैं। वह अपने हृदय में परमात्मा का नाम सिमर सिमर के लोक परलोक में सुख भोगते हैं। गुरू के शबद की बरकति से परमात्मा के नाम को याद करके उन्होंने अपने हृदय में परमात्मा का निवास स्थान ढूंढ लिया होता है।2। जो मनुष्य गुरू से बेमुख होते हैं उनके माथे भ्रष्ट हो जाते हैं। (उन्हें अपने अंदर से फिटकार ही पड़ती रहती है)। वह सदा वही करतूतें करते हैं जिनका फल दुख होता है। वह सदा जम के जाल में जम की ताक में रहते हैं। कभी सपने में भी उन्हें सुख नहीं मिलता। बहुत सारी चिंताएं उन्हें जलाती रहती हैं।3। वह परमात्मा सभ जीवों को दातें देने वाला है, वह स्वयं ही बख्शिश करता है। पर कुछ कहा नहीं जा सकता (कि मनमुख क्यूँ नाम चेते नहीं करता और गुरमुख क्यूँ सिमरता है?) जिस पर वह प्रसंन्न होता है उसको नाम की दात देता है। वह स्वयं ही (हरेक जीव के दिल की) जानता है। हे नानक! (उसकी मेहर से) गुरू की शरण पड़ने से उससे मिलाप होता है।4।9।42।
सिरीरागु महला 3 ॥
सचा साहिबु सेवीऐ सचु वडिआई देइ ॥
गुर परसादी मनि वसै हउमै दूरि करेइ ॥
इहु मनु धावतु ता रहै जा आपे नदरि करेइ ॥1॥
भाई रे गुरमुखि हरि नामु धिआइ ॥
नामु निधानु सद मनि वसै महली पावै थाउ ॥1॥ रहाउ ॥
मनमुख मनु तनु अंधु है तिस नउ ठउर न ठाउ ॥
बहु जोनी भउदा फिरै जिउ सुंञैं घरि काउ ॥
गुरमती घटि चानणा सबदि मिलै हरि नाउ ॥2॥
त्रै गुण बिखिआ अंधु है माइआ मोह गुबार ॥
लोभी अन कउ सेवदे पड़ि वेदा करै पूकार ॥
बिखिआ अंदरि पचि मुए ना उरवारु न पारु ॥3॥
माइआ मोहि विसारिआ जगत पिता प्रतिपालि ॥
बाझहु गुरू अचेतु है सभ बधी जमकालि ॥
नानक गुरमति उबरे सचा नामु समालि ॥4॥10॥43॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 3 ॥ (हे भाई!) सदा स्थिर रहने वाले मालिक प्रभू को सिमरना चाहिए (जो सिमरता है उसे) सदा स्थिर प्रभू आदर देता है। गुरू की मेहर से जिसके मन में प्रभू बसता है वह अपने अंदर अहंकार दूर कर लेता है। (पर किसी के बस की बात नहीं। माया बड़ी मोहनी है) जब प्रभू खुद ही मेहर की निगाह करता है तभी ये मन (माया के पीछे) दौड़ने से हटता है।1। हे भाई ! गुरू की शरण में पड़ कर परमात्मा का नाम सिमर। जिस मनुष्य के मन में नाम खजाना सदा बसता है वह परमात्मा के चरणों में ठिकाना ढूंढ लेता है।1।रहाउ। अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य का मन (माया के मोह में) अंधा हो जाता है। शरीर भी (भाव, हरेक ज्ञानेन्द्रियां भी) अंधा हो जाता है। उसे (आत्मिक शान्ति के लिए) कोई जगह नहीं मिलती। (माया के मोह में फंस के) वह अनेकों जोनियों में भटकता है (कहीं भी उसे आत्मिक शांति नहीं मिलती) जैसे किसी खाली घर में कौआ जाता है (तो वहां उसे मिलता कुछ नहीं)। गुरू की मति पर चलने से हृदय में प्रकाश (हो जाता है) (भाव, सही जीवन की समझ आ जाती है), गुरू शबद में जुड़ने से परमात्मा का नाम प्राप्त हो जाता है।2। त्रैगुणी माया के प्रभाव में जगत अंधा हो रहा है, माया के मोह का अंधेरा (चारों ओर पसरा हुआ है)। लोभ ग्रसे जीव (वैसे तो) वेदों को पढ़ के (उनके उपदेशों का) ढंढोरा देते हैं, (पर अंदर से प्रभू को विसार के) औरों की (भाव, माया की) सेवा करते हैं। माया के मोह में खुआर हो हो के आत्मिक मौत मर जाते हैं। (माया के मोह के घोर अंधकार में उनको) ना इस पार का कुछ दिखता है ना ही अगले पार का ।3। माया के मोह में फंस के जीवों ने जगत पिता पालणहार प्रभू को बिसार दिया है। गुरू (की शरण) के बगैर जीव गाफिल हो रहा है। (परमात्मा से बिछुड़ी हुई) सारी ख़लकत को आत्मिक मौत ने (अपने बंधनों में) जकड़ा हुआ है। हे नानक! गुरू की शिक्षा की बरकति से सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा का नाम हृदय में बसा के ही जीव (आत्मिक मौत के बंधनों से) बच सकते हैं।4।10।43।
सिरीरागु महला 3 ॥
त्रै गुण माइआ मोहु है गुरमुखि चउथा पदु पाइ ॥
करि किरपा मेलाइअनु हरि नामु वसिआ मनि आइ ॥
पोतै जिन कै पुंनु है तिन सतसंगति मेलाइ ॥1॥
भाई रे गुरमति साचि रहाउ ॥
साचो साचु कमावणा साचै सबदि मिलाउ ॥1॥ रहाउ ॥
जिनी नामु पछाणिआ तिन विटहु बलि जाउ ॥
आपु छोडि चरणी लगा चला तिन कै भाइ ॥
लाहा हरि हरि नामु मिलै सहजे नामि समाइ ॥2॥
बिनु गुर महलु न पाईऐ नामु न परापति होइ ॥
ऐसा सतगुरु लोड़ि लहु जिदू पाईऐ सचु सोइ ॥
असुर संघारै सुखि वसै जो तिसु भावै सु होइ ॥3॥
जेहा सतगुरु करि जाणिआ तेहो जेहा सुखु होइ ॥
एहु सहसा मूले नाही भाउ लाए जनु कोइ ॥
नानक एक जोति दुइ मूरती सबदि मिलावा होइ ॥4॥11॥44॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 3 ॥ (जगत में) त्रिगुणी माया का मोह (पसर रहा) है जो मनुष्य गुरू के सन्मुख रहता है वह उस आत्मिक दर्जे को हासिल कर लेता है जहां माया के तीनों गुणों का जोर नहीं पड़ सकता। परमात्मा ने मेहर करके जिन मनुष्यों को अपने चरणों में मिलाया है उनके मन में परमात्मा का नाम आ बसता है। जिनके भाग्य में नेकी है, परमात्मा उनको साध-संगति में मिलता है।1। हे भाई ! गुरू की मति ले के सदा स्थिर प्रभू में टिके रहो। सदा स्थिर प्रभू के सिमरन की ही कमाई करो, सदा स्थिर प्रभू की सिफत सलाह में जुड़े रहो ।1।रहाउ। मैं उन गुरमुखों के सदके जाता हूँ, जिन्होंने परमात्मा के नाम की कद्र समझी है। स्वै-भाव त्याग के मैं उनके चरणों में नत्मस्तक हूँ, मैं उनके अनुसार हो के चलता हूँ। (जो मनुष्य नाम जपने वालों की शरण लेता है वह) आत्मिक अडोलता से परमात्मा के नाम में लीन हो जाता है, उसको प्रभू का नाम रूपी लाभ हासिल हो जाता है।2। गुरू की शरण के बिना परमात्मा का दर नहीं मिलता, प्रभू का नाम नहीं मिलता (हे भाई! आप भी) ऐसा गुरू ढूंढ ले, जिससे वह सदा स्थिर रहने वाला परमात्मा मिल जाए। (जो मनुष्य गुरू के द्वारा परमात्मा को ढूंढ लेता है) वह कामादिक दैंतों को मार लेता है। वह आत्मिक आनन्द में टिका रहता है। (उसको निष्चय हो जाता है कि) जो कुछ परमात्मा को अच्छा लगता है वही होता है।3। कोई भी मनुष्य (गुरू चरणों में) श्रद्धा बना के देख ले, सत्गुरू को जैसा भी जिस किसी ने समझा है उसे वैसा आत्मिक आनन्द प्राप्त हुआ है। इस में रत्ती भर भी शक नहीं है (क्योंकि जिस सिख का गुरू के) शबद द्वारा मिलाप हो जाता है, हे नानक! (उस सिख और गुरू की) ज्योति एक हो जाती है, शरीर चाहे दो होते हैं।4।11।44।

श्री राग का सुर शाम के उतार पर बैठा है, जब दिन की चमक थक चुकी होती है। ग्रंथ साहिब की राग-व्यवस्था का यह पहला नाम है, और इसकी गम्भीरता उसी क्रम का संकेत है। पंजाब के पुराने सिख घरों में आज भी, सूर्यास्त के क़रीब, इसी राग की रचनाएँ कीर्तन-संगति का केन्द्र होती हैं। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।

अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “गुरू की शरण पड़ कर आप सर्व-व्यापक परमात्मा को सिमरता रह।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
English