अंग
30
सिरी राग
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हरि जीउ सदा धिआइ तू गुरमुखि एकंकारु ॥1॥ रहाउ ॥
हरि जीउ सदा धिआइ तू गुरमुखि एकंकारु ॥1॥ रहाउ ॥
गुरमुखा के मुख उजले गुर सबदी बीचारि ॥
हलति पलति सुखु पाइदे जपि जपि रिदै मुरारि ॥
घर ही विचि महलु पाइआ गुर सबदी वीचारि ॥2॥
सतगुर ते जो मुह फेरहि मथे तिन काले ॥
अनदिनु दुख कमावदे नित जोहे जम जाले ॥
सुपनै सुखु न देखनी बहु चिंता परजाले ॥3॥
सभना का दाता एकु है आपे बखस करेइ ॥
कहणा किछू न जावई जिसु भावै तिसु देइ ॥
नानक गुरमुखि पाईऐ आपे जाणै सोइ ॥4॥9॥42॥
गुरमुखा के मुख उजले गुर सबदी बीचारि ॥
हलति पलति सुखु पाइदे जपि जपि रिदै मुरारि ॥
घर ही विचि महलु पाइआ गुर सबदी वीचारि ॥2॥
सतगुर ते जो मुह फेरहि मथे तिन काले ॥
अनदिनु दुख कमावदे नित जोहे जम जाले ॥
सुपनै सुखु न देखनी बहु चिंता परजाले ॥3॥
सभना का दाता एकु है आपे बखस करेइ ॥
कहणा किछू न जावई जिसु भावै तिसु देइ ॥
नानक गुरमुखि पाईऐ आपे जाणै सोइ ॥4॥9॥42॥
हिन्दी अर्थ: गुरू की शरण पड़ कर आप सर्व-व्यापक परमात्मा को सिमरता रह।1।रहाउ। जो लोग गुरू के सन्मुख रहते हैं गुरू के शबद के द्वारा (परमात्मा के गुणों को) विचार के (वह) सदा सुर्खरू रहते हैं। वह अपने हृदय में परमात्मा का नाम सिमर सिमर के लोक परलोक में सुख भोगते हैं। गुरू के शबद की बरकति से परमात्मा के नाम को याद करके उन्होंने अपने हृदय में परमात्मा का निवास स्थान ढूंढ लिया होता है।2। जो मनुष्य गुरू से बेमुख होते हैं उनके माथे भ्रष्ट हो जाते हैं। (उन्हें अपने अंदर से फिटकार ही पड़ती रहती है)। वह सदा वही करतूतें करते हैं जिनका फल दुख होता है। वह सदा जम के जाल में जम की ताक में रहते हैं। कभी सपने में भी उन्हें सुख नहीं मिलता। बहुत सारी चिंताएं उन्हें जलाती रहती हैं।3। वह परमात्मा सभ जीवों को दातें देने वाला है, वह स्वयं ही बख्शिश करता है। पर कुछ कहा नहीं जा सकता (कि मनमुख क्यूँ नाम चेते नहीं करता और गुरमुख क्यूँ सिमरता है?) जिस पर वह प्रसंन्न होता है उसको नाम की दात देता है। वह स्वयं ही (हरेक जीव के दिल की) जानता है। हे नानक! (उसकी मेहर से) गुरू की शरण पड़ने से उससे मिलाप होता है।4।9।42।
सचा साहिबु सेवीऐ सचु वडिआई देइ ॥
सिरीरागु महला 3 ॥
सचा साहिबु सेवीऐ सचु वडिआई देइ ॥
गुर परसादी मनि वसै हउमै दूरि करेइ ॥
इहु मनु धावतु ता रहै जा आपे नदरि करेइ ॥1॥
भाई रे गुरमुखि हरि नामु धिआइ ॥
नामु निधानु सद मनि वसै महली पावै थाउ ॥1॥ रहाउ ॥
मनमुख मनु तनु अंधु है तिस नउ ठउर न ठाउ ॥
बहु जोनी भउदा फिरै जिउ सुंञैं घरि काउ ॥
गुरमती घटि चानणा सबदि मिलै हरि नाउ ॥2॥
त्रै गुण बिखिआ अंधु है माइआ मोह गुबार ॥
लोभी अन कउ सेवदे पड़ि वेदा करै पूकार ॥
बिखिआ अंदरि पचि मुए ना उरवारु न पारु ॥3॥
माइआ मोहि विसारिआ जगत पिता प्रतिपालि ॥
बाझहु गुरू अचेतु है सभ बधी जमकालि ॥
नानक गुरमति उबरे सचा नामु समालि ॥4॥10॥43॥
सचा साहिबु सेवीऐ सचु वडिआई देइ ॥
गुर परसादी मनि वसै हउमै दूरि करेइ ॥
इहु मनु धावतु ता रहै जा आपे नदरि करेइ ॥1॥
भाई रे गुरमुखि हरि नामु धिआइ ॥
नामु निधानु सद मनि वसै महली पावै थाउ ॥1॥ रहाउ ॥
मनमुख मनु तनु अंधु है तिस नउ ठउर न ठाउ ॥
बहु जोनी भउदा फिरै जिउ सुंञैं घरि काउ ॥
गुरमती घटि चानणा सबदि मिलै हरि नाउ ॥2॥
त्रै गुण बिखिआ अंधु है माइआ मोह गुबार ॥
लोभी अन कउ सेवदे पड़ि वेदा करै पूकार ॥
बिखिआ अंदरि पचि मुए ना उरवारु न पारु ॥3॥
माइआ मोहि विसारिआ जगत पिता प्रतिपालि ॥
बाझहु गुरू अचेतु है सभ बधी जमकालि ॥
नानक गुरमति उबरे सचा नामु समालि ॥4॥10॥43॥
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 3 ॥ (हे भाई!) सदा स्थिर रहने वाले मालिक प्रभू को सिमरना चाहिए (जो सिमरता है उसे) सदा स्थिर प्रभू आदर देता है। गुरू की मेहर से जिसके मन में प्रभू बसता है वह अपने अंदर अहंकार दूर कर लेता है। (पर किसी के बस की बात नहीं। माया बड़ी मोहनी है) जब प्रभू खुद ही मेहर की निगाह करता है तभी ये मन (माया के पीछे) दौड़ने से हटता है।1। हे भाई ! गुरू की शरण में पड़ कर परमात्मा का नाम सिमर। जिस मनुष्य के मन में नाम खजाना सदा बसता है वह परमात्मा के चरणों में ठिकाना ढूंढ लेता है।1।रहाउ। अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य का मन (माया के मोह में) अंधा हो जाता है। शरीर भी (भाव, हरेक ज्ञानेन्द्रियां भी) अंधा हो जाता है। उसे (आत्मिक शान्ति के लिए) कोई जगह नहीं मिलती। (माया के मोह में फंस के) वह अनेकों जोनियों में भटकता है (कहीं भी उसे आत्मिक शांति नहीं मिलती) जैसे किसी खाली घर में कौआ जाता है (तो वहां उसे मिलता कुछ नहीं)। गुरू की मति पर चलने से हृदय में प्रकाश (हो जाता है) (भाव, सही जीवन की समझ आ जाती है), गुरू शबद में जुड़ने से परमात्मा का नाम प्राप्त हो जाता है।2। त्रैगुणी माया के प्रभाव में जगत अंधा हो रहा है, माया के मोह का अंधेरा (चारों ओर पसरा हुआ है)। लोभ ग्रसे जीव (वैसे तो) वेदों को पढ़ के (उनके उपदेशों का) ढंढोरा देते हैं, (पर अंदर से प्रभू को विसार के) औरों की (भाव, माया की) सेवा करते हैं। माया के मोह में खुआर हो हो के आत्मिक मौत मर जाते हैं। (माया के मोह के घोर अंधकार में उनको) ना इस पार का कुछ दिखता है ना ही अगले पार का ।3। माया के मोह में फंस के जीवों ने जगत पिता पालणहार प्रभू को बिसार दिया है। गुरू (की शरण) के बगैर जीव गाफिल हो रहा है। (परमात्मा से बिछुड़ी हुई) सारी ख़लकत को आत्मिक मौत ने (अपने बंधनों में) जकड़ा हुआ है। हे नानक! गुरू की शिक्षा की बरकति से सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा का नाम हृदय में बसा के ही जीव (आत्मिक मौत के बंधनों से) बच सकते हैं।4।10।43।
त्रै गुण माइआ मोहु है गुरमुखि चउथा पदु पाइ ॥
सिरीरागु महला 3 ॥
त्रै गुण माइआ मोहु है गुरमुखि चउथा पदु पाइ ॥
करि किरपा मेलाइअनु हरि नामु वसिआ मनि आइ ॥
पोतै जिन कै पुंनु है तिन सतसंगति मेलाइ ॥1॥
भाई रे गुरमति साचि रहाउ ॥
साचो साचु कमावणा साचै सबदि मिलाउ ॥1॥ रहाउ ॥
जिनी नामु पछाणिआ तिन विटहु बलि जाउ ॥
आपु छोडि चरणी लगा चला तिन कै भाइ ॥
लाहा हरि हरि नामु मिलै सहजे नामि समाइ ॥2॥
बिनु गुर महलु न पाईऐ नामु न परापति होइ ॥
ऐसा सतगुरु लोड़ि लहु जिदू पाईऐ सचु सोइ ॥
असुर संघारै सुखि वसै जो तिसु भावै सु होइ ॥3॥
जेहा सतगुरु करि जाणिआ तेहो जेहा सुखु होइ ॥
एहु सहसा मूले नाही भाउ लाए जनु कोइ ॥
नानक एक जोति दुइ मूरती सबदि मिलावा होइ ॥4॥11॥44॥
त्रै गुण माइआ मोहु है गुरमुखि चउथा पदु पाइ ॥
करि किरपा मेलाइअनु हरि नामु वसिआ मनि आइ ॥
पोतै जिन कै पुंनु है तिन सतसंगति मेलाइ ॥1॥
भाई रे गुरमति साचि रहाउ ॥
साचो साचु कमावणा साचै सबदि मिलाउ ॥1॥ रहाउ ॥
जिनी नामु पछाणिआ तिन विटहु बलि जाउ ॥
आपु छोडि चरणी लगा चला तिन कै भाइ ॥
लाहा हरि हरि नामु मिलै सहजे नामि समाइ ॥2॥
बिनु गुर महलु न पाईऐ नामु न परापति होइ ॥
ऐसा सतगुरु लोड़ि लहु जिदू पाईऐ सचु सोइ ॥
असुर संघारै सुखि वसै जो तिसु भावै सु होइ ॥3॥
जेहा सतगुरु करि जाणिआ तेहो जेहा सुखु होइ ॥
एहु सहसा मूले नाही भाउ लाए जनु कोइ ॥
नानक एक जोति दुइ मूरती सबदि मिलावा होइ ॥4॥11॥44॥
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 3 ॥ (जगत में) त्रिगुणी माया का मोह (पसर रहा) है जो मनुष्य गुरू के सन्मुख रहता है वह उस आत्मिक दर्जे को हासिल कर लेता है जहां माया के तीनों गुणों का जोर नहीं पड़ सकता। परमात्मा ने मेहर करके जिन मनुष्यों को अपने चरणों में मिलाया है उनके मन में परमात्मा का नाम आ बसता है। जिनके भाग्य में नेकी है, परमात्मा उनको साध-संगति में मिलता है।1। हे भाई ! गुरू की मति ले के सदा स्थिर प्रभू में टिके रहो। सदा स्थिर प्रभू के सिमरन की ही कमाई करो, सदा स्थिर प्रभू की सिफत सलाह में जुड़े रहो ।1।रहाउ। मैं उन गुरमुखों के सदके जाता हूँ, जिन्होंने परमात्मा के नाम की कद्र समझी है। स्वै-भाव त्याग के मैं उनके चरणों में नत्मस्तक हूँ, मैं उनके अनुसार हो के चलता हूँ। (जो मनुष्य नाम जपने वालों की शरण लेता है वह) आत्मिक अडोलता से परमात्मा के नाम में लीन हो जाता है, उसको प्रभू का नाम रूपी लाभ हासिल हो जाता है।2। गुरू की शरण के बिना परमात्मा का दर नहीं मिलता, प्रभू का नाम नहीं मिलता (हे भाई! आप भी) ऐसा गुरू ढूंढ ले, जिससे वह सदा स्थिर रहने वाला परमात्मा मिल जाए। (जो मनुष्य गुरू के द्वारा परमात्मा को ढूंढ लेता है) वह कामादिक दैंतों को मार लेता है। वह आत्मिक आनन्द में टिका रहता है। (उसको निष्चय हो जाता है कि) जो कुछ परमात्मा को अच्छा लगता है वही होता है।3। कोई भी मनुष्य (गुरू चरणों में) श्रद्धा बना के देख ले, सत्गुरू को जैसा भी जिस किसी ने समझा है उसे वैसा आत्मिक आनन्द प्राप्त हुआ है। इस में रत्ती भर भी शक नहीं है (क्योंकि जिस सिख का गुरू के) शबद द्वारा मिलाप हो जाता है, हे नानक! (उस सिख और गुरू की) ज्योति एक हो जाती है, शरीर चाहे दो होते हैं।4।11।44।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ३: गुरु अमर दास जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ३० खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।