अंग 31

अंग
31
राग Siree Raag
राग: Siree Raag · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਛੋਡਿ ਬਿਖਿਆ ਲੋਭਾਣੇ ਸੇਵਾ ਕਰਹਿ ਵਿਡਾਣੀ ॥
ਆਪਣਾ ਧਰਮੁ ਗਵਾਵਹਿ ਬੂਝਹਿ ਨਾਹੀ ਅਨਦਿਨੁ ਦੁਖਿ ਵਿਹਾਣੀ ॥
ਮਨਮੁਖ ਅੰਧ ਨ ਚੇਤਹੀ ਡੂਬਿ ਮੁਏ ਬਿਨੁ ਪਾਣੀ ॥੧॥
ਮਨ ਰੇ ਸਦਾ ਭਜਹੁ ਹਰਿ ਸਰਣਾਈ ॥
ਗੁਰ ਕਾ ਸਬਦੁ ਅੰਤਰਿ ਵਸੈ ਤਾ ਹਰਿ ਵਿਸਰਿ ਨ ਜਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਇਹੁ ਸਰੀਰੁ ਮਾਇਆ ਕਾ ਪੁਤਲਾ ਵਿਚਿ ਹਉਮੈ ਦੁਸਟੀ ਪਾਈ ॥
ਆਵਣੁ ਜਾਣਾ ਜੰਮਣੁ ਮਰਣਾ ਮਨਮੁਖਿ ਪਤਿ ਗਵਾਈ ॥
ਸਤਗੁਰੁ ਸੇਵਿ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਜੋਤੀ ਜੋਤਿ ਮਿਲਾਈ ॥੨॥
ਸਤਗੁਰ ਕੀ ਸੇਵਾ ਅਤਿ ਸੁਖਾਲੀ ਜੋ ਇਛੇ ਸੋ ਫਲੁ ਪਾਏ ॥
ਜਤੁ ਸਤੁ ਤਪੁ ਪਵਿਤੁ ਸਰੀਰਾ ਹਰਿ ਹਰਿ ਮੰਨਿ ਵਸਾਏ ॥
ਸਦਾ ਅਨੰਦਿ ਰਹੈ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ਮਿਲਿ ਪ੍ਰੀਤਮ ਸੁਖੁ ਪਾਏ ॥੩॥
ਜੋ ਸਤਗੁਰ ਕੀ ਸਰਣਾਗਤੀ ਹਉ ਤਿਨ ਕੈ ਬਲਿ ਜਾਉ ॥
ਦਰਿ ਸਚੈ ਸਚੀ ਵਡਿਆਈ ਸਹਜੇ ਸਚਿ ਸਮਾਉ ॥
ਨਾਨਕ ਨਦਰੀ ਪਾਈਐ ਗੁਰਮੁਖਿ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਉ ॥੪॥੧੨॥੪੫॥
सिरीरागु महला ३ ॥
अंम्रितु छोडि बिखिआ लोभाणे सेवा करहि विडाणी ॥
आपणा धरमु गवावहि बूझहि नाही अनदिनु दुखि विहाणी ॥
मनमुख अंध न चेतही डूबि मुए बिनु पाणी ॥१॥
मन रे सदा भजहु हरि सरणाई ॥
गुर का सबदु अंतरि वसै ता हरि विसरि न जाई ॥१॥ रहाउ ॥
इहु सरीरु माइआ का पुतला विचि हउमै दुसटी पाई ॥
आवणु जाणा जंमणु मरणा मनमुखि पति गवाई ॥
सतगुरु सेवि सदा सुखु पाइआ जोती जोति मिलाई ॥२॥
सतगुर की सेवा अति सुखाली जो इछे सो फलु पाए ॥
जतु सतु तपु पवितु सरीरा हरि हरि मंनि वसाए ॥
सदा अनंदि रहै दिनु राती मिलि प्रीतम सुखु पाए ॥३॥
जो सतगुर की सरणागती हउ तिन कै बलि जाउ ॥
दरि सचै सची वडिआई सहजे सचि समाउ ॥
नानक नदरी पाईऐ गुरमुखि मेलि मिलाउ ॥४॥१२॥४५॥

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ३ ॥ अपने मन के पीछे चलने वाले लोग आत्मिक जीवन देने वाला नाम-रस छोड़ के माया में मस्त रहते हैं। (और माया की खातिर) औरों की (सेवा खुशामद) करते फिरते हैं। (इस तरह वह) अपना (मनुष्य जनम का) फर्ज भुला बैठते हैं। (पर) समझते नहीं~ और (उनकी उम्र) हर वक्त दुख में बीतती जाती है। (माया के मोह में) अंधे हुए मनमुख परमात्मा को नहीं याद करते। पानी के बिना ही डूब मरते हैं। (भाव~ विकारों में गलतान हो के आत्मिक मौत मरते हैं और प्राप्त भी कुछ नहीं होता)।1। हे (मेरे) मन! सदा परमात्मा की शरण पड़ा रह। (पर परमात्मा की शरण गुरू के शबद द्वारा ही प्राप्त होती है) जब गुरू का शबद हृदय में आ बसे~ तब परमात्मा (हृदय में से) नहीं बिसरता ।1।रहाउ। मनमुख का ये शरीर माया का पुतला बना रहता है (भाव~ मनमुख माया के हाथों में नाचता रहता है )। मनमुख के हृदय में अहम् भाव टिका रहता है और विकारों की बुराई टिकी रहती है। उसका जगत में आना जाना पैदा होना मरना हमेशा बना रहता है। मनमुख ने (लोक परलोक में) आदर-सत्कार भी गवा लिया। जिस ने सत्गुरू की बताई हुई सेवा की~ उसने आत्मक आनन्द प्राप्त कर लिया। उसकी जोति प्रभू की जोति में मिली रहती है।2। सतगुय की बताई हुई सेवा बहुत सुख देने वाली है (जो मनुष्य सेवा करता है वह) जो कुछ इच्छा करता है वही फल हासिल कर लेता है। गुरू की बताई सेवा ही जत सत तप (का मूल) है। (गुरमुख का) शरीर पवित्र हो जाता है। वह परमात्मा के नाम को अपने मन में बसा लेता है। गुरमुख दिन रात हर वक्त आत्मिक आनन्द में टिका रहता है~ प्रीतम प्रभू को मिल के वह आत्मक सुख भोगता है।3। जो मनुष्य सत्गुरू की शरण पड़ते हैं~ मैं उनसे कुर्बान जाता हूँ। उनको सदा स्थिर प्रभू के दर पे सदा ही आदर-सत्कार मिलता है। आत्मिक अडोलता की बरकति से उनको सदा स्थिर प्रभू में लीनता प्राप्त हो जाती है। हे नानक! ऐसे गुरमुखों की संगति में मिलाप परमात्मा की मेहर की नजर से ही मिलता है।4।12।45।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਮਨਮੁਖ ਕਰਮ ਕਮਾਵਣੇ ਜਿਉ ਦੋਹਾਗਣਿ ਤਨਿ ਸੀਗਾਰੁ ॥
ਸੇਜੈ ਕੰਤੁ ਨ ਆਵਈ ਨਿਤ ਨਿਤ ਹੋਇ ਖੁਆਰੁ ॥
ਪਿਰ ਕਾ ਮਹਲੁ ਨ ਪਾਵਈ ਨਾ ਦੀਸੈ ਘਰੁ ਬਾਰੁ ॥੧॥
ਭਾਈ ਰੇ ਇਕ ਮਨਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇ ॥
ਸੰਤਾ ਸੰਗਤਿ ਮਿਲਿ ਰਹੈ ਜਪਿ ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਸੁਖੁ ਪਾਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਦਾ ਸੋਹਾਗਣੀ ਪਿਰੁ ਰਾਖਿਆ ਉਰ ਧਾਰਿ ॥
ਮਿਠਾ ਬੋਲਹਿ ਨਿਵਿ ਚਲਹਿ ਸੇਜੈ ਰਵੈ ਭਤਾਰੁ ॥
ਸੋਭਾਵੰਤੀ ਸੋਹਾਗਣੀ ਜਿਨ ਗੁਰ ਕਾ ਹੇਤੁ ਅਪਾਰੁ ॥੨॥
ਪੂਰੈ ਭਾਗਿ ਸਤਗੁਰੁ ਮਿਲੈ ਜਾ ਭਾਗੈ ਕਾ ਉਦਉ ਹੋਇ ॥
ਅੰਤਰਹੁ ਦੁਖੁ ਭ੍ਰਮੁ ਕਟੀਐ ਸੁਖੁ ਪਰਾਪਤਿ ਹੋਇ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਭਾਣੈ ਜੋ ਚਲੈ ਦੁਖੁ ਨ ਪਾਵੈ ਕੋਇ ॥੩॥
ਗੁਰ ਕੇ ਭਾਣੇ ਵਿਚਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਹੈ ਸਹਜੇ ਪਾਵੈ ਕੋਇ ॥
ਜਿਨਾ ਪਰਾਪਤਿ ਤਿਨ ਪੀਆ ਹਉਮੈ ਵਿਚਹੁ ਖੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਈਐ ਸਚਿ ਮਿਲਾਵਾ ਹੋਇ ॥੪॥੧੩॥੪੬॥
सिरीरागु महला ३ ॥
मनमुख करम कमावणे जिउ दोहागणि तनि सीगारु ॥
सेजै कंतु न आवई नित नित होइ खुआरु ॥
पिर का महलु न पावई ना दीसै घरु बारु ॥१॥
भाई रे इक मनि नामु धिआइ ॥
संता संगति मिलि रहै जपि राम नामु सुखु पाइ ॥१॥ रहाउ ॥
गुरमुखि सदा सोहागणी पिरु राखिआ उर धारि ॥
मिठा बोलहि निवि चलहि सेजै रवै भतारु ॥
सोभावंती सोहागणी जिन गुर का हेतु अपारु ॥२॥
पूरै भागि सतगुरु मिलै जा भागै का उदउ होइ ॥
अंतरहु दुखु भ्रमु कटीऐ सुखु परापति होइ ॥
गुर कै भाणै जो चलै दुखु न पावै कोइ ॥३॥
गुर के भाणे विचि अंम्रितु है सहजे पावै कोइ ॥
जिना परापति तिन पीआ हउमै विचहु खोइ ॥
नानक गुरमुखि नामु धिआईऐ सचि मिलावा होइ ॥४॥१३॥४६॥

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ३ ॥ अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य के (धार्मिक) कार्य करने यूँ हैं जैसे कोई त्यागी हुई स्त्री (अपने) शरीर का श्रृंगार करती है। उस का पति (उस की) सेज पर कभी नहीं आता~ (वह व्यर्थ श्रृंगार करके) सदा खुआर होती है। (इस तरह मनमुख मनुष्य दिखावे के धार्मिक कामों से) प्रभू-पति की हजूरी प्राप्त नहीं कर सकता~ उसे प्रभू का दर-घर नहीं दिखता।1। हे भाई! एकाग्र मन हो के परमात्मा का नाम सिमर। जो मनुष्य साध-संगति में टिका रहता है वह परमात्मा का नाम सिमर के सुख प्राप्त करता है।1। सदा गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य सुहागनों (की तरह) हैं~ वे प्रभू पति को अपने हृदय में बसा के रखते हैं। वे (सभी से) मीठे बोल बोलते हैं। झुक के (अहम् भाव से हट के~ गरीब स्वभाव में) चलते हैं~ उनकी हृदय सेज को प्रभू-पति भोगता है। जिन मनुष्यों ने गुरू का अटॅुट प्यार (अपने हृदय में बसाया है) वह उन सुहागनों की तरह हैं जिन्होंने शोभा कमाई है।2। जब किसी मनुष्य के भाग्य जाग पड़ें~ तो अति किस्मत से उसे सत्गुरू मिल जाता है। (गुरू के मिलने से) हृदय में से दुख काटा जाता है~ भटकन दूर हो जाती है~ आत्मिक आनन्द की प्राप्ति होती है। जो भी मनुष्य गुरू के हुकम में है~ वह कभी भी दुख नहीं पाता।3। गुरू की रजा में नाम-अमृत है (जो रजा में चलता है) वह आत्मिक अडोलता में टिक के अंम्रित पीता है। जिन मनुष्यों को अमृत मिल गया~ उन्होंने अपने अंदर के अहंकार को दूर करके ही इसे पीया। हे नानक! गुरू की शरण पड़ कर प्रभू का नाम सिमरना चाहिए। (सिमरन की बरकति से) सदा स्थिर प्रभू में मेल हो जाता है।4।13।46।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਜਾ ਪਿਰੁ ਜਾਣੈ ਆਪਣਾ ਤਨੁ ਮਨੁ ਅਗੈ ਧਰੇਇ ॥
ਸੋਹਾਗਣੀ ਕਰਮ ਕਮਾਵਦੀਆ ਸੇਈ ਕਰਮ ਕਰੇਇ ॥
ਸਹਜੇ ਸਾਚਿ ਮਿਲਾਵੜਾ ਸਾਚੁ ਵਡਾਈ ਦੇਇ ॥੧॥
ਭਾਈ ਰੇ ਗੁਰ ਬਿਨੁ ਭਗਤਿ ਨ ਹੋਇ ॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਭਗਤਿ ਨ ਪਾਈਐ ਜੇ ਲੋਚੈ ਸਭੁ ਕੋਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਲਖ ਚਉਰਾਸੀਹ ਫੇਰੁ ਪਇਆ ਕਾਮਣਿ ਦੂਜੈ ਭਾਇ ॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਨੀਦ ਨ ਆਵਈ ਦੁਖੀ ਰੈਣਿ ਵਿਹਾਇ ॥
ਬਿਨੁ ਸਬਦੈ ਪਿਰੁ ਨ ਪਾਈਐ ਬਿਰਥਾ ਜਨਮੁ ਗਵਾਇ ॥੨॥
सिरीरागु महला ३ ॥
जा पिरु जाणै आपणा तनु मनु अगै धरेइ ॥
सोहागणी करम कमावदीआ सेई करम करेइ ॥
सहजे साचि मिलावड़ा साचु वडाई देइ ॥१॥
भाई रे गुर बिनु भगति न होइ ॥
बिनु गुर भगति न पाईऐ जे लोचै सभु कोइ ॥१॥ रहाउ ॥
लख चउरासीह फेरु पइआ कामणि दूजै भाइ ॥
बिनु गुर नीद न आवई दुखी रैणि विहाइ ॥
बिनु सबदै पिरु न पाईऐ बिरथा जनमु गवाइ ॥२॥

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ३ ॥ जब (कोई जीव-स्त्री) प्रभू-पति को अपना समझ लेती है (भाव~ प्रभु-पति के साथ याद कर करके गहरा अपनत्व डाल लेती है) तो वह अपना मन उस के हवाले कर देती है (भाव~ अपने मन के पीछे चलना छोड़ देती है)। अपना शरीर भी हवाले कर देती है। (भाव~ ज्ञानेन्द्रियां माया की ओर से हट जाती हैं)। वह जीव-स्त्री वही उद्यम करती है जो भगत जन करते हैं। (इस तरह) आत्मक अडोलता में टिकने से सदा स्थिर प्रभु में उसका मिलाप हो जाता है~ सदा स्थिर परमात्मा उसे (अपने घर में) आदर-सत्कार देता है।1। हे भाई! गुरू की शरण पड़ने के बिना परमात्मा की भक्ति नहीं हो सकती। अगर हरेक जीव भी (परमात्मा की भक्ति वास्ते) लालसा करे~ तो भी गुरू की शरण के~ बिना भक्ति (की दात) नहीं मिल सकती।1। पर~ जो जीव स्त्री माया के प्यार में रहती है। उसे चौरासी लाख योनियों का फेरा भुगतना पड़ता है । गुरू की शरण पड़ने के बिना आत्मिक शान्ति प्राप्त नहीं होती। उसकी (जिंदगी की रात) दुखों में गुजरती है। गुरू के शबद के बिना प्रभु-पति नहीं मिलता। (जो मनुष्य गुरू के शबद से वंचित रहता है) वह अपना मानव जीवन व्यर्थ कर लेता है।2।

संदर्भ: यह अंग 31 है, राग Siree Raag का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।

Jor Bagh metro station से Khan Market की 10-मिनट की walk में मन का थमना।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 39 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 31” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Siree Raag राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 32 →, पीछे का: ← अंग 30

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।