अंग 29

अंग
29
राग Siree Raag
राग: Siree Raag · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਲਖ ਚਉਰਾਸੀਹ ਤਰਸਦੇ ਜਿਸੁ ਮੇਲੇ ਸੋ ਮਿਲੈ ਹਰਿ ਆਇ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਰਿ ਪਾਇਆ ਸਦਾ ਹਰਿ ਨਾਮਿ ਸਮਾਇ ॥੪॥੬॥੩੯॥
लख चउरासीह तरसदे जिसु मेले सो मिलै हरि आइ ॥
नानक गुरमुखि हरि पाइआ सदा हरि नामि समाइ ॥४॥६॥३९॥

हिन्दी अर्थ: चौरासी लाख जूनियों के जीव (परमात्मा का मिलने के लिए) तरसते हैं। पर वही जीव परमात्मा से मिल सकता है जिस को वह खुद (अपने साथ) मिलाता है। हे नानक ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है वह परमात्मा को ढूँढ लेता है। वह सदा परमात्मा के नाम में लीन रहता है।4।6।39।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਸੁਖ ਸਾਗਰੁ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਹੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਾਇਆ ਜਾਇ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਨਾਮੁ ਧਿਆਈਐ ਸਹਜੇ ਨਾਮਿ ਸਮਾਇ ॥
ਅੰਦਰੁ ਰਚੈ ਹਰਿ ਸਚ ਸਿਉ ਰਸਨਾ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਇ ॥੧॥
ਭਾਈ ਰੇ ਜਗੁ ਦੁਖੀਆ ਦੂਜੈ ਭਾਇ ॥
ਗੁਰ ਸਰਣਾਈ ਸੁਖੁ ਲਹਹਿ ਅਨਦਿਨੁ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਾਚੇ ਮੈਲੁ ਨ ਲਾਗਈ ਮਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਹਰਿ ਧਿਆਇ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਬਦੁ ਪਛਾਣੀਐ ਹਰਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮਿ ਸਮਾਇ ॥
ਗੁਰ ਗਿਆਨੁ ਪ੍ਰਚੰਡੁ ਬਲਾਇਆ ਅਗਿਆਨੁ ਅੰਧੇਰਾ ਜਾਇ ॥੨॥
ਮਨਮੁਖ ਮੈਲੇ ਮਲੁ ਭਰੇ ਹਉਮੈ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਵਿਕਾਰੁ ॥
ਬਿਨੁ ਸਬਦੈ ਮੈਲੁ ਨ ਉਤਰੈ ਮਰਿ ਜੰਮਹਿ ਹੋਇ ਖੁਆਰੁ ॥
ਧਾਤੁਰ ਬਾਜੀ ਪਲਚਿ ਰਹੇ ਨਾ ਉਰਵਾਰੁ ਨ ਪਾਰੁ ॥੩॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਪ ਤਪ ਸੰਜਮੀ ਹਰਿ ਕੈ ਨਾਮਿ ਪਿਆਰੁ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਦਾ ਧਿਆਈਐ ਏਕੁ ਨਾਮੁ ਕਰਤਾਰੁ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਧਿਆਈਐ ਸਭਨਾ ਜੀਆ ਕਾ ਆਧਾਰੁ ॥੪॥੭॥੪੦॥
सिरीरागु महला ३ ॥
सुख सागरु हरि नामु है गुरमुखि पाइआ जाइ ॥
अनदिनु नामु धिआईऐ सहजे नामि समाइ ॥
अंदरु रचै हरि सच सिउ रसना हरि गुण गाइ ॥१॥
भाई रे जगु दुखीआ दूजै भाइ ॥
गुर सरणाई सुखु लहहि अनदिनु नामु धिआइ ॥१॥ रहाउ ॥
साचे मैलु न लागई मनु निरमलु हरि धिआइ ॥
गुरमुखि सबदु पछाणीऐ हरि अंम्रित नामि समाइ ॥
गुर गिआनु प्रचंडु बलाइआ अगिआनु अंधेरा जाइ ॥२॥
मनमुख मैले मलु भरे हउमै त्रिसना विकारु ॥
बिनु सबदै मैलु न उतरै मरि जंमहि होइ खुआरु ॥
धातुर बाजी पलचि रहे ना उरवारु न पारु ॥३॥
गुरमुखि जप तप संजमी हरि कै नामि पिआरु ॥
गुरमुखि सदा धिआईऐ एकु नामु करतारु ॥
नानक नामु धिआईऐ सभना जीआ का आधारु ॥४॥७॥४०॥

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ३ ॥ परमात्मा का नाम सुखों का समुंद्र है~ पर यह मिलता है गुरू की शरण पड़ने से। प्रभू नाम से आत्मिक अडोलता में लीन हो के हर वक्त परमात्मा का नाम सिमरना चाहिए। जीभ से हरि के गुण गा के हृदय सदा स्थिर प्रभू के साथ एक-मेक हो जाता है।1। हे भाई! (परमात्मा को भुला के माया आदि) और प्यार में पड़ के जगत दुखी हो रहा है। तू गुरू की शरण पड़ के हर रोज परमात्मा का नाम सिमर; (इस तरह) सुख प्राप्त करेगा।1।रहाउ। सदा स्थिर परमात्मा को (विकारों की) मैल नहीं लग सकती। (उस) परमात्मा का नाम सिमरने से (सिमरन वाले मनुष्य का) मन (भी) पवित्र हो जाता है। गुरू की शरण पड़ के परमात्मा की सिफति सलाह की बाणी के साथ गहरी सांझ डालनी चाहिए। (जो ये सांझ डालता है वह) आत्मिक जीवन देने वाले हरि नाम में लीन हो जाता है । (जिस मनुष्य ने अपने अंदर) गुरू का ज्ञान अच्छी तरह रौशन कर लिया है (उसके अंदर से) अज्ञानता का अंधेरा दूर हो जाता है।2। अपने मन के पीछे चलने वाले लोग मलीन मन रहते हैं~ विकारों की मैल के साथ लिबड़े रहते हैं। उनके अंदर अहम् की लालच का रोग टिका रहता है। यह मैल गुरू के शबद के बिना नहीं उतरती। (शबद के बिना) आत्मिक मौत में खुआर हो के जन्म-मरण के चक्कर में पड़े रहते हैं। वह इस नाशवंत जगत खेल में फंसे रहते हैं। इसमें से उनका ना इस पार का ना ही उस पार की प्राप्ति होती है।3। जो मनुष्य गुरू के सन्मुख रहता है वह सिमरन करता है वह सेवा करता है वह अपने आपको विकारों से बचा के रखता है। वह परमात्मा के नाम में प्यार पाता है। (हे भाई!) गुरू की शरण पड़ कर सदा ही करतार के नाम को सिमरना चाहिए। हे नानक! परमात्मा का नाम (ही) सिमरना चाहिए~ (परमात्मा का नाम) सभ जीवों (की जिंदगी) का आसरा है।4।7।40।
ਸ੍ਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਮਨਮੁਖੁ ਮੋਹਿ ਵਿਆਪਿਆ ਬੈਰਾਗੁ ਉਦਾਸੀ ਨ ਹੋਇ ॥
ਸਬਦੁ ਨ ਚੀਨੈ ਸਦਾ ਦੁਖੁ ਹਰਿ ਦਰਗਹਿ ਪਤਿ ਖੋਇ ॥
ਹਉਮੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਖੋਈਐ ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਸੁਖੁ ਹੋਇ ॥੧॥
ਮੇਰੇ ਮਨ ਅਹਿਨਿਸਿ ਪੂਰਿ ਰਹੀ ਨਿਤ ਆਸਾ ॥
ਸਤਗੁਰੁ ਸੇਵਿ ਮੋਹੁ ਪਰਜਲੈ ਘਰ ਹੀ ਮਾਹਿ ਉਦਾਸਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਕਰਮ ਕਮਾਵੈ ਬਿਗਸੈ ਹਰਿ ਬੈਰਾਗੁ ਅਨੰਦੁ ॥
ਅਹਿਨਿਸਿ ਭਗਤਿ ਕਰੇ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ਹਉਮੈ ਮਾਰਿ ਨਿਚੰਦੁ ॥
ਵਡੈ ਭਾਗਿ ਸਤਸੰਗਤਿ ਪਾਈ ਹਰਿ ਪਾਇਆ ਸਹਜਿ ਅਨੰਦੁ ॥੨॥
ਸੋ ਸਾਧੂ ਬੈਰਾਗੀ ਸੋਈ ਹਿਰਦੈ ਨਾਮੁ ਵਸਾਏ ॥
ਅੰਤਰਿ ਲਾਗਿ ਨ ਤਾਮਸੁ ਮੂਲੇ ਵਿਚਹੁ ਆਪੁ ਗਵਾਏ ॥
ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ਸਤਗੁਰੂ ਦਿਖਾਲਿਆ ਹਰਿ ਰਸੁ ਪੀਆ ਅਘਾਏ ॥੩॥
ਜਿਨਿ ਕਿਨੈ ਪਾਇਆ ਸਾਧਸੰਗਤੀ ਪੂਰੈ ਭਾਗਿ ਬੈਰਾਗਿ ॥
ਮਨਮੁਖ ਫਿਰਹਿ ਨ ਜਾਣਹਿ ਸਤਗੁਰੁ ਹਉਮੈ ਅੰਦਰਿ ਲਾਗਿ ॥
ਨਾਨਕ ਸਬਦਿ ਰਤੇ ਹਰਿ ਨਾਮਿ ਰੰਗਾਏ ਬਿਨੁ ਭੈ ਕੇਹੀ ਲਾਗਿ ॥੪॥੮॥੪੧॥
स्रीरागु महला ३ ॥
मनमुखु मोहि विआपिआ बैरागु उदासी न होइ ॥
सबदु न चीनै सदा दुखु हरि दरगहि पति खोइ ॥
हउमै गुरमुखि खोईऐ नामि रते सुखु होइ ॥१॥
मेरे मन अहिनिसि पूरि रही नित आसा ॥
सतगुरु सेवि मोहु परजलै घर ही माहि उदासा ॥१॥ रहाउ ॥
गुरमुखि करम कमावै बिगसै हरि बैरागु अनंदु ॥
अहिनिसि भगति करे दिनु राती हउमै मारि निचंदु ॥
वडै भागि सतसंगति पाई हरि पाइआ सहजि अनंदु ॥२॥
सो साधू बैरागी सोई हिरदै नामु वसाए ॥
अंतरि लागि न तामसु मूले विचहु आपु गवाए ॥
नामु निधानु सतगुरू दिखालिआ हरि रसु पीआ अघाए ॥३॥
जिनि किनै पाइआ साधसंगती पूरै भागि बैरागि ॥
मनमुख फिरहि न जाणहि सतगुरु हउमै अंदरि लागि ॥
नानक सबदि रते हरि नामि रंगाए बिनु भै केही लागि ॥४॥८॥४१॥

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ३ ॥ अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य माया के मोह में फंसा ही रहता है। (उसके अंदर) ना परमात्मा की लगन पैदा होती है ना ही माया की तरफ से उपरामता। वह मनुष्य गुरू के शबद को नहीं विचारता~ (इस वास्ते उसको) सदा दुख घेर के रखते हैं। परमात्मा की दरगाह में भी वह अपनी इज्जत गवा लेता है। पर~ गुरू की बताई राह में चलने से अहम् दूर हो जाता है~ नाम में रंग जाता है और सुख प्राप्त होता है।1। हे मेरे मन! (तेरे अंदर तो) दिन रात सदा (माया की) आस भरी रहती है। (हे मन!) सतिगुरू की बतायी हुई सेवा कर (तभी माया का) मोह अच्छी तरह जल सकता है। (तभी) गृहस्थ में रहते हुए ही (माया से) उपराम हो सकते हैं।1। गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य (गुरू के बताए हुये) कर्म करता है व (भीतर से) आनन्दित रहता है। (क्योंकि उसके अंदर) परमात्मा का प्रेम है और आत्मिक सुख है। वह दिन रात हर समय परमात्मा की भक्ति करता है। (अपने अंदर से) अहम् को दूर करके वह बेफिक्र रहता है। बड़ी किस्मत से उसको साध-संगति प्राप्त हो जाती है~ जहां उसको परमात्मा का मिलाप हो जाता है~ और वह आत्मिक अडोलता में (टिका हुआ) सुख भोगता है।2। वह मनुष्य (असल) साधू है वही बैरागी है जो अपने हृदय में प्रभू का नाम बसाता है। उसके अंदर विकारों की कालिख कभी भी असर नहीं करती~ वह अपने अंदर से अहम् भाव गवा के रखता है। सतिगुरू ने उसको परमात्मा का नाम खजाना (उसके अंदर ही) दिखा दिया होता है और वह नाम-रस पूरी तृप्ति से पीता है।3। परमात्मा को जिस किसी ने ढूंढा है साध-संगति में ही बड़ी किस्मत से प्रभू-प्रेम में जुड़ के ढूंढा है। पर अपने मन के पीछे चलने वाले लोग (बाहर जंगलों आदि में) घूमते फिरते हैं। वे सत्गुरू की (वडियाई को~ बड़ेपन को) नहीं समझते~ उनके अंदर अहम् (की मैल) लगी रहती है। हे नानक! जो मनुष्य गुरू के शबद में रंगे गये हैं वे परमात्मा नाम-रंग में रंगे जाते हैं (पर~ पाह के बिना पॅका रंग नहीं चढ़ता~ और नाम-रंग में रंगे जाने के वास्ते प्रभू के) भय-अदब के बिना पाह नहीं मिल सकती।4।8।41।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਘਰ ਹੀ ਸਉਦਾ ਪਾਈਐ ਅੰਤਰਿ ਸਭ ਵਥੁ ਹੋਇ ॥
ਖਿਨੁ ਖਿਨੁ ਨਾਮੁ ਸਮਾਲੀਐ ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਾਵੈ ਕੋਇ ॥
ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ਅਖੁਟੁ ਹੈ ਵਡਭਾਗਿ ਪਰਾਪਤਿ ਹੋਇ ॥੧॥
ਮੇਰੇ ਮਨ ਤਜਿ ਨਿੰਦਾ ਹਉਮੈ ਅਹੰਕਾਰੁ ॥
सिरीरागु महला ३ ॥
घर ही सउदा पाईऐ अंतरि सभ वथु होइ ॥
खिनु खिनु नामु समालीऐ गुरमुखि पावै कोइ ॥
नामु निधानु अखुटु है वडभागि परापति होइ ॥१॥
मेरे मन तजि निंदा हउमै अहंकारु ॥

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ३ ॥ (परमात्मा का नाम रूप) सारा (उत्तम) पदार्थ (मनुष्य के) हृदय में ही है। (गुरू की शरण पड़ने से) ये सौदा हृदय में से ही मिल जाता है। (गुरू की शरण पड़ के) स्वास स्वास परमात्मा नाम सिमरना चाहिए। जो कोई नाम प्राप्त करता है गुरू के द्वारा ही प्राप्त करता है। जिसे बड़ी किस्मत से ये खजाना मिलता है (उससे कभी खत्म नहीं होता) (क्योंकि) नाम खजाना कभी खत्म होने वाला नहीं।1। हे मेरे मन! निंदा करनी छोड़ दे~ (अपने अंदर से) अहम् दूर कर ।

संदर्भ: यह अंग 29 है, राग Siree Raag का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।

दिल्ली के Sunday-morning के bhajan-मण्डली, घर में dadiji सुन रहीं।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 37 पंक्तियों का है, 4 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 29” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Siree Raag राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 30 →, पीछे का: ← अंग 28

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।