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अंग 296

अंग
296
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सुखमनी साहिब का हिस्सा। पूरी 24 अष्टपदियों की हिन्दी टीका /sukhmani-sahib/ पर है।
गिआनु स्रेसट ऊतम इसनानु ॥
चारि पदारथ कमल प्रगास ॥
सभ कै मधि सगल ते उदास ॥
सुंदरु चतुरु तत का बेता ॥
समदरसी एक द्रिसटेता ॥
इह फल तिसु जन कै मुखि भने ॥ गुर नानक नाम बचन मनि सुने ॥6॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: श्रेष्ठ ज्ञान, बढ़िया से बढ़िया (भाव – तीर्थों का) स्नान; (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) चारों पदार्थ,हृदय कमल का खिलना; सभी में रहते हुए भी सभी से उपराम रहना; सुंदर। समझदार (जगत के) मूल तत्व को जानने वाला। सब को ऐक जैसा जानना और सब को एक नजर से देखना; ये सारे फल; हे नानक ! उस मनुष्य के अंदर आ बसते हैं; जो गुरू के शबद और प्रभू का नाम मुँह से उचारता है और मन लगा के सुनता है। 6।
इहु निधानु जपै मनि कोइ ॥
सभ जुग महि ता की गति होइ ॥
गुण गोबिंद नाम धुनि बाणी ॥
सिम्रिति सासत्र बेद बखाणी ॥
सगल मतांत केवल हरि नाम ॥
गोबिंद भगत कै मनि बिस्राम ॥
कोटि अप्राध साधसंगि मिटै ॥
संत क्रिपा ते जम ते छुटै ॥
जा कै मसतकि करम प्रभि पाए ॥
साध सरणि नानक ते आए ॥7॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: जो भी मनुष्य इस नाम को (जो गुणों का) खजाना है। जपता है। सारी उम्र उसकी उच्च आत्मिक अवस्था बनी रहती है। उस मनुष्य के (साधारण) वचन भी गोबिंद के गुण और नाम की रौंअ के ही होते हैं। स्मृतियों, शास्त्रों और वेदों ने भी यही बात कही है। सारे मतों का निचोड़ प्रभू का नाम ही है। इस नाम का निवास प्रभू के भगत के मन में होता है। (जो मनुष्य नाम जपता है उस के) करोड़ों पाप सत्संग में रह के मिट जाते हैं। गुरू की कृपा से वह मनुष्य जमों से बच जाता है। (पर) हे नानक ! जिन के माथे पर प्रभू ने (नाम की) बख्शिश के लेख लिख धरे हैं। वह मनुष्य गुरू की शरण आते हैं। 7।
जिसु मनि बसै सुनै लाइ प्रीति ॥
तिसु जन आवै हरि प्रभु चीति ॥
जनम मरन ता का दूखु निवारै ॥
दुलभ देह ततकाल उधारै ॥
निरमल सोभा अंम्रित ता की बानी ॥
एकु नामु मन माहि समानी ॥
दूख रोग बिनसे भै भरम ॥
साध नाम निरमल ता के करम ॥
सभ ते ऊच ता की सोभा बनी ॥
नानक इह गुणि नामु सुखमनी ॥8॥24॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: जिस मनुष्य के मन में (नाम) बसता है जो प्रीत लगा के (नाम) सुनता है। उस को प्रभू याद आता है; उस मनुष्य के पैदा होने मरने के कष्ट काटे जाते हैं। वह इस दुर्लभ मानव-शरीर को उसी वक्त (विकारों से) बचा लेता है। उसकी बेदाग शोभा और उसकी बाणी (नाम-) अमृत से भरपूर होती है। (क्योंकि) उसके मन में प्रभू का नाम ही बसा रहता है। दुख, रोग, डर और वहम उसके नाश हो जाते हैं। उसका नाम ‘साधु’ पड़ जाता है और उसके काम (विकारों की) मैल से साफ होते हैं। सबसे ऊँची शोभा उसको मिलती है। हे नानक ! इस गुण के कारण (प्रभू का) नाम सुखों की मणी है (भाव- सर्वोक्तम सुख है)। 8। 24।
थिती गउड़ी महला 5 ॥
सलोकु ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जलि थलि महीअलि पूरिआ सुआमी सिरजनहारु ॥
अनिक भांति होइ पसरिआ नानक एकंकारु ॥1॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: थिती गउड़ी महला 5 ॥ सलोकु- ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे नानक ! सारे जगत को पैदा करने वाला मालिक प्रभू जल में। धरती में और आकाश में भरपूर है। वह एक अकाल-पुरख अनेकों ही तरीकों से (जगत में हर जगह) बिखरा हुआ है।
पउड़ी ॥
एकम एकंकारु प्रभु करउ बंदना धिआइ ॥
गुण गोबिंद गुपाल प्रभ सरनि परउ हरि राइ ॥
ता की आस कलिआण सुख जा ते सभु कछु होइ ॥
चारि कुंट दह दिसि भ्रमिओ तिसु बिनु अवरु न कोइ ॥
बेद पुरान सिम्रिति सुने बहु बिधि करउ बीचारु ॥
पतित उधारन भै हरन सुख सागर निरंकार ॥
दाता भुगता देनहारु तिसु बिनु अवरु न जाइ ॥
जो चाहहि सोई मिलै नानक हरि गुन गाइ ॥1॥
गोबिंद जसु गाईऐ हरि नीत ॥
मिलि भजीऐ साधसंगि मेरे मीत ॥1॥ रहाउ ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी- (हे भाई !) मैं एक अकाल-पुरख प्रभू को सिमर के (उसके आगे ही) नमस्कार करता हूँ। मैं गोबिंद, गोपाल, प्रभू के गुण (गाता हूँ और उस) प्रभू पातशाह की शरण पड़ता हूँ। (हे भाई !) जिस मालिक प्रभू (के हुकम) से ही (जगत में) सब कुछ हो रहा है। उसकी आस रखने से सारे सुख मिलते हैं। मैंने चारों कुंटों और दसों दिशाओं में घूम के देख लिया है उस (मालिक प्रभू) के बिना और कोई (रक्षक) नहीं। (हे भाई !) वेद। पुराण। स्मृतियां (आदि धर्म-पुस्तकें) सुन के मैं (और भी) अनेकों ढंग-तरीकों से विचार करता हूँ (और इस नतीजे पर पहुँचता हूँ कि) आकार-रहित परमात्मा ही (विकारों में) गिरे हुए जीवों को (विकारों से) बचाने वाला है (जीवों के) सारे डर दूर करने वाला है और सुखों का समुंद्र है। वह परमात्मा ही सब दातें देने वाला है। (सब जीवों में व्यापक हो के सारे पदार्थ) भोगने वाला है। सब कुछ देने की स्मर्था वाला है। उसके बिना (जीवों के लिए) और कोई जगह-आसरा नहीं। 1। हे नानक ! (सदा) परमात्मा के गुण गाता रह। (उससे) जो कुछ आप चाहेगा वही मिल जाता है। हे मेरे मित्र ! सदा ही गोबिंद प्रभू की सिफत-सालाह गाते रहना चाहिए। साधसंगति में मिल के (उसका) भजन सिमरन करना चाहिए। रहाउ।
सलोकु ॥
करउ बंदना अनिक वार सरनि परउ हरि राइ ॥
भ्रमु कटीऐ नानक साधसंगि दुतीआ भाउ मिटाइ ॥2॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सलोकु- (हे भाई !) मैं प्रभू पातशाह की शरण पड़ता हूँ और (उसके दर पर) अनेकों बार नमस्कार करता हूँ। हे नानक ! साध-संगति में रह के (प्रभू के बिना) और-और मोह-प्यार दूर करने से मन की भटकना दूर हो जाती है। 2।
पउड़ी ॥
दुतीआ दुरमति दूरि करि गुर सेवा करि नीत ॥
राम रतनु मनि तनि बसै तजि कामु क्रोधु लोभु मीत ॥
मरणु मिटै जीवनु मिलै बिनसहि सगल कलेस ॥
आपु तजहु गोबिंद भजहु भाउ भगति परवेस ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी- (हे भाई !) सदा गुरू की बताई हुई सेवा करता रह। (और इस तरह अपने अंदर से) खोटी मति निकाल। हे मित्र ! (अपने अंदर से) काम-क्रोध-लोभ दूर कर। (जो मनुष्य ये उद्यम करता है उसके) मन में हृदय में रतन (जैसा कीमती) प्रभू नाम आ बसता है। (जो मनुष्य ऐसा करने का प्रयत्न करता है उसको) आत्मिक जीवन मिल जाता है। उसे (स्वच्छ पवित्र) जीवन मिल जाता है। उसके सारे दुख-कलेश मिट जाते हैं। (हे मित्र ! अपने मन में से) अहंकार दूर करो और परमात्मा का भजन करो। उसके अंदर प्रभू प्रेम आ बसता है। प्रभू की भक्ति आ बसती है।

गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “श्रेष्ठ ज्ञान, बढ़िया से बढ़िया (भाव – तीर्थों का) स्नान; (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) चारों पदार्थ,हृदय कमल का खिलना; सभी में रहते हुए भी सभी से उपराम रहना; सुंदर।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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