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अंग २९५ · गउड़ी

अंग
295
गउड़ी
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  1. जिसु प्रसादि सभु जगतु तराइआ ॥
  2. पूरा प्रभु आराधिआ पूरा जा का नाउ ॥
  3. पूरे गुर का सुनि उपदेसु ॥
  4. खेम कुसल सहज आनंद ॥
  5. उतम सलोक साध के बचन ॥
  6. सरनि जोगु सुनि सरनी आए ॥
  7. प्रभ की उसतति करहु संत मीत ॥
  8. खेम सांति रिधि नव निधि ॥

जिसु प्रसादि सभु जगतु तराइआ ॥

अंग २९४ से चला आ रहा अंश

जिसु प्रसादि सभु जगतु तराइआ ॥
जन आवन का इहै सुआउ ॥
जन कै संगि चिति आवै नाउ ॥
आपि मुकतु मुकतु करै संसारु ॥
नानक तिसु जन कउ सदा नमसकारु ॥8॥23॥

हिन्दी अर्थ: जिस मनुष्य की मेहर से सारा जगत का ही उद्धार होता है। ऐसे मनुष्य के आने का यही मनोरथ है कि उसकी संगति में (रह के और मनुष्यों को प्रभू का) नाम चेते आता है। वह मनुष्य खुद (माया से) आजाद है जगत को भी आजाद करता है; हे नानक ! ऐसे (उक्तम) मनुष्य को हमारा सदा प्रणाम है। 8। 23।

पूरा प्रभु आराधिआ पूरा जा का नाउ ॥

सलोकु ॥
पूरा प्रभु आराधिआ पूरा जा का नाउ ॥
नानक पूरा पाइआ पूरे के गुन गाउ ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक ॥ (जिस मनुष्य ने) अटॅल नाम वाले पूरन प्रभू को सिमरा है। उसे वह पूरन प्रभू मिल गया है। (इस वास्ते) हे नानक ! आप भी पूरन प्रभू के गुण गा। 1।

पूरे गुर का सुनि उपदेसु ॥

असटपदी ॥
पूरे गुर का सुनि उपदेसु ॥
पारब्रहमु निकटि करि पेखु ॥
सासि सासि सिमरहु गोबिंद ॥
मन अंतर की उतरै चिंद ॥
आस अनित तिआगहु तरंग ॥
संत जना की धूरि मन मंग ॥
आपु छोडि बेनती करहु ॥
साधसंगि अगनि सागरु तरहु ॥
हरि धन के भरि लेहु भंडार ॥
नानक गुर पूरे नमसकार ॥1॥

हिन्दी अर्थ: अष्टपदी ॥ (हे मन !) पूरे सतिगुरू की शिक्षा सुन। और अकाल-पुरख को (हर जगह) नजदीक जान के देख। (हे भाई !) हर दम प्रभू को याद कर। (ताकि) आपके मन के अंदर की चिंता मिट जाए। हे मन ! नित्य ना रहने वाली (चीजों की) आशाओं की लहरें त्याग दे। और संत जनों के पैरों की ख़ाक मांग। (हे भाई !) स्वैभाव छोड़ के (प्रभू के आगे) अरदास कर। (और इस तरह) साधसंगति में (रह के) (विकारों की) आग के समुंद्र से पार लांघ। हे नानक ! प्रभू-नाम-रूपी धन के खजाने भर ले और पूरे सतिगुरू को नमस्कार कर। 1।

खेम कुसल सहज आनंद ॥

खेम कुसल सहज आनंद ॥
साधसंगि भजु परमानंद ॥
नरक निवारि उधारहु जीउ ॥
गुन गोबिंद अंम्रित रसु पीउ ॥
चिति चितवहु नाराइण एक ॥
एक रूप जा के रंग अनेक ॥
गोपाल दामोदर दीन दइआल ॥
दुख भंजन पूरन किरपाल ॥
सिमरि सिमरि नामु बारं बार ॥
नानक जीअ का इहै अधार ॥2॥

हिन्दी अर्थ: अटॅल सुख, आसान जीवन और आत्मिक अडोलता के आनंद प्राप्त होंगे (हे भाई !) साध-संगति में परम-सुख प्रभू को सिमर। नर्कों को दूर करके जीवात्मा को बचा ले- गोबिंद के गुण गा (नाम-) अमृत का रस पी। उस एक प्रभू का ध्यान चित्त में धर। जिस एक अकाल-पुरख के अनेकों रंग हैं। दीनों पर दया करने वाला गोपाल दामोदर दुखों का नाश करने वाला सब में व्यापक और मेहर का जो घर है। हे नानक ! उस का नाम बारंबार याद कर। जिंद का आसरा ये नाम ही है। 2।

उतम सलोक साध के बचन ॥

उतम सलोक साध के बचन ॥
अमुलीक लाल एहि रतन ॥
सुनत कमावत होत उधार ॥
आपि तरै लोकह निसतार ॥
सफल जीवनु सफलु ता का संगु ॥
जा कै मनि लागा हरि रंगु ॥
जै जै सबदु अनाहदु वाजै ॥
सुनि सुनि अनद करे प्रभु गाजै ॥
प्रगटे गुपाल महांत कै माथे ॥
नानक उधरे तिन कै साथे ॥3॥

हिन्दी अर्थ: साधु (गुरू) के बचन सबसे अच्छी सिफत सालाह की बाणी है। ये अमूल्य लाल हैं, अमोलक रत्न हैं। (इन वचनों को) सुनने से और कमाने से बेड़ा पार होता है। (जो कमाता है) वह स्वयं तैरता है और लोगों का भी निस्तारा करता है। उसकी जिंदगी पूरी मुरादों वाली होती है उसकी संगति औरों की भी मुरादें पूरी करती है। जिस मनुष्य के मन में प्रभू के लिए प्यार बन जाता है। (उसके अंदर) जै-जैकार की गूँज हमेशा चलती रहती है जिसे सुन के (भाव महिसूस करके) वह खुश होता है (क्योंकि) प्रभू (उसके अंदर) अपना नूर रौशन करता है। गोपाल प्रभू की ऊँची करणी वाले बंदे के माथे पर प्रगट होते हैं। हे नानक ! ऐसे मनुष्य के साथ और कई मनुष्यों का बेड़ा पार होता है। 3।

सरनि जोगु सुनि सरनी आए ॥

सरनि जोगु सुनि सरनी आए ॥
करि किरपा प्रभ आप मिलाए ॥
मिटि गए बैर भए सभ रेन ॥
अंम्रित नामु साधसंगि लैन ॥
सुप्रसंन भए गुरदेव ॥
पूरन होई सेवक की सेव ॥
आल जंजाल बिकार ते रहते ॥
राम नाम सुनि रसना कहते ॥
करि प्रसादु दइआ प्रभि धारी ॥
नानक निबही खेप हमारी ॥4॥

हिन्दी अर्थ: हे प्रभू ! ये सुन के आप दर आए की बाँह थामने में समर्थ हैं। हम आपके दर पर आए थे। आपने मेहर करके (हमें) अपने साथ मिला लिया है। (अब हमारे) वैर मिट गए हैं हम सब के पैरों की ख़ाक हो गए हैं (अब) साध-संगति में अमर करने वाला नाम जप रहे हैं। गुरदेव जी (हमारे पर) प्रसन्न हो गए हैं। इस वास्ते (हमारी) सेवकों की सेवा सफल हो गई है। (हम अब) घर के धंधों और विकारों से बच गए हैं। प्रभू का नाम सुन के जीभ से (भी) उचारते हैं। हे नानक ! प्रभू ने मेहर करके (हम पर) दया की है। और हमारा किया हुआ व्यापार दरगाह में कबूल हो गया है। 4।

प्रभ की उसतति करहु संत मीत ॥

प्रभ की उसतति करहु संत मीत ॥
सावधान एकागर चीत ॥
सुखमनी सहज गोबिंद गुन नाम ॥
जिसु मनि बसै सु होत निधान ॥
सरब इछा ता की पूरन होइ ॥
प्रधान पुरखु प्रगटु सभ लोइ ॥
सभ ते ऊच पाए असथानु ॥
बहुरि न होवै आवन जानु ॥
हरि धनु खाटि चलै जनु सोइ ॥
नानक जिसहि परापति होइ ॥5॥

हिन्दी अर्थ: हे संत मित्र ! अकाल-पुरख की सिफत सालाह - ध्यान से चित्त के एक निशाने पर टिका के करो। प्रभू की सिफत सालाह और प्रभू का नाम अडोल अवस्था (का कारण है और) सुखों की मणि (रतन) है। जिसके मन में (नाम) बसता है वह (गुणों का) खजाना हो जाता है। उस मनुष्य की सारी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं। वह आदमी सबसे बड़ा बन जाता है और सारे जगत में प्रसिद्ध हो जाता है। उसको ऊँचे से ऊँचा ठिकाना मिल जाता है। दुबारा उसे जनम मरन (का चक्कर नहीं) व्यापता। वह मनुष्य प्रभू का नाम-रूपी धन कमा के (जगत से) जाता है। हे नानक ! जिस मनुष्य को (धुर से ही) ये दाति मिलती है। 5।

खेम सांति रिधि नव निधि ॥

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खेम सांति रिधि नव निधि ॥
बुधि गिआनु सरब तह सिधि ॥
बिदिआ तपु जोगु प्रभ धिआनु ॥

हिन्दी अर्थ: अटॅल सुख मन का टिकाव। रिद्धियां और नौ खजाने। अक्ल, ज्ञान और सारी ही करामातें उस मनुष्य में (आ जाती हैं)। विद्या, तप, जोग, अकाल-पुरख का ध्यान।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग २९५ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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