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अंग 295

अंग
295
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सुखमनी साहिब का हिस्सा। पूरी 24 अष्टपदियों की हिन्दी टीका /sukhmani-sahib/ पर है।
जिसु प्रसादि सभु जगतु तराइआ ॥
जन आवन का इहै सुआउ ॥
जन कै संगि चिति आवै नाउ ॥
आपि मुकतु मुकतु करै संसारु ॥
नानक तिसु जन कउ सदा नमसकारु ॥8॥23॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: जिस मनुष्य की मेहर से सारा जगत का ही उद्धार होता है। ऐसे मनुष्य के आने का यही मनोरथ है कि उसकी संगति में (रह के और मनुष्यों को प्रभू का) नाम चेते आता है। वह मनुष्य खुद (माया से) आजाद है जगत को भी आजाद करता है; हे नानक ! ऐसे (उक्तम) मनुष्य को हमारा सदा प्रणाम है। 8। 23।
सलोकु ॥
पूरा प्रभु आराधिआ पूरा जा का नाउ ॥
नानक पूरा पाइआ पूरे के गुन गाउ ॥1॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक ॥ (जिस मनुष्य ने) अटॅल नाम वाले पूरन प्रभू को सिमरा है। उसे वह पूरन प्रभू मिल गया है। (इस वास्ते) हे नानक ! आप भी पूरन प्रभू के गुण गा। 1।
असटपदी ॥
पूरे गुर का सुनि उपदेसु ॥
पारब्रहमु निकटि करि पेखु ॥
सासि सासि सिमरहु गोबिंद ॥
मन अंतर की उतरै चिंद ॥
आस अनित तिआगहु तरंग ॥
संत जना की धूरि मन मंग ॥
आपु छोडि बेनती करहु ॥
साधसंगि अगनि सागरु तरहु ॥
हरि धन के भरि लेहु भंडार ॥
नानक गुर पूरे नमसकार ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: अष्टपदी ॥ (हे मन !) पूरे सतिगुरू की शिक्षा सुन। और अकाल-पुरख को (हर जगह) नजदीक जान के देख। (हे भाई !) हर दम प्रभू को याद कर। (ताकि) आपके मन के अंदर की चिंता मिट जाए। हे मन ! नित्य ना रहने वाली (चीजों की) आशाओं की लहरें त्याग दे। और संत जनों के पैरों की ख़ाक मांग। (हे भाई !) स्वैभाव छोड़ के (प्रभू के आगे) अरदास कर। (और इस तरह) साधसंगति में (रह के) (विकारों की) आग के समुंद्र से पार लांघ। हे नानक ! प्रभू-नाम-रूपी धन के खजाने भर ले और पूरे सतिगुरू को नमस्कार कर। 1।
खेम कुसल सहज आनंद ॥
साधसंगि भजु परमानंद ॥
नरक निवारि उधारहु जीउ ॥
गुन गोबिंद अंम्रित रसु पीउ ॥
चिति चितवहु नाराइण एक ॥
एक रूप जा के रंग अनेक ॥
गोपाल दामोदर दीन दइआल ॥
दुख भंजन पूरन किरपाल ॥
सिमरि सिमरि नामु बारं बार ॥
नानक जीअ का इहै अधार ॥2॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: अटॅल सुख, आसान जीवन और आत्मिक अडोलता के आनंद प्राप्त होंगे (हे भाई !) साध-संगति में परम-सुख प्रभू को सिमर। नर्कों को दूर करके जीवात्मा को बचा ले- गोबिंद के गुण गा (नाम-) अमृत का रस पी। उस एक प्रभू का ध्यान चित्त में धर। जिस एक अकाल-पुरख के अनेकों रंग हैं। दीनों पर दया करने वाला गोपाल दामोदर दुखों का नाश करने वाला सब में व्यापक और मेहर का जो घर है। हे नानक ! उस का नाम बारंबार याद कर। जिंद का आसरा ये नाम ही है। 2।
उतम सलोक साध के बचन ॥
अमुलीक लाल एहि रतन ॥
सुनत कमावत होत उधार ॥
आपि तरै लोकह निसतार ॥
सफल जीवनु सफलु ता का संगु ॥
जा कै मनि लागा हरि रंगु ॥
जै जै सबदु अनाहदु वाजै ॥
सुनि सुनि अनद करे प्रभु गाजै ॥
प्रगटे गुपाल महांत कै माथे ॥
नानक उधरे तिन कै साथे ॥3॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: साधु (गुरू) के बचन सबसे अच्छी सिफत सालाह की बाणी है। ये अमूल्य लाल हैं, अमोलक रत्न हैं। (इन वचनों को) सुनने से और कमाने से बेड़ा पार होता है। (जो कमाता है) वह स्वयं तैरता है और लोगों का भी निस्तारा करता है। उसकी जिंदगी पूरी मुरादों वाली होती है उसकी संगति औरों की भी मुरादें पूरी करती है। जिस मनुष्य के मन में प्रभू के लिए प्यार बन जाता है। (उसके अंदर) जै-जैकार की गूँज हमेशा चलती रहती है जिसे सुन के (भाव महिसूस करके) वह खुश होता है (क्योंकि) प्रभू (उसके अंदर) अपना नूर रौशन करता है। गोपाल प्रभू की ऊँची करणी वाले बंदे के माथे पर प्रगट होते हैं। हे नानक ! ऐसे मनुष्य के साथ और कई मनुष्यों का बेड़ा पार होता है। 3।
सरनि जोगु सुनि सरनी आए ॥
करि किरपा प्रभ आप मिलाए ॥
मिटि गए बैर भए सभ रेन ॥
अंम्रित नामु साधसंगि लैन ॥
सुप्रसंन भए गुरदेव ॥
पूरन होई सेवक की सेव ॥
आल जंजाल बिकार ते रहते ॥
राम नाम सुनि रसना कहते ॥
करि प्रसादु दइआ प्रभि धारी ॥
नानक निबही खेप हमारी ॥4॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: हे प्रभू ! ये सुन के आप दर आए की बाँह थामने में स्मर्थ है। हम आपके दर पर आए थे। तूने मेहर करके (हमें) अपने साथ मिला लिया है। (अब हमारे) वैर मिट गए हैं हम सब के पैरों की ख़ाक हो गए हैं (अब) साध-संगति में अमर करने वाला नाम जप रहे हैं। गुरदेव जी (हमारे पर) प्रसन्न हो गए हैं। इस वास्ते (हमारी) सेवकों की सेवा सफल हो गई है। (हम अब) घर के धंधों और विकारों से बच गए हैं। प्रभू का नाम सुन के जीभ से (भी) उचारते हैं। हे नानक ! प्रभू ने मेहर करके (हम पर) दया की है। और हमारा किया हुआ व्यापार दरगाह में कबूल हो गया है। 4।
प्रभ की उसतति करहु संत मीत ॥
सावधान एकागर चीत ॥
सुखमनी सहज गोबिंद गुन नाम ॥
जिसु मनि बसै सु होत निधान ॥
सरब इछा ता की पूरन होइ ॥
प्रधान पुरखु प्रगटु सभ लोइ ॥
सभ ते ऊच पाए असथानु ॥
बहुरि न होवै आवन जानु ॥
हरि धनु खाटि चलै जनु सोइ ॥
नानक जिसहि परापति होइ ॥5॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: हे संत मित्र ! अकाल-पुरख की सिफत सालाह – ध्यान से चित्त के एक निशाने पर टिका के करो। प्रभू की सिफत सालाह और प्रभू का नाम अडोल अवस्था (का कारण है और) सुखों की मणि (रतन) है। जिसके मन में (नाम) बसता है वह (गुणों का) खजाना हो जाता है। उस मनुष्य की सारी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं। वह आदमी सबसे बड़ा बन जाता है और सारे जगत में प्रसिद्ध हो जाता है। उसको ऊँचे से ऊँचा ठिकाना मिल जाता है। दुबारा उसे जनम मरन (का चक्कर नहीं) व्यापता। वह मनुष्य प्रभू का नाम-रूपी धन कमा के (जगत से) जाता है। हे नानक ! जिस मनुष्य को (धुर से ही) ये दाति मिलती है। 5।
खेम सांति रिधि नव निधि ॥
बुधि गिआनु सरब तह सिधि ॥
बिदिआ तपु जोगु प्रभ धिआनु ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: अटॅल सुख मन का टिकाव। रिद्धियां और नौ खजाने। अक्ल, ज्ञान और सारी ही करामातें उस मनुष्य में (आ जाती हैं)। विद्या, तप, जोग, अकाल-पुरख का ध्यान।

गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जिस मनुष्य की मेहर से सारा जगत का ही उद्धार होता है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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