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अंग 291

अंग
291
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सुखमनी साहिब का हिस्सा। पूरी 24 अष्टपदियों की हिन्दी टीका /sukhmani-sahib/ पर है।
आपन खेलु आपि वरतीजा ॥
नानक करनैहारु न दूजा ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (जगत रूपी) अपनी खेल प्रभू ने स्वयं बनाई है। (उसके बिना इस खेल को) बनाने वाला और कोई नहीं। 1।
जब होवत प्रभ केवल धनी ॥
तब बंध मुकति कहु किस कउ गनी ॥
जब एकहि हरि अगम अपार ॥
तब नरक सुरग कहु कउन अउतार ॥
जब निरगुन प्रभ सहज सुभाइ ॥
तब सिव सकति कहहु कितु ठाइ ॥
जब आपहि आपि अपनी जोति धरै ॥
तब कवन निडरु कवन कत डरै ॥
आपन चलित आपि करनैहार ॥
नानक ठाकुर अगम अपार ॥2॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: जब मालिक प्रभू सिर्फ (स्वयं ही) था। तब बताओ किसे बंधनों में फंसा हुआ। और किसे मुक्त समझें? जब अगम और बेअंत प्रभू एक खुद ही था। तब बताओ,नर्कों और स्वर्गों में आने वाले कौन से जीव थे? जब सहज स्वभाव ही प्रभू निर्गुण था (त्रिगुणी माया से परे था)। (भाव। जब उसने माया रची ही नहीं थी) तब बताओ, कहाँ थे जीव और कहाँ थी माया? जब प्रभू खुद ही अपनी ज्योति जगाए बैठा था। तब कौन निडर थे और कौन किससे डरते थे? अपने तमाश आप ही करने वाला है। हे नानक ! अकाल-पुरख अगम और बेअंत है; 2।
अबिनासी सुख आपन आसन ॥
तह जनम मरन कहु कहा बिनासन ॥
जब पूरन करता प्रभु सोइ ॥
तब जम की त्रास कहहु किसु होइ ॥
जब अबिगत अगोचर प्रभ एका ॥
तब चित्र गुपत किसु पूछत लेखा ॥
जब नाथ निरंजन अगोचर अगाधे ॥
तब कउन छुटे कउन बंधन बाधे ॥
आपन आप आप ही अचरजा ॥
नानक आपन रूप आप ही उपरजा ॥3॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: जब अकाल-पुरख अपनी मौज में अपने ही स्वरूप में टिका बैठा था। तब बताओ, पैदा होना, मरना व मौत कहाँ थी? जब करतार पूरन प्रभू खुद ही था। तब बताओ, मौत का डर किस को हो सकता था? जब अदृष्य और अगोचर प्रभू एक खुद ही था। तब चित्रगुप्त किससे लेखा पूछ सकते थे? जब मालिक माया-रहित अथाह अगोचर स्वयं ही था। तो कौन माया के बंधनों से मुक्त था और कौन माया के बंधनों में बंधे हुए हैं? वह आश्चर्य जनक प्रभू अपने जैसा खुद ही है। हे नानक ! अपना आकार उसने स्वयं ही पैदा किया है। 3।
जह निरमल पुरखु पुरख पति होता ॥
तह बिनु मैलु कहहु किआ धोता ॥
जह निरंजन निरंकार निरबान ॥
तह कउन कउ मान कउन अभिमान ॥
जह सरूप केवल जगदीस ॥
तह छल छिद्र लगत कहु कीस ॥
जह जोति सरूपी जोति संगि समावै ॥
तह किसहि भूख कवनु त्रिपतावै ॥
करन करावन करनैहारु ॥
नानक करते का नाहि सुमारु ॥4॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: जिस अवस्था में जीवों का मालिक निर्मल प्रभू स्वयं ही था वहाँ वह मैल-रहित था। तो बताओ, उसने कौन सी मैल धोनी थी? जहाँ माया रहित आकार रहित और वासना रहित प्रभू ही था। वहाँ गुमान-अहंकार किसे होना था? जहाँ केवल जगत के मालिक प्रभू की ही हस्ती थी। वहाँ बताएं, छल और ऐब किसे लग सकते थे? जब ज्योति-रूप प्रभू खुद ही ज्योति में लीन था। तब किसे (माया की) भूख हो सकती थी और कौन तृप्त था? करतार खुद ही सब कुछ करने वाला और जीवों से कराने वाला है। हे नानक ! करतार का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। 4।
जब अपनी सोभा आपन संगि बनाई ॥
तब कवन माइ बाप मित्र सुत भाई ॥
जह सरब कला आपहि परबीन ॥
तह बेद कतेब कहा कोऊ चीन ॥
जब आपन आपु आपि उरि धारै ॥
तउ सगन अपसगन कहा बीचारै ॥
जह आपन ऊच आपन आपि नेरा ॥
तह कउन ठाकुरु कउनु कहीऐ चेरा ॥
बिसमन बिसम रहे बिसमाद ॥
नानक अपनी गति जानहु आपि ॥5॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: जब प्रभू ने अपनी शोभा अपने साथ बनाई थी (भाव- जब कोई और उसकी शोभा करने वाला नहीं था) तो कौन माँ, पिता, मित्र, पुत्र अथवा भाई थे? जब अकाल पुरख स्वयं ही सारी ताकतों में प्रवीण था। तब कहाँ कोई वेद (हिंदू धर्म पुस्तक) और कतेबों को (मुसलमानों की धर्म पुस्तकें) विचारता था? जब प्रभू अपने आप को खुद ही अपने आप में टिकाए बैठा था। अच्छे-बुरे शगुन (अपशगुन) कौन सोचता था? बताएं, जब प्रभू अपने आप ही उच्च और निम्न था तब मालिक कौन था और सेवक कौन था? जीव आपकी गति तलाशते हुए हैरान और आश्चर्यचकित हैं रहे हैं। हे नानक ! (प्रभू के आगे अरदास कर और कह, हे प्रभू !) आप अपनी गति आप ही जानता है। 5।
जह अछल अछेद अभेद समाइआ ॥
ऊहा किसहि बिआपत माइआ ॥
आपस कउ आपहि आदेसु ॥
तिहु गुण का नाही परवेसु ॥
जह एकहि एक एक भगवंता ॥
तह कउनु अचिंतु किसु लागै चिंता ॥
जह आपन आपु आपि पतीआरा ॥
तह कउनु कथै कउनु सुननैहारा ॥
बहु बेअंत ऊच ते ऊचा ॥
नानक आपस कउ आपहि पहूचा ॥6॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: जिस अवस्था में अछल-अबिनाशी और अभेद प्रभू (अपने आप में) टिका हुआ है। वहाँ किसे माया छू सकती है? (जब) प्रभू अपने आप को ही नमस्कार करता है। (माया के) तीन गुणों का (उस पर) असर नहीं पड़ता। जब भगवान केवल एक खुद ही था। तब कौन बेफिक्र था और किसको कोई चिंता लगती थी। जब अपने आप को पतियाने वाला प्रभू स्वयं ही था। तब कौन बोलता था और कौन सुनने वाला था? हे नानक ! प्रभू बड़ा बेअंत है। सबसे ऊँचा है। अपने आप तक आप ही पहुँचने वाला है। 6।
जह आपि रचिओ परपंचु अकारु ॥
तिहु गुण महि कीनो बिसथारु ॥
पापु पुंनु तह भई कहावत ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: जब प्रभू ने स्वयं जगत की खेल रच दी। और माया के तीन गुणों का पसारा पसार दिया; तब ये बात चल पड़ी कि ये पाप है ये पुंन है।

गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! (जगत रूपी) अपनी खेल प्रभू ने स्वयं बनाई है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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