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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 291 · गउड़ी

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अंग
291
गउड़ी
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  1. आपन खेलु आपि वरतीजा ॥
  2. जब होवत प्रभ केवल धनी ॥
  3. अबिनासी सुख आपन आसन ॥
  4. जह निरमल पुरखु पुरख पति होता ॥
  5. जब अपनी सोभा आपन संगि बनाई ॥
  6. जह अछल अछेद अभेद समाइआ ॥
  7. जह आपि रचिओ परपंचु अकारु ॥

गुरु अर्जन देव जी · सुखमनी · राग गउड़ी

आपन खेलु आपि वरतीजा ॥

अंग 290 से चला आ रहा अंश

आपन खेलु आपि वरतीजा ॥
नानक करनैहारु न दूजा ॥1॥

हिन्दी अर्थ: हे नानक! (जगत रूपी) अपनी खेल प्रभू ने स्वयं बनाई है। (उसके बिना इस खेल को) बनाने वाला और कोई नहीं। 1।

गुरु अर्जन देव जी · सुखमनी · राग गउड़ी

जब होवत प्रभ केवल धनी ॥

जब होवत प्रभ केवल धनी ॥
तब बंध मुकति कहु किस कउ गनी ॥
जब एकहि हरि अगम अपार ॥
तब नरक सुरग कहु कउन अउतार ॥
जब निरगुन प्रभ सहज सुभाइ ॥
तब सिव सकति कहहु कितु ठाइ ॥
जब आपहि आपि अपनी जोति धरै ॥
तब कवन निडरु कवन कत डरै ॥
आपन चलित आपि करनैहार ॥
नानक ठाकुर अगम अपार ॥2॥

हिन्दी अर्थ: जब मालिक प्रभू सिर्फ (स्वयं ही) था, तब बताएँ किसे बंधनों में फंसा हुआ। और किसे मुक्त समझें? जब अगम और बेअंत प्रभू एक खुद ही था, तब बताएँ,नर्कों और स्वर्गों में आने वाले कौन से जीव थे? जब सहज स्वभाव ही प्रभू निर्गुण था (त्रिगुणी माया से परे था)। (भाव, जब उसने माया रची ही नहीं थी) तब बताएँ, कहाँ थे जीव और कहाँ थी माया? जब प्रभू खुद ही अपनी ज्योति जगाए बैठा था, तब कौन निडर थे और कौन किससे डरते थे? अपने तमाश स्वयं ही करने वाला है। हे नानक! अकाल-पुरख अगम और बेअंत है; 2।

गुरु अर्जन देव जी · सुखमनी · राग गउड़ी

अबिनासी सुख आपन आसन ॥

अबिनासी सुख आपन आसन ॥
तह जनम मरन कहु कहा बिनासन ॥
जब पूरन करता प्रभु सोइ ॥
तब जम की त्रास कहहु किसु होइ ॥
जब अबिगत अगोचर प्रभ एका ॥
तब चित्र गुपत किसु पूछत लेखा ॥
जब नाथ निरंजन अगोचर अगाधे ॥
तब कउन छुटे कउन बंधन बाधे ॥
आपन आप आप ही अचरजा ॥
नानक आपन रूप आप ही उपरजा ॥3॥

हिन्दी अर्थ: जब अकाल-पुरख अपनी मौज में अपने ही स्वरूप में टिका बैठा था, तब बताएँ, पैदा होना, मरना व मौत कहाँ थी? जब करतार पूरन प्रभू खुद ही था, तब बताएँ, मौत का डर किस को हो सकता था? जब अदृष्य और अगोचर प्रभू एक खुद ही था, तब चित्रगुप्त किससे लेखा पूछ सकते थे? जब मालिक माया-रहित अथाह अगोचर स्वयं ही था, तो कौन माया के बंधनों से मुक्त था और कौन माया के बंधनों में बंधे हुए हैं? वह आश्चर्य जनक प्रभू अपने जैसा खुद ही है। हे नानक! अपना आकार उसने स्वयं ही पैदा किया है। 3।

गुरु अर्जन देव जी · सुखमनी · राग गउड़ी

जह निरमल पुरखु पुरख पति होता ॥

जह निरमल पुरखु पुरख पति होता ॥
तह बिनु मैलु कहहु किआ धोता ॥
जह निरंजन निरंकार निरबान ॥
तह कउन कउ मान कउन अभिमान ॥
जह सरूप केवल जगदीस ॥
तह छल छिद्र लगत कहु कीस ॥
जह जोति सरूपी जोति संगि समावै ॥
तह किसहि भूख कवनु त्रिपतावै ॥
करन करावन करनैहारु ॥
नानक करते का नाहि सुमारु ॥4॥

हिन्दी अर्थ: जिस अवस्था में जीवों का मालिक निर्मल प्रभू स्वयं ही था वहाँ वह मैल-रहित था। तो बताएँ, उसने कौन सी मैल धोनी थी? जहाँ माया रहित आकार रहित और वासना रहित प्रभू ही था। वहाँ गुमान-अहंकार किसे होना था? जहाँ केवल जगत के मालिक प्रभू की ही हस्ती थी। वहाँ बताएं, छल और ऐब किसे लग सकते थे? जब ज्योति-रूप प्रभू खुद ही ज्योति में लीन था, तब किसे (माया की) भूख हो सकती थी और कौन तृप्त था? करतार खुद ही सब कुछ करने वाला और जीवों से कराने वाला है। हे नानक! करतार का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। 4।

गुरु अर्जन देव जी · सुखमनी · राग गउड़ी

जब अपनी सोभा आपन संगि बनाई ॥

जब अपनी सोभा आपन संगि बनाई ॥
तब कवन माइ बाप मित्र सुत भाई ॥
जह सरब कला आपहि परबीन ॥
तह बेद कतेब कहा कोऊ चीन ॥
जब आपन आपु आपि उरि धारै ॥
तउ सगन अपसगन कहा बीचारै ॥
जह आपन ऊच आपन आपि नेरा ॥
तह कउन ठाकुरु कउनु कहीऐ चेरा ॥
बिसमन बिसम रहे बिसमाद ॥
नानक अपनी गति जानहु आपि ॥5॥

हिन्दी अर्थ: जब प्रभू ने अपनी शोभा अपने साथ बनाई थी (भाव, जब कोई और उसकी शोभा करने वाला नहीं था) तो कौन माँ, पिता, मित्र, पुत्र अथवा भाई थे? जब अकाल पुरख स्वयं ही सारी ताकतों में प्रवीण था, तब कहाँ कोई वेद (हिंदू धर्म पुस्तक) और कतेबों को (मुसलमानों की धर्म पुस्तकें) विचारता था? जब प्रभू अपने आप को खुद ही अपने आप में टिकाए बैठा था। अच्छे-बुरे शगुन (अपशगुन) कौन सोचता था? बताएं, जब प्रभू अपने आप ही उच्च और निम्न था तब मालिक कौन था और सेवक कौन था? जीव आपकी गति तलाशते हुए हैरान और आश्चर्यचकित हो रहे हैं। हे नानक! (प्रभू के आगे अरदास करें और कहें, हे प्रभू!) आप अपनी गति स्वयं ही जानते हैं। 5।

गुरु अर्जन देव जी · सुखमनी · राग गउड़ी

जह अछल अछेद अभेद समाइआ ॥

जह अछल अछेद अभेद समाइआ ॥
ऊहा किसहि बिआपत माइआ ॥
आपस कउ आपहि आदेसु ॥
तिहु गुण का नाही परवेसु ॥
जह एकहि एक एक भगवंता ॥
तह कउनु अचिंतु किसु लागै चिंता ॥
जह आपन आपु आपि पतीआरा ॥
तह कउनु कथै कउनु सुननैहारा ॥
बहु बेअंत ऊच ते ऊचा ॥
नानक आपस कउ आपहि पहूचा ॥6॥

हिन्दी अर्थ: जिस अवस्था में अछल-अबिनाशी और अभेद प्रभू (अपने आप में) टिका हुआ है। वहाँ किसे माया छू सकती है? (जब) प्रभू अपने आप को ही नमस्कार करता है। (माया के) तीन गुणों का (उस पर) असर नहीं पड़ता। जब भगवान केवल एक खुद ही था, तब कौन बेफिक्र था और किसको कोई चिंता लगती थी। जब अपने आप को पतियाने वाला प्रभू स्वयं ही था, तब कौन बोलता था और कौन सुनने वाला था? हे नानक! प्रभू बड़ा बेअंत है। सबसे ऊँचा है। अपने आप तक स्वयं ही पहुँचने वाला है। 6।

गुरु अर्जन देव जी · सुखमनी · राग गउड़ी

जह आपि रचिओ परपंचु अकारु ॥

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जह आपि रचिओ परपंचु अकारु ॥
तिहु गुण महि कीनो बिसथारु ॥
पापु पुंनु तह भई कहावत ॥

हिन्दी अर्थ: जब प्रभू ने स्वयं जगत की खेल रच दी। और माया के तीन गुणों का पसारा पसार दिया; तब ये बात चल पड़ी कि ये पाप है ये पुंन है।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 291 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।