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· सुखमनी · राग गउड़ी
कोऊ नरक कोऊ सुरग बंछावत ॥
कोऊ नरक कोऊ सुरग बंछावत ॥
आल जाल माइआ जंजाल ॥
हउमै मोह भरम भै भार ॥
दूख सूख मान अपमान ॥
अनिक प्रकार कीओ बख्यान ॥
आपन खेलु आपि करि देखै ॥
खेलु संकोचै तउ नानक एकै ॥7॥
आल जाल माइआ जंजाल ॥
हउमै मोह भरम भै भार ॥
दूख सूख मान अपमान ॥
अनिक प्रकार कीओ बख्यान ॥
आपन खेलु आपि करि देखै ॥
खेलु संकोचै तउ नानक एकै ॥7॥
हिन्दी अर्थ: तब कोई जीव नर्कों का भागी और कोई स्वर्गों का चाहवान बना। घरों के धंधे, माया के बंधन। अहंकार, मोह, भुलेखे, डर, दुख, सुख, आदर, निरादरी, ऐसी कई किस्मों की बातें चल पड़ीं। हे नानक! प्रभू स्वयं तमाशा रच के स्वयं देख रहा है। जब इस खेल को समेटता है तो एक स्वयं ही स्वयं हो जाता है। 7।
· सुखमनी · राग गउड़ी
जह अबिगतु भगतु तह आपि ॥
जह अबिगतु भगतु तह आपि ॥
जह पसरै पासारु संत परतापि ॥
दुहू पाख का आपहि धनी ॥
उन की सोभा उनहू बनी ॥
आपहि कउतक करै अनद चोज ॥
आपहि रस भोगन निरजोग ॥
जिसु भावै तिसु आपन नाइ लावै ॥
जिसु भावै तिसु खेल खिलावै ॥
बेसुमार अथाह अगनत अतोलै ॥
जिउ बुलावहु तिउ नानक दास बोलै ॥8॥21॥
जह पसरै पासारु संत परतापि ॥
दुहू पाख का आपहि धनी ॥
उन की सोभा उनहू बनी ॥
आपहि कउतक करै अनद चोज ॥
आपहि रस भोगन निरजोग ॥
जिसु भावै तिसु आपन नाइ लावै ॥
जिसु भावै तिसु खेल खिलावै ॥
बेसुमार अथाह अगनत अतोलै ॥
जिउ बुलावहु तिउ नानक दास बोलै ॥8॥21॥
हिन्दी अर्थ: जहाँ अदृश्य प्रभू है वहाँ उसका भक्त है। जहाँ भक्त है वहाँ वह प्रभू स्वयं है। हर जगह संतों की महिमा के वास्ते प्रभू जगत का पसारा पसार रहा है। (संतों का प्रताप और माया का प्रभाव, इन) दोनों पक्षों का मालिक प्रभू स्वयं ही है। प्रभू जी अपनी शोभा स्वयं ही जानते हैं। प्रभू खुद ही खेलें खेल रहा है खुद ही आनंद तमाशे कर रहा है। खुद ही रसों को भोगने वाला है और खुद ही निर्लिप है। जो उसे भाता है उसे अपने नाम में जोड़ता है। और जिसको चाहता है माया की खेलें खिलाता है। हे नानक! (ऐसे अरदास करें और कहें) हे बेअंत! हे अथाह! हे अगनत! हे अडोल प्रभू! जैसे आप बुलाते हैं वैसे आपके दास बोलते हैं। 8। 21।
· सुखमनी · राग गउड़ी
जीअ जंत के ठाकुरा आपे वरतणहार ॥
सलोकु ॥
जीअ जंत के ठाकुरा आपे वरतणहार ॥
नानक एको पसरिआ दूजा कह द्रिसटार ॥1॥
जीअ जंत के ठाकुरा आपे वरतणहार ॥
नानक एको पसरिआ दूजा कह द्रिसटार ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक ॥ हे जीवों जंतुओं के पालने वाले प्रभू! आप खुद ही हर जगह में व्याप्त हैं। हे नानक! प्रभू स्वयं ही हर जगह मौजूद है। (उससे बिना कोई) दूसरा कहीं देखने में आया है? 1।
· सुखमनी · राग गउड़ी
आपि कथै आपि सुननैहारु ॥
असटपदी ॥
आपि कथै आपि सुननैहारु ॥
आपहि एकु आपि बिसथारु ॥
जा तिसु भावै ता स्रिसटि उपाए ॥
आपनै भाणै लए समाए ॥
तुम ते भिंन नही किछु होइ ॥
आपन सूति सभु जगतु परोइ ॥
जा कउ प्रभ जीउ आपि बुझाए ॥
सचु नामु सोई जनु पाए ॥
सो समदरसी तत का बेता ॥
नानक सगल स्रिसटि का जेता ॥1॥
आपि कथै आपि सुननैहारु ॥
आपहि एकु आपि बिसथारु ॥
जा तिसु भावै ता स्रिसटि उपाए ॥
आपनै भाणै लए समाए ॥
तुम ते भिंन नही किछु होइ ॥
आपन सूति सभु जगतु परोइ ॥
जा कउ प्रभ जीउ आपि बुझाए ॥
सचु नामु सोई जनु पाए ॥
सो समदरसी तत का बेता ॥
नानक सगल स्रिसटि का जेता ॥1॥
हिन्दी अर्थ: अष्टपदी ॥ (सब जीवों में) प्रभू खुद बोल रहा है खुद ही सुनने वाला है। आप ही स्वं एक है और उसने स्वं ही सारी स्रष्टि का विस्तार किया हुआ है जैसा उसे उपयुक्त लगता है वैसे ही स्रष्टि को उत्पन्न करताहै और अपनी इच्छा अनुसार ही स्वं में समेट लेता है (हे प्रभू!) आपसे अलग कुछ नहीं। आपने (अपने हुकम-रूप) धागे में सारे जगत को परो रखा है। जिस मनुष्य को प्रभू जी स्वयं सूझ बख्शते हैं। वह मनुष्य प्रभू का सदा-स्थिर रहने वाला नाम हासिल कर लेता है। वह मनुष्य सबकी ओर एक नजर से देखता है। अकाल-पुरख का महिरम हो जाता है। हे नानक! वह सारे जगत का जीतने वाला है। 1।
· सुखमनी · राग गउड़ी
जीअ जंत्र सभ ता कै हाथ ॥
जीअ जंत्र सभ ता कै हाथ ॥
दीन दइआल अनाथ को नाथु ॥
जिसु राखै तिसु कोइ न मारै ॥
सो मूआ जिसु मनहु बिसारै ॥
तिसु तजि अवर कहा को जाइ ॥
सभ सिरि एकु निरंजन राइ ॥
जीअ की जुगति जा कै सभ हाथि ॥
अंतरि बाहरि जानहु साथि ॥
गुन निधान बेअंत अपार ॥
नानक दास सदा बलिहार ॥2॥
दीन दइआल अनाथ को नाथु ॥
जिसु राखै तिसु कोइ न मारै ॥
सो मूआ जिसु मनहु बिसारै ॥
तिसु तजि अवर कहा को जाइ ॥
सभ सिरि एकु निरंजन राइ ॥
जीअ की जुगति जा कै सभ हाथि ॥
अंतरि बाहरि जानहु साथि ॥
गुन निधान बेअंत अपार ॥
नानक दास सदा बलिहार ॥2॥
हिन्दी अर्थ: सारे जीव-जंतु उस प्रभू के वश में हैं। वह दीनों पर दया करने वाला है। और अनाथों का मालिक है। जिस जीव की प्रभू स्वयं रक्षा करता है उसको कोई मार नहीं सकता। मरा हुआ (तो) वह जीव है जिसको प्रभू भुला देता है। उस प्रभू को छोड़ के और कहाँ कोई जाए? सब जीवों के सिर पर एक स्वयं प्रभू ही है जो माया के प्रभाव से परे है। जिसके वश में सब जीवों की जिंदगी का भेद है। उस प्रभू को अंदर बाहर सब जगह अंग-संग जानें। जो गुणों का खजाना है। बेअंत है और अपार है। हे नानक! (कहें, हे प्रभू!) सेवक उससे सदके हैं 2।
· सुखमनी · राग गउड़ी
पूरन पूरि रहे दइआल ॥
पूरन पूरि रहे दइआल ॥
सभ ऊपरि होवत किरपाल ॥
अपने करतब जानै आपि ॥
अंतरजामी रहिओ बिआपि ॥
प्रतिपालै जीअन बहु भाति ॥
जो जो रचिओ सु तिसहि धिआति ॥
जिसु भावै तिसु लए मिलाइ ॥
भगति करहि हरि के गुण गाइ ॥
मन अंतरि बिस्वासु करि मानिआ ॥
करनहारु नानक इकु जानिआ ॥3॥
सभ ऊपरि होवत किरपाल ॥
अपने करतब जानै आपि ॥
अंतरजामी रहिओ बिआपि ॥
प्रतिपालै जीअन बहु भाति ॥
जो जो रचिओ सु तिसहि धिआति ॥
जिसु भावै तिसु लए मिलाइ ॥
भगति करहि हरि के गुण गाइ ॥
मन अंतरि बिस्वासु करि मानिआ ॥
करनहारु नानक इकु जानिआ ॥3॥
हिन्दी अर्थ: दया के घर प्रभू जी हर जगह मौजूद हैं। और सब जीवों पर मेहर करते हैं। प्रभू अपने खेल खुद जानता है। सबके दिल की जानने वाला प्रभू हर जगह मौजूद है। जीवों को कई तरीकों से पालता है। जो जो जीव उसने पैदा किया है। वह उसी प्रभू को सिमरता है। जिस पर प्रसन्न होता है उसको साथ जोड़ लेता है। (जिन पर प्रसन्न होता है) वह उसके गुण गा गा के उसकी भक्ति करते हैं। हे नानक! जिस मनुष्य ने मन में श्रद्धा धार के प्रभू को (सचमुख अस्तित्व वाला) मान लिया है। उस ने एक करतार को ही पहिचाना है। 3।
· सुखमनी · राग गउड़ी
जनु लागा हरि एकै नाइ ॥
जनु लागा हरि एकै नाइ ॥
तिस की आस न बिरथी जाइ ॥
सेवक कउ सेवा बनि आई ॥
हुकमु बूझि परम पदु पाई ॥
इस ते ऊपरि नही बीचारु ॥
जा कै मनि बसिआ निरंकारु ॥
बंधन तोरि भए निरवैर ॥
अनदिनु पूजहि गुर के पैर ॥
इह लोक सुखीए परलोक सुहेले ॥
तिस की आस न बिरथी जाइ ॥
सेवक कउ सेवा बनि आई ॥
हुकमु बूझि परम पदु पाई ॥
इस ते ऊपरि नही बीचारु ॥
जा कै मनि बसिआ निरंकारु ॥
बंधन तोरि भए निरवैर ॥
अनदिनु पूजहि गुर के पैर ॥
इह लोक सुखीए परलोक सुहेले ॥
हिन्दी अर्थ: (जो) सेवक एक प्रभू के नाम में टिका हुआ है उसकी आस कभी खाली नहीं जाती। सेवक को ये फबता है कि सब की सेवा करे। प्रभू की रजा समझ के उसे ऊँचा दर्जा मिल जाता है। जिन के मन में अकाल-पुरख बसता है उन्हें इस (नाम-सिमरन) से बड़ा और कोई विचार नहीं सूझता। (माया के) बंधन तोड़ के वे निर्वैर हो जाते हैं और हर वक्त सतिगुरू के चरन पूजते हैं। वह मनुष्य इस जनम में सुखी हैं और परलोक में सुखी होते हैं (क्योंकि)
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 292 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।