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अंग 290

अंग
290
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सुखमनी साहिब का हिस्सा। पूरी 24 अष्टपदियों की हिन्दी टीका /sukhmani-sahib/ पर है।
सो किउ बिसरै जिनि सभु किछु दीआ ॥
सो किउ बिसरै जि जीवन जीआ ॥
सो किउ बिसरै जि अगनि महि राखै ॥
गुर प्रसादि को बिरला लाखै ॥
सो किउ बिसरै जि बिखु ते काढै ॥
जनम जनम का टूटा गाढै ॥
गुरि पूरै ततु इहै बुझाइआ ॥
प्रभु अपना नानक जन धिआइआ ॥4॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: वह प्रभू क्यों भूल जाए जिसने सब कुछ दिया है। जो जीवों की जिंदगी का आसरा है? वह प्रभू क्यों भूल जाए गर्भ-अग्नि में रक्षा करता है गुरु कृपा से कोई विरला ही इसे समझता है वह अकाल-पुरख क्यूँ बिसर जाए जो (माया-रूप) जहर से बचाता है और कई जनम के बिछुड़े हुए जीव को (अपने साथ) जोड़ लेता है? (जिन सेवकों को) पूरे गुरू ने ये बात समझाई है। हे नानक ! उन्होंने अपने प्रभू को सिमरा है। 4।
साजन संत करहु इहु कामु ॥
आन तिआगि जपहु हरि नामु ॥
सिमरि सिमरि सिमरि सुख पावहु ॥
आपि जपहु अवरह नामु जपावहु ॥
भगति भाइ तरीऐ संसारु ॥
बिनु भगती तनु होसी छारु ॥
सरब कलिआण सूख निधि नामु ॥
बूडत जात पाए बिस्रामु ॥
सगल दूख का होवत नासु ॥
नानक नामु जपहु गुनतासु ॥5॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: हे सज्जनों ! हे संत जनों ! ये काम करो। अन्य सभी (प्रयास) छोड़ के प्रभू का नाम जपो। सदा सिमरो और सिमर के सुख हासिल करो। प्रभू का नाम खुद जपो और औरों को भी जपाओ। प्रभू की भगती में नेह लगाने से ये संसार (समुंद्र) तैरते हैं। भगती के बिना ये शरीर किसी काम का नहीं। प्रभू का नाम भले भाग्यों और सारे सुखों का खजाना है। (नाम जपने से विकारों में) डूबते जाते को आसरा ठिकाना मिलता है। (और) सारे दुखों का नाश हो जाता है। (इसलिए) हे नानक ! नाम जपो। (नाम ही) गुणों का खजाना (है)। 5।
उपजी प्रीति प्रेम रसु चाउ ॥
मन तन अंतरि इही सुआउ ॥
नेत्रहु पेखि दरसु सुखु होइ ॥
मनु बिगसै साध चरन धोइ ॥
भगत जना कै मनि तनि रंगु ॥
बिरला कोऊ पावै संगु ॥
एक बसतु दीजै करि मइआ ॥
गुर प्रसादि नामु जपि लइआ ॥
ता की उपमा कही न जाइ ॥
नानक रहिआ सरब समाइ ॥6॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: (जिसके अंदर प्रभू की) प्रीति पैदा होती है। प्रभू के प्यार का स्वाद और प्यार पैदा हुआ है। उसके मन में और तन में यही चाहत है (कि नाम की दाति मिले)। आँखों से (गुरू का) दीदार करके उसे सुख होता है। गुरू के चरण धो के उसका मन खिल आता है। भक्तों के मन और शरीर में (प्रभू का) प्यार टिका रहता है। (पर) किसी विरले भाग्यशाली को उनकी संगति नसीब होती है। (हे प्रभू !) मेहर करके एक नाम-वस्तु (हमें) दे। (ता कि) गुरू की कृपा से आपका नाम जप सकें। उसकी महिमा बयान नहीं की जा सकती। हे नानक ! वह प्रभू सब जगह मौजूद है। 6।
प्रभ बखसंद दीन दइआल ॥
भगति वछल सदा किरपाल ॥
अनाथ नाथ गोबिंद गुपाल ॥
सरब घटा करत प्रतिपाल ॥
आदि पुरख कारण करतार ॥
भगत जना के प्रान अधार ॥
जो जो जपै सु होइ पुनीत ॥
भगति भाइ लावै मन हीत ॥
हम निरगुनीआर नीच अजान ॥
नानक तुमरी सरनि पुरख भगवान ॥7॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: हे बख्शनहार प्रभू ! हे गरीबों पे तरस करने वाले ! हे भगती से प्यार करने वाले ! हे सदा दया के घर ! हे अनाथों के नाथ ! हे गोबिंद ! हे गोपाल ! हे सारे शरीरों की पालना करने वाले ! हे सब के आदि और सब में व्यापक प्रभू ! हे (जगत के) मूल ! ळे करतार ! हे भक्तों की जिंदगी के आसरे ! वह पवित्र हो जाता है जो आपको जपता है और जो मनुष्य भगती भाव से अपने मन में आपका प्यार टिकाता है हम नीच हैं। अंजान हैं और गुण हीन हैं। हे नानक ! (विनती कर और कह) हे अकाल-पुरख ! हे भगवान ! हम आपकी शरण आए हैं। 7।
सरब बैकुंठ मुकति मोख पाए ॥
एक निमख हरि के गुन गाए ॥
अनिक राज भोग बडिआई ॥
हरि के नाम की कथा मनि भाई ॥
बहु भोजन कापर संगीत ॥
रसना जपती हरि हरि नीत ॥
भली सु करनी सोभा धनवंत ॥
हिरदै बसे पूरन गुर मंत ॥
साधसंगि प्रभ देहु निवास ॥
सरब सूख नानक परगास ॥8॥20॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: उसने (मानो) सारे स्वर्ग और मोक्ष मुक्ति हासिल कर ली है। जिस मनुष्य ने पलक झपकने मात्र समय के लिए भी प्रभू के गुण गाए हैं। उसे (मानो) अनेकों राज-भोग पदार्थ और महिमा मिल गई हैं। जिस मनुष्य के मन को प्रभू के नाम की बातें मीठी लगी हैं। उसे (मानो) कई किस्म के खाने कपड़े और राग रंग हासिल हो गए हैं। जिस मनुष्य की जीभ सदा प्रभू का नाम जपती है। उसी का ही आचरण भला है। उसी को ही शोभा मिलती है। वही धनवान है। जिस मनुष्य के हृदय में पूरे गुरू का उपदेश बसता है। हे प्रभू ! अपने संतों की संगत में जगह दे। हे नानक ! (सत्संग में रहने से) सारे सुखों का प्रकाश हो जाता है। 8। 20।
सलोकु ॥
सरगुन निरगुन निरंकार सुंन समाधी आपि ॥
आपन कीआ नानका आपे ही फिरि जापि ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक ॥ निरंकार (भाव- आकार रहित अकाल पुरख) त्रिगुणी माया का रूप (भाव। जगत रूप) भी खुद ही है और माया के तीनों गुणों से परे भी खुद ही है। निर्विचार अवस्था में टिका हुआ भी स्वयं ही है। हे नानक ! (ये सारा जगत) प्रभू ने खुद ही रचा है (और जगत के जीवों में बैठ के) खुद ही (अपने आप को याद कर रहा है)। 1।
असटपदी ॥
जब अकारु इहु कछु न द्रिसटेता ॥
पाप पुंन तब कह ते होता ॥
जब धारी आपन सुंन समाधि ॥
तब बैर बिरोध किसु संगि कमाति ॥
जब इस का बरनु चिहनु न जापत ॥
तब हरख सोग कहु किसहि बिआपत ॥
जब आपन आप आपि पारब्रहम ॥
तब मोह कहा किसु होवत भरम ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: अष्टपदी। जब (जगत के जीवों की अभी) कोई शकल नहीं दिखती थी। तब पाप या पुंन किस जीव से हो सकता था? जब (प्रभू ने) खुद शून्य अवस्था में समाधि लगाई हुई थी (भाव जब अपने आप में ही मस्त था) तब (किसने) किसके साथ वैर-विरोध कमाना था? जब इस (जगत) का कोई रंग-रूप ही नहीं था दिखता। तब बताओ खुशी या चिंता किसे छू सकती थी? जब अकाल-पुरख केवल स्वयं ही स्वयं था। तब मोह कहाँ हो सकता था। और भरम-भुलेखे किसको हो सकते थे?

गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “वह प्रभू क्यों भूल जाए जिसने सब कुछ दिया है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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