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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 290 · गउड़ी

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290
गउड़ी
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  1. सो किउ बिसरै जिनि सभु किछु दीआ ॥
  2. साजन संत करहु इहु कामु ॥
  3. उपजी प्रीति प्रेम रसु चाउ ॥
  4. प्रभ बखसंद दीन दइआल ॥
  5. सरब बैकुंठ मुकति मोख पाए ॥
  6. सरगुन निरगुन निरंकार सुंन समाधी आपि ॥
  7. जब अकारु इहु कछु न द्रिसटेता ॥

गुरु अर्जन देव जी · सुखमनी · राग गउड़ी

सो किउ बिसरै जिनि सभु किछु दीआ ॥

अंग 289 से चला आ रहा अंश

सो किउ बिसरै जिनि सभु किछु दीआ ॥
सो किउ बिसरै जि जीवन जीआ ॥
सो किउ बिसरै जि अगनि महि राखै ॥
गुर प्रसादि को बिरला लाखै ॥
सो किउ बिसरै जि बिखु ते काढै ॥
जनम जनम का टूटा गाढै ॥
गुरि पूरै ततु इहै बुझाइआ ॥
प्रभु अपना नानक जन धिआइआ ॥4॥

हिन्दी अर्थ: वह प्रभू क्यों भूल जाए जिसने सब कुछ दिया है। जो जीवों की जिंदगी का आसरा है? वह प्रभू क्यों भूल जाए गर्भ-अग्नि में रक्षा करता है गुरु कृपा से कोई विरला ही इसे समझता है वह अकाल-पुरख क्यूँ बिसर जाए जो (माया-रूप) जहर से बचाता है और कई जनम के बिछुड़े हुए जीव को (अपने साथ) जोड़ लेता है? (जिन सेवकों को) पूरे गुरू ने ये बात समझाई है। हे नानक! उन्होंने अपने प्रभू को सिमरा है। 4।

गुरु अर्जन देव जी · सुखमनी · राग गउड़ी

साजन संत करहु इहु कामु ॥

साजन संत करहु इहु कामु ॥
आन तिआगि जपहु हरि नामु ॥
सिमरि सिमरि सिमरि सुख पावहु ॥
आपि जपहु अवरह नामु जपावहु ॥
भगति भाइ तरीऐ संसारु ॥
बिनु भगती तनु होसी छारु ॥
सरब कलिआण सूख निधि नामु ॥
बूडत जात पाए बिस्रामु ॥
सगल दूख का होवत नासु ॥
नानक नामु जपहु गुनतासु ॥5॥

हिन्दी अर्थ: हे सज्जनों! हे संत जनों! ये काम करें। अन्य सभी (प्रयास) छोड़ के प्रभू का नाम जपें। सदा सिमरें और सिमर के सुख हासिल करें। प्रभू का नाम खुद जपें और औरों को भी जपाएँ। प्रभू की भगती में नेह लगाने से ये संसार (समुंद्र) तैरते हैं। भगती के बिना ये शरीर किसी काम का नहीं। प्रभू का नाम भले भाग्यों और सारे सुखों का खजाना है। (नाम जपने से विकारों में) डूबते जाते को आसरा ठिकाना मिलता है। (और) सारे दुखों का नाश हो जाता है। (इसलिए) हे नानक! नाम जपें। (नाम ही) गुणों का खजाना (है)। 5।

गुरु अर्जन देव जी · सुखमनी · राग गउड़ी

उपजी प्रीति प्रेम रसु चाउ ॥

उपजी प्रीति प्रेम रसु चाउ ॥
मन तन अंतरि इही सुआउ ॥
नेत्रहु पेखि दरसु सुखु होइ ॥
मनु बिगसै साध चरन धोइ ॥
भगत जना कै मनि तनि रंगु ॥
बिरला कोऊ पावै संगु ॥
एक बसतु दीजै करि मइआ ॥
गुर प्रसादि नामु जपि लइआ ॥
ता की उपमा कही न जाइ ॥
नानक रहिआ सरब समाइ ॥6॥

हिन्दी अर्थ: (जिसके अंदर प्रभू की) प्रीति पैदा होती है। प्रभू के प्यार का स्वाद और प्यार पैदा हुआ है। उसके मन में और तन में यही चाहत है (कि नाम की दाति मिले)। आँखों से (गुरू का) दीदार करके उसे सुख होता है। गुरू के चरण धो के उसका मन खिल आता है। भक्तों के मन और शरीर में (प्रभू का) प्यार टिका रहता है। (पर) किसी विरले भाग्यशाली को उनकी संगति नसीब होती है। (हे प्रभू!) मेहर करके एक नाम-वस्तु (हमें) दें। (ता कि) गुरू की कृपा से आपका नाम जप सकें। उसकी महिमा बयान नहीं की जा सकती। हे नानक! वह प्रभू सब जगह मौजूद है। 6।

गुरु अर्जन देव जी · सुखमनी · राग गउड़ी

प्रभ बखसंद दीन दइआल ॥

प्रभ बखसंद दीन दइआल ॥
भगति वछल सदा किरपाल ॥
अनाथ नाथ गोबिंद गुपाल ॥
सरब घटा करत प्रतिपाल ॥
आदि पुरख कारण करतार ॥
भगत जना के प्रान अधार ॥
जो जो जपै सु होइ पुनीत ॥
भगति भाइ लावै मन हीत ॥
हम निरगुनीआर नीच अजान ॥
नानक तुमरी सरनि पुरख भगवान ॥7॥

हिन्दी अर्थ: हे बख्शनहार प्रभू! हे गरीबों पे तरस करने वाले! हे भगती से प्यार करने वाले! हे सदा दया के घर! हे अनाथों के नाथ! हे गोबिंद! हे गोपाल! हे सारे शरीरों की पालना करने वाले! हे सब के आदि और सब में व्यापक प्रभू! हे (जगत के) मूल! ळे करतार! हे भक्तों की जिंदगी के आसरे! वह पवित्र हो जाता है जो आपको जपता है और जो मनुष्य भगती भाव से अपने मन में आपका प्यार टिकाता है हम नीच हैं। अंजान हैं और गुण हीन हैं। हे नानक! (विनती करें और कहें) हे अकाल-पुरख! हे भगवान! हम आपकी शरण आए हैं। 7।

गुरु अर्जन देव जी · सुखमनी · राग गउड़ी

सरब बैकुंठ मुकति मोख पाए ॥

सरब बैकुंठ मुकति मोख पाए ॥
एक निमख हरि के गुन गाए ॥
अनिक राज भोग बडिआई ॥
हरि के नाम की कथा मनि भाई ॥
बहु भोजन कापर संगीत ॥
रसना जपती हरि हरि नीत ॥
भली सु करनी सोभा धनवंत ॥
हिरदै बसे पूरन गुर मंत ॥
साधसंगि प्रभ देहु निवास ॥
सरब सूख नानक परगास ॥8॥20॥

हिन्दी अर्थ: उसने (मानो) सारे स्वर्ग और मोक्ष मुक्ति हासिल कर ली है। जिस मनुष्य ने पलक झपकने मात्र समय के लिए भी प्रभू के गुण गाए हैं। उसे (मानो) अनेकों राज-भोग पदार्थ और महिमा मिल गई हैं। जिस मनुष्य के मन को प्रभू के नाम की बातें मीठी लगी हैं। उसे (मानो) कई किस्म के खाने कपड़े और राग रंग हासिल हो गए हैं। जिस मनुष्य की जीभ सदा प्रभू का नाम जपती है। उसी का ही आचरण भला है। उसी को ही शोभा मिलती है। वही धनवान है। जिस मनुष्य के हृदय में पूरे गुरू का उपदेश बसता है। हे प्रभू! अपने संतों की संगत में जगह दें। हे नानक! (सत्संग में रहने से) सारे सुखों का प्रकाश हो जाता है। 8। 20।

गुरु अर्जन देव जी · सुखमनी · राग गउड़ी

सरगुन निरगुन निरंकार सुंन समाधी आपि ॥

सलोकु ॥
सरगुन निरगुन निरंकार सुंन समाधी आपि ॥
आपन कीआ नानका आपे ही फिरि जापि ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक ॥ निरंकार (भाव, आकार रहित अकाल पुरख) त्रिगुणी माया का रूप (भाव, जगत रूप) भी खुद ही है और माया के तीनों गुणों से परे भी खुद ही है। निर्विचार अवस्था में टिका हुआ भी स्वयं ही है। हे नानक! (ये सारा जगत) प्रभू ने खुद ही रचा है (और जगत के जीवों में बैठ के) खुद ही (अपने आप को याद कर रहा है)। 1।

गुरु अर्जन देव जी · सुखमनी · राग गउड़ी

जब अकारु इहु कछु न द्रिसटेता ॥

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असटपदी ॥
जब अकारु इहु कछु न द्रिसटेता ॥
पाप पुंन तब कह ते होता ॥
जब धारी आपन सुंन समाधि ॥
तब बैर बिरोध किसु संगि कमाति ॥
जब इस का बरनु चिहनु न जापत ॥
तब हरख सोग कहु किसहि बिआपत ॥
जब आपन आप आपि पारब्रहम ॥
तब मोह कहा किसु होवत भरम ॥

हिन्दी अर्थ: अष्टपदी। जब (जगत के जीवों की अभी) कोई शकल नहीं दिखती थी, तब पाप या पुंन किस जीव से हो सकता था? जब (प्रभू ने) खुद शून्य अवस्था में समाधि लगाई हुई थी (भाव जब अपने आप में ही मस्त था) तब (किसने) किसके साथ वैर-विरोध कमाना था? जब इस (जगत) का कोई रंग-रूप ही नहीं था दिखता, तब बताएँ खुशी या चिंता किसे छू सकती थी? जब अकाल-पुरख केवल स्वयं ही स्वयं था, तब मोह कहाँ हो सकता था। और भरम-भुलेखे किसको हो सकते थे?

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 290 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।