मानस जतन करत बहु भाति ॥
तिस के करतब बिरथे जाति ॥
मारै न राखै अवरु न कोइ ॥
सरब जीआ का राखा सोइ ॥
काहे सोच करहि रे प्राणी ॥
जपि नानक प्रभ अलख विडाणी ॥5॥
पी अंम्रितु इहु मनु तनु ध्रपीऐ ॥
नाम रतनु जिनि गुरमुखि पाइआ ॥
तिसु किछु अवरु नाही द्रिसटाइआ ॥
नामु धनु नामो रूपु रंगु ॥
नामो सुखु हरि नाम का संगु ॥
नाम रसि जो जन त्रिपताने ॥
मन तन नामहि नामि समाने ॥
ऊठत बैठत सोवत नाम ॥
कहु नानक जन कै सद काम ॥6॥
प्रभि अपनै जन कीनी दाति ॥
करहि भगति आतम कै चाइ ॥
प्रभ अपने सिउ रहहि समाइ ॥
जो होआ होवत सो जानै ॥
प्रभ अपने का हुकमु पछानै ॥
तिस की महिमा कउन बखानउ ॥
तिस का गुनु कहि एक न जानउ ॥
आठ पहर प्रभ बसहि हजूरे ॥
कहु नानक सेई जन पूरे ॥7॥
मनु तनु अपना तिन जन देहि ॥
जिनि जनि अपना प्रभू पछाता ॥
सो जनु सरब थोक का दाता ॥
तिस की सरनि सरब सुख पावहि ॥
तिस कै दरसि सभ पाप मिटावहि ॥
अवर सिआनप सगली छाडु ॥
तिसु जन की तू सेवा लागु ॥
आवनु जानु न होवी तेरा ॥
नानक तिसु जन के पूजहु सद पैरा ॥8॥17॥
सति पुरखु जिनि जानिआ सतिगुरु तिस का नाउ ॥
तिस कै संगि सिखु उधरै नानक हरि गुन गाउ ॥1॥
सतिगुरु सिख की करै प्रतिपाल ॥
सेवक कउ गुरु सदा दइआल ॥
सिख की गुरु दुरमति मलु हिरै ॥
गुर बचनी हरि नामु उचरै ॥
सतिगुरु सिख के बंधन काटै ॥
गुर का सिखु बिकार ते हाटै ॥
सतिगुरु सिख कउ नाम धनु देइ ॥
गुर का सिखु वडभागी हे ॥
सतिगुरु सिख का हलतु पलतु सवारै ॥
नानक सतिगुरु सिख कउ जीअ नालि समारै ॥1॥
गुर की आगिआ मन महि सहै ॥
आपस कउ करि कछु न जनावै ॥
हरि हरि नामु रिदै सद धिआवै ॥
मनु बेचै सतिगुर कै पासि ॥
तिसु सेवक के कारज रासि ॥
सेवा करत होइ निहकामी ॥
तिस कउ होत परापति सुआमी ॥
गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे।
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।