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अंग 285

अंग
285
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सुखमनी साहिब का हिस्सा। पूरी 24 अष्टपदियों की हिन्दी टीका /sukhmani-sahib/ पर है।
जिस की स्रिसटि सु करणैहारु ॥
अवर न बूझि करत बीचारु ॥
करते की मिति न जानै कीआ ॥
नानक जो तिसु भावै सो वरतीआ ॥7॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: जिस प्रभू का ये जगत है वह खुद इसे बनाने वाला है। किसी और को इस जगत का ख्याल रखने वाला (भी) ना समझो। करतार (की बुजुर्गी) का अंदाजा उसका पैदा किया हुआ आदमी नहीं लगा सकता। हे नानक ! वही कुछ होता है जो उस प्रभू को भाता है। 7।
बिसमन बिसम भए बिसमाद ॥
जिनि बूझिआ तिसु आइआ स्वाद ॥
प्रभ कै रंगि राचि जन रहे ॥
गुर कै बचनि पदारथ लहे ॥
ओइ दाते दुख काटनहार ॥
जा कै संगि तरै संसार ॥
जन का सेवकु सो वडभागी ॥
जन कै संगि एक लिव लागी ॥
गुन गोबिद कीरतनु जनु गावै ॥
गुर प्रसादि नानक फलु पावै ॥8॥16॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: (महिमा देख के) वे बड़े हैरान और आश्चर्यमयी होते हैं। जिस जिस मनुष्य ने (प्रभू की बुजुर्गियत को) समझा है। उस उस को आनंद आया है। प्रभू के दास प्रभू के प्यार में मस्त रहते हैं। और सत्गुरू के उपदेश की बरकति से (नाम) पदार्थ हासिल कर लेते हैं। वह (सेवक खुद) नाम की दाति बाँटते हैं। और (जीवों के) दुख काटते हें। उनकी संगति से जगत के जीव (संसार समुंद्र से) तैर जाते हैं। ऐसे सेवकों का जो सेवक बनता है वह बड़ा भाग्यशाली होता है। उनकी संगति में जुड़ने से अकाल-पुरख के साथ सुरति जुड़ती है। (प्रभू का) सेवक प्रभू के गुण गाता है। और सिफत सालाह करता है। हे नानक ! सतिगुरू की कृपा से वह (प्रभू का नाम रूपी) फल पा लेता है। 8। 16।
सलोकु ॥
आदि सचु जुगादि सचु ॥
है भि सचु नानक होसी भि सचु ॥1॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक II प्रभू आरम्भ से ही अस्तित्व में है। युगों के शुरू से मौजूद है। इस वक्त भी मौजूद है। हे नानक ! आगे को भी सदा कायम रहेगा। 1।
असटपदी ॥
चरन सति सति परसनहार ॥
पूजा सति सति सेवदार ॥
दरसनु सति सति पेखनहार ॥
नामु सति सति धिआवनहार ॥
आपि सति सति सभ धारी ॥
आपे गुण आपे गुणकारी ॥
सबदु सति सति प्रभु बकता ॥
सुरति सति सति जसु सुनता ॥
बुझनहार कउ सति सभ होइ ॥
नानक सति सति प्रभु सोइ ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: अष्टपदी॥ प्रभू के चरन सदा स्थिर हैं चरनों को छूने वाले सेवक भी सदा अटॅल हो जाते हैं; प्रभू की पूजा एक सदा निभने वाला काम है। (सो) पूजा करने वाले सदा के लिए अटॅल हो जाते हैं। प्रभू का दीदार सति- (कर्म) है दीदार करने वाले भी जनम मरन से रहित हो जाते हैं; प्रभू का नाम अटॅल है सिमरने वाले भी स्थिर हैं। प्रभू खुद सदा अस्तित्व वाला है उसकी टिकाई हुई रचना भी अस्तित्व वाली है। प्रभू खुद गुण- (रूप) है, स्वयं ही गुण पैदा करने वाला है। (प्रभू की सिफत सालाह का) शबद सदा कायम है। शबद को उच्चारने वाला भी स्थिर हो जाता है। प्रभू में सुरति जोड़नी सति (-कर्म है)। प्रभू यश सुनने वाला भी सति है। (प्रभू का अस्तित्व) समझने वाले को उसका रचा हुआ जगत भी हसती वाला दिखता है (भाव- मिथ्या नहीं प्रतीत होता); हे नानक ! प्रभू स्वयं सदा स्थिर रहने वाला है। 1।
सति सरूपु रिदै जिनि मानिआ ॥
करन करावन तिनि मूलु पछानिआ ॥
जा कै रिदै बिस्वासु प्रभ आइआ ॥
ततु गिआनु तिसु मनि प्रगटाइआ ॥
भै ते निरभउ होइ बसाना ॥
जिस ते उपजिआ तिसु माहि समाना ॥
बसतु माहि ले बसतु गडाई ॥
ता कउ भिंन न कहना जाई ॥
बूझै बूझनहारु बिबेक ॥
नाराइन मिले नानक एक ॥2॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: जिस मनुष्य ने अटॅल प्रभू की मूरति को सदा मन में टिकाया हुआ है। उसने सब कुछ करने वाले और (जीवों से) कराने वाले (जगत के) मूल को पहिचान लिया है। जिस मनुष्य के हृदय में प्रभू (की हस्ती) का यकीन बंध गया है। उसके मन में सच्चा ज्ञान प्रगट हो गया है। (वह मनुष्य) (जगत के हरेक) डर से (रहित हो के) निडर हो के बसता है। (क्योंकि) वह सदा उस प्रभू में लीन रहता है जिस से वह पैदा हुआ है। (जैसे) एक चीज ले के (उसी तरह की) चीज में मिला दी जाए (तो दोनों में कोई फर्क नहीं रह जाता। वैसे ही जो मनुष्य प्रभू चरणों में लीन है) उसे प्रभू से अलग नहीं कहा जा सकता। (पर) इस विचार को विचारने वाला (कोई विरला) समझता है। हे नानक ! जो जीव प्रभू को मिल गए हैं वे उसके साथ एक-रूप हो गए हैं। 2।
ठाकुर का सेवकु आगिआकारी ॥
ठाकुर का सेवकु सदा पूजारी ॥
ठाकुर के सेवक कै मनि परतीति ॥
ठाकुर के सेवक की निरमल रीति ॥
ठाकुर कउ सेवकु जानै संगि ॥
प्रभ का सेवकु नाम कै रंगि ॥
सेवक कउ प्रभ पालनहारा ॥
सेवक की राखै निरंकारा ॥
सो सेवकु जिसु दइआ प्रभु धारै ॥
नानक सो सेवकु सासि सासि समारै ॥3॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: प्रभू का सेवक प्रभू की आज्ञा में चलता है और सदा उसकी पूजा करता है। अकाल-पुरख के सेवक के मन में (उसकी हसती का) विश्वास रहता है। (तभी तो) उसकी जिंदगी की स्वच्छ मर्यादा होती है। सेवक अपने मालिक प्रभू को (हर वक्त अपने) साथ जानता है और उसके नाम की मौज में रहता है। प्रभू अपने सेवक को सदा पालने के समर्थ है। और अपने सेवक की (सदा) लाज रखता है। (पर) सेवक वही मनुष्य (बन सकता) है जिस पर प्रभू खुद मेहर करता है; हे नानक ! ऐसा सेवक प्रभू को दम-ब-दम याद रखता है। 3।
अपुने जन का परदा ढाकै ॥
अपने सेवक की सरपर राखै ॥
अपने दास कउ देइ वडाई ॥
अपने सेवक कउ नामु जपाई ॥
अपने सेवक की आपि पति राखै ॥
ता की गति मिति कोइ न लाखै ॥
प्रभ के सेवक कउ को न पहूचै ॥
प्रभ के सेवक ऊच ते ऊचे ॥
जो प्रभि अपनी सेवा लाइआ ॥
नानक सो सेवकु दह दिसि प्रगटाइआ ॥4॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: प्रभू अपने सेवक का पर्दा ढकता है। और उसकी लाज अवश्य रखता है। प्रभू अपने सेवक को सम्मान बख्शता है और उसे अपना नाम जपाता है। प्रभू अपने सेवक की इज्जत स्वयं रखता है। उसकी उच्च अवस्था और उसके बड़ेपन का अंदाजा कोई नहीं लगा सकता। कोई मनुष्य प्रभू के सेवक की बराबरी नहीं कर सकता। (क्योंकि) प्रभू के सेवक ऊँचों से भी ऊँचे होते हैं। जिसे प्रभू ने खुद अपनी सेवा में लगाया है। (पर) हे नानक ! वह सेवक सारे जगत में प्रगट हुआ है। 4।
नीकी कीरी महि कल राखै ॥
भसम करै लसकर कोटि लाखै ॥
जिस का सासु न काढत आपि ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: (जिस) छोटी सी कीड़ी में (प्रभू) ताकत भरता है। (वह कीड़ी) लाखों करोड़ों लश्करों को राख कर देती है। जिस जीव के श्वास प्रभू खुद नहीं निकालता।

गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जिस प्रभू का ये जगत है वह खुद इसे बनाने वाला है।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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