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· सुखमनी · राग गउड़ी
नानक कै मनि इहु अनराउ ॥1॥
नानक कै मनि इहु अनराउ ॥1॥
हिन्दी अर्थ: नानक के मन में ये तमन्ना है
· सुखमनी · राग गउड़ी
मनसा पूरन सरना जोग ॥
मनसा पूरन सरना जोग ॥
जो करि पाइआ सोई होगु ॥
हरन भरन जा का नेत्र फोरु ॥
तिस का मंत्रु न जानै होरु ॥
अनद रूप मंगल सद जा कै ॥
सरब थोक सुनीअहि घरि ता कै ॥
राज महि राजु जोग महि जोगी ॥
तप महि तपीसरु ग्रिहसत महि भोगी ॥
धिआइ धिआइ भगतह सुखु पाइआ ॥
नानक तिसु पुरख का किनै अंतु न पाइआ ॥2॥
जो करि पाइआ सोई होगु ॥
हरन भरन जा का नेत्र फोरु ॥
तिस का मंत्रु न जानै होरु ॥
अनद रूप मंगल सद जा कै ॥
सरब थोक सुनीअहि घरि ता कै ॥
राज महि राजु जोग महि जोगी ॥
तप महि तपीसरु ग्रिहसत महि भोगी ॥
धिआइ धिआइ भगतह सुखु पाइआ ॥
नानक तिसु पुरख का किनै अंतु न पाइआ ॥2॥
हिन्दी अर्थ: प्रभू (जीवों के) मन के फुरने पूरे करने व शरण आए की सहायता करने के समर्थ है। जो उसने (जीवों के) हाथों में लिख दिया है। वही होता है। जिस प्रभू का आँख फरकने का समय (जगत के) पालने और नाश करने के लिए (काफी) है। उसका छुपा हुआ भेद कोई और जीव नहीं जानता। जिस प्रभू के घर में सदा आनंद और खुशियां हैं। (जगत के) सारे पदार्थ उसके घर में (मौजूद) सुने जाते हैं। राजाओं में प्रभू खुद ही राजा है। जोगियों में जोगी है। तपस्वियों में स्वयं ही बड़ा तपस्वी है और गृहस्तियों में भी सवयं ही गृहस्ती है। भगत जनों ने (उस प्रभू को) सिमर सिमर के सुख पा लिया है। हे नानक! किसी जीव ने उस अकाल-पुरख का अंत नहीं पाया। 2।
· सुखमनी · राग गउड़ी
जा की लीला की मिति नाहि ॥
जा की लीला की मिति नाहि ॥
सगल देव हारे अवगाहि ॥
पिता का जनमु कि जानै पूतु ॥
सगल परोई अपुनै सूति ॥
सुमति गिआनु धिआनु जिन देइ ॥ जन दास नामु धिआवहि सेइ ॥
तिहु गुण महि जा कउ भरमाए ॥
जनमि मरै फिरि आवै जाए ॥
ऊच नीच तिस के असथान ॥
जैसा जनावै तैसा नानक जान ॥3॥
सगल देव हारे अवगाहि ॥
पिता का जनमु कि जानै पूतु ॥
सगल परोई अपुनै सूति ॥
सुमति गिआनु धिआनु जिन देइ ॥ जन दास नामु धिआवहि सेइ ॥
तिहु गुण महि जा कउ भरमाए ॥
जनमि मरै फिरि आवै जाए ॥
ऊच नीच तिस के असथान ॥
जैसा जनावै तैसा नानक जान ॥3॥
हिन्दी अर्थ: जिस प्रभू की (जगत रूपी) खेल का लेखा कोई नहीं लगा सकता। उसे खोज-खोज के सारे देवते भी थक गए हैं। (क्योंकि) पिता का जन्म पुत्र क्या जाने? (जैसे माला के मणके) धागे में परोए हुए होते हैं (वैसे ही) सारी रचना प्रभू ने अपने (हुकम रूपी) धागे में परोई हुई है। जिन लोगों को प्रभू सुमति, ऊँची समझ और सुरति जोड़ने की दाति देता है। वही सेवक और दास उसका नाम सिमरते हैं। (पर) जिनको (माया के) तीन गुणों में भटकाता है। वह पैदा होते मरते रहते हैं और बार बार (जगत में) आते और जाते रहते हैं। सुमति वाले ऊँचे लोगों के हृदय त्रिगुणी नीच लोगों के मन, ये सारे उस प्रभू के अपने ही ठिकाने हैं (भाव, सब में बसता है)। हे नानक! जैसी बुद्धि-मति देता है। वैसी ही समझ वाला जीव बन जाता है। 3।
· सुखमनी · राग गउड़ी
नाना रूप नाना जा के रंग ॥
नाना रूप नाना जा के रंग ॥
नाना भेख करहि इक रंग ॥
नाना बिधि कीनो बिसथारु ॥
प्रभु अबिनासी एकंकारु ॥
नाना चलित करे खिन माहि ॥
पूरि रहिओ पूरनु सभ ठाइ ॥
नाना बिधि करि बनत बनाई ॥
अपनी कीमति आपे पाई ॥
सभ घट तिस के सभ तिस के ठाउ ॥
जपि जपि जीवै नानक हरि नाउ ॥4॥
नाना भेख करहि इक रंग ॥
नाना बिधि कीनो बिसथारु ॥
प्रभु अबिनासी एकंकारु ॥
नाना चलित करे खिन माहि ॥
पूरि रहिओ पूरनु सभ ठाइ ॥
नाना बिधि करि बनत बनाई ॥
अपनी कीमति आपे पाई ॥
सभ घट तिस के सभ तिस के ठाउ ॥
जपि जपि जीवै नानक हरि नाउ ॥4॥
हिन्दी अर्थ: हे प्रभु! आपके कई रूप और रंग हैं। आप अनेक भेष धारण करते हैं और फिर भी एक ही स्वरूप में रहते हैं। उसने जगत का पसारा कई तरीकों से किया है। प्रभू नाश-रहित है और सब जगह एक खुद ही खुद है। कई तमाशे प्रभू पलक में कर देता है। वह पूरन पुरख सब जगह व्यापक है। जगत की रचना प्रभू ने कई तरीकों से रची है। अपनी (महिमा का) मूल्य वह खुद ही जानता है। सारे शरीर उस प्रभू के ही हैं। सारी जगहें उसी की ही हैं। हे नानक! (उस का दास) उस का नाम जप-जप के जीता है। 4।
· सुखमनी · राग गउड़ी
नाम के धारे सगले जंत ॥
नाम के धारे सगले जंत ॥
नाम के धारे खंड ब्रहमंड ॥
नाम के धारे सिम्रिति बेद पुरान ॥
नाम के धारे सुनन गिआन धिआन ॥
नाम के धारे आगास पाताल ॥
नाम के धारे सगल आकार ॥
नाम के धारे पुरीआ सभ भवन ॥
नाम कै संगि उधरे सुनि स्रवन ॥
करि किरपा जिसु आपनै नामि लाए ॥
नानक चउथे पद महि सो जनु गति पाए ॥5॥
नाम के धारे खंड ब्रहमंड ॥
नाम के धारे सिम्रिति बेद पुरान ॥
नाम के धारे सुनन गिआन धिआन ॥
नाम के धारे आगास पाताल ॥
नाम के धारे सगल आकार ॥
नाम के धारे पुरीआ सभ भवन ॥
नाम कै संगि उधरे सुनि स्रवन ॥
करि किरपा जिसु आपनै नामि लाए ॥
नानक चउथे पद महि सो जनु गति पाए ॥5॥
हिन्दी अर्थ: सारे जीव-जंतु अकाल-पुरख के आसरे हैं। जगत के सारे (हिस्से) भी प्रभू के टिकाए हुए हैं। वेद, पुराण, स्मृतियां प्रभू के आधार पर हैं। ज्ञान की बातें सुननी और सुरति जोड़नी भी अकाल-पुरख के आसरे ही हैं। सारे आकाश-पाताल प्रभू-आसरे हैं। सारे शरीर ही प्रभू के आधार पर हैं। तीनों भवन और चौदह लोक अकाल-पुरख के टिकाए हुए हैं। जीव प्रभू में जुड़ के और उसका नाम कानों से सुन के विकारों से बचते हैं। जिस को मेहर करके अपने नाम में जोड़ता है। हे नानक! वह मनुष्य (माया के असर से ऊपर) चौथे तल पर पहुँच कर उच्च अवस्था प्राप्त करता है। 5।
· सुखमनी · राग गउड़ी
रूपु सति जा का सति असथानु ॥
रूपु सति जा का सति असथानु ॥
पुरखु सति केवल परधानु ॥
करतूति सति सति जा की बाणी ॥
सति पुरख सभ माहि समाणी ॥
सति करमु जा की रचना सति ॥
मूलु सति सति उतपति ॥
सति करणी निरमल निरमली ॥
जिसहि बुझाए तिसहि सभ भली ॥
सति नामु प्रभ का सुखदाई ॥
बिस्वासु सति नानक गुर ते पाई ॥6॥
पुरखु सति केवल परधानु ॥
करतूति सति सति जा की बाणी ॥
सति पुरख सभ माहि समाणी ॥
सति करमु जा की रचना सति ॥
मूलु सति सति उतपति ॥
सति करणी निरमल निरमली ॥
जिसहि बुझाए तिसहि सभ भली ॥
सति नामु प्रभ का सुखदाई ॥
बिस्वासु सति नानक गुर ते पाई ॥6॥
हिन्दी अर्थ: जिस प्रभू का रूप और ठिकाना सदा स्थिर रहने वाले हैं। केवल वही सर्व-व्यापक प्रभू सब के सिर पर है। जिस सदा अटल अकाल-पुरख की बाणी सब जीवों में रमी हुई है (भाव-जो प्रभू सब जीवों में बोल रहा है) उसके काम भी अटल हैं। जिस प्रभू की रचना सम्पूर्ण है (भाव, अधूरा नहीं)। जो (सबका) मूल (रूप) सदा स्थिर है। जिसका पैदा होना भी संपूर्ण है। उसकी बख्शिश सदा कायम है। प्रभू की महा पवित्र रजा है। जिस जीव को (रजा की) समझ देता है। उस को (वह रजा) पूरन तौर पर सुखदाई (लगती है)। प्रभू का सदा स्थिर रहने वाला नाम सुख दाता है। हे नानक! (जीव को) ये अटॅल सिदक सतिगुरू से मिलता है। 6।
· सुखमनी · राग गउड़ी
सति बचन साधू उपदेस ॥
सति बचन साधू उपदेस ॥
सति ते जन जा कै रिदै प्रवेस ॥
सति निरति बूझै जे कोइ ॥
नामु जपत ता की गति होइ ॥
आपि सति कीआ सभु सति ॥
आपे जानै अपनी मिति गति ॥
सति ते जन जा कै रिदै प्रवेस ॥
सति निरति बूझै जे कोइ ॥
नामु जपत ता की गति होइ ॥
आपि सति कीआ सभु सति ॥
आपे जानै अपनी मिति गति ॥
हिन्दी अर्थ: गुरू के उपदेश अटल बचन हैं। जिनके हृदय में (इस उपदेश का) प्रवेश होता है। वह भी अटॅल (भाव, जनम-मरन से रहित) हो जाते हैं। अगर किसी मनुष्य को सदा स्थिर रहने वाले प्रभू के प्यार की सूझ आ जाए, तो नाम जप के वह उच्च अवस्था हासिल कर लेता है। प्रभू खुद सदा कायम रहने वाला है। उसका पैदा किया हुआ जगत भी सच-मुच अस्तित्व वाला है (भाव, मिथ्या नहीं है) प्रभू अपनी अवस्था और मर्यादा स्वयं ही जानता है।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 284 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।