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अंग २८३ · गउड़ी

अंग
283
गउड़ी
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  1. पुरब लिखे का लिखिआ पाईऐ ॥
  2. जिसु वखर कउ लैनि तू आइआ ॥
  3. चरन साध के धोइ धोइ पीउ ॥
  4. मिरतक कउ जीवालनहार ॥
  5. जा कै मनि गुर की परतीति ॥
  6. रूपु न रेख न रंगु किछु त्रिहु गुण ते प्रभ भिंन ॥
  7. अबिनासी प्रभु मन महि राखु ॥

पुरब लिखे का लिखिआ पाईऐ ॥

अंग २८२ से चला आ रहा अंश

पुरब लिखे का लिखिआ पाईऐ ॥
दूख सूख प्रभ देवनहारु ॥
अवर तिआगि तू तिसहि चितारु ॥
जो कछु करै सोई सुखु मानु ॥
भूला काहे फिरहि अजान ॥
कउन बसतु आई तेरै संग ॥
लपटि रहिओ रसि लोभी पतंग ॥
राम नाम जपि हिरदे माहि ॥
नानक पति सेती घरि जाहि ॥4॥

हिन्दी अर्थ: पूर्व बीजे का फल ही खाना पड़ता है। दुख-सुख देने वाला प्रभू खुद ही है। (इसलिए) और (आसरे) छोड़ के आप उसी को याद कर। जो कुछ प्रभू करता है उसी को सुख समझ। हे अंजान ! क्यूँ भूला फिरता है? (बता) कौन सी चीज आपके साथ आई थी। हे लोभी पतंगे ! आप (माया के) स्वाद में मस्त हो रहे हैं। हे नानक ! हृदय में प्रभू का नाम जप। (इस तरह) बा-इज्जत (परलोक वाले) घर में जाएगा। 4।

जिसु वखर कउ लैनि तू आइआ ॥

जिसु वखर कउ लैनि तू आइआ ॥
राम नामु संतन घरि पाइआ ॥
तजि अभिमानु लेहु मन मोलि ॥ राम नामु हिरदे महि तोलि ॥
लादि खेप संतह संगि चालु ॥
अवर तिआगि बिखिआ जंजाल ॥
धंनि धंनि कहै सभु कोइ ॥
मुख ऊजल हरि दरगह सोइ ॥
इहु वापारु विरला वापारै ॥
नानक ता कै सद बलिहारै ॥5॥

हिन्दी अर्थ: (हे भाई !) जो सौदा खरीदने के लिए आप (जगत में) आए हैं; वह राम नाम (-रूपी सौदा) संतों के घर में मिलता है। (इसलिए) अहंकार छोड़ दे। और मन के बदले (ये सौदा) खरीद ले। और प्रभू का नाम हृदय में परख। संतों के साथ चल और राम नाम का ये सौदा लाद ले। माया के अन्य धंधे छोड़ दे। (अगर ये उद्यम करेगा तो) हरेक जीव आपको शाबाश देगा। और प्रभू की दरगाह में भी आपका मुँह उज्जवल होंगे। (पर) ये व्यापार कोई विरला बंदा ही करता है। हे नानक ! ऐसे (व्यापारी) पर से सदा सदके जाएं। 5।

चरन साध के धोइ धोइ पीउ ॥

चरन साध के धोइ धोइ पीउ ॥
अरपि साध कउ अपना जीउ ॥
साध की धूरि करहु इसनानु ॥
साध ऊपरि जाईऐ कुरबानु ॥
साध सेवा वडभागी पाईऐ ॥
साधसंगि हरि कीरतनु गाईऐ ॥
अनिक बिघन ते साधू राखै ॥
हरि गुन गाइ अंम्रित रसु चाखै ॥
ओट गही संतह दरि आइआ ॥
सरब सूख नानक तिह पाइआ ॥6॥

हिन्दी अर्थ: (हे भाई !) साधु जनों के पैर धो-धो के (नाम जल) पी। साधु जनों पर से अपनी जिंद भी वार दे। गुरमुख मनुष्य के पैरों की ख़ाक में स्नान कर। गुरमुख से सदके हो। संत की सेवा बड़े भाग्यों से मिलती है। संत की संगत में ही प्रभू की सिफत सालाह की जा सकती है। संत अनेकों मुश्किलों से (जो आत्मिक जीवन के राह में आती हैं) बचा लेता है। संत प्रभू के गुण गा के नाम-अमृत का स्वाद लेता है। (जिस मनुष्य ने) संतों का आसरा लिया है जो संतों के दर पर आ गिरा है। उसने। हे नानक ! सारे सुख पा लिए हैं। 6।

मिरतक कउ जीवालनहार ॥

मिरतक कउ जीवालनहार ॥
भूखे कउ देवत अधार ॥
सरब निधान जा की द्रिसटी माहि ॥
पुरब लिखे का लहणा पाहि ॥
सभु किछु तिस का ओहु करनै जोगु ॥
तिसु बिनु दूसर होआ न होगु ॥
जपि जन सदा सदा दिनु रैणी ॥
सभ ते ऊच निरमल इह करणी ॥
करि किरपा जिस कउ नामु दीआ ॥
नानक सो जनु निरमलु थीआ ॥7॥

हिन्दी अर्थ: (प्रभू) मरे हुए को जिंदा करने के काबिल है। भूखे को भी आसरा देता है। सारे खजाने उस मालिक की नजर में हैं। (पर जीव) अपने पहले किये कर्मों के फल भोगते हैं। सब कुछ उस प्रभू का ही है और वही सब कुछ करने के स्मर्थ है; उससे बिना ना कोई दूसरा है ना ही होंगे। हे जन ! सदा ही दिन रात प्रभू को याद कर। और सभी कर्मों से यही कर्म ऊँचा और स्वच्छ है। मेहर करके जिस मनुष्य को नाम बख्शता है। हे नानक ! वह मनुष्य पवित्र हो जाता है। 7।

जा कै मनि गुर की परतीति ॥

जा कै मनि गुर की परतीति ॥
तिसु जन आवै हरि प्रभु चीति ॥
भगतु भगतु सुनीऐ तिहु लोइ ॥
जा कै हिरदै एको होइ ॥
सचु करणी सचु ता की रहत ॥
सचु हिरदै सति मुखि कहत ॥
साची द्रिसटि साचा आकारु ॥
सचु वरतै साचा पासारु ॥
पारब्रहमु जिनि सचु करि जाता ॥
नानक सो जनु सचि समाता ॥8॥15॥

हिन्दी अर्थ: जिस मनुष्य के मन में सतिगुरू की श्रद्धा बन गई है उसके चित्त में प्रभू टिक जाता है। वह मनुष्य सारे जगत में भगत-भगत सुना जाता है। जिसके हृदय में एक प्रभू बसता है। उसकी असल जिंदगी और जिंदगी के असूल एक समान हैं। सच्चा प्रभू उसके दिल में है। और प्रभू का नाम ही वह मुंह से उच्चारता है। उस मनुष्य की नजर सच्चे प्रभू के रंग में रंगी हुई है। (तभी तो) सारा दिखाई देता जगत (उसको) प्रभू का रूप दिखता है। प्रभू ही (हर जगह) मौजूद (दिखता है। और) प्रभू का ही (सारा) पसारा दिखता है। जिस मनुष्य ने अकाल-पुरख को सदा स्थिर रहने वाला समझा है। हे नानक ! वह मनुष्य सदा उस स्थिर रहने वाले में लीन हो जाता है। 8। 15।

रूपु न रेख न रंगु किछु त्रिहु गुण ते प्रभ भिंन ॥

सलोकु ॥
रूपु न रेख न रंगु किछु त्रिहु गुण ते प्रभ भिंन ॥
तिसहि बुझाए नानका जिसु होवै सुप्रसंन ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ प्रभू का ना कोई रूप है। ना चिन्ह-चक्र और ना कोई रंग। प्रभू माया के तीन गुणों से बेदाग है। हे नानक ! प्रभू अपना आप उस मनुष्य को समझाता है जिस पर खुद मेहरबान होता है। 1।

अबिनासी प्रभु मन महि राखु ॥

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असटपदी ॥
अबिनासी प्रभु मन महि राखु ॥
मानुख की तू प्रीति तिआगु ॥
तिस ते परै नाही किछु कोइ ॥
सरब निरंतरि एको सोइ ॥
आपे बीना आपे दाना ॥
गहिर गंभीरु गहीरु सुजाना ॥
पारब्रहम परमेसुर गोबिंद ॥
क्रिपा निधान दइआल बखसंद ॥
साध तेरे की चरनी पाउ ॥

हिन्दी अर्थ: अष्टपदी ॥ (हे भाई !) अपने मन में अकाल पुरख को परो के रख और मनुष्य का प्यार (मोह) त्याग दे। उससे बाहर और कोई जीव नहीं। कोई चीज नहीं। सब जीवों के अंदर एक अकाल-पुरख ही व्यापक है। वही खुद ही (जीवों के दिल की) पहचानने वाला और जानने वाला है। प्रभू बड़ा गंभीर है और गहरा है। समझदार है। हे पारब्रहम प्रभू ! सबसे बड़े मालिक ! और जीवों के पालक ! दया के खजाने ! दया के घर ! और बख्शनहार ! मैं आपके साधुओं की चरणों में पड़ूँ। 1।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग २८३ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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