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अंग 280

अंग
280
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सुखमनी साहिब का हिस्सा। पूरी 24 अष्टपदियों की हिन्दी टीका /sukhmani-sahib/ पर है।
नानक संत भावै ता ओइ भी गति पाहि ॥2॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: (हाँ) हे नानक ! अगर संतों को भाए तो वे निंदक भी बढ़िया अवस्था में पहुँच जाते हैं। 2।
संत का निंदकु महा अतताई ॥
संत का निंदकु खिनु टिकनु न पाई ॥
संत का निंदकु महा हतिआरा ॥
संत का निंदकु परमेसुरि मारा ॥
संत का निंदकु राज ते हीनु ॥
संत का निंदकु दुखीआ अरु दीनु ॥
संत के निंदक कउ सरब रोग ॥
संत के निंदक कउ सदा बिजोग ॥
संत की निंदा दोख महि दोखु ॥
नानक संत भावै ता उस का भी होइ मोखु ॥3॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: संत की निंदा करने वाला सदा अति किए रखता है। और एक पलक भर भी (अपनी अत्याचारी आदत) से बाज नहीं आता। संत का निंदक बड़ा जालिम बन जाता है। और रॅब द्वारा धिक्कारा जाता है। संत का निंदक राज (भाव। दुनिया के सुखों) से वंचित रहता है। (सदा) दुखी और आतुर रहता है। संत की निंदा करने वाले को सारे रोग व्याप्ते हैं (क्योंकि) उसका (सुखों के श्रोत प्रभू से) सदा विछोड़ा बना रहता है। संत की निंदा करनी बहुत ही बुरा काम है। हे नानक ! अगर संतों को भाए तो उस (निंदक) का भी (निंदा से) छुटकारा हो जाता है। 3।
संत का दोखी सदा अपवितु ॥
संत का दोखी किसै का नही मितु ॥
संत के दोखी कउ डानु लागै ॥
संत के दोखी कउ सभ तिआगै ॥
संत का दोखी महा अहंकारी ॥
संत का दोखी सदा बिकारी ॥
संत का दोखी जनमै मरै ॥
संत की दूखना सुख ते टरै ॥
संत के दोखी कउ नाही ठाउ ॥
नानक संत भावै ता लए मिलाइ ॥4॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: संत का निंदक सदा मैले मन वाला है (तभी) वह (कभी) किसी का सज्जन नहीं बनता। (अंत समय) संत के निंदक को (धर्मराज से) सजा मिलती है और सारे उसका साथ छोड़ जाते हैं। संत की निंदा करने वाला बड़े गुरूर वाला (अकड़ वाला) बन जाता है और सदा बुरे काम करता है। (इन औगुणों में) संत का निंदक पैदा होता मरता रहता है। और संत की निंदा के कारण सुखों से वंचित रहता है। संत के निंदक को कोई सहारा नहीं मिलता। (पर हाँ)। हे नानक ! अगर संत चाहे अपने साथ उस (निंदक) को मिला लेता है। 4।
संत का दोखी अध बीच ते टूटै ॥
संत का दोखी कितै काजि न पहूचै ॥
संत के दोखी कउ उदिआन भ्रमाईऐ ॥
संत का दोखी उझड़ि पाईऐ ॥
संत का दोखी अंतर ते थोथा ॥
जिउ सास बिना मिरतक की लोथा ॥
संत के दोखी की जड़ किछु नाहि ॥
आपन बीजि आपे ही खाहि ॥
संत के दोखी कउ अवरु न राखनहारु ॥
नानक संत भावै ता लए उबारि ॥5॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: संत की निंदा करने वाले का काम आधे बीच में ही रह जाता है। संत की निंदा करने वाले का कोई काम सिरे नहीं चढ़ता। संत के निंदक को (मानो) जंगलों में परेशान किया जाता है और (राह से विछोड़ के) उजाड़ में डाल देते हैं। वैसे ही संत का निंदक अंदर से (असली जिंदगी से जो मनुष्य का आधार है) खाली होता है। जैसे प्राणों के बिना मुर्दा शव है। संत के निंदकों की (नेक कमाई और सिमरन वाली) कोई पक्की नींव नहीं होती। खुद ही (निंदा की) कमाई करके खुद ही (उसका बुरा फल) खाते हैं। संत की निंदा करने वाले को कोई और मनुष्य (निंदा की वादी से) बचा नहीं सकता। (पर) हे नानक ! अगर संत चाहे तो (निंदक को निंदा के स्वभाव से) बचा सकता है। 5।
संत का दोखी इउ बिललाइ ॥
जिउ जल बिहून मछुली तड़फड़ाइ ॥
संत का दोखी भूखा नही राजै ॥
जिउ पावकु ईधनि नही ध्रापै ॥
संत का दोखी छुटै इकेला ॥
जिउ बूआड़ु तिलु खेत माहि दुहेला ॥
संत का दोखी धरम ते रहत ॥
संत का दोखी सद मिथिआ कहत ॥
किरतु निंदक का धुरि ही पइआ ॥
नानक जो तिसु भावै सोई थिआ ॥6॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: संत का निंदक ऐसे बिलकता है जैसे पानी के बिना मछली तड़फती है। संत का निंदक तृष्णा का मारा हुआ कभी संतुष्ट नहीं होता। जैसे आग ईधन से तृप्त नहीं होती (भाव। संत को शोभा का जला हुआ ईष्या के कारण निंदा करता है और ये ईरखा कम नहीं होती)। वैसे ही संत का निंदक भी अकेला त्यागा हुआ पड़ा रहता है (कोई उसके नजदीक नहीं आता)। जैसे अंदर से जला हुआ तिल का पौधा खेत में ही दुत्कारा सा पड़ा रहता है संत का निंदक धर्म से हीन होता है और सदा झूठ बोलता है। (पर) पहली की हुई निंदा का ये फल (-रूपी स्वभाव) निंदक का आरम्भ से ही (जब से उसने निंदा का काम पकड़ा) चला (सो, उस स्वभाव के कारण बिचारा और करे भी तो क्या?) हे नानक ! (ये मालिक की रजा है) जो उसे ठीक लगता है वही होता है। 6।
संत का दोखी बिगड़ रूपु होइ जाइ ॥
संत के दोखी कउ दरगह मिलै सजाइ ॥
संत का दोखी सदा सहकाईऐ ॥
संत का दोखी न मरै न जीवाईऐ ॥
संत के दोखी की पुजै न आसा ॥
संत का दोखी उठि चलै निरासा ॥
संत कै दोखि न त्रिसटै कोइ ॥
जैसा भावै तैसा कोई होइ ॥
पइआ किरतु न मेटै कोइ ॥
नानक जानै सचा सोइ ॥7॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: संतों की निंदा करने वाला भ्रष्टा जाता है। प्रभू की दरगाह में उसको सजा मिलती है। संत का निंदक सदा आतुर (सिसकता) रहता है। ना वह जीवितों में ना ही मरों में होता है। संत के निंदक की आस कभी पूरी नहीं होती। जगत से निराश ही चला जाता है (भला संतों वाली शोभा उसे कैसे मिले?)। (इस वास्ते) संत की निंदा करने कोई मनुष्य (निंदा की) इस प्यास से नहीं बचता। जैसी मनुष्य की नीयति होती है वैसा उसका स्वभाव बन जाता है (बचे भी कैसे?) पीछे की हुई (बुरी) कमाई के इकट्ठे हुए (स्वभाव रूपी) फल को कोई मिटा नहीं सकता। हे नानक ! (इस भेद को) वह सच्चा प्रभू जानता है। 7।
सभ घट तिस के ओहु करनैहारु ॥
सदा सदा तिस कउ नमसकारु ॥
प्रभ की उसतति करहु दिनु राति ॥
तिसहि धिआवहु सासि गिरासि ॥
सभु कछु वरतै तिस का कीआ ॥
जैसा करे तैसा को थीआ ॥
अपना खेलु आपि करनैहारु ॥
दूसर कउनु कहै बीचारु ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सारे जीव जंतु उस प्रभू के हैं। वही सब कुछ करने के स्मर्थ हैं। सदा उस प्रभू के आगे सिर निवाओ। दिन रात प्रभू के गुण गाओ। हर दम के साथ उसे याद करो। (जगत में) हरेक खेल उसी की चलाई हुई चल रही है। प्रभू (जीव को) जैसा बनाता है वैसा ही हरेक जीव बन जाता है। (जगत रूपी) अपनी खेल खुद ही करने के काबिल है। कौन कोई दूसरा उसे सलाह दे सकता है?

गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हाँ) हे नानक ! अगर संतों को भाए तो वे निंदक भी बढ़िया अवस्था में पहुँच जाते हैं।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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