Lulla Family

अंग 279

अंग
279
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सुखमनी साहिब का हिस्सा। पूरी 24 अष्टपदियों की हिन्दी टीका /sukhmani-sahib/ पर है।
त्रिपति न आवै माइआ पाछै पावै ॥
अनिक भोग बिखिआ के करै ॥
नह त्रिपतावै खपि खपि मरै ॥
बिना संतोख नही कोऊ राजै ॥
सुपन मनोरथ ब्रिथे सभ काजै ॥
नाम रंगि सरब सुखु होइ ॥
बडभागी किसै परापति होइ ॥
करन करावन आपे आपि ॥
सदा सदा नानक हरि जापि ॥5॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: माया जमा किए जाता है (पर) तृप्त नहीं होता। माया की अनेकों मौजें मानता है। तसल्ली नहीं होती। (भोगों के पीछे और दौड़ता है) बड़ा दुखी होता है। अगर अंदर संतोष ना हो। तो कोई (मनुष्य) तृप्त नहीं होता। जैसे सपनों का कोई लाभ नहीं होता। वैसे (संतोष-हीन मनुष्य के) सारे काम और ख्वाहिशें व्यर्थ हैं। प्रभू के नाम की मौज में (ही) सारा सुख है। (और ये सुख) किसी बड़े भाग्यशाली को मिलता है। (जो) प्रभू खुद ही सब कुछ करने के और (जीवों से) कराने के स्मर्थ है। हे नानक ! उस प्रभू को सदा सिमर। 5।
करन करावन करनैहारु ॥
इस कै हाथि कहा बीचारु ॥
जैसी द्रिसटि करे तैसा होइ ॥
आपे आपि आपि प्रभु सोइ ॥
जो किछु कीनो सु अपनै रंगि ॥
सभ ते दूरि सभहू कै संगि ॥
बूझै देखै करै बिबेक ॥
आपहि एक आपहि अनेक ॥
मरै न बिनसै आवै न जाइ ॥
नानक सद ही रहिआ समाइ ॥6॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: प्रभू खुद ही सब कुछ करने योग्य है, और (जीवों से) करवाने के समर्थ है। विचार के देख ले इस जीव के हाथ में कुछ भी नहीं। प्रभू जैसी नजर (बंदे पर) करता है (बंदा) वैसा ही बन जाता है। वह प्रभू स्वयं ही स्वयं है। जो कुछ उसने बनाया है अपनी मौज में बनाया है; सब जीवों के अंग संग भी है और सबसे अलग भी है। सब कुछ समझता है देखता है और पहचानता है। प्रभू स्वयं ही एक है और स्वयं ही अनेक (रूप) धार रहा है। वह ना कभी मरता है ना बिनसता है; ना पैदा होता है ना मरता है; हे नानक ! प्रभू सदा ही अपने आप में टिका रहता है। 6।
आपि उपदेसै समझै आपि ॥
आपे रचिआ सभ कै साथि ॥
आपि कीनो आपन बिसथारु ॥
सभु कछु उस का ओहु करनैहारु ॥
उस ते भिंन कहहु किछु होइ ॥
थान थनंतरि एकै सोइ ॥
अपुने चलित आपि करणैहार ॥
कउतक करै रंग आपार ॥
मन महि आपि मन अपुने माहि ॥
नानक कीमति कहनु न जाइ ॥7॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: (सो वह) स्वयं ही शिक्षा देता है और स्वयं ही (उस शिक्षा को) समझता है। प्रभू खुद ही सब जीवों के साथ मिला हुआ है। अपना फैलाव उसने खुद ही बनाया है। (जगत की) हरेक शै उसकी बनाई हुई है वह बनाने के काबिल है। बताओ उससे अलग कुछ हो सकता है? हर जगह वह प्रभू खुद ही (मौजूद) है। अपने खेल आप ही करने के लायक है। बेअंत रंगों के तमाशे करता है। (जीवों के) मन में स्वयं बस रहा है (जीवों को) अपने मन में टिकाए बैठा है; हे नानक ! उसका मूल्य बताया नहीं जा सकता। 7।
सति सति सति प्रभु सुआमी ॥
गुर परसादि किनै वखिआनी ॥
सचु सचु सचु सभु कीना ॥
कोटि मधे किनै बिरलै चीना ॥
भला भला भला तेरा रूप ॥
अति सुंदर अपार अनूप ॥
निरमल निरमल निरमल तेरी बाणी ॥
घटि घटि सुनी स्रवन बख्याणी ॥
पवित्र पवित्र पवित्र पुनीत ॥
नामु जपै नानक मनि प्रीति ॥8॥12॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: (सब का) मालिक प्रभू सदा ही कायम रहने वाला है, गुरू की मेहर से किसी विरले ने (ये बात) बताई है। जो कुछ उसने बनाया है वह भी मुकंमल है (संपूर्ण है अधूरा नहीं) ये बात करोड़ों में से किसी विरले ने पहिचानी है। आपका रूप क्या प्यारा प्यारा है? हे अत्यंत सुंदर बेअंत और बेमिसाल प्रभू ! आपकी बोली भी मीठी मीठी है। हरेक शरीर में कानों द्वारा सुनी जा रही है और जीभ से उचारी जा रही है (भाव। हरेक शरीर में आप खुद ही बोल रहा है)। हे नानक ! वह पवित्र ही पवित्र हो जाता है। (जो ऐसे प्रभू का) नाम प्रीति से मन में जपता है। 8। 12।
सलोकु ॥
संत सरनि जो जनु परै सो जनु उधरनहार ॥
संत की निंदा नानका बहुरि बहुरि अवतार ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: शलोक॥ जो मनुष्य संतों की शरण पड़ता है वह माया के बंधनों से बच जाता है; (पर) हे नानक ! संतों की निंदा करने से बार बार पैदा होना पड़ता है (भाव- जनम मरन के चक्कर में पड़ जाते हैं)। 1।
असटपदी ॥
संत कै दूखनि आरजा घटै ॥
संत कै दूखनि जम ते नही छुटै ॥
संत कै दूखनि सुखु सभु जाइ ॥
संत कै दूखनि नरक महि पाइ ॥
संत कै दूखनि मति होइ मलीन ॥
संत कै दूखनि सोभा ते हीन ॥
संत के हते कउ रखै न कोइ ॥
संत कै दूखनि थान भ्रसटु होइ ॥
संत क्रिपाल क्रिपा जे करै ॥
नानक संतसंगि निंदकु भी तरै ॥1॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: अष्टपदी॥ संत की निंदा करने से (मनुष्य की) उम्र (व्यर्थ ही) गुजर जाती है। (क्योंकि) संत की निंदा करने से जमों से बच नहीं सकता। संत की निंदा करने से सारा (ही) सुख (नाश हो) जाता है। और मनुष्य नरक में (भाव- घोर दुखों में) पड़ जाता है। संत की निंदा करने से (मनुष्य की) मति मैली हो जाती है। और (जगत में) मनुष्य शोभा से वंचित रह जाता है। संत के धिक्कारे हुए आदमी की कोई मनुष्य सहायता नहीं कर सकता। (क्योंकि) संत की निंदा करने से (निंदक का) हृदय गंदा हो जाता है। (पर) अगर कृपालु संत स्वयं कृपा करे तो। हे नानक ! संत की संगति में निंदक भी (पापों से) बच जाता है। 1।
संत के दूखन ते मुखु भवै ॥
संतन कै दूखनि काग जिउ लवै ॥
संतन कै दूखनि सरप जोनि पाइ ॥
संत कै दूखनि त्रिगद जोनि किरमाइ ॥
संतन कै दूखनि त्रिसना महि जलै ॥
संत कै दूखनि सभु को छलै ॥
संत कै दूखनि तेजु सभु जाइ ॥
संत कै दूखनि नीचु नीचाइ ॥
संत दोखी का थाउ को नाहि ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: संत की निंदा करने से (निंदक का) चेहरा ही भ्रष्ट हो जाता है। (और निंदक) (जगह जगह) कौए की तरह लब-लब करता है (निंदा के बचन बोलता फिरता है)। संत की निंदा करने से (खोटा स्वभाव बन जाने से) मनुष्य सांप की जोनि जा पड़ता है। और कृमि आदि छोटी जोनियों में भटकता है। संत की निंदा के कारण (निंदक) तृष्णा (की आग) में जलता भुनता है। और हरेक मनुष्य को धोखा देता फिरता है। संत की निंदा करने से सारा तेज प्रताप ही नष्ट हो जाता है और (निंदक) महा नीच बन जाता है। संत की निंदा करने वालों का कोई आसरा नहीं रहता;

गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “माया जमा किए जाता है (पर) तृप्त नहीं होता।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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