जिस ही की सिरकार है तिस ही का सभु कोइ ॥
गुरमुखि कार कमावणी सचु घटि परगटु होइ ॥
अंतरि जिस कै सचु वसै सचे सची सोइ ॥
सचि मिले से न विछुड़हि तिन निज घरि वासा होइ ॥1॥
मेरे राम मै हरि बिनु अवरु न कोइ ॥
सतगुरु सचु प्रभु निरमला सबदि मिलावा होइ ॥1॥ रहाउ ॥
सबदि मिलै सो मिलि रहै जिस नउ आपे लए मिलाइ ॥
दूजै भाइ को ना मिलै फिरि फिरि आवै जाइ ॥
सभ महि इकु वरतदा एको रहिआ समाइ ॥
जिस नउ आपि दइआलु होइ सो गुरमुखि नामि समाइ ॥2॥
पड़ि पड़ि पंडित जोतकी वाद करहि बीचारु ॥
मति बुधि भवी न बुझई अंतरि लोभ विकारु ॥
लख चउरासीह भरमदे भ्रमि भ्रमि होइ खुआरु ॥
पूरबि लिखिआ कमावणा कोइ न मेटणहारु ॥3॥
सतगुर की सेवा गाखड़ी सिरु दीजै आपु गवाइ ॥
सबदि मिलहि ता हरि मिलै सेवा पवै सभ थाइ ॥
पारसि परसिऐ पारसु होइ जोती जोति समाइ ॥
जिन कउ पूरबि लिखिआ तिन सतगुरु मिलिआ आइ ॥4॥
मन भुखा भुखा मत करहि मत तू करहि पूकार ॥
लख चउरासीह जिनि सिरी सभसै देइ अधारु ॥
निरभउ सदा दइआलु है सभना करदा सार ॥
नानक गुरमुखि बुझीऐ पाईऐ मोख दुआरु ॥5॥3॥36॥
जिनी सुणि कै मंनिआ तिना निज घरि वासु ॥
गुरमती सालाहि सचु हरि पाइआ गुणतासु ॥
सबदि रते से निरमले हउ सद बलिहारै जासु ॥
हिरदै जिन कै हरि वसै तितु घटि है परगासु ॥1॥
मन मेरे हरि हरि निरमलु धिआइ ॥
धुरि मसतकि जिन कउ लिखिआ से गुरमुखि रहे लिव लाइ ॥1॥ रहाउ ॥
हरि संतहु देखहु नदरि करि निकटि वसै भरपूरि ॥
गुरमति जिनी पछाणिआ से देखहि सदा हदूरि ॥
जिन गुण तिन सद मनि वसै अउगुणवंतिआ दूरि ॥
मनमुख गुण तै बाहरे बिनु नावै मरदे झूरि ॥2॥
जिन सबदि गुरू सुणि मंनिआ तिन मनि धिआइआ हरि सोइ ॥
अनदिनु भगती रतिआ मनु तनु निरमलु होइ ॥
कूड़ा रंगु कसुंभ का बिनसि जाइ दुखु रोइ ॥
जिसु अंदरि नाम प्रगासु है ओहु सदा सदा थिरु होइ ॥3॥
श्री राग की धुन में एक ठहराव है, सूर्यास्त के क़रीब के घंटे का। ग्रंथ में जब-कब यह राग खुलता है, स्वर में चमक के पीछे की उदासी सुनाई देती है। शास्त्रीय परम्परा में इसे रागों का मूल कहा गया है। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “श्री राग महला 3 घरु 1 ॥ (जिस देश में) जिस (बादशाह) की हकूमत हो (उस देश का) हरेक जीव उसी (बादशाह) का हो के रहता है (इसी तरह अगर) गुरू के सन्मुख हो के कर्म किया जाए तो सदा स्थिर रहने।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।