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· सुखमनी · राग गउड़ी
ब्रहम गिआनी आपि निरंकारु ॥
ब्रहम गिआनी आपि निरंकारु ॥
ब्रहम गिआनी की सोभा ब्रहम गिआनी बनी ॥
नानक ब्रहम गिआनी सरब का धनी ॥8॥8॥
ब्रहम गिआनी की सोभा ब्रहम गिआनी बनी ॥
नानक ब्रहम गिआनी सरब का धनी ॥8॥8॥
हिन्दी अर्थ: वह (तो प्रत्यक्ष) स्वयं ही ईश्वर है। ब्रहमज्ञानी की महिमा (कोई) ब्रहमज्ञानी ही कर सकता है; हे नानक! ब्रहमज्ञानी सब जीवों का मालिक है। 8। 8।
· सुखमनी · राग गउड़ी
उरि धारै जो अंतरि नामु ॥
सलोकु ॥
उरि धारै जो अंतरि नामु ॥
सरब मै पेखै भगवानु ॥
निमख निमख ठाकुर नमसकारै ॥
नानक ओहु अपरसु सगल निसतारै ॥1॥
उरि धारै जो अंतरि नामु ॥
सरब मै पेखै भगवानु ॥
निमख निमख ठाकुर नमसकारै ॥
नानक ओहु अपरसु सगल निसतारै ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक ॥ जो मनुष्य सदा अपने हृदय में अकाल-पुरख का नाम टिकाए रखता है। और भगवान को सभी में व्यापक देखता है। जो पल पल अपने प्रभू को नमस्कार करता है; हे नानक! वह (असली) अछोह है और वह सब जीवों को (संसार समुंद्र से) तार लेता है। 1।
· सुखमनी · राग गउड़ी
मिथिआ नाही रसना परस ॥
असटपदी ॥
मिथिआ नाही रसना परस ॥
मन महि प्रीति निरंजन दरस ॥
पर त्रिअ रूपु न पेखै नेत्र ॥
साध की टहल संतसंगि हेत ॥
करन न सुनै काहू की निंदा ॥
सभ ते जानै आपस कउ मंदा ॥
गुर प्रसादि बिखिआ परहरै ॥
मन की बासना मन ते टरै ॥
इंद्री जित पंच दोख ते रहत ॥
नानक कोटि मधे को ऐसा अपरस ॥1॥
मिथिआ नाही रसना परस ॥
मन महि प्रीति निरंजन दरस ॥
पर त्रिअ रूपु न पेखै नेत्र ॥
साध की टहल संतसंगि हेत ॥
करन न सुनै काहू की निंदा ॥
सभ ते जानै आपस कउ मंदा ॥
गुर प्रसादि बिखिआ परहरै ॥
मन की बासना मन ते टरै ॥
इंद्री जित पंच दोख ते रहत ॥
नानक कोटि मधे को ऐसा अपरस ॥1॥
हिन्दी अर्थ: अष्टपदी। जो मनुष्य जीभ से झूठ को छूने नहीं देता। मन में अकाल-पुरख के दीदार की तमन्ना रखता है; जो पराई स्त्री के हुस्न को अपनी आँखों से नहीं देखता। भले मनुष्यों की टहल (सेवा करता है) और संत जनों की संगति में प्रीति (रखता है); जो कानों से किसी की भी निंदा नहीं सुनता। (बल्कि) सभी से अपने आप को बुरा समझता है; जो गुरू की मेहर के सदका माइआ (का प्रभाव) परे हटा देता है। और जिसके मन की वासना मन से टल जाती है; जो अपनी ज्ञानेन्द्रियों को वश में रख के कामादिक पाँचों विकारों से बचा रहता है। हे नानक! करोड़ों में से कोई ऐसा विरला मनुष्य ‘अपरस’ (कहा जा सकता है)। 1।
· सुखमनी · राग गउड़ी
बैसनो सो जिसु ऊपरि सुप्रसंन ॥
बैसनो सो जिसु ऊपरि सुप्रसंन ॥
बिसन की माइआ ते होइ भिंन ॥
करम करत होवै निहकरम ॥
तिसु बैसनो का निरमल धरम ॥
काहू फल की इछा नही बाछै ॥
केवल भगति कीरतन संगि राचै ॥
मन तन अंतरि सिमरन गोपाल ॥
सभ ऊपरि होवत किरपाल ॥
आपि द्रिड़ै अवरह नामु जपावै ॥
नानक ओहु बैसनो परम गति पावै ॥2॥
बिसन की माइआ ते होइ भिंन ॥
करम करत होवै निहकरम ॥
तिसु बैसनो का निरमल धरम ॥
काहू फल की इछा नही बाछै ॥
केवल भगति कीरतन संगि राचै ॥
मन तन अंतरि सिमरन गोपाल ॥
सभ ऊपरि होवत किरपाल ॥
आपि द्रिड़ै अवरह नामु जपावै ॥
नानक ओहु बैसनो परम गति पावै ॥2॥
हिन्दी अर्थ: जिस पर प्रभू खुद प्रसन्न होता है वह है असली वैष्णव। जो मनुष्य प्रभू की माया के असर से बेदाग है और जो (धर्म के) काम करता हुआ इन कामों के फल की इच्छा नहीं रखता। उस वैष्णव का धर्म (भी) पवित्र है जो मनुष्य किसी भी फल की ख्वाइश नहीं करता; और निरा भगती व कीर्तन में मस्त रहता है। जिसके मन तन में प्रभू का सिमरन बस रहा है। जो सब जीवों पे दया करता है। जो खुद (प्रभू के नाम को) अपने मन में टिकाता है व औरों को नाम जपाता है। हे नानक! वह वैष्णव उच्च स्थान हासिल करता है। 2।
· सुखमनी · राग गउड़ी
भगउती भगवंत भगति का रंगु ॥
भगउती भगवंत भगति का रंगु ॥
सगल तिआगै दुसट का संगु ॥
मन ते बिनसै सगला भरमु ॥
करि पूजै सगल पारब्रहमु ॥
साधसंगि पापा मलु खोवै ॥
तिसु भगउती की मति ऊतम होवै ॥
भगवंत की टहल करै नित नीति ॥
मनु तनु अरपै बिसन परीति ॥
हरि के चरन हिरदै बसावै ॥
नानक ऐसा भगउती भगवंत कउ पावै ॥3॥
सगल तिआगै दुसट का संगु ॥
मन ते बिनसै सगला भरमु ॥
करि पूजै सगल पारब्रहमु ॥
साधसंगि पापा मलु खोवै ॥
तिसु भगउती की मति ऊतम होवै ॥
भगवंत की टहल करै नित नीति ॥
मनु तनु अरपै बिसन परीति ॥
हरि के चरन हिरदै बसावै ॥
नानक ऐसा भगउती भगवंत कउ पावै ॥3॥
हिन्दी अर्थ: भगवान का (असली) उपासक (वह है जिसके हृदय में) भगवान की भक्ति का प्यार है और जो सब बुरे काम करने वालों का संग त्याग देता है। जिसके मन में से हर तरह का वहम मिट जाता है। जो अकाल-पुरख को हर जगह मौजूद जान के पूजता है। जो गुरमुखों की संगति में रह के पापों की मैल (मन से) दूर करता है। उस भगवती की मति उक्तम होती है। जो नित्य भगवान का सिमरन करता है। जो प्रभू के प्यार में अपना मन व तन कुर्बान कर देता है; जो प्रभू के चरण (सदा अपने) हृदय में बसाता है। हे नानक! ऐसा भगवती भगवान को पा लेता है। 3।
· सुखमनी · राग गउड़ी
सो पंडितु जो मनु परबोधै ॥
सो पंडितु जो मनु परबोधै ॥
राम नामु आतम महि सोधै ॥
राम नाम सारु रसु पीवै ॥
उसु पंडित कै उपदेसि जगु जीवै ॥
हरि की कथा हिरदै बसावै ॥
सो पंडितु फिरि जोनि न आवै ॥
बेद पुरान सिम्रिति बूझै मूल ॥
सूखम महि जानै असथूलु ॥
चहु वरना कउ दे उपदेसु ॥
नानक उसु पंडित कउ सदा अदेसु ॥4॥
राम नामु आतम महि सोधै ॥
राम नाम सारु रसु पीवै ॥
उसु पंडित कै उपदेसि जगु जीवै ॥
हरि की कथा हिरदै बसावै ॥
सो पंडितु फिरि जोनि न आवै ॥
बेद पुरान सिम्रिति बूझै मूल ॥
सूखम महि जानै असथूलु ॥
चहु वरना कउ दे उपदेसु ॥
नानक उसु पंडित कउ सदा अदेसु ॥4॥
हिन्दी अर्थ: (असली) पण्डित वह है जो अपने मन को शिक्षा देता है। और प्रभू के नाम को अपने मन में तलाशता है। जो प्रभू नाम का मीठा स्वाद चखता है। उस पण्डित के उपदेश से (सारा) संसार रूहानी जिंदगी हासिल करता है। जो अकाल-पुरख (की सिफतसलाह) की बातें अपने हृदय में बसाता है। वह पंडित दुबारा जनम (मरन) में नहीं आता। जो वेद पुराण स्मृतियां (आदि सब धर्म-पुस्तकों) के मूल (प्रभू को) समझता है। जो यह जानता है कि ये सारा दृश्यमान संसार अदृश्य प्रभू के ही आसरे है। जो (ब्राहमण, क्षत्रीय, वैश्य व शूद्र) चारों ही जातियों को शिक्षा देता है। हे नानक! (कहें) उस पंडित के सामने हम सदा सिर निवाते हैं (नत्मस्तक होते हैं)। 4।
· सुखमनी · राग गउड़ी
बीज मंत्रु सरब को गिआनु ॥
बीज मंत्रु सरब को गिआनु ॥
चहु वरना महि जपै कोऊ नामु ॥
जो जो जपै तिस की गति होइ ॥
साधसंगि पावै जनु कोइ ॥
करि किरपा अंतरि उर धारै ॥
पसु प्रेत मुघद पाथर कउ तारै ॥
सरब रोग का अउखदु नामु ॥
कलिआण रूप मंगल गुण गाम ॥
काहू जुगति कितै न पाईऐ धरमि ॥
नानक तिसु मिलै जिसु लिखिआ धुरि करमि ॥5॥
चहु वरना महि जपै कोऊ नामु ॥
जो जो जपै तिस की गति होइ ॥
साधसंगि पावै जनु कोइ ॥
करि किरपा अंतरि उर धारै ॥
पसु प्रेत मुघद पाथर कउ तारै ॥
सरब रोग का अउखदु नामु ॥
कलिआण रूप मंगल गुण गाम ॥
काहू जुगति कितै न पाईऐ धरमि ॥
नानक तिसु मिलै जिसु लिखिआ धुरि करमि ॥5॥
हिन्दी अर्थ: नाम (और सब मंत्रों का) मूल मंत्र है और सब का ज्ञान (दाता) है। (ब्राहमण, क्षत्रीय, वैश्य व शूद्र) चारों ही जातियों में से कोई भी मनुष्य (प्रभू का) नाम जप (के देख ले)। जो जो मनुष्य नाम जपता है उसकी जिंदगी ऊँची हो जाती है। (पर) कोई विरला मनुष्य ही साध-संगति में (रह के) (इसे) हासिल करता है। (अगर प्रभू) मेहर करके (उसके) हृदय में (नाम) टिका दे। पशु, बुरी रूह, मूर्ख, पत्थर (-दिल) (कोई भी हो सब) को (नाम) तार देता है प्रभू का नाम सारे रोगों की दवाई है। प्रभू के गुण गाने सौभाग्य व सुख का रूप है। (पर ये नाम और) किसी ढंग से अथवा किसी धार्मिक रस्म-रिवाज के करने से नहीं मिलता; हे नानक! (ये नाम) उस मनुष्य को मिलता है जिस (के माथे पर) धुर से (प्रभू की) मेहर मुताबक लिखा जाता है। 5।
· सुखमनी · राग गउड़ी
जिस कै मनि पारब्रहम का निवासु ॥
जिस कै मनि पारब्रहम का निवासु ॥
हिन्दी अर्थ: जिसके मन में अकाल पुरख बसता है।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 274 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।