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अंग 272

अंग
272
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सुखमनी साहिब का हिस्सा। पूरी 24 अष्टपदियों की हिन्दी टीका /sukhmani-sahib/ पर है।
नानक साध कै संगि सफल जनंम ॥5॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! साधू की संगति में मानस जनम का फल मिल जाता है।5। संतों की संगति में रह के सब जगह पहुँच हो जाती है (भाव। ऊँची आत्मिक अवस्था आ जाती है); हे नानक ! साधू की संगति में मानस जनम का फल मिल जाता है। 5।
साध कै संगि नही कछु घाल ॥
दरसनु भेटत होत निहाल ॥
साध कै संगि कलूखत हरै ॥
साध कै संगि नरक परहरै ॥
साध कै संगि ईहा ऊहा सुहेला ॥
साधसंगि बिछुरत हरि मेला ॥
जो इछै सोई फलु पावै ॥
साध कै संगि न बिरथा जावै ॥
पारब्रहमु साध रिद बसै ॥
नानक उधरै साध सुनि रसै ॥6॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: साध जनों की संगति में रहने से तप आदि में तपने की आवश्यक्ता नहीं रहती। (क्योंकि उनके) दर्शन ही करके हृदय खिला रहता है। गुरमुखों की संगति में (मनुष्य अपने) पाप नाश कर लेता है। (और इस तरह) नर्कों से बच जाता है। संतों की संगति में रह के (मनुष्य) इस लोक में व परलोक में सुखी रहता है संतों की संगति में रह के (मनुष्य) बे-मुराद हो के नहीं जाता। (बल्कि) जो इच्छा करता है, वही फल पाता है। साध जनों की संगति में रहने से जीवन व्यर्थ नहीं जाता अकाल-पुरख संत जनों के हृदय में बसता है; हे नानक ! (मनुष्य) साध जनों की रसना से (उपदेश) सुन के (विकारों से) बच जाता है।6।
साध कै संगि सुनउ हरि नाउ ॥
साधसंगि हरि के गुन गाउ ॥
साध कै संगि न मन ते बिसरै ॥
साधसंगि सरपर निसतरै ॥
साध कै संगि लगै प्रभु मीठा ॥
साधू कै संगि घटि घटि डीठा ॥
साधसंगि भए आगिआकारी ॥
साधसंगि गति भई हमारी ॥
साध कै संगि मिटे सभि रोग ॥
नानक साध भेटे संजोग ॥7॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: मैं गुरमुखों की संगति में रह के प्रभू का नाम सुनूँ और प्रभू के गुण गाऊँ (ये मेरी कामना है)। संतों की संगति में रहने से प्रभू मन से भूलता नहीं। साध जनों की संगति में मनुष्य जरूर (विकारों से) बच निकलता है। भलों की संगति में रहने से प्रभू प्यारा लगने लग जाता है और वह हरेक शरीर में दिखाई देने लग जाता है। साधुओं की संगति करने से (हम) प्रभू के आज्ञाकारी हो जाते हैं और हमारी आत्मिक अवस्था सुधर जाती है। संत जनों की सुहबत में (विकार आदि) सारे रोग मिट जाते हैं; हे नानक ! (बड़े) भाग्यों से साध जन मिलते हैं।7।
साध की महिमा बेद न जानहि ॥
जेता सुनहि तेता बखिआनहि ॥
साध की उपमा तिहु गुण ते दूरि ॥
साध की उपमा रही भरपूरि ॥
साध की सोभा का नाही अंत ॥
साध की सोभा सदा बेअंत ॥
साध की सोभा ऊच ते ऊची ॥
साध की सोभा मूच ते मूची ॥
साध की सोभा साध बनि आई ॥
नानक साध प्रभ भेदु न भाई ॥8॥7॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: साध की वडिआई वेद (भी) नहीं जानते। वो तो जितना सुनते हैं। उतना ही बयान करते हैं (पर साध की महिमा बयान से परे है)। साध की समानता तीन गुणों से परे है (भाव। जगत की रचना में कोई ऐसी हस्ती नहीं जिसे साध जैसा कहा जा सके; हां) साध की समानता उस प्रभू से ही हो सकती है जो सर्व व्यापक है। साध की शोभा का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। सदा (इसको) बेअंत ही (कहा जा सकता) है। साधू की शोभा और बहुत ऊँची है साधू की शोभा बहुत बड़ी है। साधू की शोभा साधू को ही फबती है (क्योंकि) हे नानक ! (कह) हे भाई ! साधू और प्रभू में (कोई) फर्क नहीं।8।7।
सलोकु ॥
मनि साचा मुखि साचा सोइ ॥
अवरु न पेखै एकसु बिनु कोइ ॥
नानक इह लछण ब्रहम गिआनी होइ ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: श्लोक ॥ (जिस मनुष्य के) मन में सदा स्थिर रहने वाला प्रभू (बसता है)। (जो) मुंह से (भी) उसी प्रभू को (जपता है)। (जो मनुष्य) एक अकाल-पुरख के बिना (कहीं भी) किसी और को नहीं देखता। हे नानक ! (वह मनुष्य) इन गुणों के कारण ब्रहमज्ञानी हो जाता है।1।
असटपदी ॥
ब्रहम गिआनी सदा निरलेप ॥
जैसे जल महि कमल अलेप ॥
ब्रहम गिआनी सदा निरदोख ॥
जैसे सूरु सरब कउ सोख ॥
ब्रहम गिआनी कै द्रिसटि समानि ॥
जैसे राज रंक कउ लागै तुलि पवान ॥
ब्रहम गिआनी कै धीरजु एक ॥
जिउ बसुधा कोऊ खोदै कोऊ चंदन लेप ॥
ब्रहम गिआनी का इहै गुनाउ ॥
नानक जिउ पावक का सहज सुभाउ ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: अष्टपदी ॥ ब्रहमज्ञानी (मनुष्य विकारों की तरफ से) सदा बेदाग (रहते हैं) जैसे पानी में (उगे हुए) कमल फूल (कीचड़ से) साफ होते हैं। ब्रहमज्ञानी (मनुष्य) (सारे पापों को जला देते हैं) पापों से बचे रहते हैं। जैसे सूरज सारे (रसों) को सुखा देता है (वैसे ही) ब्रहमज्ञानी के अंदर (सबकी तरफ) एक जैसी नजर (के साथ देखने का स्वभाव होता) है। जैसे हवा राजे व कंगाल को एक जैसी ही लगती है (वैसे ही) (कोई भला कहे चाहे बुरा पर) ब्रहमज्ञानी मनुष्यों में एक तार हौसला (सदा कायम रहता) है। जैसे धरती को कोई तो खोदता है कोई चंदन से लेप करता है (पर धरती को कोई परवाह नहीं)। ब्रहमज्ञानी मनुष्य का (भी) यही गुण है- हे नानक ! जैसे आग का कुदरती स्वभाव है (हरेक चीज की मैल जला देनी) 1।
ब्रहम गिआनी निरमल ते निरमला ॥
जैसे मैलु न लागै जला ॥
ब्रहम गिआनी कै मनि होइ प्रगासु ॥
जैसे धर ऊपरि आकासु ॥
ब्रहम गिआनी कै मित्र सत्रु समानि ॥
ब्रहम गिआनी कै नाही अभिमान ॥
ब्रहम गिआनी ऊच ते ऊचा ॥
मनि अपनै है सभ ते नीचा ॥
ब्रहम गिआनी से जन भए ॥
नानक जिन प्रभु आपि करेइ ॥2॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: ब्रहमज्ञानी मनुष्य (वैसे ही विकारों की मैल से सदा बचा रहके) महा निर्मल है – जैसे पानी को कभी मैल नहीं रह सकती (भाप बन के फिर साफ का साफ। (वैसे ही) ब्रहमानी के मन में (ये) रौशनी हो जाती है (कि प्रभू हर जगह मौजूद है)- जैसे धरती पर आकाश (हर जगह व्यापक है। ब्रहमज्ञानी के लिए सज्जन व वैरी एक जैसा है (क्योंकि) उसके अंदर अहंकार नहीं है (किसी के अच्छे-बुरे सलूक का हर्ष-शोक नहीं)। ब्रहमज्ञानी (आत्मिक अवस्था में) सबसे ऊँचा है। (पर) अपने मन में (अपने आप को) सबसे नीचा (जानता है)। हे नानक ! वही मनुष्य ब्रहमज्ञानी बनते हैं जिन्हें प्रभू खुद बनाता है।2।
ब्रहम गिआनी सगल की रीना ॥
आतम रसु ब्रहम गिआनी चीना ॥
ब्रहम गिआनी की सभ ऊपरि मइआ ॥
ब्रहम गिआनी ते कछु बुरा न भइआ ॥
ब्रहम गिआनी सदा समदरसी ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: ब्रहमज्ञानी सारे (बंदों) के पैरों की खाक (हो के रहता) है; ब्रहमज्ञानी ने आत्मिक आनंद को पहिचान लिया है। बंहमज्ञानी की सब पर खुशी रहती है (भाव। ब्रहमज्ञानी सबके साथ हंसते माथे रहता है।) और वह कोई बुरा काम नहीं करता। ब्रहमज्ञानी सदा सब ओर एक जैसी नजर से देखता है।

गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! साधू की संगति में मानस जनम का फल मिल जाता है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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