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अंग २७१ · गउड़ी

अंग
271
गउड़ी
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  1. प्रभ किरपा ते होइ प्रगासु ॥
  2. अगम अगाधि पारब्रहमु सोइ ॥
  3. साध कै संगि मुख ऊजल होत ॥
  4. साध कै संगि अगोचरु मिलै ॥
  5. साधसंगि दुसमन सभि मीत ॥
  6. साध कै संगि न कबहू धावै ॥
  7. साध कै संगि सभ कुल उधारै ॥

प्रभ किरपा ते होइ प्रगासु ॥

अंग २७० से चला आ रहा अंश

प्रभ किरपा ते होइ प्रगासु ॥
प्रभू दइआ ते कमल बिगासु ॥
प्रभ सुप्रसंन बसै मनि सोइ ॥
प्रभ दइआ ते मति ऊतम होइ ॥
सरब निधान प्रभ तेरी मइआ ॥
आपहु कछू न किनहू लइआ ॥
जितु जितु लावहु तितु लगहि हरि नाथ ॥
नानक इन कै कछू न हाथ ॥8॥6॥

हिन्दी अर्थ: प्रभू की मेहर से (मन में ज्ञान का) प्रकाश होता है; उसकी दया से हृदय रूपी कमल फूल खिलता है। वह प्रभू (उस मनुष्य के) मन में बसता है जिस पे वह प्रसन्न होता है। प्रभू की मेहर से (मनुष्य की) बुद्धि अच्छी होती है। हे प्रभू ! आपकी मेहर की नजर में सारे खजाने हैं। अपने यत्न से किसी ने भी कुछ नहीं पाया (भाव। जीव की उद्यम तभी सफल होता है जब आप सीधी नजर करते हैं)। हे हरी ! हे नाथ ! जिधर आप लगाते हैं उधर ये जीव लगते हैं। हे नानक ! इन जीवों के वश में कुछ नहीं।8।6।

अगम अगाधि पारब्रहमु सोइ ॥

सलोकु ॥
अगम अगाधि पारब्रहमु सोइ ॥
जो जो कहै सु मुकता होइ ॥
सुनि मीता नानकु बिनवंता ॥ साध जना की अचरज कथा ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ वह बेअंत प्रभू (जीव की) पहुँच से परे है और अथाह है। जो जो (मनुष्य उसको) सिमरते हैं वे (विकारों के जाल से) निजात पा लेते हैं। हे मित्र ! सुन नानक विनती कर्ता है - (सिमरन करने वाले) गुरमुखों (के गुणों) का जिक्र हैरान करने वाला है (भाव। सिमरन की बरकति से भक्त जनों में इतने गुण पैदा हो जाते हैं कि उन गुणों की बात छेड़ के आश्चर्यचकित हो जाते हैं)।1।

साध कै संगि मुख ऊजल होत ॥

असटपदी ॥
साध कै संगि मुख ऊजल होत ॥
साधसंगि मलु सगली खोत ॥
साध कै संगि मिटै अभिमानु ॥
साध कै संगि प्रगटै सुगिआनु ॥
साध कै संगि बुझै प्रभु नेरा ॥
साधसंगि सभु होत निबेरा ॥
साध कै संगि पाए नाम रतनु ॥
साध कै संगि एक ऊपरि जतनु ॥
साध की महिमा बरनै कउनु प्रानी ॥
नानक साध की सोभा प्रभ माहि समानी ॥1॥

हिन्दी अर्थ: अष्टपदी। गुरमुखों की संगति में रहने से मुंह उजले होते हैं (भाव इज्जत बनती है) (क्योंकि) साधु जनों के पास रहने से (विकारों की) सारी मैल मिट जाती है। साधुओं की संगति में अहंकार दूर होता है। और श्रेष्ठ ज्ञान प्रगट होता है (अर्थात अच्छी बुद्धि आती है)। संतों की संगति में प्रभू अंग-संग बसता प्रतीत होता है। (इस वास्ते बुरे संस्कारों या वासना का) सारा फैसला हो जाता है (भाव। बुरी तरफ जीव पड़ता ही नहीं)। गुरमुखों की संगति में मनुष्य नाम-रूपी रत्न ढूँढ लेता है। और एक प्रभू को मिलने का यत्न करता है। साधुओं की महिमा कौन सा मनुष्य बयान कर सकता है? (क्योंकि) हे नानक ! साध जनों की शोभा प्रभू की शोभा के बराबर हो जाती है।1।

साध कै संगि अगोचरु मिलै ॥

साध कै संगि अगोचरु मिलै ॥
साध कै संगि सदा परफुलै ॥
साध कै संगि आवहि बसि पंचा ॥
साधसंगि अंम्रित रसु भुंचा ॥
साधसंगि होइ सभ की रेन ॥
साध कै संगि मनोहर बैन ॥
साध कै संगि न कतहूं धावै ॥
साधसंगि असथिति मनु पावै ॥
साध कै संगि माइआ ते भिंन ॥
साधसंगि नानक प्रभ सुप्रसंन ॥2॥

हिन्दी अर्थ: गुरमुखों की संगति में (मनुष्य को) वह प्रभू मिल जाता है जो शारीरिक इन्द्रियों की पहुँच से परे है; और मनुष्य सदा खिले माथे रहता है। साध जनों की संगति में रहने से कामादिक पाँच विकार काबू में आ जाते हैं। (क्योंकि मनुष्य) नाम रूपी अमृत का रस चख लेता है। साध जनों की संगति करने से (मनुष्य) सब (प्राणियों) के चरणों की धूड़ बन जाता है और (सबसे) मीठे वचन बोलता है। संत जनों के संग रहने से (मनुष्य का) मन किसी तरफ नहीं दौड़ता है। और (प्रभू के चरणों में) टिकाव हासिल कर लेता है। हे नानक ! गुरमुखों की संगति में टिकने से (मनुष्य) माया के (असर) से बेदाग रहता है और अकाल-पुरख इस पर दयावान होता है।2।

साधसंगि दुसमन सभि मीत ॥

साधसंगि दुसमन सभि मीत ॥
साधू कै संगि महा पुनीत ॥
साधसंगि किस सिउ नही बैरु ॥
साध कै संगि न बीगा पैरु ॥
साध कै संगि नाही को मंदा ॥
साधसंगि जाने परमानंदा ॥
साध कै संगि नाही हउ तापु ॥
साध कै संगि तजै सभु आपु ॥
आपे जानै साध बडाई ॥
नानक साध प्रभू बनि आई ॥3॥

हिन्दी अर्थ: गुरमुखों की संगति में रहने से सारे वैरी (भी) मित्र (दिखाई देने लग जाते हैं)। (क्योंकि) साध जनों की संगति में (मनुष्य का अपना हृदय) बहुत साफ हो जाता है। संतों की संगति में बैठने से किसी के साथ वैर नहीं रह जाता और किसी बुरी तरफ पैर नहीं चलता। भलों की संगति में कोई मनुष्य बुरा नहीं दिखता। (क्योंकि हर जगह मनुष्य) उच्च सुख के मालिक प्रभू को ही जानता है। गुरमुख की संगति करने से अहंकार रूपी ताप नहीं रह जाता। (क्योंकि) साधु की संगति में मनुष्य सारे अपनत्व त्याग देता है। साधू का बड़ापन (वडिआई) प्रभू खुद ही जानता है। (क्योंकि) हे नानक ! साधू का और प्रभू का पक्का प्यार पड़ जाता है।

साध कै संगि न कबहू धावै ॥

साध कै संगि न कबहू धावै ॥
साध कै संगि सदा सुखु पावै ॥
साधसंगि बसतु अगोचर लहै ॥
साधू कै संगि अजरु सहै ॥
साध कै संगि बसै थानि ऊचै ॥
साधू कै संगि महलि पहूचै ॥
साध कै संगि द्रिड़ै सभि धरम ॥
साध कै संगि केवल पारब्रहम ॥
साध कै संगि पाए नाम निधान ॥
नानक साधू कै कुरबान ॥4॥

हिन्दी अर्थ: गुरमुखों की संगति में रहने से मनुष्य का मन कभी भटकता नहीं। (क्योंकि) साध जनों की संगति में (मनुष्य) सदा सुख पाता है। संत जनों की संगति में (प्रभू के) नाम रूपी अगोचर वस्तु प्राप्त हो जाती है। (और मनुष्य) ये ना संभाल पाने वाली मंजिल (मरतबा। अनूठी वस्तु) को संभाल लेता है (के काबिल हो जाता है)। गुरमुखों की संगति में रह के मनुष्य ऊँचे (आत्मिक) ठिकाने पर बसता है और अकाल-पुरख के चरणों में जुड़ा रहता है। संतों की संगति में रह के (मनुष्य) सारे धर्मों (फर्जों) को ठीक तरह समझ लेता है और सिर्फ अकाल-पुरख को (हर जगह देखता है)। साधू जनों की संगति में (मनुष्य) नाम खजाना ढूँढ लेता है; (इस वास्ते) हे नानक ! (कह) मैं साध जनों से सदके हूँ।4।

साध कै संगि सभ कुल उधारै ॥

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साध कै संगि सभ कुल उधारै ॥
साधसंगि साजन मीत कुटंब निसतारै ॥
साधू कै संगि सो धनु पावै ॥
जिसु धन ते सभु को वरसावै ॥
साधसंगि धरम राइ करे सेवा ॥
साध कै संगि सोभा सुरदेवा ॥
साधू कै संगि पाप पलाइन ॥
साधसंगि अंम्रित गुन गाइन ॥
साध कै संगि स्रब थान गंमि ॥

हिन्दी अर्थ: गुरमुखों की संगति में रह के (मनुष्य अपनी) सारी कुलें (विकारों से) बचा लेता है और (अपने) सज्जन-मित्रों व परिवार को तार लेता है। संतों की संगति में मनुष्य वह धन पा लेता है। जिस धन के मिलने से हरेक मनुष्य मशहूर हो जाता है। साधु जनों की संगति में रहने से धर्मराज (भी) सेवा करता है और देवते भी शोभा करते हैं। गुरमुखों की संगति में पाप दूर हो जाते हैं। (क्योंकि वहाँ) प्रभू के अमर करने वाले गुण (मनुष्य) गाते हैं। संतों की संगति में रह के सब जगह पहुँच हो जाती है (भाव। ऊँची आत्मिक अवस्था आ जाती है);

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग २७१ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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