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अंग 271

अंग
271
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सुखमनी साहिब का हिस्सा। पूरी 24 अष्टपदियों की हिन्दी टीका /sukhmani-sahib/ पर है।
प्रभ किरपा ते होइ प्रगासु ॥
प्रभू दइआ ते कमल बिगासु ॥
प्रभ सुप्रसंन बसै मनि सोइ ॥
प्रभ दइआ ते मति ऊतम होइ ॥
सरब निधान प्रभ तेरी मइआ ॥
आपहु कछू न किनहू लइआ ॥
जितु जितु लावहु तितु लगहि हरि नाथ ॥
नानक इन कै कछू न हाथ ॥8॥6॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: प्रभू की मेहर से (मन में ज्ञान का) प्रकाश होता है; उसकी दया से हृदय रूपी कमल फूल खिलता है। वह प्रभू (उस मनुष्य के) मन में बसता है जिस पे वह प्रसन्न होता है। प्रभू की मेहर से (मनुष्य की) बुद्धि अच्छी होती है। हे प्रभू ! आपकी मेहर की नजर में सारे खजाने हैं। अपने यत्न से किसी ने भी कुछ नहीं पाया (भाव। जीव की उद्यम तभी सफल होता है जब आप सीधी नजर करता है)। हे हरी ! हे नाथ ! जिधर आप लगाता है उधर ये जीव लगते हैं। हे नानक ! इन जीवों के वश में कुछ नहीं।8।6।
सलोकु ॥
अगम अगाधि पारब्रहमु सोइ ॥
जो जो कहै सु मुकता होइ ॥
सुनि मीता नानकु बिनवंता ॥ साध जना की अचरज कथा ॥1॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ वह बेअंत प्रभू (जीव की) पहुँच से परे है और अथाह है। जो जो (मनुष्य उसको) सिमरते हैं वे (विकारों के जाल से) निजात पा लेते हैं। हे मित्र ! सुन नानक विनती कर्ता है – (सिमरन करने वाले) गुरमुखों (के गुणों) का जिक्र हैरान करने वाला है (भाव। सिमरन की बरकति से भक्त जनों में इतने गुण पैदा हो जाते हैं कि उन गुणों की बात छेड़ के आश्चर्यचकित हो जाते हैं)।1।
असटपदी ॥
साध कै संगि मुख ऊजल होत ॥
साधसंगि मलु सगली खोत ॥
साध कै संगि मिटै अभिमानु ॥
साध कै संगि प्रगटै सुगिआनु ॥
साध कै संगि बुझै प्रभु नेरा ॥
साधसंगि सभु होत निबेरा ॥
साध कै संगि पाए नाम रतनु ॥
साध कै संगि एक ऊपरि जतनु ॥
साध की महिमा बरनै कउनु प्रानी ॥
नानक साध की सोभा प्रभ माहि समानी ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: अष्टपदी। गुरमुखों की संगति में रहने से मुंह उजले होते हैं (भाव इज्जत बनती है) (क्योंकि) साधु जनों के पास रहने से (विकारों की) सारी मैल मिट जाती है। साधुओं की संगति में अहंकार दूर होता है। और श्रेष्ठ ज्ञान प्रगट होता है (अर्थात अच्छी बुद्धि आती है)। संतों की संगति में प्रभू अंग-संग बसता प्रतीत होता है। (इस वास्ते बुरे संस्कारों या वासना का) सारा फैसला हो जाता है (भाव। बुरी तरफ जीव पड़ता ही नहीं)। गुरमुखों की संगति में मनुष्य नाम-रूपी रत्न ढूँढ लेता है। और एक प्रभू को मिलने का यत्न करता है। साधुओं की महिमा कौन सा मनुष्य बयान कर सकता है? (क्योंकि) हे नानक ! साध जनों की शोभा प्रभू की शोभा के बराबर हो जाती है।1।
साध कै संगि अगोचरु मिलै ॥
साध कै संगि सदा परफुलै ॥
साध कै संगि आवहि बसि पंचा ॥
साधसंगि अंम्रित रसु भुंचा ॥
साधसंगि होइ सभ की रेन ॥
साध कै संगि मनोहर बैन ॥
साध कै संगि न कतहूं धावै ॥
साधसंगि असथिति मनु पावै ॥
साध कै संगि माइआ ते भिंन ॥
साधसंगि नानक प्रभ सुप्रसंन ॥2॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: गुरमुखों की संगति में (मनुष्य को) वह प्रभू मिल जाता है जो शारीरिक इन्द्रियों की पहुँच से परे है; और मनुष्य सदा खिले माथे रहता है। साध जनों की संगति में रहने से कामादिक पाँच विकार काबू में आ जाते हैं। (क्योंकि मनुष्य) नाम रूपी अमृत का रस चख लेता है। साध जनों की संगति करने से (मनुष्य) सब (प्राणियों) के चरणों की धूड़ बन जाता है और (सबसे) मीठे वचन बोलता है। संत जनों के संग रहने से (मनुष्य का) मन किसी तरफ नहीं दौड़ता है। और (प्रभू के चरणों में) टिकाव हासिल कर लेता है। हे नानक ! गुरमुखों की संगति में टिकने से (मनुष्य) माया के (असर) से बेदाग रहता है और अकाल-पुरख इस पर दयावान होता है।2।
साधसंगि दुसमन सभि मीत ॥
साधू कै संगि महा पुनीत ॥
साधसंगि किस सिउ नही बैरु ॥
साध कै संगि न बीगा पैरु ॥
साध कै संगि नाही को मंदा ॥
साधसंगि जाने परमानंदा ॥
साध कै संगि नाही हउ तापु ॥
साध कै संगि तजै सभु आपु ॥
आपे जानै साध बडाई ॥
नानक साध प्रभू बनि आई ॥3॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: गुरमुखों की संगति में रहने से सारे वैरी (भी) मित्र (दिखाई देने लग जाते हैं)। (क्योंकि) साध जनों की संगति में (मनुष्य का अपना हृदय) बहुत साफ हो जाता है। संतों की संगति में बैठने से किसी के साथ वैर नहीं रह जाता और किसी बुरी तरफ पैर नहीं चलता। भलों की संगति में कोई मनुष्य बुरा नहीं दिखता। (क्योंकि हर जगह मनुष्य) उच्च सुख के मालिक प्रभू को ही जानता है। गुरमुख की संगति करने से अहंकार रूपी ताप नहीं रह जाता। (क्योंकि) साधु की संगति में मनुष्य सारे अपनत्व त्याग देता है। साधू का बड़ापन (वडिआई) प्रभू खुद ही जानता है। (क्योंकि) हे नानक ! साधू का और प्रभू का पक्का प्यार पड़ जाता है।
साध कै संगि न कबहू धावै ॥
साध कै संगि सदा सुखु पावै ॥
साधसंगि बसतु अगोचर लहै ॥
साधू कै संगि अजरु सहै ॥
साध कै संगि बसै थानि ऊचै ॥
साधू कै संगि महलि पहूचै ॥
साध कै संगि द्रिड़ै सभि धरम ॥
साध कै संगि केवल पारब्रहम ॥
साध कै संगि पाए नाम निधान ॥
नानक साधू कै कुरबान ॥4॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: गुरमुखों की संगति में रहने से मनुष्य का मन कभी भटकता नहीं। (क्योंकि) साध जनों की संगति में (मनुष्य) सदा सुख पाता है। संत जनों की संगति में (प्रभू के) नाम रूपी अगोचर वस्तु प्राप्त हो जाती है। (और मनुष्य) ये ना संभाल पाने वाली मंजिल (मरतबा। अनूठी वस्तु) को संभाल लेता है (के काबिल हो जाता है)। गुरमुखों की संगति में रह के मनुष्य ऊँचे (आत्मिक) ठिकाने पर बसता है और अकाल-पुरख के चरणों में जुड़ा रहता है। संतों की संगति में रह के (मनुष्य) सारे धर्मों (फर्जों) को ठीक तरह समझ लेता है और सिर्फ अकाल-पुरख को (हर जगह देखता है)। साधू जनों की संगति में (मनुष्य) नाम खजाना ढूँढ लेता है; (इस वास्ते) हे नानक ! (कह) मैं साध जनों से सदके हूँ।4।
साध कै संगि सभ कुल उधारै ॥
साधसंगि साजन मीत कुटंब निसतारै ॥
साधू कै संगि सो धनु पावै ॥
जिसु धन ते सभु को वरसावै ॥
साधसंगि धरम राइ करे सेवा ॥
साध कै संगि सोभा सुरदेवा ॥
साधू कै संगि पाप पलाइन ॥
साधसंगि अंम्रित गुन गाइन ॥
साध कै संगि स्रब थान गंमि ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: गुरमुखों की संगति में रह के (मनुष्य अपनी) सारी कुलें (विकारों से) बचा लेता है और (अपने) सज्जन-मित्रों व परिवार को तार लेता है। संतों की संगति में मनुष्य वह धन पा लेता है। जिस धन के मिलने से हरेक मनुष्य मशहूर हो जाता है। साधु जनों की संगति में रहने से धर्मराज (भी) सेवा करता है और देवते भी शोभा करते हैं। गुरमुखों की संगति में पाप दूर हो जाते हैं। (क्योंकि वहाँ) प्रभू के अमर करने वाले गुण (मनुष्य) गाते हैं। संतों की संगति में रह के सब जगह पहुँच हो जाती है (भाव। ऊँची आत्मिक अवस्था आ जाती है);

गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “प्रभू की मेहर से (मन में ज्ञान का) प्रकाश होता है; उसकी दया से हृदय रूपी कमल फूल खिलता है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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