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अंग 270

अंग
270
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सुखमनी साहिब का हिस्सा। पूरी 24 अष्टपदियों की हिन्दी टीका /sukhmani-sahib/ पर है।
मुखि ता को जसु रसन बखानै ॥
जिह प्रसादि तेरो रहता धरमु ॥
मन सदा धिआइ केवल पारब्रहमु ॥
प्रभ जी जपत दरगह मानु पावहि ॥
नानक पति सेती घरि जावहि ॥2॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: उसकी वडिआई (अपने) मुंह से जीभ से (सदा) कर। जिस (प्रभू) की कृपा से आपका धर्म (कायम) रहता है। हे मन ! आप सदा उस परमेश्वर को सिमर। हे नानक ! परमात्मा का भजन करने से (उसकी) दरगाह में मान पाएगा। और (यहाँ से) इज्जत के साथ अपने (परलोक के) घर में जाएगा।2।
जिह प्रसादि आरोग कंचन देही ॥
लिव लावहु तिसु राम सनेही ॥
जिह प्रसादि तेरा ओला रहत ॥
मन सुखु पावहि हरि हरि जसु कहत ॥
जिह प्रसादि तेरे सगल छिद्र ढाके ॥
मन सरनी परु ठाकुर प्रभ ता कै ॥
जिह प्रसादि तुझु को न पहूचै ॥
मन सासि सासि सिमरहु प्रभ ऊचे ॥
जिह प्रसादि पाई द्रुलभ देह ॥
नानक ता की भगति करेह ॥3॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: जिस (प्रभू) की कृपा से सोने जैसा आपका रोग-रहित जिस्म है। उस प्यारे राम से लिव जोड़। जिसकी मेहर से आपका पर्दा बना रहता है। हे मन ! जिसकी दया से आपके सारे ऐब ढके रहते हैं। हे मन ! उस प्रभू ठाकुर की शरण पड़। जिस की कृपा से कोई आपकी बराबरी नहीं कर सकता। हे मन ! उस उच्च प्रभू को सांस सांस याद कर। हे नानक ! जिसकी कृपा से आपको ये मानस शरीर मिला है जो बड़ा मुश्किल से मिलता है। उस प्रभू की भक्ति कर। 3।
जिह प्रसादि आभूखन पहिरीजै ॥
मन तिसु सिमरत किउ आलसु कीजै ॥
जिह प्रसादि अस्व हसति असवारी ॥
मन तिसु प्रभ कउ कबहू न बिसारी ॥
जिह प्रसादि बाग मिलख धना ॥
राखु परोइ प्रभु अपुने मना ॥
जिनि तेरी मन बनत बनाई ॥
ऊठत बैठत सद तिसहि धिआई ॥
तिसहि धिआइ जो एक अलखै ॥
ईहा ऊहा नानक तेरी रखै ॥4॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: जिस (प्रभू) की कृपा से गहने पहनते हैं। हे मन ! उसे सिमरते हुए आलस क्यूँ किया जाय? जिसकी मेहर से घोड़े और हाथियों की सवारी करता है। हे मन ! उस प्रभू को कभी ना विसारना। जिसकी दया से बाग-जमीनें व धन (आपको नसीब हैं) उस प्रभू को अपने मन में परो के रख। हे मन ! जिस (प्रभू) ने आपको सजाया है। उठते बैठते (भाव। हर समय) उसी को सदा सिमर। हे नानक ! उस प्रभू को सिमर। जो एक है। और बेअंत है। लोक और परलोक में (वही) आपकी लाज रखने वाला है। 4।
जिह प्रसादि करहि पुंन बहु दान ॥
मन आठ पहर करि तिस का धिआन ॥
जिह प्रसादि तू आचार बिउहारी ॥
तिसु प्रभ कउ सासि सासि चितारी ॥
जिह प्रसादि तेरा सुंदर रूपु ॥
सो प्रभु सिमरहु सदा अनूपु ॥
जिह प्रसादि तेरी नीकी जाति ॥
सो प्रभु सिमरि सदा दिन राति ॥
जिह प्रसादि तेरी पति रहै ॥
गुर प्रसादि नानक जसु कहै ॥5॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: जिस (प्रभू) की कृपा से बहुत दान-पुंन करता है। हे मन ! आठों पहर उसे याद कर। जिसकी मेहर आप रीतें-रस्में करने के लायक हुआ है। उस प्रभू को श्वास-श्वास याद कर। जिसकी दया से आपकी सुंदर शकल है। उस सुंदर मालिक को सदा सिमर। जिस प्रभू की कृपा से तूझे अच्छी (मनुष्य) जाति मिली है। उसे सदा दिन रात याद कर। जिसकी मेहर से आपकी इज्जत (जगत में) बनी हुई है (उस का नाम सिमर)। गुरू की बरकति लेकर (भाग्यशाली मनुष्य) उसकी सिफत सालाह करता है। 5।
जिह प्रसादि सुनहि करन नाद ॥
जिह प्रसादि पेखहि बिसमाद ॥
जिह प्रसादि बोलहि अंम्रित रसना ॥
जिह प्रसादि सुखि सहजे बसना ॥
जिह प्रसादि हसत कर चलहि ॥
जिह प्रसादि संपूरन फलहि ॥
जिह प्रसादि परम गति पावहि ॥
जिह प्रसादि सुखि सहजि समावहि ॥
ऐसा प्रभु तिआगि अवर कत लागहु ॥
गुर प्रसादि नानक मनि जागहु ॥6॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: जिसकी कृपा से आप (अपने) कानों से आवाज सुनता है (भाव। आपको सुनने की ताकत मिली है)। जिसकी मेहर से आश्चर्यजनक नजारे देखता है; जिसकी बरकति पा के जीभ से मीठे बोल बोलता है; जिसकी कृपा से स्वाभाविक ही सुखी बस रहा है; जिसकी दया से आपके हाथ (आदि सारे अंग) काम कर रहे हैं। जिसकी मेहर से आप हरेक कार्य-व्यवहार में कामयाब होता है; जिसकी बख्शिश से आपको ऊँचा दर्जा मिलता है। और आप सुख और बे-फिक्री में मस्त है; ऐसे प्रभू को विसार के आप और किस तरफ लग रहा है? हे नानक ! गुरू की बरकति ले के मन में जागृत हो।6।
जिह प्रसादि तूं प्रगटु संसारि ॥
तिसु प्रभ कउ मूलि न मनहु बिसारि ॥
जिह प्रसादि तेरा परतापु ॥
रे मन मूड़ तू ता कउ जापु ॥
जिह प्रसादि तेरे कारज पूरे ॥
तिसहि जानु मन सदा हजूरे ॥
जिह प्रसादि तूं पावहि साचु ॥
रे मन मेरे तूं ता सिउ राचु ॥
जिह प्रसादि सभ की गति होइ ॥
नानक जापु जपै जपु सोइ ॥7॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: जिस प्रभू की कृपा से आप जगत में शोभा वाला है x हे नानक ! गुरू की बरकति ले के मन में जागृत हो। जिसकी मेहर से आपको आदर-सम्मान मिला हुआ है। हे मूर्ख मन ! आप उस प्रभू को जप। जिस की कृपा से आपके (सारे) काम सिरे चढ़ते हैं। हे मन ! आप उस (प्रभू) को सदा अंग-संग जान। जिसकी बरकति से आपको सत्य प्राप्त होता है। हे मेरे मन ! आप उस (प्रभू) के साथ जुड़ा रह। जिस (परमात्मा) की दया से हरेक (जीव) की (उस तक) पहुँच हो जाती है।(उसे जप)। हे नानक ! (जिसको ये दाति मिलती है) वह (हरी-) जाप ही जपता है। 7।
आपि जपाए जपै सो नाउ ॥
आपि गावाए सु हरि गुन गाउ ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: वही मनुष्य प्रभू का नाम जपता है जिससे आप जपाता है। वही मनुष्य हरी के गुण गाता है जिसे गाने के लिए प्रेरता है।

गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “उसकी वडिआई (अपने) मुंह से जीभ से (सदा) कर।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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