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· सुखमनी · राग गउड़ी
मुखि ता को जसु रसन बखानै ॥
मुखि ता को जसु रसन बखानै ॥
जिह प्रसादि तेरो रहता धरमु ॥
मन सदा धिआइ केवल पारब्रहमु ॥
प्रभ जी जपत दरगह मानु पावहि ॥
नानक पति सेती घरि जावहि ॥2॥
जिह प्रसादि तेरो रहता धरमु ॥
मन सदा धिआइ केवल पारब्रहमु ॥
प्रभ जी जपत दरगह मानु पावहि ॥
नानक पति सेती घरि जावहि ॥2॥
हिन्दी अर्थ: उसकी वडिआई (अपने) मुंह से जीभ से (सदा) करें। जिस (प्रभू) की कृपा से आपका धर्म (कायम) रहता है। हे मन! आप सदा उस परमेश्वर को सिमरें। हे नानक! परमात्मा का भजन करने से (उसकी) दरगाह में मान पाएगा। और (यहाँ से) इज्जत के साथ अपने (परलोक के) घर में जाएगा। 2।
· सुखमनी · राग गउड़ी
जिह प्रसादि आरोग कंचन देही ॥
जिह प्रसादि आरोग कंचन देही ॥
लिव लावहु तिसु राम सनेही ॥
जिह प्रसादि तेरा ओला रहत ॥
मन सुखु पावहि हरि हरि जसु कहत ॥
जिह प्रसादि तेरे सगल छिद्र ढाके ॥
मन सरनी परु ठाकुर प्रभ ता कै ॥
जिह प्रसादि तुझु को न पहूचै ॥
मन सासि सासि सिमरहु प्रभ ऊचे ॥
जिह प्रसादि पाई द्रुलभ देह ॥
नानक ता की भगति करेह ॥3॥
लिव लावहु तिसु राम सनेही ॥
जिह प्रसादि तेरा ओला रहत ॥
मन सुखु पावहि हरि हरि जसु कहत ॥
जिह प्रसादि तेरे सगल छिद्र ढाके ॥
मन सरनी परु ठाकुर प्रभ ता कै ॥
जिह प्रसादि तुझु को न पहूचै ॥
मन सासि सासि सिमरहु प्रभ ऊचे ॥
जिह प्रसादि पाई द्रुलभ देह ॥
नानक ता की भगति करेह ॥3॥
हिन्दी अर्थ: जिस (प्रभू) की कृपा से सोने जैसा आपका रोग-रहित जिस्म है। उस प्यारे राम से लिव जोड़ें। जिसकी मेहर से आपका पर्दा बना रहता है। हे मन! जिसकी दया से आपके सारे ऐब ढके रहते हैं। हे मन! उस प्रभू ठाकुर की शरण पड़ें। जिस की कृपा से कोई आपकी बराबरी नहीं कर सकता। हे मन! उस उच्च प्रभू को सांस सांस याद करें। हे नानक! जिसकी कृपा से आपको ये मानस शरीर मिला है जो बड़ा मुश्किल से मिलता है। उस प्रभू की भक्ति करें। 3।
· सुखमनी · राग गउड़ी
जिह प्रसादि आभूखन पहिरीजै ॥
जिह प्रसादि आभूखन पहिरीजै ॥
मन तिसु सिमरत किउ आलसु कीजै ॥
जिह प्रसादि अस्व हसति असवारी ॥
मन तिसु प्रभ कउ कबहू न बिसारी ॥
जिह प्रसादि बाग मिलख धना ॥
राखु परोइ प्रभु अपुने मना ॥
जिनि तेरी मन बनत बनाई ॥
ऊठत बैठत सद तिसहि धिआई ॥
तिसहि धिआइ जो एक अलखै ॥
ईहा ऊहा नानक तेरी रखै ॥4॥
मन तिसु सिमरत किउ आलसु कीजै ॥
जिह प्रसादि अस्व हसति असवारी ॥
मन तिसु प्रभ कउ कबहू न बिसारी ॥
जिह प्रसादि बाग मिलख धना ॥
राखु परोइ प्रभु अपुने मना ॥
जिनि तेरी मन बनत बनाई ॥
ऊठत बैठत सद तिसहि धिआई ॥
तिसहि धिआइ जो एक अलखै ॥
ईहा ऊहा नानक तेरी रखै ॥4॥
हिन्दी अर्थ: जिस (प्रभू) की कृपा से गहने पहनते हैं। हे मन! उसे सिमरते हुए आलस क्यूँ किया जाय? जिसकी मेहर से घोड़े और हाथियों की सवारी करता है। हे मन! उस प्रभू को कभी ना विसारना। जिसकी दया से बाग-जमीनें व धन (आपको नसीब हैं) उस प्रभू को अपने मन में परो के रखें। हे मन! जिस (प्रभू) ने आपको सजाया है। उठते बैठते (भाव, हर समय) उसी को सदा सिमरें। हे नानक! उस प्रभू को सिमरें। जो एक है। और बेअंत है। लोक और परलोक में (वही) आपकी लाज रखने वाला है। 4।
· सुखमनी · राग गउड़ी
जिह प्रसादि करहि पुंन बहु दान ॥
जिह प्रसादि करहि पुंन बहु दान ॥
मन आठ पहर करि तिस का धिआन ॥
जिह प्रसादि तू आचार बिउहारी ॥
तिसु प्रभ कउ सासि सासि चितारी ॥
जिह प्रसादि तेरा सुंदर रूपु ॥
सो प्रभु सिमरहु सदा अनूपु ॥
जिह प्रसादि तेरी नीकी जाति ॥
सो प्रभु सिमरि सदा दिन राति ॥
जिह प्रसादि तेरी पति रहै ॥
गुर प्रसादि नानक जसु कहै ॥5॥
मन आठ पहर करि तिस का धिआन ॥
जिह प्रसादि तू आचार बिउहारी ॥
तिसु प्रभ कउ सासि सासि चितारी ॥
जिह प्रसादि तेरा सुंदर रूपु ॥
सो प्रभु सिमरहु सदा अनूपु ॥
जिह प्रसादि तेरी नीकी जाति ॥
सो प्रभु सिमरि सदा दिन राति ॥
जिह प्रसादि तेरी पति रहै ॥
गुर प्रसादि नानक जसु कहै ॥5॥
हिन्दी अर्थ: जिस (प्रभू) की कृपा से बहुत दान-पुंन करता है। हे मन! आठों पहर उसे याद करें। जिसकी मेहर आप रीतें-रस्में करने के लायक हुए हैं। उस प्रभू को श्वास-श्वास याद करें। जिसकी दया से आपकी सुंदर शकल है। उस सुंदर मालिक को सदा सिमरें। जिस प्रभू की कृपा से आपको अच्छी (मनुष्य) जाति मिली है। उसे सदा दिन रात याद करें। जिसकी मेहर से आपकी इज्जत (जगत में) बनी हुई है (उस का नाम सिमरें)। गुरू की बरकति लेकर (भाग्यशाली मनुष्य) उसकी सिफत सालाह करता है। 5।
· सुखमनी · राग गउड़ी
जिह प्रसादि सुनहि करन नाद ॥
जिह प्रसादि सुनहि करन नाद ॥
जिह प्रसादि पेखहि बिसमाद ॥
जिह प्रसादि बोलहि अंम्रित रसना ॥
जिह प्रसादि सुखि सहजे बसना ॥
जिह प्रसादि हसत कर चलहि ॥
जिह प्रसादि संपूरन फलहि ॥
जिह प्रसादि परम गति पावहि ॥
जिह प्रसादि सुखि सहजि समावहि ॥
ऐसा प्रभु तिआगि अवर कत लागहु ॥
गुर प्रसादि नानक मनि जागहु ॥6॥
जिह प्रसादि पेखहि बिसमाद ॥
जिह प्रसादि बोलहि अंम्रित रसना ॥
जिह प्रसादि सुखि सहजे बसना ॥
जिह प्रसादि हसत कर चलहि ॥
जिह प्रसादि संपूरन फलहि ॥
जिह प्रसादि परम गति पावहि ॥
जिह प्रसादि सुखि सहजि समावहि ॥
ऐसा प्रभु तिआगि अवर कत लागहु ॥
गुर प्रसादि नानक मनि जागहु ॥6॥
हिन्दी अर्थ: जिसकी कृपा से आप (अपने) कानों से आवाज सुनते हैं (भाव, आपको सुनने की ताकत मिली है)। जिसकी मेहर से आश्चर्यजनक नजारे देखता है; जिसकी बरकति पा के जीभ से मीठे बोल बोलता है; जिसकी कृपा से स्वाभाविक ही सुखी बस रहा है; जिसकी दया से आपके हाथ (आदि सारे अंग) काम कर रहे हैं। जिसकी मेहर से आप हरेक कार्य-व्यवहार में कामयाब होते हैं; जिसकी बख्शिश से आपको ऊँचा दर्जा मिलता है। और आप सुख और बे-फिक्री में मस्त हैं; ऐसे प्रभू को विसार के आप और किस तरफ लग रहे हैं? हे नानक! गुरू की बरकति ले के मन में जागृत हों। 6।
· सुखमनी · राग गउड़ी
जिह प्रसादि तूं प्रगटु संसारि ॥
जिह प्रसादि तूं प्रगटु संसारि ॥
तिसु प्रभ कउ मूलि न मनहु बिसारि ॥
जिह प्रसादि तेरा परतापु ॥
रे मन मूड़ तू ता कउ जापु ॥
जिह प्रसादि तेरे कारज पूरे ॥
तिसहि जानु मन सदा हजूरे ॥
जिह प्रसादि तूं पावहि साचु ॥
रे मन मेरे तूं ता सिउ राचु ॥
जिह प्रसादि सभ की गति होइ ॥
नानक जापु जपै जपु सोइ ॥7॥
तिसु प्रभ कउ मूलि न मनहु बिसारि ॥
जिह प्रसादि तेरा परतापु ॥
रे मन मूड़ तू ता कउ जापु ॥
जिह प्रसादि तेरे कारज पूरे ॥
तिसहि जानु मन सदा हजूरे ॥
जिह प्रसादि तूं पावहि साचु ॥
रे मन मेरे तूं ता सिउ राचु ॥
जिह प्रसादि सभ की गति होइ ॥
नानक जापु जपै जपु सोइ ॥7॥
हिन्दी अर्थ: जिस प्रभु की कृपा से आपको संसार में प्रतिष्ठा मिली है, उसे अपने मन से कभी न भुलाइए। जिसकी मेहर से आपको आदर-सम्मान मिला हुआ है। हे मूर्ख मन! आप उस प्रभु का जाप कीजिए। जिस की कृपा से आपके (सारे) काम सिरे चढ़ते हैं। हे मन! आप उस प्रभु को सदा अपने साथ जानिए। जिसकी बरकति से आपको सत्य प्राप्त होता है। हे मेरे मन! आप उस प्रभु के साथ जुड़े रहिए। जिस (परमात्मा) की दया से हरेक (जीव) की (उस तक) पहुँच हो जाती है। उसका जाप कीजिए। हे नानक! (जिसको ये दाति मिलती है) वह (हरी-) जाप ही जपता है। 7।
· सुखमनी · राग गउड़ी
आपि जपाए जपै सो नाउ ॥
आपि जपाए जपै सो नाउ ॥
आपि गावाए सु हरि गुन गाउ ॥
आपि गावाए सु हरि गुन गाउ ॥
हिन्दी अर्थ: वही मनुष्य प्रभू का नाम जपता है जिससे आप जपाता है। वही मनुष्य हरी के गुण गाता है जिसे गाने के लिए प्रेरता है।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 270 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।