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· सुखमनी · राग गउड़ी
इआहू जुगति बिहाने कई जनम ॥
इआहू जुगति बिहाने कई जनम ॥
नानक राखि लेहु आपन करि करम ॥7॥
नानक राखि लेहु आपन करि करम ॥7॥
हिन्दी अर्थ: इसी राह पर पड़ के (इसके) कई जनम गुजर गए हैं। हे नानक! (इस बिचारे जीव के लिए प्रभू-दर पर प्रार्थना करें और कहें) अपनी मेहर करके (इसे) बचा लें। 7।
· सुखमनी · राग गउड़ी
तू ठाकुरु तुम पहि अरदासि ॥
तू ठाकुरु तुम पहि अरदासि ॥
जीउ पिंडु सभु तेरी रासि ॥
तुम मात पिता हम बारिक तेरे ॥
तुमरी क्रिपा महि सूख घनेरे ॥
कोइ न जानै तुमरा अंतु ॥
ऊचे ते ऊचा भगवंत ॥
सगल समग्री तुमरै सूत्रि धारी ॥
तुम ते होइ सु आगिआकारी ॥
तुमरी गति मिति तुम ही जानी ॥
नानक दास सदा कुरबानी ॥8॥4॥
जीउ पिंडु सभु तेरी रासि ॥
तुम मात पिता हम बारिक तेरे ॥
तुमरी क्रिपा महि सूख घनेरे ॥
कोइ न जानै तुमरा अंतु ॥
ऊचे ते ऊचा भगवंत ॥
सगल समग्री तुमरै सूत्रि धारी ॥
तुम ते होइ सु आगिआकारी ॥
तुमरी गति मिति तुम ही जानी ॥
नानक दास सदा कुरबानी ॥8॥4॥
हिन्दी अर्थ: (हे प्रभू!) आप मालिक हैं (हम जीवों की) अर्ज आपके आगे ही है। ये जिंद और शरीर (जो आपने हमें दिया है) सब आपकी ही कृपा है। आप हमारे माँ-बाप हैं। हम आपके बच्चे हैं। आपकी मेहर (की नजर) में बेअंत सुख हैं। कोई आपका अंत नहीं पा सकता। (क्योंकि) आप सबसे ऊँचे भगवान हैं। (जगत के) सारे पदार्थ आपके ही हुकम में टिके हुए हैं; आपकी रची हुई सृष्टि आपकी ही आज्ञा में चल रही है। आप कैसे हैं और कितने बड़े हैं, ये तो आप स्वयं ही जानते हैं। हे नानक! (कहें। हे प्रभू!) आपके सेवक (आपसे) सदा सदके जाते हैं। 8। 4।
· सुखमनी · राग गउड़ी
देनहारु प्रभ छोडि कै लागहि आन सुआइ ॥
सलोकु ॥
देनहारु प्रभ छोडि कै लागहि आन सुआइ ॥
नानक कहू न सीझई बिनु नावै पति जाइ ॥1॥
देनहारु प्रभ छोडि कै लागहि आन सुआइ ॥
नानक कहू न सीझई बिनु नावै पति जाइ ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक ॥ (सारी दातें) देने वाले प्रभू को छोड़ के (जीव) अन्य स्वाद में लगते हैं; (पर) हे नानक! (ऐसा) कभी (कोई मनुष्य जीवन-यात्रा में) कामयाब नहीं होता (क्योंकि प्रभू के) नाम के बिना इज्जत नहीं रहती। 1।
· सुखमनी · राग गउड़ी
दस बसतू ले पाछै पावै ॥
असटपदी ॥
दस बसतू ले पाछै पावै ॥
एक बसतु कारनि बिखोटि गवावै ॥
एक भी न देइ दस भी हिरि लेइ ॥
तउ मूड़ा कहु कहा करेइ ॥
जिसु ठाकुर सिउ नाही चारा ॥
ता कउ कीजै सद नमसकारा ॥
जा कै मनि लागा प्रभु मीठा ॥
सरब सूख ताहू मनि वूठा ॥
जिसु जन अपना हुकमु मनाइआ ॥
सरब थोक नानक तिनि पाइआ ॥1॥
दस बसतू ले पाछै पावै ॥
एक बसतु कारनि बिखोटि गवावै ॥
एक भी न देइ दस भी हिरि लेइ ॥
तउ मूड़ा कहु कहा करेइ ॥
जिसु ठाकुर सिउ नाही चारा ॥
ता कउ कीजै सद नमसकारा ॥
जा कै मनि लागा प्रभु मीठा ॥
सरब सूख ताहू मनि वूठा ॥
जिसु जन अपना हुकमु मनाइआ ॥
सरब थोक नानक तिनि पाइआ ॥1॥
हिन्दी अर्थ: अष्टपदी॥ (मनुष्य प्रभू से) दस चीजें लेकर संभाल लेता है। (पर) एक चीज की खातिर अपना एतबार गवा लेता है (क्योंकि मिली हुई चीजों के बदले शुक्रिया तो करता नहीं। जो नहीं मिली उसका गिला करता रहता है)। (अगर प्रभू) एक चीज भी ना दे और, दस (दी हुई) भी छीन ले, तो बताएँ, ये मूर्ख क्या कर सकता है? जिस मालिक के साथ पेश नहीं चल सकती। उसके आगे सिर निवाना ही चाहिए। (क्योंकि) जिस मनुष्य के मन में प्रभू प्यारा लगता है। सारे सुख उसी के हृदय में आ बसते हैं। हे नानक! जिस मनुष्य से प्रभू अपना हुकम मनाता है। (दुनिया के) सारे पदार्थ (जैसे) उसने पा लिए हैं। 1।
· सुखमनी · राग गउड़ी
अगनत साहु अपनी दे रासि ॥
अगनत साहु अपनी दे रासि ॥
खात पीत बरतै अनद उलासि ॥
अपुनी अमान कछु बहुरि साहु लेइ ॥
अगिआनी मनि रोसु करेइ ॥
अपनी परतीति आप ही खोवै ॥
बहुरि उस का बिस्वासु न होवै ॥
जिस की बसतु तिसु आगै राखै ॥
प्रभ की आगिआ मानै माथै ॥
उस ते चउगुन करै निहालु ॥
नानक साहिबु सदा दइआलु ॥2॥
खात पीत बरतै अनद उलासि ॥
अपुनी अमान कछु बहुरि साहु लेइ ॥
अगिआनी मनि रोसु करेइ ॥
अपनी परतीति आप ही खोवै ॥
बहुरि उस का बिस्वासु न होवै ॥
जिस की बसतु तिसु आगै राखै ॥
प्रभ की आगिआ मानै माथै ॥
उस ते चउगुन करै निहालु ॥
नानक साहिबु सदा दइआलु ॥2॥
हिन्दी अर्थ: (प्रभू) शाह अनगिनत (पदार्थों की) पूँजी (जीव बन्जारे को) देता है। (जीव) खता पीता चाव व खुशी से (इन पदार्थों को) बरतता है। (यदि) शाह अपने कोई अमानत वापस ले ले, तो (ये) अज्ञानी मन में गुस्सा करता है; (इस तरह) अपना एतबार स्वयं ही गवा लेता है। और पुनः इसका विश्वास नहीं किया जाता। (अगर) जिस प्रभू की (बख्शी हुई) चीज है उसके आगे (खुद ही खुशी से) रख दे। और प्रभू का हुकम (कोई चीज छीने जाने के समय) सिर माथे मान ले। तो (प्रभू उसे) आगे से चौगुना निहाल करता है। हे नानक! मालिक सदैव मेहर करने वाला है। 2।
· सुखमनी · राग गउड़ी
अनिक भाति माइआ के हेत ॥ सरपर होवत जानु अनेत ॥
अनिक भाति माइआ के हेत ॥ सरपर होवत जानु अनेत ॥
बिरख की छाइआ सिउ रंगु लावै ॥
ओह बिनसै उहु मनि पछुतावै ॥
जो दीसै सो चालनहारु ॥
लपटि रहिओ तह अंध अंधारु ॥
बटाऊ सिउ जो लावै नेह ॥
ता कउ हाथि न आवै केह ॥
मन हरि के नाम की प्रीति सुखदाई ॥
करि किरपा नानक आपि लए लाई ॥3॥
बिरख की छाइआ सिउ रंगु लावै ॥
ओह बिनसै उहु मनि पछुतावै ॥
जो दीसै सो चालनहारु ॥
लपटि रहिओ तह अंध अंधारु ॥
बटाऊ सिउ जो लावै नेह ॥
ता कउ हाथि न आवै केह ॥
मन हरि के नाम की प्रीति सुखदाई ॥
करि किरपा नानक आपि लए लाई ॥3॥
हिन्दी अर्थ: माया के प्यार अनेकों किस्मों के हैं (भाव, माया के अनेकों सुंदर रूप मनुष्य के मन को मोहते हैं)। (पर ये सारे) अंत में नाश हो जाने वाले समझिए। (अगर कोई मनुष्य) वृक्ष की छाया से प्यार डाल बैठे। (नतीजा क्या निकलेगा?) वह छाया नाश हो जाती है, और वह मनुष्य मन में पछताता है। (ये सारा जगत) जो दिखाई दे रहा है नाशवंत है। इस (जगत) से ये अंधों का अंधा (जीव) चिपका बैठा है। जो (भी) मनुष्य (किसी) राही से प्यार डाल बैठता है। (अंत को) उसके हाथ पल्ले कुछ भी नहीं पड़ता। हे मन! प्रभू के नाम का प्यार (ही) सुख देने वाला है; (पर) हे नानक! (ये प्यार उस मनुष्य को नसीब होता है। जिसे) प्रभू मेहर करके खुद लगाता है। 3।
· सुखमनी · राग गउड़ी
मिथिआ तनु धनु कुटंबु सबाइआ ॥
मिथिआ तनु धनु कुटंबु सबाइआ ॥
मिथिआ हउमै ममता माइआ ॥
मिथिआ राज जोबन धन माल ॥
मिथिआ काम क्रोध बिकराल ॥
मिथिआ रथ हसती अस्व बसत्रा ॥
मिथिआ रंग संगि माइआ पेखि हसता ॥
मिथिआ ध्रोह मोह अभिमानु ॥
मिथिआ आपस ऊपरि करत गुमानु ॥
असथिरु भगति साध की सरन ॥
नानक जपि जपि जीवै हरि के चरन ॥4॥
मिथिआ हउमै ममता माइआ ॥
मिथिआ राज जोबन धन माल ॥
मिथिआ काम क्रोध बिकराल ॥
मिथिआ रथ हसती अस्व बसत्रा ॥
मिथिआ रंग संगि माइआ पेखि हसता ॥
मिथिआ ध्रोह मोह अभिमानु ॥
मिथिआ आपस ऊपरि करत गुमानु ॥
असथिरु भगति साध की सरन ॥
नानक जपि जपि जीवै हरि के चरन ॥4॥
हिन्दी अर्थ: (जब ये) शरीर, धन और सारा परिवार नाशवंत है, (तो) माया की मल्कियत और अहंकार (भाव, धन व परिवार के कारण बड़प्पन), इन पे मान भी झूठा। राज जवानी और धन माल सब नाशवंत हैं। (इस वास्ते इनके कारण) काम (की लहर) और भयानक क्रोध ये भी व्यर्थ हैं। रथ, हाथी, घोड़े और (सुंदर) कपड़े सदा कायम रहने वाले नहीं हें। (इस सारी) माया को प्यार से देख के (जीव) हसता है। (पर ये हसना व गुमान भी) व्यर्थ है। दगा, मोह और अहंकार, (ये सारे ही मन की) व्यर्थ (तरंगें) हैं; अपने ऊपर गुमान करना भी झूठा (नशा) है। सदा कायम रहने वाली (प्रभू की) भक्ति (ही है जो) गुरू की शरण पड़ कर (की जाए)। हे नानक! प्रभू के चरण (ही) सदा जप के (मनुष्य) असल जीवन जीता है। 4।
· सुखमनी · राग गउड़ी
मिथिआ स्रवन पर निंदा सुनहि ॥
मिथिआ स्रवन पर निंदा सुनहि ॥
मिथिआ हसत पर दरब कउ हिरहि ॥
मिथिआ हसत पर दरब कउ हिरहि ॥
हिन्दी अर्थ: (मनुष्य के) कान व्यर्थ हैं (अगर वे) पराई निंदा सुनते हैं। हाथ व्यर्थ हैं (अगर ये) पराए धन को चुराते हैं;
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 268 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।