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अंग 268

अंग
268
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सुखमनी साहिब का हिस्सा। पूरी 24 अष्टपदियों की हिन्दी टीका /sukhmani-sahib/ पर है।
इआहू जुगति बिहाने कई जनम ॥
नानक राखि लेहु आपन करि करम ॥7॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: इसी राह पर पड़ के (इसके) कई जनम गुजर गए हैं। हे नानक ! (इस बिचारे जीव के लिए प्रभू-दर पर प्रार्थना कर और कह) अपनी मेहर करके (इसे) बचा लो।7।
तू ठाकुरु तुम पहि अरदासि ॥
जीउ पिंडु सभु तेरी रासि ॥
तुम मात पिता हम बारिक तेरे ॥
तुमरी क्रिपा महि सूख घनेरे ॥
कोइ न जानै तुमरा अंतु ॥
ऊचे ते ऊचा भगवंत ॥
सगल समग्री तुमरै सूत्रि धारी ॥
तुम ते होइ सु आगिआकारी ॥
तुमरी गति मिति तुम ही जानी ॥
नानक दास सदा कुरबानी ॥8॥4॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: (हे प्रभू !) आप मालिक है (हम जीवों की) अर्ज आपके आगे ही है। ये जिंद और शरीर (जो तूने हमें दिया है) सब आपकी ही कृपा है। आप हमारा माँ-बाप है। हम आपके बच्चे हैं। आपकी मेहर (की नजर) में बेअंत सुख हैं। कोई आपका अंत नहीं पा सकता। (क्योंकि) आप सबसे ऊँचा भगवान है। (जगत के) सारे पदार्थ आपके ही हुकम में टिके हुए हैं; आपकी रची हुई सृष्टि आपकी ही आज्ञा में चल रही है। आप कैसा है और कितना बड़ा है, ये तो आप स्वयं ही जानता है। हे नानक ! (कह। हे प्रभू !) आपके सेवक (आपसे) सदा सदके जाते हैं।8।4।
सलोकु ॥
देनहारु प्रभ छोडि कै लागहि आन सुआइ ॥
नानक कहू न सीझई बिनु नावै पति जाइ ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: श्लोक ॥ (सारी दातें) देने वाले प्रभू को छोड़ के (जीव) अन्य स्वाद में लगते हैं; (पर) हे नानक ! (ऐसा) कभी (कोई मनुष्य जीवन-यात्रा में) कामयाब नहीं होता (क्योंकि प्रभू के) नाम के बिना इज्जत नहीं रहती।1।
असटपदी ॥
दस बसतू ले पाछै पावै ॥
एक बसतु कारनि बिखोटि गवावै ॥
एक भी न देइ दस भी हिरि लेइ ॥
तउ मूड़ा कहु कहा करेइ ॥
जिसु ठाकुर सिउ नाही चारा ॥
ता कउ कीजै सद नमसकारा ॥
जा कै मनि लागा प्रभु मीठा ॥
सरब सूख ताहू मनि वूठा ॥
जिसु जन अपना हुकमु मनाइआ ॥
सरब थोक नानक तिनि पाइआ ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: अष्टपदी॥ (मनुष्य प्रभू से) दस चीजें लेकर संभाल लेता है। (पर) एक चीज की खातिर अपना एतबार गवा लेता है (क्योंकि मिली हुई चीजों के बदले शुक्रिया तो करता नहीं। जो नहीं मिली उसका गिला करता रहता है)। (अगर प्रभू) एक चीज भी ना दे और, दस (दी हुई) भी छीन ले। तो बताओ, ये मूर्ख क्या कर सकता है? जिस मालिक के साथ पेश नहीं चल सकती। उसके आगे सिर निवाना ही चाहिए। (क्योंकि) जिस मनुष्य के मन में प्रभू प्यारा लगता है। सारे सुख उसी के हृदय में आ बसते हैं। हे नानक ! जिस मनुष्य से प्रभू अपना हुकम मनाता है। (दुनिया के) सारे पदार्थ (जैसे) उसने पा लिए हैं।1।
अगनत साहु अपनी दे रासि ॥
खात पीत बरतै अनद उलासि ॥
अपुनी अमान कछु बहुरि साहु लेइ ॥
अगिआनी मनि रोसु करेइ ॥
अपनी परतीति आप ही खोवै ॥
बहुरि उस का बिस्वासु न होवै ॥
जिस की बसतु तिसु आगै राखै ॥
प्रभ की आगिआ मानै माथै ॥
उस ते चउगुन करै निहालु ॥
नानक साहिबु सदा दइआलु ॥2॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: (प्रभू) शाह अनगिनत (पदार्थों की) पूँजी (जीव बन्जारे को) देता है। (जीव) खता पीता चाव व खुशी से (इन पदार्थों को) बरतता है। (यदि) शाह अपने कोई अमानत वापस ले ले। तो (ये) अज्ञानी मन में गुस्सा करता है; (इस तरह) अपना एतबार स्वयं ही गवा लेता है। और पुनः इसका विश्वास नहीं किया जाता। (अगर) जिस प्रभू की (बख्शी हुई) चीज है उसके आगे (खुद ही खुशी से) रख दे। और प्रभू का हुकम (कोई चीज छीने जाने के समय) सिर माथे मान ले। तो (प्रभू उसे) आगे से चौगुना निहाल करता है। हे नानक ! मालिक सदैव मेहर करने वाला है।2।
अनिक भाति माइआ के हेत ॥ सरपर होवत जानु अनेत ॥
बिरख की छाइआ सिउ रंगु लावै ॥
ओह बिनसै उहु मनि पछुतावै ॥
जो दीसै सो चालनहारु ॥
लपटि रहिओ तह अंध अंधारु ॥
बटाऊ सिउ जो लावै नेह ॥
ता कउ हाथि न आवै केह ॥
मन हरि के नाम की प्रीति सुखदाई ॥
करि किरपा नानक आपि लए लाई ॥3॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: माया के प्यार अनेकों किस्मों के हैं (भाव। माया के अनेकों सुंदर रूप मनुष्य के मन को मोहते हैं)। (पर ये सारे) अंत में नाश हो जाने वाले समझिए। (अगर कोई मनुष्य) वृक्ष की छाया से प्यार डाल बैठे। (नतीजा क्या निकलेगा?) वह छाया नाश हो जाती है, और वह मनुष्य मन में पछताता है। (ये सारा जगत) जो दिखाई दे रहा है नाशवंत है। इस (जगत) से ये अंधों का अंधा (जीव) चिपका बैठा है। जो (भी) मनुष्य (किसी) राही से प्यार डाल बैठता है। (अंत को) उसके हाथ पल्ले कुछ भी नहीं पड़ता। हे मन ! प्रभू के नाम का प्यार (ही) सुख देने वाला है; (पर) हे नानक ! (ये प्यार उस मनुष्य को नसीब होता है। जिसे) प्रभू मेहर करके खुद लगाता है।3।
मिथिआ तनु धनु कुटंबु सबाइआ ॥
मिथिआ हउमै ममता माइआ ॥
मिथिआ राज जोबन धन माल ॥
मिथिआ काम क्रोध बिकराल ॥
मिथिआ रथ हसती अस्व बसत्रा ॥
मिथिआ रंग संगि माइआ पेखि हसता ॥
मिथिआ ध्रोह मोह अभिमानु ॥
मिथिआ आपस ऊपरि करत गुमानु ॥
असथिरु भगति साध की सरन ॥
नानक जपि जपि जीवै हरि के चरन ॥4॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: (जब ये) शरीर, धन और सारा परिवार नाशवंत है। (तो) माया की मल्कियत और अहंकार (भाव। धन व परिवार के कारण बड़प्पन) -इन पे मान भी झूठा। राज जवानी और धन माल सब नाशवंत हैं। (इस वास्ते इनके कारण) काम (की लहर) और भयानक क्रोध ये भी व्यर्थ हैं। रथ, हाथी, घोड़े और (सुंदर) कपड़े सदा कायम रहने वाले नहीं हें। (इस सारी) माया को प्यार से देख के (जीव) हसता है। (पर ये हसना व गुमान भी) व्यर्थ है। दगा, मोह और अहंकार- (ये सारे ही मन की) व्यर्थ (तरंगें) हैं; अपने ऊपर गुमान करना भी झूठा (नशा) है। सदा कायम रहने वाली (प्रभू की) भक्ति (ही है जो) गुरू की शरण पड़ कर (की जाए)। हे नानक ! प्रभू के चरण (ही) सदा जप के (मनुष्य) असल जीवन जीता है।4।
मिथिआ स्रवन पर निंदा सुनहि ॥
मिथिआ हसत पर दरब कउ हिरहि ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: (मनुष्य के) कान व्यर्थ हैं (अगर वे) पराई निंदा सुनते हैं। हाथ व्यर्थ हैं (अगर ये) पराए धन को चुराते हैं;

गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “इसी राह पर पड़ के (इसके) कई जनम गुजर गए हैं।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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