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· सुखमनी · राग गउड़ी
मिथिआ नेत्र पेखत पर त्रिअ रूपाद ॥
मिथिआ नेत्र पेखत पर त्रिअ रूपाद ॥
मिथिआ रसना भोजन अन स्वाद ॥
मिथिआ चरन पर बिकार कउ धावहि ॥
मिथिआ मन पर लोभ लुभावहि ॥
मिथिआ तन नही परउपकारा ॥
मिथिआ बासु लेत बिकारा ॥
बिनु बूझे मिथिआ सभ भए ॥
सफल देह नानक हरि हरि नाम लए ॥5॥
मिथिआ रसना भोजन अन स्वाद ॥
मिथिआ चरन पर बिकार कउ धावहि ॥
मिथिआ मन पर लोभ लुभावहि ॥
मिथिआ तन नही परउपकारा ॥
मिथिआ बासु लेत बिकारा ॥
बिनु बूझे मिथिआ सभ भए ॥
सफल देह नानक हरि हरि नाम लए ॥5॥
हिन्दी अर्थ: आँखें व्यर्थ हैं (यदि ये) पराई स्त्री का रूप देखती हैं। जीभ व्यर्थ है (अगर ये) खाने व अन्य सवादों में (लगी हुई है); पैर व्यर्थ है (अगर ये) पराए नुकसान के लिए दौड़-भाग रहे हैं। हे मन! आप भी व्यर्थ हैं (यदि आप) पराए धन का लोभ कर रहे हैं। (वह) शरीर व्यर्थ हैं जो दूसरों की भलाई नहीं करते। (नाक) व्यर्थ है (जो) विकारों की वासना ले रहा है। (अपने अपने अस्तित्व के उद्देश्य) को समझे बिना (ये) सारे (अंग) व्यर्थ हैं। हे नानक! वह शरीर सफल है जो प्रभू का नाम जपता है। 5।
· सुखमनी · राग गउड़ी
बिरथी साकत की आरजा ॥
बिरथी साकत की आरजा ॥
साच बिना कह होवत सूचा ॥
बिरथा नाम बिना तनु अंध ॥
मुखि आवत ता कै दुरगंध ॥
बिनु सिमरन दिनु रैनि ब्रिथा बिहाइ ॥
मेघ बिना जिउ खेती जाइ ॥
गोबिद भजन बिनु ब्रिथे सभ काम ॥
जिउ किरपन के निरारथ दाम ॥
धंनि धंनि ते जन जिह घटि बसिओ हरि नाउ ॥
नानक ता कै बलि बलि जाउ ॥6॥
साच बिना कह होवत सूचा ॥
बिरथा नाम बिना तनु अंध ॥
मुखि आवत ता कै दुरगंध ॥
बिनु सिमरन दिनु रैनि ब्रिथा बिहाइ ॥
मेघ बिना जिउ खेती जाइ ॥
गोबिद भजन बिनु ब्रिथे सभ काम ॥
जिउ किरपन के निरारथ दाम ॥
धंनि धंनि ते जन जिह घटि बसिओ हरि नाउ ॥
नानक ता कै बलि बलि जाउ ॥6॥
हिन्दी अर्थ: (ईश्वर से) टूटे हुए मनुष्य की उम्र व्यर्थ जाती है। (क्योंकि) सच्चे प्रभू (के नाम) के बिना वह कैसे स्वच्छ हो सकता है? नाम के बिना अंधे (साकत) का शरीर (ही) किसी काम का नहीं। (क्योंकि) उसके मुंह में से (निंदा आदि) की बद बू आती है। (वैसे) सिमरन के बगैर (साकत के) दिन रात बेकार चले जाते हैं। जैसे बरखा के बगैर खेती निष्फल जाती है। प्रभू के भजन से वंचित रहने के कारण (मनुष्य के) सारे ही काम किसी अर्थ के नहीं। (क्योंकि ये काम इसका अपना कुछ नहीं सँवारते) जैसे कंजूस का धन उसके अपने किसी काम का नहीं। वह मनुष्य मुबारक हैं। जिनके हृदय में प्रभू का नाम बसता है। हे नानक! (कहें कि) मैं उन (गुरमुखों) से सदके जाता हूँ। 6।
· सुखमनी · राग गउड़ी
रहत अवर कछु अवर कमावत ॥
रहत अवर कछु अवर कमावत ॥
मनि नही प्रीति मुखहु गंढ लावत ॥
जाननहार प्रभू परबीन ॥
बाहरि भेख न काहू भीन ॥
अवर उपदेसै आपि न करै ॥
आवत जावत जनमै मरै ॥
जिस कै अंतरि बसै निरंकारु ॥
तिस की सीख तरै संसारु ॥
जो तुम भाने तिन प्रभु जाता ॥
नानक उन जन चरन पराता ॥7॥
मनि नही प्रीति मुखहु गंढ लावत ॥
जाननहार प्रभू परबीन ॥
बाहरि भेख न काहू भीन ॥
अवर उपदेसै आपि न करै ॥
आवत जावत जनमै मरै ॥
जिस कै अंतरि बसै निरंकारु ॥
तिस की सीख तरै संसारु ॥
जो तुम भाने तिन प्रभु जाता ॥
नानक उन जन चरन पराता ॥7॥
हिन्दी अर्थ: धर्म के बाहरी धारे हुए चिन्ह और हैं पर असल जिंदगी कुछ और है; मन में (तो) प्रभू से प्यार नहीं। (पर) मुंह की बातों से घर पूरा करता है। (पर दिलों की) जानने वाला प्रभू सयाना है। (वह कभी) किसी के बाहरी भेष से प्रसन्न नहीं हुआ। (जो मनुष्य) औरों को सलाहें देता है (पर) खुद (उन सलाहों पर) नहीं चलता। वह सदा जनम मरण के चक्कर में पड़ा रहता है। जिस मनुष्य के हृदय में निरंकार बसता है। उसकी शिक्षा से जगत (विकारों से) बचता है। (हे प्रभू!) जो (भगत) आपको प्यारे लगते हैं उन्होंने आपको पहिचाना है। हे नानक! (कहें): मैं उन (भक्तों) के चरणों में पड़ता हूँ। 7।
· सुखमनी · राग गउड़ी
करउ बेनती पारब्रहमु सभु जानै ॥
करउ बेनती पारब्रहमु सभु जानै ॥
अपना कीआ आपहि मानै ॥
आपहि आप आपि करत निबेरा ॥
किसै दूरि जनावत किसै बुझावत नेरा ॥
उपाव सिआनप सगल ते रहत ॥
सभु कछु जानै आतम की रहत ॥
जिसु भावै तिसु लए लड़ि लाइ ॥
थान थनंतरि रहिआ समाइ ॥
सो सेवकु जिसु किरपा करी ॥
निमख निमख जपि नानक हरी ॥8॥5॥
अपना कीआ आपहि मानै ॥
आपहि आप आपि करत निबेरा ॥
किसै दूरि जनावत किसै बुझावत नेरा ॥
उपाव सिआनप सगल ते रहत ॥
सभु कछु जानै आतम की रहत ॥
जिसु भावै तिसु लए लड़ि लाइ ॥
थान थनंतरि रहिआ समाइ ॥
सो सेवकु जिसु किरपा करी ॥
निमख निमख जपि नानक हरी ॥8॥5॥
हिन्दी अर्थ: (जो जो) विनती मैं करता हूँ। प्रभू सब जानता है। अपने पैदा किए जीव को वह खुद ही सम्मान देता है। (जीवों के किए कर्मों के मुताबिक) प्रभू खुद ही फैसला करता है। (भाव) किसी को ये बुद्धि बख्शता है कि प्रभू हमारे नजदीक है और किसी को ये जनाता है कि प्रभू कहीं दूर है। सब तरीकों से चतुराईयों से (प्रभू) परे है (भाव-किसी हीले चतुराई से प्रभू प्रसन्न नहीं होता) (क्योंकि वह जीव की) आत्मिक रहणी की हरेक बात जानता है। जो (जीव) उसे भाता है उसे अपने साथ जोड़ लेता है। प्रभू हर जगह मौजूद है। वही मनुष्य (असली) सेवक बनता है जिस पर प्रभू मेहर करता है। हे नानक! (ऐसे) प्रभू को दम-ब-दम याद करें। 8। 5।
· सुखमनी · राग गउड़ी
काम क्रोध अरु लोभ मोह बिनसि जाइ अहंमेव ॥
सलोकु ॥
काम क्रोध अरु लोभ मोह बिनसि जाइ अहंमेव ॥
नानक प्रभ सरणागती करि प्रसादु गुरदेव ॥1॥
काम क्रोध अरु लोभ मोह बिनसि जाइ अहंमेव ॥
नानक प्रभ सरणागती करि प्रसादु गुरदेव ॥1॥
हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ (मेरे) काम, क्रोध, लोभ, मोह व अहंकार दूर हो जाएं। हे नानक! (बिनती करें और कहें): हे गुरदेव! हे प्रभू! मैं शरण आया हूँ। (मेरे पर) मेहर करें। 1।
· सुखमनी · राग गउड़ी
जिह प्रसादि छतीह अंम्रित खाहि ॥
असटपदी ॥
जिह प्रसादि छतीह अंम्रित खाहि ॥
तिसु ठाकुर कउ रखु मन माहि ॥
जिह प्रसादि सुगंधत तनि लावहि ॥
तिस कउ सिमरत परम गति पावहि ॥
जिह प्रसादि बसहि सुख मंदरि ॥
तिसहि धिआइ सदा मन अंदरि ॥
जिह प्रसादि ग्रिह संगि सुख बसना ॥
आठ पहर सिमरहु तिसु रसना ॥
जिह प्रसादि रंग रस भोग ॥
नानक सदा धिआईऐ धिआवन जोग ॥1॥
जिह प्रसादि छतीह अंम्रित खाहि ॥
तिसु ठाकुर कउ रखु मन माहि ॥
जिह प्रसादि सुगंधत तनि लावहि ॥
तिस कउ सिमरत परम गति पावहि ॥
जिह प्रसादि बसहि सुख मंदरि ॥
तिसहि धिआइ सदा मन अंदरि ॥
जिह प्रसादि ग्रिह संगि सुख बसना ॥
आठ पहर सिमरहु तिसु रसना ॥
जिह प्रसादि रंग रस भोग ॥
नानक सदा धिआईऐ धिआवन जोग ॥1॥
हिन्दी अर्थ: अष्टपदी॥ (हे भाई!) जिस की कृपा से आप कई किस्मों के स्वादिष्ट पकवान खाते हैं। उस प्रभू को मन में (याद) रखें। जिसकी मेहर से अपने शरीर पर आप सुगंधियां लगाते हैं। उसे याद करने से आप उच्च पदवी हासिल कर लेंगे। जिसकी दया से आप सुख-महलों में बसते हैं। उसे सदा मन में सिमरें। जिस (प्रभू) की कृपा से आप घर में मौजों से बस रहे हैं। उसे जीभ से आठों पहर याद करें। हे नानक! जिस (प्रभू) की बख्शिश से खेल-तमाशे (मौज-मस्ती)। स्वादिष्ट भोजन व पदार्थ (नसीब होते हैं) उस ध्यानयोग को सदा ही ध्याना चाहिए। 1।
· सुखमनी · राग गउड़ी
जिह प्रसादि पाट पटंबर हढावहि ॥
जिह प्रसादि पाट पटंबर हढावहि ॥
तिसहि तिआगि कत अवर लुभावहि ॥
जिह प्रसादि सुखि सेज सोईजै ॥
मन आठ पहर ता का जसु गावीजै ॥
जिह प्रसादि तुझु सभु कोऊ मानै ॥
तिसहि तिआगि कत अवर लुभावहि ॥
जिह प्रसादि सुखि सेज सोईजै ॥
मन आठ पहर ता का जसु गावीजै ॥
जिह प्रसादि तुझु सभु कोऊ मानै ॥
हिन्दी अर्थ: (हे मन!) जिस (प्रभू) की कृपा से आप रेशमी कपड़े पहनते हैं। उसे बिसार के और कहाँ लोभ कर रहे हैं? जिसकी मेहर से सेज पर सुखी सोते हैं। हे मन! उस प्रभू का यश आठों पहर गाना चाहिए। जिसकी मेहर से हरेक मनुष्य आपका आदर करता है।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 269 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।