Lulla Family

अंग 269

अंग
269
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सुखमनी साहिब का हिस्सा। पूरी 24 अष्टपदियों की हिन्दी टीका /sukhmani-sahib/ पर है।
मिथिआ नेत्र पेखत पर त्रिअ रूपाद ॥
मिथिआ रसना भोजन अन स्वाद ॥
मिथिआ चरन पर बिकार कउ धावहि ॥
मिथिआ मन पर लोभ लुभावहि ॥
मिथिआ तन नही परउपकारा ॥
मिथिआ बासु लेत बिकारा ॥
बिनु बूझे मिथिआ सभ भए ॥
सफल देह नानक हरि हरि नाम लए ॥5॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: आँखें व्यर्थ हैं (यदि ये) पराई स्त्री का रूप देखती हैं। जीभ व्यर्थ है (अगर ये) खाने व अन्य सवादों में (लगी हुई है); पैर व्यर्थ है (अगर ये) पराए नुकसान के लिए दौड़-भाग रहे हैं। हे मन ! आप भी व्यर्थ है (यदि आप) पराए धन का लोभ कर रहा है। (वह) शरीर व्यर्थ हैं जो दूसरों की भलाई नहीं करते। (नाक) व्यर्थ है (जो) विकारों की वासना ले रहा है। (अपने अपने अस्तित्व के उद्देश्य) को समझे बिना (ये) सारे (अंग) व्यर्थ हैं। हे नानक ! वह शरीर सफल है जो प्रभू का नाम जपता है।5।
बिरथी साकत की आरजा ॥
साच बिना कह होवत सूचा ॥
बिरथा नाम बिना तनु अंध ॥
मुखि आवत ता कै दुरगंध ॥
बिनु सिमरन दिनु रैनि ब्रिथा बिहाइ ॥
मेघ बिना जिउ खेती जाइ ॥
गोबिद भजन बिनु ब्रिथे सभ काम ॥
जिउ किरपन के निरारथ दाम ॥
धंनि धंनि ते जन जिह घटि बसिओ हरि नाउ ॥
नानक ता कै बलि बलि जाउ ॥6॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: (ईश्वर से) टूटे हुए मनुष्य की उम्र व्यर्थ जाती है। (क्योंकि) सच्चे प्रभू (के नाम) के बिना वह कैसे स्वच्छ हो सकता है? नाम के बिना अंधे (साकत) का शरीर (ही) किसी काम का नहीं। (क्योंकि) उसके मुंह में से (निंदा आदि) की बद बू आती है। (वैसे) सिमरन के बगैर (साकत के) दिन रात बेकार चले जाते हैं। जैसे बरखा के बगैर खेती निष्फल जाती है। प्रभू के भजन से वंचित रहने के कारण (मनुष्य के) सारे ही काम किसी अर्थ के नहीं। (क्योंकि ये काम इसका अपना कुछ नहीं सँवारते) जैसे कंजूस का धन उसके अपने किसी काम का नहीं। वह मनुष्य मुबारक हैं। जिनके हृदय में प्रभू का नाम बसता है। हे नानक ! (कह कि) मैं उन (गुरमुखों) से सदके जाता हूँ।6।
रहत अवर कछु अवर कमावत ॥
मनि नही प्रीति मुखहु गंढ लावत ॥
जाननहार प्रभू परबीन ॥
बाहरि भेख न काहू भीन ॥
अवर उपदेसै आपि न करै ॥
आवत जावत जनमै मरै ॥
जिस कै अंतरि बसै निरंकारु ॥
तिस की सीख तरै संसारु ॥
जो तुम भाने तिन प्रभु जाता ॥
नानक उन जन चरन पराता ॥7॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: धर्म के बाहरी धारे हुए चिन्ह और हैं पर असल जिंदगी कुछ और है; मन में (तो) प्रभू से प्यार नहीं। (पर) मुंह की बातों से घर पूरा करता है। (पर दिलों की) जानने वाला प्रभू सयाना है। (वह कभी) किसी के बाहरी भेष से प्रसन्न नहीं हुआ। (जो मनुष्य) औरों को सलाहें देता है (पर) खुद (उन सलाहों पर) नहीं चलता। वह सदा जनम मरण के चक्कर में पड़ा रहता है। जिस मनुष्य के हृदय में निरंकार बसता है। उसकी शिक्षा से जगत (विकारों से) बचता है। (हे प्रभू !) जो (भगत) आपको प्यारे लगते हैं उन्होंने आपको पहिचाना है। हे नानक ! (कह) -मैं उन (भक्तों) के चरणों में पड़ता हूँ।7।
करउ बेनती पारब्रहमु सभु जानै ॥
अपना कीआ आपहि मानै ॥
आपहि आप आपि करत निबेरा ॥
किसै दूरि जनावत किसै बुझावत नेरा ॥
उपाव सिआनप सगल ते रहत ॥
सभु कछु जानै आतम की रहत ॥
जिसु भावै तिसु लए लड़ि लाइ ॥
थान थनंतरि रहिआ समाइ ॥
सो सेवकु जिसु किरपा करी ॥
निमख निमख जपि नानक हरी ॥8॥5॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: (जो जो) विनती मैं करता हूँ। प्रभू सब जानता है। अपने पैदा किए जीव को वह खुद ही सम्मान देता है। (जीवों के किए कर्मों के मुताबिक) प्रभू खुद ही फैसला करता है। (भाव) किसी को ये बुद्धि बख्शता है कि प्रभू हमारे नजदीक है और किसी को ये जनाता है कि प्रभू कहीं दूर है। सब तरीकों से चतुराईयों से (प्रभू) परे है (भाव-किसी हीले चतुराई से प्रभू प्रसन्न नहीं होता) (क्योंकि वह जीव की) आत्मिक रहणी की हरेक बात जानता है। जो (जीव) उसे भाता है उसे अपने साथ जोड़ लेता है। प्रभू हर जगह मौजूद है। वही मनुष्य (असली) सेवक बनता है जिस पर प्रभू मेहर करता है। हे नानक ! (ऐसे) प्रभू को दम-ब-दम याद कर।8।5।
सलोकु ॥
काम क्रोध अरु लोभ मोह बिनसि जाइ अहंमेव ॥
नानक प्रभ सरणागती करि प्रसादु गुरदेव ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ (मेरे) काम। क्रोध। लोभ। मोह व अहंकार दूर हो जाएं। हे नानक ! (बिनती कर और कह) -हे गुरदेव ! हे प्रभू ! मैं शरण आया हूँ। (मेरे पर) मेहर कर। 1।
असटपदी ॥
जिह प्रसादि छतीह अंम्रित खाहि ॥
तिसु ठाकुर कउ रखु मन माहि ॥
जिह प्रसादि सुगंधत तनि लावहि ॥
तिस कउ सिमरत परम गति पावहि ॥
जिह प्रसादि बसहि सुख मंदरि ॥
तिसहि धिआइ सदा मन अंदरि ॥
जिह प्रसादि ग्रिह संगि सुख बसना ॥
आठ पहर सिमरहु तिसु रसना ॥
जिह प्रसादि रंग रस भोग ॥
नानक सदा धिआईऐ धिआवन जोग ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: अष्टपदी॥ (हे भाई !) जिस की कृपा से आप कई किस्मों के स्वादिष्ट पकवान खाता है। उस प्रभू को मन में (याद) रख। जिसकी मेहर से अपने शरीर पर आप सुगंधियां लगाता है। उसे याद करने से आप उच्च पदवी हासिल कर लेगा। जिसकी दया से आप सुख-महलों में बसता है। उसे सदा मन में सिमर। जिस (प्रभू) की कृपा से आप घर में मौजों से बस रहा है। उसे जीभ से आठों पहर याद कर। हे नानक ! जिस (प्रभू) की बख्शिश से खेल-तमाशे (मौज-मस्ती)। स्वादिष्ट भोजन व पदार्थ (नसीब होते हैं) उस ध्यानयोग को सदा ही ध्याना चाहिए।1।
जिह प्रसादि पाट पटंबर हढावहि ॥
तिसहि तिआगि कत अवर लुभावहि ॥
जिह प्रसादि सुखि सेज सोईजै ॥
मन आठ पहर ता का जसु गावीजै ॥
जिह प्रसादि तुझु सभु कोऊ मानै ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: (हे मन !) जिस (प्रभू) की कृपा से आप रेशमी कपड़े पहनता है। उसे बिसार के और कहाँ लोभ कर रहा है? जिसकी मेहर से सेज पर सुखी सोते हैं। हे मन ! उस प्रभू का यश आठों पहर गाना चाहिए। जिसकी मेहर से हरेक मनुष्य आपका आदर करता है।

गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “आँखें व्यर्थ हैं (यदि ये) पराई स्त्री का रूप देखती हैं।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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