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अंग 267

अंग
267
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सुखमनी साहिब का हिस्सा। पूरी 24 अष्टपदियों की हिन्दी टीका /sukhmani-sahib/ पर है।
इहु निरगुनु गुनु कछू न बूझै ॥
बखसि लेहु तउ नानक सीझै ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: (उस प्रभ को चेते कर)। (पर) हे नानक ! (कह। हे प्रभू !) ये गुणहीन जीव (आपका) कोई उपकार नहीं समझता। (अगर) आप खुद मेहर करे। तो (ये जन्म उद्देश्य में) सफल हैं। 1।
जिह प्रसादि धर ऊपरि सुखि बसहि ॥
सुत भ्रात मीत बनिता संगि हसहि ॥
जिह प्रसादि पीवहि सीतल जला ॥
सुखदाई पवनु पावकु अमुला ॥
जिह प्रसादि भोगहि सभि रसा ॥
सगल समग्री संगि साथि बसा ॥
दीने हसत पाव करन नेत्र रसना ॥
तिसहि तिआगि अवर संगि रचना ॥
ऐसे दोख मूड़ अंध बिआपे ॥
नानक काढि लेहु प्रभ आपे ॥2॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: (हे जीव !) जिस (प्रभू) की कृपा से आप धरती पर सुखी बसता है। पुत्र भाई स्त्री के साथ हसता है; जिसकी मेहर से आप ठंडा पानी पीता है। सुख देने वाली हवा व अमुल्य आग (इस्तेमाल करता है); जिसकी कृपा से सारे रस भोगता है। सारे पदार्थों के साथ आप रहता है (भाव। सारे पदार्थ बरतने के लिए आपको मिलते हैं); (जिस ने) आपको हाथ पैर कान नाक जीभ दिए हैं। उस (प्रभू) को विसार के (हे जीव !) आप औरों के साथ मगन है। (ये) मूर्ख अंधे जीव (भलाई भुला देने वाले) ऐसे अवगुणों में फंसे हुए हैं। हे नानक ! (इन जीवों के लिए प्रार्थना कर। और कह) – हे प्रभू ! (इन्हें) स्वयं (इन अवगुणों में से) निकाल ले।2।
आदि अंति जो राखनहारु ॥
तिस सिउ प्रीति न करै गवारु ॥
जा की सेवा नव निधि पावै ॥
ता सिउ मूड़ा मनु नही लावै ॥
जो ठाकुरु सद सदा हजूरे ॥
ता कउ अंधा जानत दूरे ॥
जा की टहल पावै दरगह मानु ॥
तिसहि बिसारै मुगधु अजानु ॥
सदा सदा इहु भूलनहारु ॥
नानक राखनहारु अपारु ॥3॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: जो (इसके) जनम से ले कर मरने के समय तक (इसकी) सक्षा करने वाला है- मूर्ख मनुष्य उस प्रभू से प्यार नहीं करता। जिसकी सेवा करने से (इसे सृष्टि के) नौ ही खजाने मिल जाते हैं। मूर्ख जीव उस प्रभू के साथ चित्त नहीं जोड़ता। जो हर समय इसके अंग-संग है- अंधा मनुष्य उस ठाकुर को (कहीं) दूर (बैठा) समझता है। जिसकी टहल करने से इसे (प्रभू की) दरगाह में आदर मिलता है। मूर्ख और अंजान जीव उस प्रभू को विसार बैठता है। (पर कौन कौन सा अवगुण चितारें?) ये जीव (तो) सदा ही भूलें करता रहता है; हे नानक ! रक्षा करने वाला प्रभू बेअंत है (वह इस जीव के अवगुणों की तरफ नहीं देखता)।3।
रतनु तिआगि कउडी संगि रचै ॥
साचु छोडि झूठ संगि मचै ॥
जो छडना सु असथिरु करि मानै ॥
जो होवनु सो दूरि परानै ॥
छोडि जाइ तिस का स्रमु करै ॥
संगि सहाई तिसु परहरै ॥
चंदन लेपु उतारै धोइ ॥
गरधब प्रीति भसम संगि होइ ॥
अंध कूप महि पतित बिकराल ॥
नानक काढि लेहु प्रभ दइआल ॥4॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: (माया धारी जीव) (नाम-) रत्न छोड़ के (माया रूपी) कौड़ी से खुश रहता है। सच्चे (प्रभू) को छोड़ के नाशवंत (पदार्थों) के साथ जलता रहता है। जो (माया) छोड़ जानी है। उसे सदा अटल समझता है; जो (मौत) जरूर घटित होनी है। उसे (कहीं) दूर (बैठी) ख्याल करता है। उस (धन पदार्थ) की खातिर (नित्य) मुशक्कत करता (फिरता) है जो (आखिर में) छोड़ जानी है; जो (प्रभू) (इस) के साथ रक्षक है उसे विसार बैठा है। चंदन का लेप धो के उतार देता है। गधे का प्यार (सदा) राख से (ही) होता है। (जीव माया के) अंधेरे भयानक कूएं में गिरे पड़े हैं; हे नानक ! (अरदास कर और कह) हे दयालु प्रभू ! (इन्हें स्वयं इस कूएं में से) निकाल ले।4।
करतूति पसू की मानस जाति ॥
लोक पचारा करै दिनु राति ॥
बाहरि भेख अंतरि मलु माइआ ॥
छपसि नाहि कछु करै छपाइआ ॥
बाहरि गिआन धिआन इसनान ॥
अंतरि बिआपै लोभु सुआनु ॥
अंतरि अगनि बाहरि तनु सुआह ॥
गलि पाथर कैसे तरै अथाह ॥
जा कै अंतरि बसै प्रभु आपि ॥
नानक ते जन सहजि समाति ॥5॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: जाति मनुष्य की है (भाव। मनुष्य श्रेणी में पैदा हुआ है) पर काम पशुओं वाले हैं। (वैसे) दिन रात लोगों के लिए दिखावा कर रहा है। बाहर (शरीर पर) धार्मिक पोशाक है पर मन में माया की मैल है। (बाहर के भेस से) छुपाने का यनत करने से (मन की मैल) छुपती नहीं। बाहर (दिखावे के लिए) (तीर्थ) स्नान व ज्ञान की बातें करता है। समाधियां भी लगाता है। पर मन में लोभ (रूपी) कुक्ता अपना जोर डाल रहा है। मन में (तृष्णा की) आग है। बाहर शरीर राख (से लिबड़ा हुआ है); (यदि) गले में (विकारों के) पत्थर (हों तो) अथाह (संसार समुंद्र को जीव) कैसे तैरे? जिस जिस मनुष्य के हृदय में प्रभू आ बसता है। हे नानक ! वही अडोल अवस्था में टिके रहते हैं।5।
सुनि अंधा कैसे मारगु पावै ॥
करु गहि लेहु ओड़ि निबहावै ॥
कहा बुझारति बूझै डोरा ॥
निसि कहीऐ तउ समझै भोरा ॥
कहा बिसनपद गावै गुंग ॥
जतन करै तउ भी सुर भंग ॥
कह पिंगुल परबत पर भवन ॥
नही होत ऊहा उसु गवन ॥
करतार करुणा मै दीनु बेनती करै ॥
नानक तुमरी किरपा तरै ॥6॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: अंधा मनुष्य (निरा) सुन के कैसे राह ढूँढ ले? (हे प्रभू ! स्वयं इसका) हाथ पकड़ लो (ता कि ये) आखिर तक (प्रीति) निबाह सके। बहरा मनुष्य (निरी) बुझारत को क्या समझे? (बुझारत से) कहें (ये) रात है तो वह समझ लेता है (ये) दिन (है)। गूँगा कैसे विष्णु-पद गा सके? (कई) यतन (भी) करे तो भी उसकी सुर टूटी रहती है। लंगड़ा कैसे पहाड़ों पे चढ़ सकता है? वहां उसकी पहुँच नहीं हो सकती। हे नानक ! (इस हालत में केवल अरदास कर और कह) हे करतार ! हे दया के सागर ! (ये) निमाणा दास विनती करता है। आपकी मेहर से (ही) तैर सकता है।6।
संगि सहाई सु आवै न चीति ॥
जो बैराई ता सिउ प्रीति ॥
बलूआ के ग्रिह भीतरि बसै ॥
अनद केल माइआ रंगि रसै ॥
द्रिड़ु करि मानै मनहि प्रतीति ॥
कालु न आवै मूड़े चीति ॥
बैर बिरोध काम क्रोध मोह ॥
झूठ बिकार महा लोभ ध्रोह ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: जो प्रभू (इस मूर्ख का) संगी-साथी है। उस को (ये) याद नहीं करता। (पर) जो वैरी है उससे प्यार कर रहा है। रेत के घर में बसता है (भाव। रेत के कणों की भांति उम्र छिन छिन कर के किर रही है)। (फिर भी) माया की मस्ती में आनंद मौजें मना रहा है। (अपने आप को) अमर समझे बैठा है। मन में (यही) यकीन बना हुआ है; पर मूर्ख के चित्त में (कभी) मौत (का ख्याल भी) नहीं आता। वैर विरोध, काम, गुस्सा, मोह, झूठ, बुरे कर्म, खूब लालच और दगा-

गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे।

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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