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अंग २६७ · गउड़ी

अंग
267
गउड़ी
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  1. इहु निरगुनु गुनु कछू न बूझै ॥
  2. जिह प्रसादि धर ऊपरि सुखि बसहि ॥
  3. आदि अंति जो राखनहारु ॥
  4. रतनु तिआगि कउडी संगि रचै ॥
  5. करतूति पसू की मानस जाति ॥
  6. सुनि अंधा कैसे मारगु पावै ॥
  7. संगि सहाई सु आवै न चीति ॥

इहु निरगुनु गुनु कछू न बूझै ॥

अंग २६६ से चला आ रहा अंश

इहु निरगुनु गुनु कछू न बूझै ॥
बखसि लेहु तउ नानक सीझै ॥1॥

हिन्दी अर्थ: (उस प्रभ को चेते कर)। (पर) हे नानक ! (कह। हे प्रभू !) ये गुणहीन जीव (आपका) कोई उपकार नहीं समझता। (अगर) आप खुद मेहर करे। तो (ये जन्म उद्देश्य में) सफल हैं। 1।

जिह प्रसादि धर ऊपरि सुखि बसहि ॥

जिह प्रसादि धर ऊपरि सुखि बसहि ॥
सुत भ्रात मीत बनिता संगि हसहि ॥
जिह प्रसादि पीवहि सीतल जला ॥
सुखदाई पवनु पावकु अमुला ॥
जिह प्रसादि भोगहि सभि रसा ॥
सगल समग्री संगि साथि बसा ॥
दीने हसत पाव करन नेत्र रसना ॥
तिसहि तिआगि अवर संगि रचना ॥
ऐसे दोख मूड़ अंध बिआपे ॥
नानक काढि लेहु प्रभ आपे ॥2॥

हिन्दी अर्थ: (हे जीव !) जिस (प्रभू) की कृपा से आप धरती पर सुखी बसते हैं। पुत्र भाई स्त्री के साथ हँसते हैं; जिसकी मेहर से आप ठंडा पानी पीते हैं। सुख देने वाली हवा व अमुल्य आग (इस्तेमाल करता है); जिसकी कृपा से सारे रस भोगता है। सारे पदार्थों के साथ आप रहते हैं (भाव। सारे पदार्थ बरतने के लिए आपको मिलते हैं); (जिस ने) आपको हाथ पैर कान नाक जीभ दिए हैं। उस (प्रभू) को विसार के (हे जीव !) आप औरों के साथ मगन हैं। (ये) मूर्ख अंधे जीव (भलाई भुला देने वाले) ऐसे अवगुणों में फंसे हुए हैं। हे नानक ! (इन जीवों के लिए प्रार्थना कर। और कह) - हे प्रभू ! (इन्हें) स्वयं (इन अवगुणों में से) निकाल ले।2।

आदि अंति जो राखनहारु ॥

आदि अंति जो राखनहारु ॥
तिस सिउ प्रीति न करै गवारु ॥
जा की सेवा नव निधि पावै ॥
ता सिउ मूड़ा मनु नही लावै ॥
जो ठाकुरु सद सदा हजूरे ॥
ता कउ अंधा जानत दूरे ॥
जा की टहल पावै दरगह मानु ॥
तिसहि बिसारै मुगधु अजानु ॥
सदा सदा इहु भूलनहारु ॥
नानक राखनहारु अपारु ॥3॥

हिन्दी अर्थ: जो (इसके) जनम से ले कर मरने के समय तक (इसकी) सक्षा करने वाला है- मूर्ख मनुष्य उस प्रभू से प्यार नहीं करता। जिसकी सेवा करने से (इसे सृष्टि के) नौ ही खजाने मिल जाते हैं। मूर्ख जीव उस प्रभू के साथ चित्त नहीं जोड़ता। जो हर समय इसके अंग-संग है- अंधा मनुष्य उस ठाकुर को (कहीं) दूर (बैठा) समझता है। जिसकी टहल करने से इसे (प्रभू की) दरगाह में आदर मिलता है। मूर्ख और अंजान जीव उस प्रभू को विसार बैठता है। (पर कौन कौन सा अवगुण चितारें?) ये जीव (तो) सदा ही भूलें करता रहता है; हे नानक ! रक्षा करने वाला प्रभू बेअंत है (वह इस जीव के अवगुणों की तरफ नहीं देखता)।3।

रतनु तिआगि कउडी संगि रचै ॥

रतनु तिआगि कउडी संगि रचै ॥
साचु छोडि झूठ संगि मचै ॥
जो छडना सु असथिरु करि मानै ॥
जो होवनु सो दूरि परानै ॥
छोडि जाइ तिस का स्रमु करै ॥
संगि सहाई तिसु परहरै ॥
चंदन लेपु उतारै धोइ ॥
गरधब प्रीति भसम संगि होइ ॥
अंध कूप महि पतित बिकराल ॥
नानक काढि लेहु प्रभ दइआल ॥4॥

हिन्दी अर्थ: (माया धारी जीव) (नाम-) रत्न छोड़ के (माया रूपी) कौड़ी से खुश रहता है। सच्चे (प्रभू) को छोड़ के नाशवंत (पदार्थों) के साथ जलता रहता है। जो (माया) छोड़ जानी है। उसे सदा अटल समझता है; जो (मौत) जरूर घटित होनी है। उसे (कहीं) दूर (बैठी) ख्याल करता है। उस (धन पदार्थ) की खातिर (नित्य) मुशक्कत करता (फिरता) है जो (आखिर में) छोड़ जानी है; जो (प्रभू) (इस) के साथ रक्षक है उसे विसार बैठा है। चंदन का लेप धो के उतार देता है। गधे का प्यार (सदा) राख से (ही) होता है। (जीव माया के) अंधेरे भयानक कूएं में गिरे पड़े हैं; हे नानक ! (अरदास कर और कह) हे दयालु प्रभू ! (इन्हें स्वयं इस कूएं में से) निकाल ले।4।

करतूति पसू की मानस जाति ॥

करतूति पसू की मानस जाति ॥
लोक पचारा करै दिनु राति ॥
बाहरि भेख अंतरि मलु माइआ ॥
छपसि नाहि कछु करै छपाइआ ॥
बाहरि गिआन धिआन इसनान ॥
अंतरि बिआपै लोभु सुआनु ॥
अंतरि अगनि बाहरि तनु सुआह ॥
गलि पाथर कैसे तरै अथाह ॥
जा कै अंतरि बसै प्रभु आपि ॥
नानक ते जन सहजि समाति ॥5॥

हिन्दी अर्थ: जाति मनुष्य की है (भाव। मनुष्य श्रेणी में पैदा हुआ है) पर काम पशुओं वाले हैं। (वैसे) दिन रात लोगों के लिए दिखावा कर रहा है। बाहर (शरीर पर) धार्मिक पोशाक है पर मन में माया की मैल है। (बाहर के भेस से) छुपाने का यनत करने से (मन की मैल) छुपती नहीं। बाहर (दिखावे के लिए) (तीर्थ) स्नान व ज्ञान की बातें करता है। समाधियां भी लगाता है। पर मन में लोभ (रूपी) कुक्ता अपना जोर डाल रहा है। मन में (तृष्णा की) आग है। बाहर शरीर राख (से लिबड़ा हुआ है); (यदि) गले में (विकारों के) पत्थर (हों तो) अथाह (संसार समुंद्र को जीव) कैसे तैरे? जिस जिस मनुष्य के हृदय में प्रभू आ बसता है। हे नानक ! वही अडोल अवस्था में टिके रहते हैं।5।

सुनि अंधा कैसे मारगु पावै ॥

सुनि अंधा कैसे मारगु पावै ॥
करु गहि लेहु ओड़ि निबहावै ॥
कहा बुझारति बूझै डोरा ॥
निसि कहीऐ तउ समझै भोरा ॥
कहा बिसनपद गावै गुंग ॥
जतन करै तउ भी सुर भंग ॥
कह पिंगुल परबत पर भवन ॥
नही होत ऊहा उसु गवन ॥
करतार करुणा मै दीनु बेनती करै ॥
नानक तुमरी किरपा तरै ॥6॥

हिन्दी अर्थ: अंधा मनुष्य (निरा) सुन के कैसे राह ढूँढ ले? (हे प्रभू ! स्वयं इसका) हाथ पकड़ लो (ता कि ये) आखिर तक (प्रीति) निबाह सके। बहरा मनुष्य (निरी) बुझारत को क्या समझे? (बुझारत से) कहें (ये) रात है तो वह समझ लेता है (ये) दिन (है)। गूँगा कैसे विष्णु-पद गा सके? (कई) यतन (भी) करे तो भी उसकी सुर टूटी रहती है। लंगड़ा कैसे पहाड़ों पे चढ़ सकता है? वहां उसकी पहुँच नहीं हो सकती। हे नानक ! (इस हालत में केवल अरदास कर और कह) हे करतार ! हे दया के सागर ! (ये) निमाणा दास विनती करता है। आपकी मेहर से (ही) तैर सकता है।6।

संगि सहाई सु आवै न चीति ॥

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संगि सहाई सु आवै न चीति ॥
जो बैराई ता सिउ प्रीति ॥
बलूआ के ग्रिह भीतरि बसै ॥
अनद केल माइआ रंगि रसै ॥
द्रिड़ु करि मानै मनहि प्रतीति ॥
कालु न आवै मूड़े चीति ॥
बैर बिरोध काम क्रोध मोह ॥
झूठ बिकार महा लोभ ध्रोह ॥

हिन्दी अर्थ: जो प्रभू (इस मूर्ख का) संगी-साथी है। उस को (ये) याद नहीं करता। (पर) जो वैरी है उससे प्यार कर रहा है। रेत के घर में बसता है (भाव। रेत के कणों की भांति उम्र छिन छिन कर के किर रही है)। (फिर भी) माया की मस्ती में आनंद मौजें मना रहा है। (अपने आप को) अमर समझे बैठा है। मन में (यही) यकीन बना हुआ है; पर मूर्ख के चित्त में (कभी) मौत (का ख्याल भी) नहीं आता। वैर विरोध, काम, गुस्सा, मोह, झूठ, बुरे कर्म, खूब लालच और दगा-

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग २६७ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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