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अंग 266

अंग
266
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सुखमनी साहिब का हिस्सा। पूरी 24 अष्टपदियों की हिन्दी टीका /sukhmani-sahib/ पर है।
अनिक जतन करि त्रिसन ना ध्रापै ॥
भेख अनेक अगनि नही बुझै ॥
कोटि उपाव दरगह नही सिझै ॥
छूटसि नाही ऊभ पइआलि ॥
मोहि बिआपहि माइआ जालि ॥
अवर करतूति सगली जमु डानै ॥
गोविंद भजन बिनु तिलु नही मानै ॥
हरि का नामु जपत दुखु जाइ ॥
नानक बोलै सहजि सुभाइ ॥4॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: अनेकों यत्न करने से (माया की) प्यास नहीं बुझती। अनेकों (धार्मिक) भेख करने से (तृष्णा की) आग नहीं बुझती। (ऐसे) करोड़ों तरीके (बरतने से प्रभू की) दरगाह में सुर्खरू नहीं होते। (इन यत्नों से) जीव चाहे आकाश पे चढ़ जाए। चाहे पाताल में छुप जाए। (माया से) बच नहीं सकता। (बल्कि) जीव माया के जाल में व मोह में फंसते हैं। (नाम के बिना) और सारी करतूतों को यमराज दण्ड लगाता है। प्रभू के भजन के बिना रक्ती भर भी नहीं पतीजता। (उसका दुख प्रभू का नाम जपते ही दूर हो जाता है हे नानक ! (जो मनुष्य) आत्मिक अडोलता में टिक के प्रेम से (हरी नाम) उच्चारता है । 4।
चारि पदारथ जे को मागै ॥
साध जना की सेवा लागै ॥
जे को आपुना दूखु मिटावै ॥
हरि हरि नामु रिदै सद गावै ॥
जे को अपुनी सोभा लोरै ॥
साधसंगि इह हउमै छोरै ॥
जे को जनम मरण ते डरै ॥
साध जना की सरनी परै ॥
जिसु जन कउ प्रभ दरस पिआसा ॥
नानक ता कै बलि बलि जासा ॥5॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: अगर कोई मनुष्य (धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष) चार पदार्थों का अभिलाशी हो। (तो उसे चाहिए कि) गुरमुखों की सेवा में लगे। अगर कोई मनुष्य अपना दुख मिटाना चाहे तो प्रभू का नाम सदा हृदय में सिमरे। अगर कोई मनुष्य अपनी शोभा चाहता हैं तो सत्संगि में (रह के) इस अहंकार का त्याग करे। अगर कोई मनुष्य जनम मरन के चक्कर से डरता हैं। तो वह संतों की चरणीं लगे। हे नानक ! (कह कि) जिस मनुष्य को प्रभू के दीदार की चाहत है। मैं उससे सदा सदके जाऊँ। 5।
सगल पुरख महि पुरखु प्रधानु ॥
साधसंगि जा का मिटै अभिमानु ॥
आपस कउ जो जाणै नीचा ॥
सोऊ गनीऐ सभ ते ऊचा ॥
जा का मनु होइ सगल की रीना ॥
हरि हरि नामु तिनि घटि घटि चीना ॥
मन अपुने ते बुरा मिटाना ॥
पेखै सगल स्रिसटि साजना ॥
सूख दूख जन सम द्रिसटेता ॥
नानक पाप पुंन नही लेपा ॥6॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: (वह) मनुष्य सारे मनुष्यों में बड़ा है। सत्संग में (रह के) जिस मनुष्य का अहंकार मिट जाता है जो मनुष्य अपने आप को (सब से) बुरे कामों वाला मानता है। उसे सभी से बढ़िया समझना चाहिए। जिस मनुष्य का मन सबके चरणों की धूड़ होता है (भाव- जो सबसे गरीबी-भाव बरतता है) उस मनुष्य ने हरेक शरीर में प्रभू की सक्ता पहिचान ली है। जिसने अपने मन में से बुराई मिटा दी है। वह सारी सृष्टि (के जीवों को अपना) मित्र देखता है। हे नानक ! (ऐसे) मनुष्य सुखों और दुखों को एक जैसा समझते हैं। (तभी तो) पाप और पुंन का उनपे असर नहीं होता (भाव। ना कोई बुरा कर्म उनके मन को फसा सकता है। और ना ही स्वर्ग आदि का लालच करके या दुख-कलेश से डरके वे पुंन-कर्म करते हैं। उनका स्वभाव ही नेकी करना बन जाता है)। 6।
निरधन कउ धनु तेरो नाउ ॥
निथावे कउ नाउ तेरा थाउ ॥
निमाने कउ प्रभ तेरो मानु ॥
सगल घटा कउ देवहु दानु ॥
करन करावनहार सुआमी ॥
सगल घटा के अंतरजामी ॥
अपनी गति मिति जानहु आपे ॥
आपन संगि आपि प्रभ राते ॥
तुम॑री उसतति तुम ते होइ ॥
नानक अवरु न जानसि कोइ ॥7॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: (हे प्रभू !) कंगाल के लिए आपका नाम ही धन है। निआसरे को आपका आसरा है। निमाणे के वास्ते आपका (नाम)। हे प्रभू ! आदर मान है। आप सारे जीवों को दातें देता है। आप खुद ही सब कुछ करता है और स्वयं ही कराता है। हे स्वामी ! हे सारे प्राणियों के दिल की जानने वाले ! हे प्रभू ! आप अपनी हालत और अपनी (वडिआई) की मर्यादा आप ही जानता है; आप अपने आप में खुद ही मगन है। हे नानक ! (कह कि। हे प्रभू !) आपकी महिमा (वडिआई) आपसे ही (बयान) हैं सकती है। कोई और आपकी महिमा नहीं जानता। 7।
सरब धरम महि स्रेसट धरमु ॥
हरि को नामु जपि निरमल करमु ॥
सगल क्रिआ महि ऊतम किरिआ ॥
साधसंगि दुरमति मलु हिरिआ ॥
सगल उदम महि उदमु भला ॥
हरि का नामु जपहु जीअ सदा ॥
सगल बानी महि अंम्रित बानी ॥
हरि को जसु सुनि रसन बखानी ॥
सगल थान ते ओहु ऊतम थानु ॥
नानक जिह घटि वसै हरि नामु ॥8॥3॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: ये धर्म सारे धर्मों से बढ़िया है- (हे मन !) प्रभू का नाम जप (और) पवित्र आचरण (बना) ये काम और सारे धार्मिक रस्मों से उक्तम है – सत्संग में (रहके) बुरी मति (रूपी) मैल दूर की जाए ये उद्यम (और) सारे उद्यमों से भला है – हे मन ! सदा प्रभू का नाम जप (प्रभू के यश की ये) आत्मिक जीवन देने वाली बाणी और सब बाणियों से सुंदर है – प्रभू का यश (कानों से) सुन (और) जीभ से बोल वह (हृदय-रूपी) जगह और सभी जगहों (तीर्थों) स्थानों से पवित्र है। हे नानक ! जिस हृदय में प्रभू का नाम बसता है । 8। 3।
सलोकु ॥
निरगुनीआर इआनिआ सो प्रभु सदा समालि ॥
जिनि कीआ तिसु चीति रखु नानक निबही नालि ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक ॥ हे अंजान ! हे गुणहीन (मनुष्य) ! उस मालिक को सदा याद कर। हे नानक ! जिस ने आपको पैदा किया है। उसे चित्त में (परो के) रख। वही (आपका) साथ निभाएगा। 1।
असटपदी ॥
रमईआ के गुन चेति परानी ॥
कवन मूल ते कवन द्रिसटानी ॥
जिनि तूं साजि सवारि सीगारिआ ॥
गरभ अगनि महि जिनहि उबारिआ ॥
बार बिवसथा तुझहि पिआरै दूध ॥
भरि जोबन भोजन सुख सूध ॥
बिरधि भइआ ऊपरि साक सैन ॥ मुखि अपिआउ बैठ कउ दैन ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: अष्टपदी॥ हे जीव ! सुंदर राम के गुण याद कर। (देख) किस आदि से (आपको) कितना (सुंदर बना के उसने) दिखाया है। जिस प्रभू ने बना सँवार के सुंदर किया है। जिसने आपको पेट की आग में (भी) बचाया; जो बाल उम्र में आपको दूध पिलाता है। भरी जवानी में भोजन व सुखों की सूझ (देता है); (जब आप) बॅुढा हैं जाता है (तो) सेवा करने को साक-सज्जन (तैयार कर देता है) जो बैठे हुए को मुंह में बढ़िया भोजन देते हैं।

गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “अनेकों यत्न करने से (माया की) प्यास नहीं बुझती।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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