Lulla Family

अंग २६६ · गउड़ी

अंग
266
गउड़ी
अंग बदलें या अंश चुनें · ७ अंश

१ से १४३० तक कोई अंक लिखिए।

  1. अनिक जतन करि त्रिसन ना ध्रापै ॥
  2. चारि पदारथ जे को मागै ॥
  3. सगल पुरख महि पुरखु प्रधानु ॥
  4. निरधन कउ धनु तेरो नाउ ॥
  5. सरब धरम महि स्रेसट धरमु ॥
  6. निरगुनीआर इआनिआ सो प्रभु सदा समालि ॥
  7. रमईआ के गुन चेति परानी ॥

अनिक जतन करि त्रिसन ना ध्रापै ॥

अंग २६५ से चला आ रहा अंश

अनिक जतन करि त्रिसन ना ध्रापै ॥
भेख अनेक अगनि नही बुझै ॥
कोटि उपाव दरगह नही सिझै ॥
छूटसि नाही ऊभ पइआलि ॥
मोहि बिआपहि माइआ जालि ॥
अवर करतूति सगली जमु डानै ॥
गोविंद भजन बिनु तिलु नही मानै ॥
हरि का नामु जपत दुखु जाइ ॥
नानक बोलै सहजि सुभाइ ॥4॥

हिन्दी अर्थ: अनेकों यत्न करने से (माया की) प्यास नहीं बुझती। अनेकों (धार्मिक) भेख करने से (तृष्णा की) आग नहीं बुझती। (ऐसे) करोड़ों तरीके (बरतने से प्रभू की) दरगाह में सुर्खरू नहीं होते। (इन यत्नों से) जीव चाहे आकाश पे चढ़ जाए। चाहे पाताल में छुप जाए। (माया से) बच नहीं सकता। (बल्कि) जीव माया के जाल में व मोह में फंसते हैं। (नाम के बिना) और सारी करतूतों को यमराज दण्ड लगाता है। प्रभू के भजन के बिना रक्ती भर भी नहीं पतीजता। (उसका दुख प्रभू का नाम जपते ही दूर हो जाता है हे नानक ! (जो मनुष्य) आत्मिक अडोलता में टिक के प्रेम से (हरी नाम) उच्चारता है । 4।

चारि पदारथ जे को मागै ॥

चारि पदारथ जे को मागै ॥
साध जना की सेवा लागै ॥
जे को आपुना दूखु मिटावै ॥
हरि हरि नामु रिदै सद गावै ॥
जे को अपुनी सोभा लोरै ॥
साधसंगि इह हउमै छोरै ॥
जे को जनम मरण ते डरै ॥
साध जना की सरनी परै ॥
जिसु जन कउ प्रभ दरस पिआसा ॥
नानक ता कै बलि बलि जासा ॥5॥

हिन्दी अर्थ: अगर कोई मनुष्य (धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष) चार पदार्थों का अभिलाशी हो। (तो उसे चाहिए कि) गुरमुखों की सेवा में लगे। अगर कोई मनुष्य अपना दुख मिटाना चाहे तो प्रभू का नाम सदा हृदय में सिमरे। अगर कोई मनुष्य अपनी शोभा चाहता हो तो सत्संगि में (रह के) इस अहंकार का त्याग करे। अगर कोई मनुष्य जनम मरन के चक्कर से डरता हैं। तो वह संतों की चरणीं लगे। हे नानक ! (कह कि) जिस मनुष्य को प्रभू के दीदार की चाहत है। मैं उससे सदा सदके जाऊँ। 5।

सगल पुरख महि पुरखु प्रधानु ॥

सगल पुरख महि पुरखु प्रधानु ॥
साधसंगि जा का मिटै अभिमानु ॥
आपस कउ जो जाणै नीचा ॥
सोऊ गनीऐ सभ ते ऊचा ॥
जा का मनु होइ सगल की रीना ॥
हरि हरि नामु तिनि घटि घटि चीना ॥
मन अपुने ते बुरा मिटाना ॥
पेखै सगल स्रिसटि साजना ॥
सूख दूख जन सम द्रिसटेता ॥
नानक पाप पुंन नही लेपा ॥6॥

हिन्दी अर्थ: (वह) मनुष्य सारे मनुष्यों में बड़ा है। सत्संग में (रह के) जिस मनुष्य का अहंकार मिट जाता है जो मनुष्य अपने आप को (सब से) बुरे कामों वाला मानता है। उसे सभी से बढ़िया समझना चाहिए। जिस मनुष्य का मन सबके चरणों की धूड़ होता है (भाव- जो सबसे गरीबी-भाव बरतता है) उस मनुष्य ने हरेक शरीर में प्रभू की सक्ता पहिचान ली है। जिसने अपने मन में से बुराई मिटा दी है। वह सारी सृष्टि (के जीवों को अपना) मित्र देखता है। हे नानक ! (ऐसे) मनुष्य सुखों और दुखों को एक जैसा समझते हैं। (तभी तो) पाप और पुंन का उनपे असर नहीं होता (भाव। ना कोई बुरा कर्म उनके मन को फसा सकता है। और ना ही स्वर्ग आदि का लालच करके या दुख-कलेश से डरके वे पुंन-कर्म करते हैं। उनका स्वभाव ही नेकी करना बन जाता है)। 6।

निरधन कउ धनु तेरो नाउ ॥

निरधन कउ धनु तेरो नाउ ॥
निथावे कउ नाउ तेरा थाउ ॥
निमाने कउ प्रभ तेरो मानु ॥
सगल घटा कउ देवहु दानु ॥
करन करावनहार सुआमी ॥
सगल घटा के अंतरजामी ॥
अपनी गति मिति जानहु आपे ॥
आपन संगि आपि प्रभ राते ॥
तुम॑री उसतति तुम ते होइ ॥
नानक अवरु न जानसि कोइ ॥7॥

हिन्दी अर्थ: (हे प्रभू !) कंगाल के लिए आपका नाम ही धन है। निआसरे को आपका आसरा है। निमाणे के वास्ते आपका (नाम)। हे प्रभू ! आदर मान है। आप सारे जीवों को दातें देते हैं। आप खुद ही सब कुछ करते हैं और स्वयं ही कराते हैं। हे स्वामी ! हे सारे प्राणियों के दिल की जानने वाले ! हे प्रभू ! आप अपनी हालत और अपनी (वडिआई) की मर्यादा स्वयं ही जानते हैं; आप अपने आप में खुद ही मगन हैं। हे नानक ! (कह कि। हे प्रभू !) आपकी महिमा (वडिआई) आपसे ही (बयान) हो सकती है। कोई और आपकी महिमा नहीं जानता। 7।

सरब धरम महि स्रेसट धरमु ॥

सरब धरम महि स्रेसट धरमु ॥
हरि को नामु जपि निरमल करमु ॥
सगल क्रिआ महि ऊतम किरिआ ॥
साधसंगि दुरमति मलु हिरिआ ॥
सगल उदम महि उदमु भला ॥
हरि का नामु जपहु जीअ सदा ॥
सगल बानी महि अंम्रित बानी ॥
हरि को जसु सुनि रसन बखानी ॥
सगल थान ते ओहु ऊतम थानु ॥
नानक जिह घटि वसै हरि नामु ॥8॥3॥

हिन्दी अर्थ: ये धर्म सारे धर्मों से बढ़िया है- (हे मन !) प्रभू का नाम जप (और) पवित्र आचरण (बना) ये काम और सारे धार्मिक रस्मों से उक्तम है - सत्संग में (रहके) बुरी मति (रूपी) मैल दूर की जाए ये उद्यम (और) सारे उद्यमों से भला है - हे मन ! सदा प्रभू का नाम जप (प्रभू के यश की ये) आत्मिक जीवन देने वाली बाणी और सब बाणियों से सुंदर है - प्रभू का यश (कानों से) सुन (और) जीभ से बोल वह (हृदय-रूपी) जगह और सभी जगहों (तीर्थों) स्थानों से पवित्र है। हे नानक ! जिस हृदय में प्रभू का नाम बसता है । 8। 3।

निरगुनीआर इआनिआ सो प्रभु सदा समालि ॥

सलोकु ॥
निरगुनीआर इआनिआ सो प्रभु सदा समालि ॥
जिनि कीआ तिसु चीति रखु नानक निबही नालि ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक ॥ हे अंजान ! हे गुणहीन (मनुष्य) ! उस मालिक को सदा याद कर। हे नानक ! जिस ने आपको पैदा किया है। उसे चित्त में (परो के) रख। वही (आपका) साथ निभाएगा। 1।

रमईआ के गुन चेति परानी ॥

अगले अंग पर आगे पढ़िए →

असटपदी ॥
रमईआ के गुन चेति परानी ॥
कवन मूल ते कवन द्रिसटानी ॥
जिनि तूं साजि सवारि सीगारिआ ॥
गरभ अगनि महि जिनहि उबारिआ ॥
बार बिवसथा तुझहि पिआरै दूध ॥
भरि जोबन भोजन सुख सूध ॥
बिरधि भइआ ऊपरि साक सैन ॥ मुखि अपिआउ बैठ कउ दैन ॥

हिन्दी अर्थ: अष्टपदी॥ हे जीव ! सुंदर राम के गुण याद कर। (देख) किस आदि से (आपको) कितना (सुंदर बना के उसने) दिखाया है। जिस प्रभू ने बना सँवार के सुंदर किया है। जिसने आपको पेट की आग में (भी) बचाया; जो बाल उम्र में आपको दूध पिलाता है। भरी जवानी में भोजन व सुखों की सूझ (देता है); (जब आप) बूढ़े हो जाते हैं (तो) सेवा करने को साक-सज्जन (तैयार कर देता है) जो बैठे हुए को मुंह में बढ़िया भोजन देते हैं।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग २६६ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

English