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अंग 265

अंग
265
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सुखमनी साहिब का हिस्सा। पूरी 24 अष्टपदियों की हिन्दी टीका /sukhmani-sahib/ पर है।
हरि का नामु जन कउ भोग जोग ॥
हरि नामु जपत कछु नाहि बिओगु ॥
जनु राता हरि नाम की सेवा ॥
नानक पूजै हरि हरि देवा ॥6॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: (त्यागी की) योग (-साधना) और गृहस्ती का माया का भोग। भक्तजन के वास्ते प्रभू का नाम (ही) है। प्रभू का नाम जपते हुए (उसे) कोई दुख-कलेश नहीं होता। (प्रभू का) भक्त (सदा) प्रभू के नाम की सेवा (सिमरन) में मस्त रहता है; हे नानक ! (भक्त सदा) प्रभू-देव को ही पूजता है।6।
हरि हरि जन कै मालु खजीना ॥
हरि धनु जन कउ आपि प्रभि दीना ॥
हरि हरि जन कै ओट सताणी ॥
हरि प्रतापि जन अवर न जाणी ॥
ओति पोति जन हरि रसि राते ॥
सुंन समाधि नाम रस माते ॥
आठ पहर जनु हरि हरि जपै ॥
हरि का भगतु प्रगट नही छपै ॥
हरि की भगति मुकति बहु करे ॥
नानक जन संगि केते तरे ॥7॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: प्रभू का नाम भक्त के लिए माल धन है। ये नाम रूपी धन प्रभू ने खुद अपने भक्त को दिया है। भक्त के वास्ते प्रभू का नाम (ही) तगड़ा आसरा है। भक्तों ने प्रभू के प्रताप से किसी और आसरे को नहीं देखा। भक्तजन प्रभू-नाम-रस में पूरे तौर पर भीगे रहते हैं। और नाम-रस में मस्त हुए (मन के) टिकाव (का वे आनंद लेते हैं)। जो निर्विचार अवस्था होती है। (प्रभू का) भक्त आठों पहर प्रभू को जपता है। (जगत में) भगत प्रकट (हो जाता है) छुपा नहीं रहता। प्रभू की भक्ती बेअंत जीवों को (विकारों से) छुटकारा दिलाती है; हे नानक ! भगत की संगति में कई और भी पार हो जाते हैं।7।
पारजातु इहु हरि को नाम ॥
कामधेन हरि हरि गुण गाम ॥
सभ ते ऊतम हरि की कथा ॥
नामु सुनत दरद दुख लथा ॥
नाम की महिमा संत रिद वसै ॥
संत प्रतापि दुरतु सभु नसै ॥
संत का संगु वडभागी पाईऐ ॥
संत की सेवा नामु धिआईऐ ॥
नाम तुलि कछु अवरु न होइ ॥
नानक गुरमुखि नामु पावै जनु कोइ ॥8॥2॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: प्रभू का ये नाम (ही) ‘पारजात’ वृक्ष है। प्रभू के गुण गाने (ही इच्छा पूरक) ‘कामधेनु’ है। प्रभू की (सिफत सालाह की) बातें (और) सब (बातों) से अच्छी हैं (क्योंकि प्रभू का) नाम सुनने से सारे दुख-दर्द उतर जाते हैं। (प्रभू के) नाम की वडिआई संतों के हृदय में बसती है (और) संतों के प्रताप से सारे पाप दूर हो जाते हैं। बड़े भाग्यों से संतों की संगति मिलती है (और) संतों की सेवा (करने से) (प्रभू का) नाम सिमरा जाता है। प्रभू-नाम के बराबर और कोई (पदार्थ) नहीं। हे नानक ! गुरू के सन्मुख हो के कोई विरला मनुष्य नाम की दाति पाता है। 8। 2।
सलोकु ॥
बहु सासत्र बहु सिम्रिती पेखे सरब ढढोलि ॥
पूजसि नाही हरि हरे नानक नाम अमोल ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक ॥ बहुत से शास्त्र व बहुत सारी स्मृतियां सारे (हमने) खोज के देखे हैं; (ये पुस्तकें कई तरह की ज्ञान-चर्चाएं व कई धार्मिक व भाईचारक रस्में तो सिखाती हैं) (पर ये) अकाल-पुरख के नाम की बराबरी नहीं कर सकते। हे नानक ! (प्रभू के) नाम का मूल नहीं पाया जा सकता। 1।
असटपदी ॥
जाप ताप गिआन सभि धिआन ॥
खट सासत्र सिम्रिति वखिआन ॥
जोग अभिआस करम ध्रम किरिआ ॥
सगल तिआगि बन मधे फिरिआ ॥
अनिक प्रकार कीए बहु जतना ॥
पुंन दान होमे बहु रतना ॥
सरीरु कटाइ होमै करि राती ॥
वरत नेम करै बहु भाती ॥
नही तुलि राम नाम बीचार ॥
नानक गुरमुखि नामु जपीऐ इक बार ॥1॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: अष्टपदी ॥ (यदि कोई) (वेद मंत्रों के) जाप करे। (शरीर को धुनी रमा के) तपाए। (और) कई ज्ञान (की बातें करे) और (देवतों के) ध्यान धरे। छे शास्त्रों व स्मृतियों का उपदेश करे; योग के साधन करे। कर्म काण्डी धर्म की क्रिया करे। (अथवा) सारे (काम) छोड़ के जंगलों में भटकता फिरे; अनेकों किस्म के बड़े बड़े यत्न करे। पुंन-दान करके बहुत सारा घी हवन करे। अपने शरीर को रक्ती रक्ती करके कटाए और आग में जला दे। कई किस्मों के वर्तों के बंधन करे; (पर ये सारे ही) प्रभू के नाम की विचार के बराबर नहीं हैं। (चाहे) हे नानक ! ये नाम एक बार भी गुरू के सन्मुख हो के जपा जाए।1।
नउ खंड प्रिथमी फिरै चिरु जीवै ॥
महा उदासु तपीसरु थीवै ॥
अगनि माहि होमत परान ॥
कनिक अस्व हैवर भूमि दान ॥
निउली करम करै बहु आसन ॥
जैन मारग संजम अति साधन ॥
निमख निमख करि सरीरु कटावै ॥
तउ भी हउमै मैलु न जावै ॥
हरि के नाम समसरि कछु नाहि ॥
नानक गुरमुखि नामु जपत गति पाहि ॥2॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: (अगर कोई मनुष्य) सारी धरती पर फिरे। लम्बी उम्र तक जीता रहे। (जगत से) बहुत उपराम हो के बड़ा तपस्वी बन जाए; आग में (अपनी) जान हवन कर दे; सोना,घोड़े, बढ़िया घोड़े और जमीन दान करे; न्योली कर्म व अन्य बहुत सारे (योग) आसन करे। जैनियों के रास्ते (चल के) बड़े कठिन साधन व संजम करे; शरीर को रता रता के कटा देवे। तो भी (मन के) अहंकार की मैल दूर नहीं होती। (ऐसा) कोई (उद्यम) प्रभू के नाम के बराबर नहीं है; हे नानक ! जो मनुष्य गुरू के सन्मुख हो के नाम जपते हैं वे उच्च आत्मिक अवस्था हासिल करते हैं।2।
मन कामना तीरथ देह छुटै ॥
गरबु गुमानु न मन ते हुटै ॥
सोच करै दिनसु अरु राति ॥
मन की मैलु न तन ते जाति ॥
इसु देही कउ बहु साधना करै ॥
मन ते कबहू न बिखिआ टरै ॥
जलि धोवै बहु देह अनीति ॥
सुध कहा होइ काची भीति ॥
मन हरि के नाम की महिमा ऊच ॥
नानक नामि उधरे पतित बहु मूच ॥3॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: (कई प्राणियों के) मन की इच्छा (होती है कि) तीर्थों पर (जा के) शरीरिक चोला छोड़ा जाय। (पर इस तरह भी) गर्व, अहंकार मन में कम नहीं होता। (मनुष्य) दिन और रात (भाव। सदा) (तीर्थों पर) स्नान करे। (फिर भी) मन की मैल शरीर धोने से नहीं जाती। (अगर) इस शरीर को (साधने की खातिर) कई यतन भी करें। (तो भी) कभी मन से माया (का प्रभाव) नहीं टलता। (यदि) इस नाशवंत शरीर को कई बार पानी से भी धोएं (तो भी इस शरीर रूपी) कच्ची दीवार कहाँ पवित्र हो सकती है ? हे मन ! प्रभू के नाम की महिमा बहुत बड़ी है। हे नानक ! नाम की बरकति से अनगिनत बुरे कामों वाले जीव (विकारों से) बच जाते हैं।3।
बहुतु सिआणप जम का भउ बिआपै ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: (जीव की) बहुती चतुराई (के कारण) जमों का डर (जीव को) आ दबाता है (क्योंकि चतुराई के)

गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(त्यागी की) योग (-साधना) और गृहस्ती का माया का भोग।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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