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अंग २६४ · गउड़ी

अंग
264
गउड़ी
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  1. जह मात पिता सुत मीत न भाई ॥
  2. सगल स्रिसटि को राजा दुखीआ ॥
  3. छूटत नही कोटि लख बाही ॥
  4. जिह मारग के गने जाहि न कोसा ॥
  5. भगत जना की बरतनि नामु ॥
  6. हरि का नामु जन कउ मुकति जुगति ॥

जह मात पिता सुत मीत न भाई ॥

असटपदी ॥
जह मात पिता सुत मीत न भाई ॥
मन ऊहा नामु तेरै संगि सहाई ॥
जह महा भइआन दूत जम दलै ॥
तह केवल नामु संगि तेरै चलै ॥
जह मुसकल होवै अति भारी ॥
हरि को नामु खिन माहि उधारी ॥
अनिक पुनहचरन करत नही तरै ॥
हरि को नामु कोटि पाप परहरै ॥
गुरमुखि नामु जपहु मन मेरे ॥
नानक पावहु सूख घनेरे ॥1॥

हिन्दी अर्थ: अष्टपदी। जहाँ माता, पिता, पुत्र, मित्र, भाई कोई (साथी) नहीं (बनता)। वहाँ हे मन ! (प्रभू) का नाम आपकी सहायता करने वाला है। जहाँ बड़े भयानक जमदूतों का दल है। वहाँ आपके साथ सिर्फ प्रभू का नाम ही जाता है। जहाँ बड़ी भारी मुश्किल होती है। (वहाँ) प्रभू का नाम पलक झपकने में बचा लेता है। अनेकों धार्मिक रस्में करके भी (मनुष्य पापों से) नहीं बचता। (पर) प्रभू का नाम करोड़ों पापों का नाश कर देता है। (इसलिए) हे मेरे मन ! गुरू की शरण पड़ के (प्रभू का) नाम जप। हे नानक ! (नाम की बरकति से) बड़े सुख पाएगा। 1।

सगल स्रिसटि को राजा दुखीआ ॥

सगल स्रिसटि को राजा दुखीआ ॥
हरि का नामु जपत होइ सुखीआ ॥
लाख करोरी बंधु न परै ॥
हरि का नामु जपत निसतरै ॥
अनिक माइआ रंग तिख न बुझावै ॥
हरि का नामु जपत आघावै ॥
जिह मारगि इहु जात इकेला ॥
तह हरि नामु संगि होत सुहेला ॥
ऐसा नामु मन सदा धिआईऐ ॥
नानक गुरमुखि परम गति पाईऐ ॥2॥

हिन्दी अर्थ: (मनुष्य) सारी दुनिया का राजा (हो के भी) दुखी (रहता है) पर प्रभू का नाम जपने से सुखी (हो जाता है); (क्योंकि) लाखों करोड़ों (रुपए) कमा के भी (माया की प्यास को) रोक नहीं पड़ती। (इस माया के दल दल से) प्रभू का नाम जप के ही मनुष्य पार लांघ जाता है माया की बेअंत मौजें होते हुए भी (माया की) प्यास नहीं बुझती। (पर) प्रभू का नाम जपने से (मनुष्य माया की तरफ से) तृप्त हो जाता है। जिन राहों से ये जीव अकेला जाता है। (भाव। जिंदगी के जिन झमेलों में इस चिंतातुर जीव की कोई सहायता नहीं कर सकता) वहाँ प्रभू का नाम इसके साथ सुख देने वाला होता है। (इस वास्ते) हे मन ! ऐसा (सुहेला) नाम सदा सिमरें। हे नानक ! गुरू के द्वारा (नाम जपने से) ऊँचा दर्जा मिलता है। 2।

छूटत नही कोटि लख बाही ॥

छूटत नही कोटि लख बाही ॥
नामु जपत तह पारि पराही ॥
अनिक बिघन जह आइ संघारै ॥
हरि का नामु ततकाल उधारै ॥
अनिक जोनि जनमै मरि जाम ॥
नामु जपत पावै बिस्राम ॥
हउ मैला मलु कबहु न धोवै ॥
हरि का नामु कोटि पाप खोवै ॥
ऐसा नामु जपहु मन रंगि ॥
नानक पाईऐ साध कै संगि ॥3॥

हिन्दी अर्थ: लाखों करोड़ों भाईयों के होते हुए (मनुष्य जिस दीन अवस्था से) निजात नहीं पा सकता। वहाँ (प्रभू का) नाम जपने से (जीव) पार लांघ जाते हैं। जहाँ अनेको मुश्किलें आ दबोचती हैं। (वहाँ) प्रभू का नाम तुरंत बचा लेता है। (जीव) अनेकों जूनियों में पैदा होता है मरता है (फिर) पैदा होता है (इसी तरह जनम मरण के चक्कर में पड़ा रहता है)। नाम जपने से (प्रभू चरणों में) टिक जाता है। अहंकार से गंदा हुआ (जीव) कभी ये मैल धोता नहीं। (पर) प्रभू का नाम करोड़ों पाप नाश कर देता है। हे मन ! (प्रभू का) ऐसा नाम प्यार से जप। हे नानक ! (प्रभू का नाम) गुरमुखों की संगति में मिलता है। 3।

जिह मारग के गने जाहि न कोसा ॥

जिह मारग के गने जाहि न कोसा ॥
हरि का नामु ऊहा संगि तोसा ॥
जिह पैडै महा अंध गुबारा ॥
हरि का नामु संगि उजीआरा ॥
जहा पंथि तेरा को न सिञानू ॥
हरि का नामु तह नालि पछानू ॥
जह महा भइआन तपति बहु घाम ॥
तह हरि के नाम की तुम ऊपरि छाम ॥
जहा त्रिखा मन तुझु आकरखै ॥
तह नानक हरि हरि अंम्रितु बरखै ॥4॥

हिन्दी अर्थ: जिस (जिंदगी रूपी) राह के कोस गिने नहीं जा सकते। वहाँ (भाव। उस लंबे सफर में) प्रभू का नाम (जीव की) रास पूँजी है। जिस (जिंदगी रूप) राह में (विकारों का) घोर अंधकार है। (वहाँ) प्रभू का नाम (जीव के) साथ रौशनी है। जिस रास्ते में (हे जीव !) आपका कोई (असली) महरम नहीं। वहाँ प्रभू का नाम आपके साथ (सच्चा) साथी है। जहाँ (जिंदगी के सफर में) (विकारों की) बड़ी भयानक तपश व गरमी है। वहाँ (हे जीव !) प्रभू का नाम आपके पर छाया है। (हे जीव !) जहाँ (माया की) प्यास आपको (सदा) आकर्षित करती है। वहाँ, हे नानक ! प्रभू के नाम की बरखा होती है (जो तपश को बुझा देती है)। 4।

भगत जना की बरतनि नामु ॥

भगत जना की बरतनि नामु ॥
संत जना कै मनि बिस्रामु ॥
हरि का नामु दास की ओट ॥
हरि कै नामि उधरे जन कोटि ॥
हरि जसु करत संत दिनु राति ॥
हरि हरि अउखधु साध कमाति ॥
हरि जन कै हरि नामु निधानु ॥
पारब्रहमि जन कीनो दान ॥
मन तन रंगि रते रंग एकै ॥
नानक जन कै बिरति बिबेकै ॥5॥

हिन्दी अर्थ: प्रभू का नाम भगतों का हथियार है। भक्तों के मन में ये टिका रहता है। प्रभू का नाम भक्तों का आसरा है। प्रभू के नाम से करोड़ों लोग (विकारों से) बच जाते हैं। भक्त जन दिन रात प्रभू की उस्तति करते हैं। और प्रभू नाम रूपी दवा इकट्ठी करते हैं (जिससे अहंकार का रोग दूर होता है)। भक्तों के पास प्रभू का नाम ही खजाना है। प्रभू ने नाम की बख्शिश अपने सेवकों पर स्वयं की है। भक्त जन मन से तन से एक प्रभू के प्यार में रंगे रहते हैं; हे नानक ! भक्तों के अंदर भले-बुरे की परख करने का स्वभाव बन जाता है।5।

हरि का नामु जन कउ मुकति जुगति ॥

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हरि का नामु जन कउ मुकति जुगति ॥
हरि कै नामि जन कउ त्रिपति भुगति ॥
हरि का नामु जन का रूप रंगु ॥
हरि नामु जपत कब परै न भंगु ॥
हरि का नामु जन की वडिआई ॥
हरि कै नामि जन सोभा पाई ॥

हिन्दी अर्थ: भक्त के वास्ते प्रभू का नाम (ही) (माया के बंधनों से) छुटकारा पाने का वसीला है। (क्योंकि) प्रभू के नाम से भगत (माया के) भोगों की ओर से तृप्त हो जाता है। प्रभू का नाम भगत का सुहज सुंदरता है। प्रभू का नाम जपते हुए (भक्त के राह में) कभी (कोई) अटकाव नहीं पड़ता। प्रभू का नाम (ही) भक्त का मान-सम्मान है। (क्योंकि) प्रभू के नाम द्वारा (ही) भक्तों ने (जगत में) मशहूरी पाई है।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग २६४ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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