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अंग 264

अंग
264
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सुखमनी साहिब का हिस्सा। पूरी 24 अष्टपदियों की हिन्दी टीका /sukhmani-sahib/ पर है।
असटपदी ॥
जह मात पिता सुत मीत न भाई ॥
मन ऊहा नामु तेरै संगि सहाई ॥
जह महा भइआन दूत जम दलै ॥
तह केवल नामु संगि तेरै चलै ॥
जह मुसकल होवै अति भारी ॥
हरि को नामु खिन माहि उधारी ॥
अनिक पुनहचरन करत नही तरै ॥
हरि को नामु कोटि पाप परहरै ॥
गुरमुखि नामु जपहु मन मेरे ॥
नानक पावहु सूख घनेरे ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: अष्टपदी। जहाँ माता, पिता, पुत्र, मित्र, भाई कोई (साथी) नहीं (बनता)। वहाँ हे मन ! (प्रभू) का नाम आपकी सहायता करने वाला है। जहाँ बड़े भयानक जमदूतों का दल है। वहाँ आपके साथ सिर्फ प्रभू का नाम ही जाता है। जहाँ बड़ी भारी मुश्किल होती है। (वहाँ) प्रभू का नाम पलक झपकने में बचा लेता है। अनेकों धार्मिक रस्में करके भी (मनुष्य पापों से) नहीं बचता। (पर) प्रभू का नाम करोड़ों पापों का नाश कर देता है। (इसलिए) हे मेरे मन ! गुरू की शरण पड़ के (प्रभू का) नाम जप। हे नानक ! (नाम की बरकति से) बड़े सुख पाएगा। 1।
सगल स्रिसटि को राजा दुखीआ ॥
हरि का नामु जपत होइ सुखीआ ॥
लाख करोरी बंधु न परै ॥
हरि का नामु जपत निसतरै ॥
अनिक माइआ रंग तिख न बुझावै ॥
हरि का नामु जपत आघावै ॥
जिह मारगि इहु जात इकेला ॥
तह हरि नामु संगि होत सुहेला ॥
ऐसा नामु मन सदा धिआईऐ ॥
नानक गुरमुखि परम गति पाईऐ ॥2॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: (मनुष्य) सारी दुनिया का राजा (हो के भी) दुखी (रहता है) पर प्रभू का नाम जपने से सुखी (हो जाता है); (क्योंकि) लाखों करोड़ों (रुपए) कमा के भी (माया की प्यास को) रोक नहीं पड़ती। (इस माया के दल दल से) प्रभू का नाम जप के ही मनुष्य पार लांघ जाता है माया की बेअंत मौजें होते हुए भी (माया की) प्यास नहीं बुझती। (पर) प्रभू का नाम जपने से (मनुष्य माया की तरफ से) तृप्त हो जाता है। जिन राहों से ये जीव अकेला जाता है। (भाव। जिंदगी के जिन झमेलों में इस चिंतातुर जीव की कोई सहायता नहीं कर सकता) वहाँ प्रभू का नाम इसके साथ सुख देने वाला होता है। (इस वास्ते) हे मन ! ऐसा (सुहेला) नाम सदा सिमरें। हे नानक ! गुरू के द्वारा (नाम जपने से) ऊँचा दर्जा मिलता है। 2।
छूटत नही कोटि लख बाही ॥
नामु जपत तह पारि पराही ॥
अनिक बिघन जह आइ संघारै ॥
हरि का नामु ततकाल उधारै ॥
अनिक जोनि जनमै मरि जाम ॥
नामु जपत पावै बिस्राम ॥
हउ मैला मलु कबहु न धोवै ॥
हरि का नामु कोटि पाप खोवै ॥
ऐसा नामु जपहु मन रंगि ॥
नानक पाईऐ साध कै संगि ॥3॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: लाखों करोड़ों भाईयों के होते हुए (मनुष्य जिस दीन अवस्था से) निजात नहीं पा सकता। वहाँ (प्रभू का) नाम जपने से (जीव) पार लांघ जाते हैं। जहाँ अनेको मुश्किलें आ दबोचती हैं। (वहाँ) प्रभू का नाम तुरंत बचा लेता है। (जीव) अनेकों जूनियों में पैदा होता है मरता है (फिर) पैदा होता है (इसी तरह जनम मरण के चक्कर में पड़ा रहता है)। नाम जपने से (प्रभू चरणों में) टिक जाता है। अहंकार से गंदा हुआ (जीव) कभी ये मैल धोता नहीं। (पर) प्रभू का नाम करोड़ों पाप नाश कर देता है। हे मन ! (प्रभू का) ऐसा नाम प्यार से जप। हे नानक ! (प्रभू का नाम) गुरमुखों की संगति में मिलता है। 3।
जिह मारग के गने जाहि न कोसा ॥
हरि का नामु ऊहा संगि तोसा ॥
जिह पैडै महा अंध गुबारा ॥
हरि का नामु संगि उजीआरा ॥
जहा पंथि तेरा को न सिञानू ॥
हरि का नामु तह नालि पछानू ॥
जह महा भइआन तपति बहु घाम ॥
तह हरि के नाम की तुम ऊपरि छाम ॥
जहा त्रिखा मन तुझु आकरखै ॥
तह नानक हरि हरि अंम्रितु बरखै ॥4॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: जिस (जिंदगी रूपी) राह के कोस गिने नहीं जा सकते। वहाँ (भाव। उस लंबे सफर में) प्रभू का नाम (जीव की) रास पूँजी है। जिस (जिंदगी रूप) राह में (विकारों का) घोर अंधकार है। (वहाँ) प्रभू का नाम (जीव के) साथ रौशनी है। जिस रास्ते में (हे जीव !) आपका कोई (असली) महरम नहीं। वहाँ प्रभू का नाम आपके साथ (सच्चा) साथी है। जहाँ (जिंदगी के सफर में) (विकारों की) बड़ी भयानक तपश व गरमी है। वहाँ (हे जीव !) प्रभू का नाम आपके पर छाया है। (हे जीव !) जहाँ (माया की) प्यास आपको (सदा) आकर्षित करती है। वहाँ, हे नानक ! प्रभू के नाम की बरखा होती है (जो तपश को बुझा देती है)। 4।
भगत जना की बरतनि नामु ॥
संत जना कै मनि बिस्रामु ॥
हरि का नामु दास की ओट ॥
हरि कै नामि उधरे जन कोटि ॥
हरि जसु करत संत दिनु राति ॥
हरि हरि अउखधु साध कमाति ॥
हरि जन कै हरि नामु निधानु ॥
पारब्रहमि जन कीनो दान ॥
मन तन रंगि रते रंग एकै ॥
नानक जन कै बिरति बिबेकै ॥5॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: प्रभू का नाम भगतों का हथियार है। भक्तों के मन में ये टिका रहता है। प्रभू का नाम भक्तों का आसरा है। प्रभू के नाम से करोड़ों लोग (विकारों से) बच जाते हैं। भक्त जन दिन रात प्रभू की उस्तति करते हैं। और प्रभू नाम रूपी दवा इकट्ठी करते हैं (जिससे अहंकार का रोग दूर होता है)। भक्तों के पास प्रभू का नाम ही खजाना है। प्रभू ने नाम की बख्शिश अपने सेवकों पर स्वयं की है। भक्त जन मन से तन से एक प्रभू के प्यार में रंगे रहते हैं; हे नानक ! भक्तों के अंदर भले-बुरे की परख करने का स्वभाव बन जाता है।5।
हरि का नामु जन कउ मुकति जुगति ॥
हरि कै नामि जन कउ त्रिपति भुगति ॥
हरि का नामु जन का रूप रंगु ॥
हरि नामु जपत कब परै न भंगु ॥
हरि का नामु जन की वडिआई ॥
हरि कै नामि जन सोभा पाई ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: भक्त के वास्ते प्रभू का नाम (ही) (माया के बंधनों से) छुटकारा पाने का वसीला है। (क्योंकि) प्रभू के नाम से भगत (माया के) भोगों की ओर से तृप्त हो जाता है। प्रभू का नाम भगत का सुहज सुंदरता है। प्रभू का नाम जपते हुए (भक्त के राह में) कभी (कोई) अटकाव नहीं पड़ता। प्रभू का नाम (ही) भक्त का मान-सम्मान है। (क्योंकि) प्रभू के नाम द्वारा (ही) भक्तों ने (जगत में) मशहूरी पाई है।

गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे।

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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