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अंग २६३ · गउड़ी

अंग
263
गउड़ी
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  1. नानक ता कै लागउ पाए ॥3॥
  2. प्रभ का सिमरनु सभ ते ऊचा ॥
  3. प्रभ कउ सिमरहि से धनवंते ॥
  4. प्रभ कउ सिमरहि से परउपकारी ॥
  5. प्रभ कै सिमरनि कारज पूरे ॥
  6. हरि सिमरनु करि भगत प्रगटाए ॥
  7. दीन दरद दुख भंजना घटि घटि नाथ अनाथ ॥

नानक ता कै लागउ पाए ॥3॥

अंग २६२ से चला आ रहा अंश

नानक ता कै लागउ पाए ॥3॥

हिन्दी अर्थ: कह) हे नानक ! मैं उन (सिमरन करने वालों) के पैर लगूँ। 3।

प्रभ का सिमरनु सभ ते ऊचा ॥

प्रभ का सिमरनु सभ ते ऊचा ॥
प्रभ कै सिमरनि उधरे मूचा ॥
प्रभ कै सिमरनि त्रिसना बुझै ॥
प्रभ कै सिमरनि सभु किछु सुझै ॥
प्रभ कै सिमरनि नाही जम त्रासा ॥
प्रभ कै सिमरनि पूरन आसा ॥
प्रभ कै सिमरनि मन की मलु जाइ ॥
अंम्रित नामु रिद माहि समाइ ॥
प्रभ जी बसहि साध की रसना ॥
नानक जन का दासनि दसना ॥4॥

हिन्दी अर्थ: प्रभू का सिमरन करना (और) सभी (कोशिशों) से बेहतर है; प्रभू का सिमरन करने से बहुत सारे (जीव) (विकारों से) बच जाते हैं। प्रभू का सिमरन करने से (माया की) प्यास मिट जाती है। (क्योंकि माया के) हरेक (तेवर) की समझ पड़ जाती है। प्रभू का सिमरन करने से जमों का डर खत्म हो जाता है। और। (जीव की) आस पूर्ण हो जाती है (भाव। आशाओं से मन तृप्त हो जाता है)। प्रभू का सिमरन करने से मन की (विकारों की) मैल दूर हो जाती है। और मनुष्य के हृदय में (प्रभू का) अमर करने वाला नाम टिक जाता है। प्रभू जी गुरमुख मनुष्यों की जीभ पर बसते हैं (भाव। साधु जन सदा प्रभू को जपते हैं)। (कह) हे नानक ! (मैं) गुरमुखों के सेवकों का सेवक (बनूँ)। 4।

प्रभ कउ सिमरहि से धनवंते ॥

प्रभ कउ सिमरहि से धनवंते ॥
प्रभ कउ सिमरहि से पतिवंते ॥
प्रभ कउ सिमरहि से जन परवान ॥
प्रभ कउ सिमरहि से पुरख प्रधान ॥
प्रभ कउ सिमरहि सि बेमुहताजे ॥
प्रभ कउ सिमरहि सि सरब के राजे ॥
प्रभ कउ सिमरहि से सुखवासी ॥
प्रभ कउ सिमरहि सदा अबिनासी ॥
सिमरन ते लागे जिन आपि दइआला ॥
नानक जन की मंगै रवाला ॥5॥

हिन्दी अर्थ: जो मनुष्य प्रभू को सिमरते हैं। वे धनवान हैं। और वे आदरणीय हैं। जो मनुष्य प्रभू को सिमरते हैं। वे जाने माने प्रसिद्ध हुए हें। और वे (सब मनुष्यों से) अच्छे हैं। जो मनुष्य प्रभू को सिमरते हैं। वे किसी के मुहताज नहीं हैं। वे (तो बल्कि) सब के बादशाह हैं। जो मनुष्य प्रभू को सिमरते हैं वे सुखी बसते हैं और सदा के वास्ते जनम मरन से रहित हो जाते हैं। (पर) प्रभू सिमरन में वही मनुष्य लगते हैं जिनपे प्रभू स्वयं मेहरबान (होता है); हे नानक ! (कोई भाग्यशाली) इन गुरमुखों की चरण-धूड़ माँगता है। 5।

प्रभ कउ सिमरहि से परउपकारी ॥

प्रभ कउ सिमरहि से परउपकारी ॥
प्रभ कउ सिमरहि तिन सद बलिहारी ॥
प्रभ कउ सिमरहि से मुख सुहावे ॥
प्रभ कउ सिमरहि तिन सूखि बिहावै ॥
प्रभ कउ सिमरहि तिन आतमु जीता ॥
प्रभ कउ सिमरहि तिन निरमल रीता ॥
प्रभ कउ सिमरहि तिन अनद घनेरे ॥
प्रभ कउ सिमरहि बसहि हरि नेरे ॥
संत क्रिपा ते अनदिनु जागि ॥
नानक सिमरनु पूरै भागि ॥6॥

हिन्दी अर्थ: जो मनुष्य प्रभू को सिमरते हैं। वे दूसरों के साथ भलाई करने वाले बन जाते हें। उनसे (मैं) सदा सदके हूँ। जो मनुष्य प्रभू को सिमरते हैं। उनके मुंह सुंदर (लगते) हैं। उनकी (उम्र) सुख में गुजरती है। जो मनुष्य प्रभू को सिमरते हैं वे अपने आप को जीत लेते हैं और उनका जिंदगी गुजारने का तरीका पवित्र हो जाता है। जो मनुष्य प्रभू को सिमरते हैं, उन्हें खुशियां ही खुशियां हैं। (क्योंकि) वे प्रभू की हजूरी में बसते हैं। संतों की कृपा से ही ये हर समय (सिमरन की) जाग आ सकती है; हे नानक ! सिमरन (की दाति) बड़ी किस्मत से (मिलती है)। 6।

प्रभ कै सिमरनि कारज पूरे ॥

प्रभ कै सिमरनि कारज पूरे ॥
प्रभ कै सिमरनि कबहु न झूरे ॥
प्रभ कै सिमरनि हरि गुन बानी ॥
प्रभ कै सिमरनि सहजि समानी ॥
प्रभ कै सिमरनि निहचल आसनु ॥
प्रभ कै सिमरनि कमल बिगासनु ॥
प्रभ कै सिमरनि अनहद झुनकार ॥
सुखु प्रभ सिमरन का अंतु न पार ॥
सिमरहि से जन जिन कउ प्रभ मइआ ॥
नानक तिन जन सरनी पइआ ॥7॥

हिन्दी अर्थ: प्रभू का सिमरन करने से मनुष्य के (सारे) काम पूरे हो जाते हैं (वह आवश्यक्ताओं के अधीन नहीं रहता) और कभी चिंताओं के वश नहीं पड़ता। प्रभू का सिमरन करने से मनुष्य अकाल पुरख के गुण ही उच्चारता है (भाव उसे सिफत सालाह की आदत पड़ जाती है) और सहज अवस्था में टिका रहता है। प्रभू का सिमरन करने से मनुष्य का (मन रूपी) आसन डोलता नहीं और उसके (हृदय का) कमल-फूल खिला रहता है। प्रभू का सिमरन करने से (मनुष्य के अंदर) एक-रस संगीत सा (होता रहता है)। प्रभू के सिमरन से जो सुख (उपजता) है वह (कभी) खत्म नहीं होता। वही मनुष्य (प्रभू को) सिमरते हैं। जिन पर प्रभू की मेहर होती है; हे नानक ! (कोई भाग्यशाली) उन (सिमरन करने वाले) जनों की शरण पड़ता है। 7।

हरि सिमरनु करि भगत प्रगटाए ॥

हरि सिमरनु करि भगत प्रगटाए ॥
हरि सिमरनि लगि बेद उपाए ॥
हरि सिमरनि भए सिध जती दाते ॥
हरि सिमरनि नीच चहु कुंट जाते ॥
हरि सिमरनि धारी सभ धरना ॥
सिमरि सिमरि हरि कारन करना ॥
हरि सिमरनि कीओ सगल अकारा ॥
हरि सिमरन महि आपि निरंकारा ॥
करि किरपा जिसु आपि बुझाइआ ॥
नानक गुरमुखि हरि सिमरनु तिनि पाइआ ॥8॥1॥

हिन्दी अर्थ: प्रभू का सिमरन करके भगत (जगत में) मशहूर होते हैं। सिमरन में ही जुड़ के (ऋषियों ने) वेद (आदि धर्म पुस्तकें) रचीं। प्रभू के सिमरन द्वारा ही मनुष्य सिद्ध बन गए। जती बन गए। दाते बन गए; सिमरन की बरकति से नीच मनुष्य सारे संसार में प्रगट हो गए। प्रभू के सिमरन ने सारी धरती को आसरा दिया हुआ है; (इसलिए। हे भाई !) जगत के कर्ता प्रभू को सदा सिमर। प्रभू ने सिमरन के वास्ते सारा जगत बनाया है; जहाँ सिमरन है वहाँ निरंकार स्वयं बसता है। मेहर करके जिस मनुष्य को (सिमरन करने की) समझ देता है। हे नानक ! उस मनुष्य ने गुरू के द्वारा सिमरन (की दाति) प्राप्त कर ली है। 8। 1।

दीन दरद दुख भंजना घटि घटि नाथ अनाथ ॥

सलोकु ॥
दीन दरद दुख भंजना घटि घटि नाथ अनाथ ॥
सरणि तुम॑ारी आइओ नानक के प्रभ साथ ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक ॥ दीनों के दर्द और दुखों का नाश करने वाले हे प्रभू ! हे हरेक शरीर में व्यापक हरी ! हे अनाथों के नाथ ! हे प्रभू ! गुरू नानक का पल्ला पकड़ के मैं आपकी शरण आया हूँ। १।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग २६३ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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